श्रीकृष्ण ‘जुगनू’
प्राचीन संस्कृत साहित्य के विद्वान
वेद निखिल विश्व के लिए ज्ञान—विज्ञान के प्राचीनतम आधार और स्रोत हैं। जिस स्तर का ज्ञान वैदिक कोष में संचित है, वह परम विज्ञान है और आज का विकसमान विज्ञान उनसे अपनी तुलना करता है या उस स्रोत को सत्यापित करता है। यह आश्चर्य है कि वैदिक ऋषि मानवीय प्रज्ञा की पहुंच से कितने आगे थे। वेद को ज्ञान की प्रयोगशाला मानकर मेरा मन अनेक कल्पनाएं करता है और सोचता है कि वैदिक भाषा और उसका प्रयोग कैसे अनुभव के परम चरम को कंठ कोश बनाने में सफल रहे! इसी कारण वेद सच्चे अर्थों में ज्ञान के आकर (भंडार) और नित्य नवीन विचार के सर्जक भी हैं।
प्रकृति के ज्ञानाधार
ऋग्वेद से लेकर अथर्ववेद तक ज्ञान के जो चरण विकासमान हैं, उनमें कृषि और वनस्पति विज्ञान के अनेक सोपान हैं। वनस्पति के अध्ययन का सुंदर प्रतिरूपण हमें वेदों में मिलता है। यजुर्वेद के ऋषियों ने जिस रूप में प्राकृतिक जड़ी—बूटियों की प्रार्थना की है, वह मानवीय सभ्यता में सहायक संपदाओं के स्तवन का सुंदर चित्र है। कहना न होगा कि प्रकृति की सुंदरतम, प्राणवान रचना है : पेड़-पौधे, गुल्म और लता-वल्लरी। ये सदैव दाता होने से देवता रूप हैं। वनस्पति उपासना अर्थात् पेड़-पौधों की पूजा हमारी संस्कृति का मुख्य अंग है और हर कहीं जुड़ी है। यह पद्धति अकारण नहीं शुरू हुई है। पेड़ पंचांग रूप से उपयोगी है। पेड़ों से हमें प्राण वायु, भोजन और जल तीनों मिलता है और इन्हीं से हमारा जीवन चक्र चलता है।
परंपरा में बहुत सुनियोजित ऐतरेय ब्राह्मण और कौषितकि ब्राह्मण ग्रंथ में “प्राणौ वै वनस्पति:” कहा गया है। (ऐतरेय 2.4, कौषितकि 12.7) यह सामान्य सूत्र नहीं है, बल्कि दीर्घ अनुभव आधारित हैं। कहा गया है, जहां वनस्पतियों से हमारे जीवन को संचालित करने वाले तत्व मिलते हैं, वहीं वनस्पतियां ऐसे तत्वों को भी समाप्त करती हैं, जो हमारे जीवन को नुकसान पहुंचाते हैं, यह सूत्र वैदिक ऋषियों को पता था। विद्वानों ने माना है कि वनस्पतियों को पृथ्वी पर शिव ( कल्याण) की प्रतिनिधि यूं ही नहीं कहा जाता। उसका गंभीर अर्थ है। वे परिवेश का जाना अनजाना विष पीती हैं और हलाहल के बदले में हमें जीवन के लिए जरूरी अमृत (आक्सीजन) देती हैं।
अथर्ववेद 1.32.4: द्यावापृथिवी जनयन् देवा अग्रे या ओषधि: प्रथममानसृजात:। ‘प्राकृतिक व्यवस्था (ऋत) की दिव्य प्रणाली के मूल निर्माता, साथ ही वनस्पति, ग्रह और आकाशीय मंडल, हमारी रक्षा करें।’ ये मंत्र सभी जीवों के परस्पर संबंध के वैदिक दर्शन को प्रदर्शित करते हैं, पर्यावरण जागरूकता, संरक्षण और प्राकृतिक दुनिया के प्रति जिम्मेदारी की वकालत करते हैं। वे सभी संस्थाओं की परस्पर निर्भरता और पर्यावरण के साथ सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व के महत्व पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
शुक्ल यजुर्वेद के उल्लेख से एक प्रचलित मंत्र उदाहरण के रूप में लिया जा सकता है:
नमो वृक्षेभ्यो हरिकेशेभ्य:।
क्षेत्राणां पतये नम:। वनानां पतये नम:।
वृक्षाणां पतये नम:।
ओषधीनां पतये नम:।
कक्षाणां पतये नम:। (यजुर्वेद 16.17.18)
इसमें जिस शिव को वृक्ष, वन, औषधियों इत्यादि का स्वामी का कहा गया है, वह उनके विराट अर्थ का परिचायक है। वे सामान्य शिव नहीं हैं। देवताओं को उनके अपने—अपने गुणानुरूप जीवों और पदार्थों का स्वामी नियुक्त किया गया है। यदि शिव वनस्पतियों के स्वामी कहे गए हैं तो इसका मतलब यह हुआ कि वनस्पतियों का गुण भी कल्याण (शिव) जैसा होना चाहिए। शिव का शिवत्व बहुत व्यापक है। शिव का एक रूप है सुंदर। चराचर की समस्त वनस्पतियां भी पृथ्वी की सज्जा करती हैं। धरती की हरियाली का स्रोत ही वनस्पति है। इस तरह से वनस्पतियों का व्यवहार उनको शिव का प्रतिनिधि सिद्ध कर देता है। अन्य उदाहरण में शिव का विषपान प्रसिद्ध है। वे सृष्टि के पोषक और रक्षक इसलिए कहलाए, क्योंकि हलाहल से वे नीलकंठ हुए। विष पीकर अमृत छोड़ देना भी शिवत्व का श्रेष्ठ प्रभाव है। हमारे पर्यावरण में वनस्पतियों की भूमिका शिव सरीखी है। इसीलिए कहा जाता है : शिव समान विष पीते वन। कामधेनु सा देते धन।
औषधियां : आहार और उपचार भी
वैदिक ऋषियों ने औषधियों को कई रूप में देखा और उनसे संबंधित ज्ञान को मंत्रमय किया। वे बेहतर आहार हैं, बेहतर उपचार हैं और धन धातु भी! बाद में यह मान्यता भी आई कि इनका जन्म देव के रौद्र रूप से हुआ है, इसलिए औषधियां दोषों और विकारों को समाप्त करने में सक्षम हैं। यह भी शिव का ही गुण है। सरल सी बात है कि वही शिव का जो स्वभाव है, वनस्पतियों का भाव है। रुद्र अष्टाध्यायी में शिव के प्राकृतिक कल्याणमय रूप को अंगीकार किया गया है। क्यों धातु और औषधियों की जन्म कथाएं शिव से संबद्ध है? क्योंकि उन वनस्पतियों की दिव्यता के लिए देव संबंधित दिखाना आवश्यक था।
वेदों और वेदांगों में पर्वत, जल, वायु, वर्षा और अग्नि को पर्यावरण का शोधक कहा है और नवीकरण का हेतु भी। गीता भी यही कहती है। और, इन सभी पर्यावरण शोधकों का मूल तो वनस्पतियां ही हैं। वनस्पतियों के कम होने से सबसे पहला प्रभाव प्राणवायु के स्तर पर पड़ता है। अभिषेक आदि में क्यों सर्व औषधीय, सर्व फल युक्त स्नान आदि के नियम हैं? इंद्र शांति के प्रयोग क्यों अवश्य माने गए हैं! अथर्ववेद और विश्वकर्मा कहते हैं कि दीर्घजीवन के लिए वृक्ष एक आवश्यक संसाधन है।
वेदों और उपवेदों में दो प्रकार की वायु की चर्चा है : प्राणवायु और अपान वायु। प्राणवायु से जीवन का संचार होता है और अपानवायु से सारीरिक दोषों का निवारण होता है। कहा गया है—
आ वात वाहि भेषजं वि वात वाहि यद् रप:।
त्वं हि विश्व भेषज देवानां दूत ईयसे।। (अथर्ववेद 4.13.3)
यहां वायु को विश्वभेषज कहा गया है यानी विश्व वैद्य। यह बहुत गंभीर अर्थ में लिया जाना चाहिए। अथर्ववेद में वायु और सूर्य को रक्षक के रूप में वंदना की गई है— युवं वायो सविता च भुवनानि रक्षय:। (अथर्ववेद 4, 24, 3)।
अथर्ववेद शुद्ध वायु को एक अहम औषधि मानता है। शुद्ध और ताजा हवा शरीर में प्रवेश करते ही हम तंदुरुस्त और तरोताजा हो जाते हैं। बहुत से रोग बहुत से कष्ट ऐसे ही कट जाते हैं, लेकिन जब हमने पेड़-पौधों के महत्व को नकार दिया और हमें संकट से बचाने वाली वनस्पतियों के लिए हम संकट बने तो पर्यावरण का तंत्र ही व्यर्थ हो गया। हम आज विष पीने को मजबूर हैं। वेदों में प्रदूषण के कारकों को क्रव्याद यानी जीव को सुखाकर निर्जीव करने वाला कहा गया है। यह एक विकासमान सूत्र है—
ये पर्वता: सोमपृष्ठा: आप:।
वात: पर्जन्य आदग्निनस्ते क्रव्यादमशीशमन। (अथर्ववेद 3. 21. 10)
यही नहीं, यह भी कहा गया है कि यह वनस्पतियों के अभाव में पनपते हैं, जहां आज हम उत्सर्जन कम करने पर जोर दे रहे हैं, तो वहीं वेदों ने शोधन बढ़ाने पर जोर दिया है। अथर्ववेद में ऐसी वनस्पतियों की सूची मिलती है जो कि पर्यावरण के शोधक के रूप में सक्रिय होती हैं। जैसे इसमें न्यग्रोध, अश्वत्थ (पीपल), कुष्ठ (कठ), भद्र और चीपुत्र (देवदार और चीड़), प्लक्ष (पिलखन और पाकड़), खदिर (खैर), उदुम्बर (गूलर), अपामार्ग (चिरचिरा), और गुग्गुल (गूगल) हैं। ये वृक्ष भारतीय मूल के हैं और वे व्यावहारिक जीवन के अंग भी हैं। उनसे मानव ने बहुत कुछ ग्रहण किया है।
अथर्ववेद में कहा गया है कि इन वृक्षों से वायु शुद्ध होती है और पर्यावरण का संतुलन सही बना रहता है। हमारे प्राचीन साहित्य में वृक्षारोपण को बल दिया गया है। अब तक हमने कई प्रथायें सुनी हैं कि पुत्र होने पर वहां एक वृक्ष रोपा जाता है, जबकि हम नहीं जानते कि वृक्षायुर्वेद, पद्मपुराण और मत्स्य पुराण में ‘दशपुत्र समोद्रुम:’ कहकर वृक्षों का महत्व बताया गया है। दशपुत्र समोद्रुम: का मतलब है, एक वृक्ष दश पुत्रों के समान है।
औषधीय चर्चा के आधार वेद
आयुर्वेद का मूल स्रोत है अथर्ववेद जिससे चिकित्सा ज्ञान का आरम्भ होता है, अकेले सर्पदंश के 52 तरह के उपचार बताये हैं। अनेक प्रयोग मिलते हैं। अथर्ववेद तो भारतीय विज्ञान विषयक अवधारणा का रसायनशाला जैसा सूत्र संग्रहण है। आयुर्वेद के विकास में इन सूत्रों ने बड़ी भूमिका का काम किया है। आज क्यों वह पद्धति पिछड़ी है? राजेंद्र बोड़ा जी कहते हैं कि कोई दो-तीन सौ साल हुए अंग्रेजों के आगमन के साथ आई एलोपैथी की चिकित्सा पद्धति के पहले तक आयुर्वेद चिकित्सा से ही इस विशाल भू-भाग में बीमारियों का इलाज होता आया था। यवनों के साथ यूनानी चिकित्सा पद्धति भी आई। आयुर्वेद का स्वर्ण युग, 800 ईसा पूर्व से लेकर लगभग 1000 ई. तक, विशेष रूप से चरक-संहिता और सुश्रुत-संहिता जैसे चिकित्सा ग्रंथों के निर्माण के साथ माना जा सकता है। चरक, एक चिकित्सक और सुश्रुत, एक शल्य चिकित्सक के रूप में हमारे सामने आते हैं। अनुमान लगाया जाता है कि चरक-संहिता अपने वर्तमान स्वरूप में पहली शताब्दी ई. पू. से है, हालांकि इससे पहले के संस्करण भी थे। सुश्रुत-संहिता संभवत: ईसा पूर्व की अंतिम शताब्दियों में उत्पन्न हुई थी और 7वीं शताब्दी ई.पू. तक अपने वर्तमान स्वरूप में स्थिर हो गई थी। भारतीय चिकित्सा पद्धति पर बाद का समस्त लेखन इन्हीं के कार्यों पर आधारित रहा है। बाद का काल वह समय है जब आयुर्वेद में कुछ नया नहीं जुड़ता। कोई नया अनुसंधान नहीं होता। सिर्फ संस्कृत के रटे हुए ज्ञान के आधार पर वैद्य अपना रोजग़ार चलाते रहे। प्राचीन भारत में स्वतंत्र रूप से विकसित हुए आयुर्वेद में चिकित्सा की मूल अवधारणा केवल उपचार की नहीं थी, बल्कि उसके साथ आहार, जलवायु, अनुभवजन्य और संस्कृति का बहुआयामी संयोजन भी था। उसमें अलौकिक शक्ति में विश्वास और आस्था का भी महत्वपूर्ण स्थान रहा। आयुर्वेद को आधुनिक युग में चुनौती मिली नित नयी खोजों में जुटे पश्चिम के चिकित्सा विज्ञानियों से, जो भारतीय अनुभवजन्य ऋषि परंपरा, जो अति गोपनीय होती थी, के विपरीत सार्वजनिक रूप से प्रयोगजनित अनुसंधान करते थे। पश्चिमी विज्ञान में प्रयोगों के दावों की पुष्टि उसी क्षेत्र में काम कर रहे अन्य वैज्ञानिक स्वतंत्र रूप से करते हैं। पश्चिम के विज्ञान ने अनुसंधान और खोजों को मान्यता देने की बेहतरीन प्रणाली विकसित की। दुर्भाग्य से आयुर्वेद ऐसे विकास से कटा रह गया। इसीलिए आज एलोपैथी आयुर्वेद पर भारी पड़ती है।





