प्रो. बलवंत सिंह राजपूत
वरिष्ठ वैज्ञानिक पूर्व कुलपति
हमारे प्राचीन साहित्य (चार वेदों, चार उपवेदों छह वैदिक दर्शनों, चार अवैदिक दर्शनों, उपनिषदों, शतपथ ब्राह्मण, अरण्यकाओं, श्रीमदभगवद्गीता तथा महाभारत) में विज्ञान एवं गणित के ज्ञान की प्रचुरता एवं सघन क्रमबद्ध वर्गीकरण उपलब्ध होने पर भी गणित, खगोल भौतिकी, ज्यामिति, पदार्थ विज्ञान, ब्रहमांड विज्ञान एवं जीव-विज्ञान के क्षेत्रों में प्राचीन भारतीय योगदान के संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चेतना जागृत करने की दिशा में वांछित प्रयास अभी तक नहीं हो पाये हैं। प्राचीन भारत में हुए विज्ञान एवं गणित के अति गौरवशाली विकास के प्रति अंतरराष्ट्रीय उदासीनता का मुख्य कारण पश्चिमी वैज्ञानिकों की यह प्रवृत्ति रही है कि वे आधुनिक विचारधारा से प्राचीन अवधारणों की तुलना उपलब्ध पुस्तकों में विद्यमान प्रमाणों एवं उनके समाज में पीढिय़ों से व्याप्त धारणाओं के आधार पर करते रहे हैं। उन्हें या तो वैदिक सिद्धांतों एवं अवधारणाओं का ज्ञान ही नहीं है और यदि कुछ सतही जानकारी है भी तो वे केवल उपासना की भौतिक पद्धतियों अथवा अध्यात्म के प्रारंभिक स्तर तक ही सीमित है। यदि आधुनिक विज्ञान के क्षेत्र में गत दो शताब्दियों में हुए आश्चर्यजनक शोधों का आधार विज्ञान की वैदिक अवधारणायें रही होतीं तो विश्व एवं मानव के लिए अधिक कल्याणकारी होता। अभी तक आधुनिक विज्ञान में ऐसा कोई भी उल्लेखनीय शोध नहीं हो पाया है, जिसके संबंध में वैदिक अवधारणाएं न रही हों।
आधुनिक विज्ञान में विश्वसनीय ज्ञान उसी को मानते हैं जिसकी पुष्टि प्रयोगशाला में उपकरणों के आधार पर किये गये परीक्षणों द्वारा हो सके। अति प्राचीन काल में भारतीय विज्ञान में सत्य की कसौटी की इस जड़ सीमा से बहुत आगे तक बढ़ कर इन्द्रियों एवं उपकरणों द्वारा प्रेक्षित ज्ञान के साथ अप्रेक्षित एवं अप्रेक्षिणीय ज्ञान भी समाहित था। प्राचीन भारतीय विज्ञान में सदा इस सम्पूर्णता का दृष्टिकोण अपनाया गया था। जबकि आधुनिक विज्ञान सृजन को टुकड़ों, अवयवों एवं अंशों में विश्लेषित करता है। वेदों में जटिल रूप से समाहित विभिन्न वैज्ञानिक सूत्रों की व्याख्या प्राचीन ऋषियों ने सरल ढंग से की थी। जीवन के दर्शन को वैदिक मंत्रों में देखने वाले ये ऋषि बहुत ज्ञानी, सत्य अन्वेषक एवं विज्ञान के प्रकांड विद्वान थे। प्राचीन भारत में वैज्ञानिक शोध इन्हीं ऋषियों के मार्गदर्शन एवं दिशा—निर्देशन में हुए थे। प्राचीन भारतीय विचारकों ने अनुभव किया था कि पदार्थ एवं संपूर्ण विश्व एवं इसकी वस्तुएं गति के कारण परस्पर संबंध हैं तथा इस मूल में दिक् और काल समाहित है। परिवर्तन को कारण तथा प्रभाव के सह-संबंध के आधार पर समझा गया था। वेदों में विश्व-सृजन के सिद्धांत को पदार्थ, काल एवं कारणता के आधार पर उल्लेखित किया गया है। वैदिक साहित्य में ब्रहम-विद्या अथवा ब्रह्माण्ड-विज्ञान को पूर्णत: विकसित किया गया था। जिसे उपलब्ध ज्ञान तथा भविष्य में संभावित ज्ञान की प्रनाभि के रूप में प्रस्तुत किया गया था।
गतिशील ब्रह्मांड की अवधारणा
ऋग्वेद को विश्व का प्राचीनतम साहित्य माना जाता है तथा इसमें ब्रह्माण्ड-सृजन के रहस्य की जिज्ञासा का आरंभ (नासाद्या-सूत्र) समाहित है। यजुर्वेद में तारामण्डलों का प्रथम उल्लेख है। प्रकृति की प्रत्यक्ष विविधताओं में अंतिम सममिति की जिज्ञासा के प्रयासों में वैदिक ऋषियों ने अवधारित किया कि विश्व एवं इसकी वस्तुएं विश्व-ज्योति (ब्रह्मांडीय उर्जा) नामक ऐकिक सिद्धांत के निरूपण तथा उनका गतियपक्ष अन्य सिद्धांत ‘यज्ञ’ से संबंधित है। सम्पूर्ण विश्व एवं इसकी विभिन्न इकाइयों के विस्तृत वैज्ञानिक विश्लेषण को पुरुष सूक्तों के माध्यम से समझा जाता है। अत: वेदों में स्थान—स्थान पर दिये गये पुरुष सूक्तों के संदर्भ मात्र औपचारिकता नहीं है वरन् ये वैज्ञानिक परिभाषाओं को समझाने हेतु सूत्रों अथवा संकेतों का कार्य करते हैं। पुरुष सूक्त की प्रथम उक्ति सम्पूर्ण विश्व के तत्वों को पुरुष रूप में दर्शाती है तथा सिद्ध करती है यह सृजन अनन्त, अनादि एवं प्रसरणीयता-युक्त है तथा साथ ही विषमांगी है एवं इसकी कल्पना कर लेना सरल नहीं है। पुरुष सूक्त की द्वितीय उक्ति में प्रत्युक्त ”यवन्नेनतिरोहितका” इस विकसित एवं विकासशील सृजन की सूक्ष्मता को अनन्त पुरुष के सूक्ष्म अंश के रूप में प्रस्तुत करता है। पुरुष सूक्त स्पष्ट करता है कि सृजन से पूर्व मूल अविनाशी ऊर्जा बहुलता में था तथा इसका अत्यन्त सूक्ष्म अंश ही द्रव्य के निर्माण में सक्रिय भाग लेता है जबकि अन्य बड़ा भाग निष्क्रिय बना रहता है। प्राचीन भारतीय दर्शन का मुख्य लक्ष्य सभी क्रमों को उस अंतिम सत्य के प्रकटीकरण के रूप में अनुभव कराना है जिसे विश्व एवं इसकी विविध प्रेक्षित- तत्वों एवं घटनाओं के सत के रूप में जाना जाता है। इसकी मूल प्रकृति इसे अनन्त रूपों में निरूपित करने की है जो अंतहीन प्रक्रिया से एक दूसरों में परिवर्तित होते रहते हैं। इस प्रकार ब्रह्मांड का प्रक्रम-पक्ष मूलरूप में गतिशील है। शब्द ब्रह्म का अर्थ विकास (वृद्धि) है जिसमें जीवन, गति एवं प्रगति निहित है। उपनिषदीय ब्रह्म को निराकार में ब्रहमांड की गतिशील प्रकृति को दर्शाने हेतु ‘रिता’ शब्द को प्रदर्शित करने हेतु कर्म की अवधारणा की गयी है तथा निष्कर्ष निकाला गया है कि कर्म के अभाव में सभी जगत नष्ट हो जायेंगे। श्रीमद्भगवद्गीता में भी कहा गया है, ”यदि मैं परमात्मा संतुलित कर्म न करूं तो इन समस्त ब्रह्मांडों का विलय हो जायेगा। तथा उस अवस्था में मैं सृष्टि के विनाश का हेतु बन जाऊँगा।” अन्य शब्दों में यदि मानव चेतना के माध्यम से ब्रह्मांडीय गतिशीलता रुक जाये तो मानव मात्र भौतिकवाद में लिप्त होकर भ्रमित, किंकर्तव्यविमूढ़ एवं विवेकशून्य हो जायेगा तथा इन्द्रिय-संयम, एवं ज्ञान-सृजन से दूर हट जायेगा एवं उसका आत्मिक विकास जायेगा।
ब्रह्मांड के लय युक्त आवर्तिय प्रसार एवं संकुचन, जिसमें दिक् एवं काल के विशाल माप निहित हैं, की अवधारणा केवल आधुनिक ब्रह्मांड-विज्ञान में ही अभिग्रहित नहीं है, बल्कि प्राचीन भारतीय विज्ञान में समय में से कर ली गयी थी। जिसके अनुसार ब्रह्म का जगतों में रूपांतरण और जगतों का ब्रह्म में रूपांतरण एक लययुक्त क्रीड़ा के साथ अंतहीन चक्रों में होता रहता है। श्रीमद्भगवद्गीता में इसे एक का अनेक में प्रकट होना एवं अनेक का एक में लीन हो जाना कहा गया है। हमारे ऋषियों ने इस लययुक्त आवर्तिय क्रीड़ा को सम्पूर्ण ब्रहमांड के सृजन के रूप में समझा था। उन्होंने ब्रहमांड को क्रमबद्ध आवर्तिय प्रसार एवं संकुचन के रूप में निरूपित किया था तथा एक सृजन एवं विलय (विनाश) के मध्य के कालमान को एक ‘कल्पÓ का नाम दिया था। आधुनिक भौतिकी में इस अवधारणा को पुन: अभिग्रहण करने में मानव मस्तिष्क को पाँच हजार वर्षों से अधिक समय लगा जिसके अनुसार द्रव्य का मौलिक गुण गतिशीलता है जहाँ पर सभी मौलिक कण गतिय प्रतिमान है। जिनका स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है किन्तु जो मौलिक अन्योन्य क्रियाओं के उस अविभाजित जाल के अभिन्न अंग है जिसमें कणों को अंतहीन सृजन एवं विलय की क्रीड़ा गतिय अंत: क्रीड़ा के रूप में उर्जा का सतत अविरल प्रवाह होता रहता है। ये सभी अन्योन्य क्रियायें तथा (अन्ततोगत्वा एकीकृत अन्योन्य क्रिया) सृजन एवं विलय के अंतहीन नृत्य तथा उर्जानृत्य को दर्शाती है।
गतिशील ब्रह्माण्ड का सर्वाधिक सटीक व्यक्तिकरण ब्रह्मांडीय नृतक ‘शिव’ के रूप में किया जाता जिससे जीवन, बुद्धियुक्त तथा लययुक्त गतिशील बहुमांड पूर्णरूपेण निरुपित होता है। ब्रह्मांडीय नृत्य की सर्वश्रेष्ठ सौदर्यमयी अभिव्यक्ति नटराज शिव की मूर्ति के रूप में होती है जो सम्पूर्ण जीवन को सृजन एवं विकास के अनन्त चक्र के लययुक्त प्रक्रम के अंग के रूप में दर्शाती है। इस अद्भुत अवधारणा से यह पूर्णत: स्पष्ट हो जाता है कि चराचर जगत को गति, प्रवाह एवं परिवर्तन के रूप में अभिग्रहित किया जा सकता है। जिसमें ब्रह्मांडों का निरुपण एक ऐसे अविभाज्य जाल के रूप में किया जाता है जिसके अंत-वन्धन गतिशील हैं। भौतिकशास्त्रियों के लिए शिव-नृत्य उपपरमाण्वीय द्रव्य का नृत्य है, सृजन एवं विनाश ब्रह्मांडीय नृत्य है तथा प्रत्येक प्रकार के अस्तित्व एवं प्राकृतिक प्रक्रमों का आधार है। यह दर्शाता है कि गति तथा लय पदार्थ का अंत:गुण है। जहाँ सब प्रकार का पदार्थ, चाहे पृथ्वी पर हो अथवा ब्रह्माण्ड में कहीं अन्यत्र, ब्रहमांडीय नृत्य में लीन है। जगत (जो ब्रह्माण्ड का पर्यायवाची है) शब्द का अर्थ ही गतिशीलता है।
वेदों में विश्व के लिए नीति शब्द का प्रयोग हुआ है। जिसका अर्थ अकल्पनीय तथा असीम है। इसे उस अनन्त दिक्-काल ढांचे के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसमें दिक् तथा काल का प्रारंभ एवं अन्त नहीं है। पुरुष-सूक्त के छठें मंत्र में कहा गया है कि अनन्त, अव्यक्त एवं अविनाशी सत का एक अति सूक्ष्म अंश सृजन-विनाश के सम्पूर्ण चक्र को नियंत्रित करता है। सदा ही कहीं सृजन एवं विकास तथा कहीं विलय एवं विनाश चलता रहता है। सांख्य दर्शन में दिक् एवं काल के अन्तर को दूर करके दिक्-काल के अस्तित्व को स्वीकारा गया है, गति से भिन्न काल के अस्तित्व को नकारा गया है तथा प्रकाश को पदार्थ का एक प्रकार माना गया है जिसमें वेग एवं उर्जा समाहित हो (आधुनिक भौतिकी में प्रकाश की क्वांटम प्रकृक्ति के समान)। सांख्य में प्रकृति को आद्य कारण माना गया है जो स्वयं को प्रकट करके प्रभावों को उर्जा प्रवाह के रूप में परिलक्षित करती है। जिससे उर्जा संरक्षण जैसे नियमों के अंतर्गत सृजन होता है जिसमें सत्व, रज एवं तम गुणों का योग अचर रहता है। विलय के प्रक्रम में इसके विपरीत क्रिया होती है तथा इस प्रकार सूजन एवं विलय का चक्र क्रम बद्ध लय के साथ चलकर ब्रह्माण्ड को गतिमान बना देता है। इस सूक्त में उल्लेखित ॐ भूर्भुव: स्व: (भुवस्)………..प्रसिद्ध गायत्री मंत्र जिसका स्रोत ऋग्वेद है, का भाग है जिसमें भू शब्द का अर्थ पृथ्वी है, भुवस् का अर्थ नौ ग्रहों का ग्रहीय तंत्र है तथा स्वाहा का प्रयोग आकाश में तीव्र वेग से गतिमान आकाश-गंगाओं के लिए किया गया है। असंख्य आकाश—गंगाओं के तीव्र वेग के कारण एक प्रबल नाम सर्वत्र व्याप्त हो जाता है। जब प्राचीन ऋषियों ने उनकी ध्यानावस्था में इस नाम को सुना तो उनके मुख से अचानक शब्द निकला। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने सुझाया था कि उन्होंने एवं अन्य ऋषियों ने ध्यानावस्था में जो ॐ का नाम सुना है उसे ही सृजन-घर का नाम स्वीकार किया जाये। तभी से यह शब्द ॐ सम्पूर्ण दिव्यता एवं प्रभुता एवं पवित्रता के साथ चिरन्तन नाद के रूप में माना जाता है। इसी को ‘प्रणव’ कहते हैं, क्योंकि इसकी सर्वत्र व्याप्त ध्वनि तरंगें अनन्त उर्जा का स्रोत प्राण हैं तथा इसी से विश्व की सम्पूर्ण उर्जा में संतुलन रहता है। इसे ही अनहत नाद कहते हैं जिसका अर्थ है आहनन-रहित ध्वनि। इसे विशाल द्रव्यमान की आकाश गंगाओं के अति तीव्र वेग के रूप में अभिग्रहीत किया जा सकता है।
अंध-द्रव्य की अवधारणा (Concept of Dark Matter)
आधुनिक भौतिकी के अनुसार इस विश्व का अस्सी प्रतिशत भाग अज्ञात प्रकृति का नान- बैरियानिक निष्क्रिय अंध-द्रव्य (Dark Matter) है। ऐसा होते हुए इस पदार्थ से गतीय चेतन सृजन किस प्रकार संभव है? रिले के कैंब्रिज सिद्धांत के अनुसार इस सम्पूर्ण विश्व की उत्पत्ति (बिग-बंग) के कारण हुयी थी। इस द्रव्यमान का एक भाग सभी दिशाओं में बिखर गया। जिससे नक्षत्र, तारामण्डल एवं आकाश गंगाएं एवं अनेक सौर मण्डल बने तथा इस प्रकार निर्मित विश्व में सतत प्रसार प्रारंभ हो गया। ऋग्वेद के अनुसार विश्व के सृजन से पूर्व कुछ भी अस्तित्व में नहीं था। न ही कोई आकृति, न आकार और न ही प्रकाश था। एक अभेद अंधकार एक अज्ञात, अज्ञेय गतिहीन द्रव्य के साथ सर्वत्र व्याप्त था। यह द्रव्य स्थिर, तमस एवं निष्क्रिय था। यही आधुनिक भौतिकी का अंध-द्रव्य है।
सांख्य दर्शन में भी यही अवधारणा है कि सृजन से पूर्व स्वधा का अस्तित्व था जो पूर्णत: निष्क्रिय एक तमस (अंध) था। मनुस्मृति में अंध-द्रव्य का उल्लेख है तथा कहा गया है कि “प्रारम्भ में एक तमयुक्त, निष्क्रिय, अव्यक्त, अग्राही, अद्वितीय द्रव्य का अस्तित्व था जिसने स्वत: ही स्वयं को अनेक रूपों में विभिन्न कालों में व्यक्त किया”।
बिग-बैंग ऋग्वेद के उन मंत्रों की प्रतिध्वनि प्रतीत होता है जिनमें कहा गया था कि “वह शक्तिमान श्येन की गति से उठा तथा सम्पूर्ण आकाश में व्याप्त अदृश्य द्रव्य से केन्द्रिय हिरण्यगर्भ के साथ अनेक आकाश गंगाएं अस्तित्व में आ गयीं तथा त्रिगुणात्मक की प्रकृति आद्य कारण बन गयी।” पुरुष सूक्त की द्वितीय युक्ति से संकेत मिलता है कि उर्जा-रूप में अविनाशी मौलिक तत्व सर्वत्र व्याप्त है तथा उसका केवल एक अति लघु अंश ही पदार्थ के सृजन में सक्रिय होता है तथा शेष अतिदीर्घ अंश निष्क्रिय एव तमयुक्त रहता है (यही अंश आधुनिक भौतिकी का डार्कमैटर है) पुरुष सूक्त की तृतीय सूक्त में भी स्पष्ट संकेत है कि सर्वव्यापी विश्वीय उर्जा का मात्र अति लघु अंश ही प्ररिवर्तनशील है जो रूपान्तरित होकर विश्व का सृजन करता है तथा इसका अतिदीर्घ भाग इस सृजन चक्र से निष्क्रिय रहता है। यह निष्क्रिय भाग ही आधुनिक भौतिकी की अंध-उर्जा (dark matter) है। पुरुष सूक्त की षष्टम् सुक्त में भी स्पष्ट संकेत है कि अविनाशी अनन्त अस्तित्व का अति लघु भाग ही सृजन के सम्पूर्ण चक्र को नियंत्रित करता है तथा इसका अतिदीर्घ अंश निष्क्रिय रहता है। यही निष्क्रिय अंश भौतिकी का अंध-द्रव्य है।





