संकट काल का भारतीय समाधान

विजय शंकर तिवारी
प्रधान संपादक


जब किसी राष्ट्र पर आर्थिक संकट, युद्ध, बाहरी आक्रमण, प्राकृतिक आपदा अथवा अन्य प्रकार की गंभीर चुनौतियाँ आती हैं, तब केवल शासन या केवल जनता के प्रयास पर्याप्त नहीं होते। भारतीय परंपरा में राज्य को राजा और प्रजा के संयुक्त दायित्व के रूप में देखा गया है। इसलिए रामायण, महाभारत, कौटिल्य के अर्थशास्त्र, मनुस्मृति तथा अन्य नीति ग्रंथ संकट के समय राजा और प्रजा दोनों के कर्तव्यों का विस्तार से वर्णन करते हैं।

महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित वाल्मीकि रामायण में श्रीराम के शासन का वर्णन करते हुए यह आदर्श प्रस्तुत किया गया है कि राजा का सुख प्रजा के सुख में निहित है। रामायण में अनेक स्थानों पर यह भाव व्यक्त होता है कि शासक को अपने व्यक्तिगत हित, सुख और विलासिता से ऊपर उठकर प्रजा के कल्याण को प्राथमिकता देनी चाहिए। इसका अर्थ यह है कि जब राज्य आर्थिक संकट या युद्ध जैसी स्थिति से गुजर रहा हो, तब शासक वर्ग को सबसे पहले अपने अनावश्यक खर्चों में कटौती करनी चाहिए और उपलब्ध संसाधनों को जनता की सुरक्षा, भोजन, रोजगार और आवश्यक सेवाओं पर केंद्रित करना चाहिए।

आज के संदर्भ में देखें तो यदि कोई देश आर्थिक मंदी, राजकोषीय घाटे या युद्ध जैसी परिस्थितियों का सामना कर रहा हो, तो सबसे पहले सरकार और प्रशासन को अपने गैर-जरूरी खर्च कम करने चाहिए, क्योंकि जनता तभी त्याग के लिए तैयार होती है जब उसे नेतृत्व में भी त्याग दिखाई देता है।

इसी प्रकार महाभारत के शांतिपर्व में भीष्म पितामह युधिष्ठिर को राजधर्म का उपदेश देते हुए कहते हैं कि राजा और प्रजा का संबंध शरीर और अंगों के समान है। यदि राज्य सुरक्षित नहीं रहेगा तो प्रजा भी सुरक्षित नहीं रह सकती। भीष्म स्पष्ट करते हैं कि संकट के समय राजा को कोष, सेना और प्रशासन को सुदृढ़ बनाना चाहिए, जबकि प्रजा को भी राज्य की रक्षा और व्यवस्था बनाए रखने में सहयोग करना चाहिए। महाभारत यह स्वीकार करता है कि असाधारण परिस्थितियों में असाधारण उपायों की आवश्यकता पड़ सकती है, लेकिन उनका उद्देश्य लोक कल्याण होना चाहिए, न कि शासक का निजी लाभ।

यह सिद्धांत आज भी उतना ही प्रासंगिक है। उदाहरण के लिए यदि किसी राष्ट्र पर युद्ध का खतरा हो या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अतिरिक्त संसाधनों की आवश्यकता हो, तो नागरिकों को भी यह समझना चाहिए कि रक्षा और सुरक्षा पर होने वाला व्यय केवल सरकार का विषय नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र के अस्तित्व का प्रश्न है। इसी प्रकार युद्धकाल या संकट के समय अफवाह फैलाना, सामाजिक विभाजन को बढ़ावा देना या राष्ट्रीय एकता को कमजोर करना भारतीय परंपरा की दृष्टि में अनुचित माना गया है।

संकट प्रबंधन के विषय में सबसे व्यावहारिक और विस्तृत विचार कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मिलते हैं। कौटिल्य स्पष्ट कहते हैं कि समृद्ध राज्य वही है जो सामान्य समय में भविष्य के संकटों के लिए तैयारी करता है। वे राजा को निर्देश देते हैं कि पर्याप्त कोष, अन्न भंडार और सामरिक संसाधनों का संग्रह किया जाए ताकि युद्ध, अकाल या आर्थिक संकट की स्थिति में राज्य व्यवस्था चरमराए नहीं। अर्थशास्त्र में यह भी कहा गया है कि यदि राज्य पर अत्यंत गंभीर संकट आ जाए तो अस्थायी रूप से अतिरिक्त कर लगाए जा सकते हैं, लेकिन राजा को जनता को यह विश्वास दिलाना चाहिए कि यह त्याग राष्ट्र की रक्षा और पुनर्निर्माण के लिए है।

कौटिल्य आगे कहते हैं कि संकट के समय राजा को अन्न भंडार खोलने चाहिए, किसानों को सहायता देनी चाहिए, व्यापार को सुरक्षित रखना चाहिए और आवश्यक वस्तुओं की कृत्रिम कमी पैदा करने वालों पर कठोर कार्रवाई करनी चाहिए। यदि आज के संदर्भ में देखें तो महंगाई, बेरोजगारी या आर्थिक मंदी के समय सरकारों द्वारा गरीबों को राशन सहायता, कृषि सहायता, रोजगार योजनाएँ तथा सार्वजनिक निवेश बढ़ाने जैसी नीतियाँ इसी सिद्धांत से मेल खाती हैं कि संकट का भार केवल जनता पर नहीं डाला जाना चाहिए।

मनुस्मृति में राजा को कराधान के संबंध में एक महत्वपूर्ण शिक्षा दी गई है। मनु कहते हैं कि राजा को कर उसी प्रकार लेना चाहिए जैसे मधुमक्खी फूलों से थोड़ा-थोड़ा मधु ग्रहण करती है। इसका अर्थ है कि कर संग्रह ऐसा हो जिससे उत्पादन और समाज की आर्थिक शक्ति नष्ट न हो। लेकिन मनुस्मृति यह भी स्वीकार करती है कि जब राज्य पर विशेष संकट हो, तब प्रजा को अतिरिक्त योगदान देने के लिए तैयार रहना चाहिए। यह योगदान केवल धन का ही नहीं बल्कि श्रम, अनुशासन और सामाजिक सहयोग का भी हो सकता है।

शुक्र नीति में कहा गया है कि किसी भी संकट में जनता का विश्वास ही राज्य की सबसे बड़ी शक्ति होता है। यदि जनता को यह विश्वास हो कि शासन ईमानदारी से कार्य कर रहा है और त्याग का भार समान रूप से बाँटा जा रहा है, तो वह कठिन से कठिन परिस्थितियों का भी सामना कर सकती है। वहीं विदुर नीति में विदुर बताते हैं कि बुद्धिमान शासक संकट आने के बाद नहीं, बल्कि संकट आने से पहले तैयारी करता है। जो राज्य समृद्धि के समय संसाधनों का अपव्यय करता है, वह विपत्ति के समय सबसे अधिक कठिनाई झेलता है।

वर्तमान समय में विश्व के अनेक देशों पर बढ़ता सार्वजनिक ऋण, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, व्यापारिक प्रतिस्पर्धा, ऊर्जा संकट और युद्ध जैसी चुनौतियाँ दिखाई दे रही हैं। ऐसे समय में भारतीय परंपरा का संदेश अत्यंत स्पष्ट है—राज्य को वित्तीय अनुशासन, संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग और दीर्घकालिक तैयारी करनी चाहिए, जबकि नागरिकों को उत्पादकता, अनुशासन, कर अनुपालन और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना चाहिए। केवल अधिकारों की चर्चा और कर्तव्यों की उपेक्षा किसी भी राष्ट्र को संकट से बाहर नहीं निकाल सकती।

भारतीय ग्रंथों का समग्र निष्कर्ष यह है कि संकट के समय राजा और प्रजा एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि सहयोगी होते हैं। राजा को अपने सुख और विलास का त्याग कर लोककल्याण को प्राथमिकता देनी चाहिए, जबकि प्रजा को भी राष्ट्रहित में आवश्यक त्याग और अनुशासन का पालन करना चाहिए। यही कारण है कि रामायण के श्रीराम, महाभारत के भीष्म, अर्थशास्त्र के कौटिल्य, मनुस्मृति के मनु और विदुर नीति के विदुर सभी अलग-अलग शब्दों में एक ही सिद्धांत की स्थापना करते हैं—राष्ट्र संकट में हो तो शासन और समाज दोनों को अपने-अपने स्वार्थों से ऊपर उठकर सामूहिक हित के लिए कार्य करना चाहिए। यही भारतीय राजधर्म की मूल भावना है।