डॉ. प्रिया सूफी
व्याख्याता, साहित्य अन्वेषक
यज्ञकर्म केवल आनुष्ठानिक उद्देश्य और ध्येय से ही नहीं जुड़ा होता है, बल्कि एक संस्थागत रूप से वह अध्ययन-अध्यापन, संभार-सामग्री संचयन, आचार्यादि वरण, मंत्रपाठ पूर्वक अग्निहोत्र, दीक्षादि संस्कार, अवभृत स्नान जैसी विधियों से भी जोड़ता है। हर यज्ञ की विशिष्टताएं और विधियां हैं जो उसे अन्य यज्ञ से अलग करती हैं और वे हवन-होम की वेदी की रचना से लेकर कुण्ड और मण्डप तक दिखाई देती हैं। इनके शास्त्रीय विधान के साथ ही लोक रीतियों का रंग भी दिखाई देता है। इसीलिए प्रत्येक यज्ञ अनेक अर्थों में गंभीर अध्ययन का विषय भी है।
कुण्ड और मण्डप के शास्त्र
यज्ञ जिस स्थान पर आयोजित होता है, वह गृह से लेकर खुला आंगन, देवालय और पारंपरिक यज्ञशाला आदि हो सकते हैं लेकिन वेदी निर्माण और उसमें बनने वाले विभिन्न आकार-प्रकार कुण्ड और उनके वितान तथा पताका वाले मण्डप के अपने नियम और विधान होते हैं। बहुत प्राचीन काल में शुल्ब गणनाधारित रचना की जाती थी और इसके लिए शुल्बसूत्र रचे गए। हमें वर्तमान में चार शुल्बसूत्र प्राप्त होते हैं जिनमें भूमि के चयन, प्रमाप, कुण्ड आदि के मापन और नियोजन के लिए अलग-अलग नियम मिलते हैं। रेखागणित, त्रिमिति, ज्यामिति की तरह अनेक प्रमेय इन सूत्रों में मिलते हैं। संसार को बौधायन प्रमेय जैसे एकाधिक विधान इन्हीं शुल्बसूत्र की देन है।
सिद्धांत शेखर के रचयिता गणितज्ञ श्रीपति ने 10वीं सदी में वास्तु सहित अन्य यज्ञ विधियों के संपादन के लिए श्रीधरी आदि जिन वेदियों और कुण्ड के नियम दिए वे लंबे काल तक भारतीय जनजीवन में स्वीकार्य रहे। वास्तुयाग में भी उनका नियमन रहा और संहिताओं सहित स्थापत्य शास्त्र में उनको रेखाचित्रों सहित समझाया गया।
यज्ञ के नित्य निरंतर भारतीय जन सामान्य के जीवन का अंग बने रहने का ही यह प्रभाव रहा कि कुण्ड और मण्डप विधान पर 20 ग्रंथों की रचनाएं हुईं। ‘कुण्ड विंशती’ के नाम से उनका आनंद आश्रम से प्रकाशन हुआ है। साधु आश्रम, होशियारपुर ने ऐसी सामग्री को महत्व दिया है। सबसे अधिक रचनाएं इतिहास के मध्यकाल में हुईं और यह आश्चर्यजनक है, क्योंकि भवन, देवालय और जलाशय के कार्य इस दौरान सबसे अधिक हुए तो इनकी प्रतिष्ठा और व्रत संकल्प के उद्यापन पर यज्ञादि आवश्यक थे। वि_ल दीक्षित ने जहां 1620 ई. में ‘कुण्ड मण्डप सिद्धि’ की रचना की वहीं अन्य आचार्यों ने वास्तवकुण्डसिद्धि, कुण्ड मण्डप विधान, कुण्ड रत्नावली, कुंडार्क, कुण्ड भास्कर, कुण्ड मण्डप चंद्रिका जैसे भी ग्रंथ लिखे और सबमें एक ही माप और नियम मिलता है। शारदा तिलक और उसकी टीका, सोम शंभू पद्धति आदि तंत्र ग्रंथों में भी वे ही नियम और विधियां मिलती हैं।
कुण्डादि का स्वरूप व अलंकरण
हवन के लिए कुण्ड कैसे होंगे उनका मान और अलंकार किस तरह होगा, यह सब शास्त्रीय नियमों से किया जाता है। वि_ल दीक्षित ने कुण्डफल, हवन संख्या के अनुसार कुण्ड का मान, क्षेत्र मान को क्रमश: समझाया है। इसी प्रकार चौकोर कुण्ड, अर्धचंद्र, त्रिभुज, वर्तुल, छह कोणीय कुण्ड सहित पद्मकुण्ड, विषम कोण और सम अष्ट कोण कुण्ड की रचनाओं का विवेचन भी किया है। यह सब विषय जितना सिद्धांतिक है, उससे कहीं अधिक प्रायोगिक भी है। इसी प्रकार बनाए जाने वाले कुण्ड के लिए अधम आदि मेखला, खात मान मेखला और उनके रूपायन को भी बताते हुए नाभि, योनि आदि की सीमाओं के सज्जा पक्ष को भी दिया गया है जिनका यज्ञाचार्य बड़ी कठोरता से पालन करते हैं। इसमें प्रमाण हस्त और अंगुल सहित मुष्टि, यूका, अरत्नि, बालाग्र, त्रसरेणु, परमाणु आदि इकाइयों में रखा जाता है, यह भारतीय गणित का एक सुंदर पक्ष है।
इसी प्रकार मण्डप के मान अधम, मध्यम और उत्तम रूप में बताए गए हैं किंतु उनका व्यावहारिक महत्व बड़ा अधिक है। मण्डप हाथ मान में 10 और 12 हाथ का अधम, 12 और 14 हाथ का मध्यम तथा 16 और 18 हाथ का मण्डप उत्तम होता है। मण्डप को समान आकार वाले 9 कोष्ठकों में विभाजित कर बीच के कोष्ठक में एक हाथ ऊंची मध्य वेदी बनाई जाती है। इसी को प्रधान वेदिका कहा जाता है। पुराविदों ने इसी प्रमाण के आधार पर उत्खनन में मिली वेदियों को पहचाना है। चतुष्कुंडी, पंचकुंडी, सप्तकुंडी, अष्टकुंडी और नव कुंडी यज्ञों में ही विशेष रूप से प्रधान वेदी के निर्माण के निर्देश मिलते हैं। वैसे वेदिकाएं चार प्रकार की होती हैं : चतुरस्र, पद्मिनी, श्रीधरी, सर्वतोभद्रा।





