विकास की सनातन दृष्टि

प्रो. विवेकानंद तिवारी
अध्यक्ष, आम्बेडकर पीठ, एचपीयू, शिमला


सनातन दृष्टि में विकास केवल भौतिक समृद्धि नहीं, बल्कि मानव, प्रकृति और चराचर जगत का संतुलित, नैतिक तथा दीर्घकालिक कल्याण है और मानव और प्रकृति का सह-अस्तित्व है, जो संतुलन और नैतिकता पर आधारित है। यह दृष्टिकोण भोग के बजाय त्याग और संयम को प्राथमिकता देता है, जहाँ प्रकृति के शोषण के स्थान पर उसके साथ सामंजस्यपूर्ण विकास की परिकल्पना है।

प्रकृति सर्वश्रेष्ठ है और मानव उसका एक हिस्सा मात्र है, शोषणकर्ता नहीं। यह दृष्टिकोण पर्यावरण सुरक्षा को प्राथमिकता देता है। समग्र कल्याण विकास का उद्देश्य समाज के हर व्यक्ति का कल्याण है, न कि केवल कुछ लोगों की भौतिक प्रगति।

सनातन परंपरा में भौतिक प्रगति के साथ-साथ आंतरिक ज्ञान (चेतना) के विकास को भी उतना ही महत्व दिया गया है। यह विकास को केवल तकनीकी या औद्योगिक प्रगति के रूप में नहीं, बल्कि ‘सतत विकास’ के रूप में देखती है।
भारतवर्ष की पहचान केवल एक राजनीतिक या आर्थिक इकाई के रूप में नहीं, बल्कि एक समृद्ध ज्ञान परंपरा (Indian Knowledge System) के रूप में रही है। ‘विकसित भारत 2047’ का लक्ष्य केवल आर्थिक समृद्धि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक, सामाजिक और बौद्धिक विकास को भी समाहित करता है। भारतीय ज्ञान परंपरा—जिसमें वेद, उपनिषद, आयुर्वेद, योग, धर्म, अर्थशास्त्र आदि सम्मिलित हैं—आज के विकास मॉडल को एक सतत समावेशी और नैतिक आधार प्रदान कर रही है।

आज के संदर्भ में, यह दृष्टिकोण ‘विकसित भारत 2047’ के संकल्प में भी परिलक्षित होता है, जो आधुनिक ढांचागत सुविधाओं के साथ सांस्कृतिक विरासत को साथ लेकर चलने पर जोर देता है। सनातन परंपरा में विकास का अर्थ ‘भोग’ नहीं, ‘त्याग एवं संयम’ है। भौतिक समृद्धि को प्राथमिकता देने वाला आज का मॉडल परिवार, समाज, पर्यावरण और नैतिकता को क्षीण कर रहा है, जबकि सनातन दृष्टि में विकास पुरुषार्थ चतुष्टय पर आधारित है जिसमें धर्म को सर्वोपरि स्थान दिया गया है। यह दृष्टि केवल भारत के लिए नहीं, समस्त विश्व के कल्याण के लिए है। ऋषियों द्वारा दी गई यह व्यवस्था तीनों कालों— भूत, वर्तमान और भविष्य के लिए थी।

सनातन व्यवस्था सहज रूप से प्रकृति-अनुकूल और सतत थीं। आर्थिक क्षेत्र में आत्मनिर्भर गांवों, कुटीर उद्योगों, शिल्प-कला और महिलाओं की पूर्ण भागीदारी का मॉडल था। ये उद्योग न केवल पर्यावरण की रक्षा करते थे, बल्कि सामरिक दृष्टि से भी अजेय थे—कोई दुश्मन इन्हें एक मिनट में नष्ट नहीं कर सकता था। शिक्षा व्यवस्था गुरुकुल पद्धति पर टिकी थी जिसमें 32 प्रकार की विद्याएँ (शुक्रनीति के अनुसार) दी जाती थीं, वैदिक गणित के 17 सूत्रों का ज्ञान था और संस्कृत जैसी वैज्ञानिक व संस्कारिक भाषा का अध्ययन अनिवार्य था। विद्यार्थी प्रकृति के सान्निध्य में रहते थे, राजा-प्रजा एक साथ पढ़ते थे और भिक्षा-विधि से अहंकार का नाश होता था। चिकित्सा में आयुर्वेद और सुश्रुत संहिता की जड़-मूल चिकित्सा प्रणाली थी— 300 प्रकार की सर्जरी, 125 यंत्र और नाड़ी-विद्या। पर्यावरण संरक्षण वृक्ष-त्रयी (पीपल, बरगद, नीम), जल-संरक्षण के यजुर्वेदीय मंत्रों और पर्व-त्योहारों में समाया हुआ था। कृषि में मिट्टी को जीव मानकर प्राकृतिक खाद का उपयोग किया जाता था, जिससे उर्वरता कभी समाप्त नहीं होती थी। सामाजिक रूप से संयुक्त परिवार, श्रवण कुमार जैसे आदर्श, पंच-परमेश्वर न्याय व्यवस्था और 48 संस्कारों की परंपरा थी। 48 संस्कारों को आमतौर पर दो भागों में बाँटा जाता है—40 बाह्य संस्कार (कर्मकांड संबंधी): जन्म से मृत्यु तक के विभिन्न अनुष्ठान, यज्ञ, व्रत आदि। 8 आंतरिक संस्कार (आत्म-गुण): दया, क्षमा, अनसूया (ईष्र्या-रहितता), शौच (शुद्धता), अनायास (सरलता), मंगल (कल्याणकारी भाव), अकार्पण्य (उदारता) और अस्पृहा (लालच-रहितता)।

ये 48 संस्कार व्यक्ति को पूर्ण रूप से संस्कारित करते हैं, लेकिन व्यवहार में षोडश संस्कार (16 संस्कार) ही सबसे अधिक प्रचलित और मान्य हैं, जिन्हें महर्षि वेदव्यास आदि ने संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया।

इन व्यवस्थाओं के कारण भारत हजारों वर्ष तक विश्व का मार्गदर्शक बना रहा। इसके विपरीत, आधुनिक विकास मॉडल में परिवार टूट रहे हैं, शादियाँ महीनों में विघटित हो रही हैं, बुजुर्ग वृद्धाश्रमों में हैं, पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है, बड़े उद्योग दुश्मन का आसान लक्ष्य बन रहे हैं और चिकित्सा ‘ग्राहक बनानेÓ का व्यवसाय बन गई है। 100-200 वर्ष पुराने विकसित देशों में भी नैतिक, सामाजिक और पर्यावरणीय संकट गहरा चुका है। जो व्यवस्थाएँ प्रकृति के विरुद्ध हैं—चाहे साम्यवाद हो या अन्य—वे अल्पकालिक सिद्ध हुई हैं।

विकसित भारत तभी सार्थक और टिकाऊ होगा जब हम सनातन परंपरा को आधार बनाएंगे। इसके लिए शिक्षा नीति में संस्कृत, वैदिक गणित और गुरुकुल-मूल्यों को प्रमुख स्थान देना होगा। चिकित्सा में आयुर्वेद को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा का आधार बनाना होगा। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कुटीर उद्योगों और आत्मनिर्भर गांवों को रणनीतिक प्राथमिकता मिलनी चाहिए। पर्यावरण संरक्षण के लिए वृक्ष-त्रयी, जल-संरक्षण और पर्व-परंपराओं को नीतिगत रूप से प्रोत्साहन दिया जाए। सामाजिक क्षेत्र में संयुक्त परिवार, कुल-देवता परंपरा और संस्कारों का पुनरुत्थान आवश्यक है।

सनातन दृष्टि मनुष्य को प्रकृति का ‘मालिक’ नहीं, बल्कि उसका एक अभिन्न अंग और रक्षक मानती है। इसके तहत सतत और पर्यावरण-अनुकूल विकास को प्राथमिकता दी जाती है।

भौतिक और आध्यात्मिक समन्वय
केवल भौतिक सुख-सुविधाओं की दौड़ को वास्तविक विकास नहीं माना जाता। इसमें आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ आंतरिक ज्ञान, सदाचार और मानवीय मूल्यों (संस्कारों) को विकसित करने पर जोर दिया जाता है।

समावेशी और समग्र कल्याण
विकास का उद्देश्य समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक सुख-समृद्धि का पहुँचना है। यह वर्ग-विहीन और शोषण-मुक्त समाज की कल्पना करता है।

विश्व बंधुत्व की भावना
‘वसुधैव कुटुंबकम्’ (पूरी पृथ्वी एक परिवार है) के दर्शन के अनुसार, सनातन दृष्टि किसी एक राष्ट्र या समूह के लाभ की बात नहीं करती, बल्कि संपूर्ण विश्व के शांति और कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है। आज के आधुनिक युग में, जब विश्व पर्यावरण, परिवर्तन और मानसिक अशांति जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब सनातन दृष्टिकोण टिकाऊ और समावेशी विकास (Sustainable Development) का एक आदर्श मॉडल प्रस्तुत करता है।

भारत वर्ष की पहचान केवल एक राजनीतिक या आर्थिक इकाई के रूप में नहीं, बल्कि एक समृद्ध ज्ञान परंपरा (Indian Knowledge System) के रूप में रही है। ‘विकसित भारत 2047’ का लक्ष्य केवल आर्थिक समृद्धि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक, सामाजिक और बौद्धिक विकास को भी समाहित करता है। भारतीय ज्ञान परंपरा—जिसमें वेद, उपनिषद, आयुर्वेद, योग, धर्म, अर्थशास्त्र आदि सम्मिलित हैं—आज के विकास मॉडल को एक सतत (sustainable), समावेशी (inclusive) और नैतिक आधार प्रदान कर रही है।