विश्वस्तरीय वैज्ञानिक और भारतीय ज्ञान-परंपरा के साधक : प्रो. बलवंत सिंह राजपूत

धरोहर प्रतिनिधि


प्रतिभा जब परिश्रम से जुड़ती है और ज्ञान जब राष्ट्रबोध से अनुप्राणित होता है, तब व्यक्ति केवल अपना जीवन नहीं गढ़ता, बल्कि आने वाली पीढिय़ों के लिए प्रेरणा की राह भी बनाता है। प्रोफेसर बलवंत सिंह राजपूत का जीवन ऐसी ही विलक्षण साधना की कहानी है। एक ऐसे बालक की कहानी, जिसने बिजनौर जनपद के छोटे-से गाँव लच्छीरामपुर के सामान्य कृषक परिवार से निकलकर विश्वस्तरीय विज्ञान के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई और फिर भारतीय ज्ञान-विज्ञान की समृद्ध परंपरा को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि से समझने तथा पुनस्र्थापित करने को अपने जीवन का महत्वपूर्ण ध्येय बना लिया।
वर्ष 1944 में जन्मे बलवंत सिंह राजपूत की प्रारंभिक शिक्षा गाँव के विद्यालय में हुई। पाँचवीं कक्षा में उन्होंने पूरे क्षेत्र के लगभग पचास विद्यालयों में प्रथम स्थान प्राप्त किया। आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें गाँव से लगभग छह किलोमीटर दूर किरतपुर के हिंदू इंटर कॉलेज जाना पड़ता था। प्रतिदिन सुबह पाँच बजे घर से पैदल निकलना, विद्यालय की पढ़ाई पूरी करना और छुट्टी के बाद पैदल लौटकर लगभग ढाई बजे घर पहुँचना—यह क्रम दसवीं कक्षा तक चलता रहा। कठिन परिस्थितियाँ थीं, लेकिन मेधा और परिश्रम की गति कभी धीमी नहीं हुई। छठी से नौवीं कक्षा तक प्रत्येक परीक्षा में उन्होंने प्रथम स्थान प्राप्त किया।

वर्ष 1958 की उत्तर प्रदेश बोर्ड की दसवीं की परीक्षा उनके जीवन का निर्णायक पड़ाव बनी। गणित और भौतिकी में उन्होंने शत-प्रतिशत तथा रसायन विज्ञान में 98 प्रतिशत अंक प्राप्त किए। बोर्ड की मेधा सूची में स्थान मिलने के कारण उन्हें राष्ट्रीय मेधा छात्रवृत्ति प्राप्त हुई, जिसने आगे एमएससी तक उनकी शिक्षा का आधार तैयार किया। इस प्रकार एक सामान्य किसान परिवार का प्रतिभाशाली बालक अपनी उच्च शिक्षा की अधिकांश यात्रा छात्रवृत्ति के सहारे तय करता गया।
वर्ष 1960 में राजकीय इंटर कॉलेज, बिजनौर से बारहवीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने के साथ उन्होंने तीन विषयों में विशेष योग्यता प्राप्त की। इसके बाद आगरा विश्वविद्यालय से वर्ष 1962 में बीएससी प्रथम श्रेणी एवं प्रथम स्थान से तथा वर्ष 1964 में एमएससी भी प्रथम श्रेणी एवं प्रथम स्थान से उत्तीर्ण की।

विश्वविद्यालय में अध्यापन
वर्ष 1964 में, मात्र बीस वर्ष की आयु में, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में भौतिकी के प्रवक्ता के रूप में उनकी नियुक्ति हुई। यही उनके असाधारण अकादमिक जीवन की शुरुआत थी। अध्यापन के साथ उनकी शोध-यात्रा भी तेजी से आगे बढ़ी और वर्ष 1969 में उन्होंने ‘क्वांटम फील्ड थ्योरी’ में पीएचडी प्राप्त की।

कम उम्र में ही उन्होंने शोध निर्देशन और वैज्ञानिक लेखन के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बना ली। वर्ष 1972 तक वे अनेक शोध छात्रों को पीएचडी के लिए मार्गदर्शन दे चुके थे और अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में उनके लगभग तीस शोधपत्र प्रकाशित हो चुके थे। मात्र 28 वर्ष की आयु में उनका नाम एक गंभीर, प्रतिभाशाली और उभरते हुए शोधकर्ता के रूप में स्थापित हो चुका था। लेकिन उनका जीवन केवल प्रयोगशाला और विश्वविद्यालय की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहा। देश के लोकतांत्रिक इतिहास के कठिन दौर आपातकाल में उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों के पक्ष में खड़े होने का साहस दिखाया। वर्ष 1975 में उन्हें बंदी बनाकर लगभग छह माह करनाल जेल में रखा गया। जनवरी 1976 में रिहाई के बाद परिस्थितियाँ प्रतिकूल रहीं, तो उन्होंने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से अवकाश लेकर उत्तर प्रदेश के गढ़वाल विश्वविद्यालय में भौतिकी के उपाचार्य एवं विभागाध्यक्ष का दायित्व संभाला।

जहाँ गए वहाँ संस्थान को नई ऊँचाई दी
गढ़वाल विश्वविद्यालय में चार वर्ष के दौरान उन्होंने पाँच शोध छात्रों को पीएचडी के लिए मार्गदर्शन दिया और विभाग को दो प्रमुख शोध परियोजनाएँ दिलाईं। अक्टूबर 1980 में मात्र 35 वर्ष की आयु में वे कुमाऊँ विश्वविद्यालय में भौतिकी के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष नियुक्त हुए। उस समय वे देश के सबसे कम आयु वाले प्रोफेसरों में अग्रणी थे। कुमाऊँ विश्वविद्यालय में उनका लगभग 26 वर्ष का कार्यकाल केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों का अध्याय नहीं, बल्कि संस्थान-निर्माण की उल्लेखनीय कहानी भी है। उन्होंने अध्यापन, शोध और प्रशासन के विभिन्न दायित्वों का निर्वहन करते हुए वर्ष 1983 में विज्ञान संकाय के डीन का दायित्व संभाला। इस दौरान 25 शोध छात्रों को पीएचडी के लिए मार्गदर्शन दिया गया, लगभग 300 उच्च स्तरीय शोधपत्र प्रकाशित हुए और अनेक प्रमुख शोध परियोजनाएँ सफलतापूर्वक पूरी की गईं। उनके नेतृत्व में विभाग को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी की DRS, DSA और COSIST जैसी प्रतिष्ठित योजनाओं के अंतर्गत महत्वपूर्ण सहायता मिली। उत्कृष्ट शोध के आधार पर उत्तर प्रदेश सरकार ने विभाग को Center of Excellence घोषित किया और विशिष्ट अनुदान प्रदान किया। यूजीसी ने भी इसे Centre of Advanced Study के रूप में मान्यता दी।

ये उपलब्धियाँ बताती हैं कि प्रो. राजपूत केवल स्वयं शोध करने वाले वैज्ञानिक नहीं थे; वे ऐसी शोध-संस्कृति विकसित करने वाले शिक्षाविद् थे, जिसमें संस्थान, शिक्षक और विद्यार्थी एक साथ आगे बढ़ते हैं।

कुलपति के रूप में संस्थान-निर्माण की दृष्टि
प्रोफेसर राजपूत की प्रशासनिक प्रतिभा भी उनकी वैज्ञानिक उपलब्धियों जितनी ही प्रभावशाली रही। उन्होंने गढ़वाल विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में एक बार तथा कुमाऊँ विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में दो बार दायित्व संभाला। इसके अतिरिक्त वे उत्तर प्रदेश राज्य उच्च शिक्षा परिषद् के अध्यक्ष भी रहे। उनके नेतृत्व में शैक्षणिक सत्रों की नियमितता, नए विभागों की स्थापना, शोध परियोजनाओं की स्वीकृति और अकादमिक गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार हुआ। गढ़वाल विश्वविद्यालय के विकास ने उसे आगे चलकर केंद्रीय विश्वविद्यालय बनने की दिशा में मजबूत आधार प्रदान किया, जबकि कुमाऊँ विश्वविद्यालय ने उनके कार्यकाल में शोध और अकादमिक उत्कृष्टता की नई ऊँचाइयाँ प्राप्त कीं।

चार सौ शोधपत्र और ज्ञान की निरंतर साधना
प्रोफेसर राजपूत की वैज्ञानिक यात्रा का सबसे प्रभावशाली पक्ष उनकी निरंतर शोध-साधना है। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त शोध पत्रिकाओं में उनके लगभग 400 शोधपत्र प्रकाशित हुए हैं, जिनके हजारों संदर्भ और उल्लेख दर्ज किए गए हैं। उन्होंने राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में लगभग 100 शोधपत्र प्रस्तुत किए और भौतिकी के क्षेत्र में आठ पुस्तकों का लेखन किया। लेकिन उनकी वास्तविक बौद्धिक विशिष्टता केवल आधुनिक भौतिकी तक सीमित नहीं रही। उन्होंने प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान की परंपरा को भी वैज्ञानिक दृष्टि से समझने का गंभीर प्रयास किया और आधुनिक विज्ञान तथा भारतीय चिंतन के बीच संवाद की एक ऐसी राह तलाशने का प्रयास किया, जो उनके कार्य को विशिष्ट बनाती है।
भारतीय ज्ञान-विज्ञान की पुनस्र्थापना के साधक

प्रोफेसर राजपूत का सबसे विशिष्ट योगदान यह है कि उन्होंने भारतीय ज्ञान-परंपरा को केवल सांस्कृतिक या दार्शनिक दृष्टि से देखने के बजाय वैज्ञानिक विश्लेषण की कसौटी पर समझने का साहसिक प्रयास किया। उनकी पुस्तक “Scientific Analysis of Gita” इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कृति है, जिसमें उन्होंने गीता के दार्शनिक सिद्धांतों को आधुनिक भौतिकी, ऊर्जा-संरक्षण, चेतना-विज्ञान और ब्रह्मांडीय संरचना के संदर्भ में समझने का प्रयास किया। इसी प्रकार उनकी पुस्तक “Historical, Cultural and Scientific Heritages of India” भारत की उस समृद्ध परंपरा को सामने लाती है, जिसमें गणित, खगोलशास्त्र, धातु-विज्ञान, चिकित्सा-विज्ञान और ब्रह्मांडीय अवधारणाओं का अत्यंत उन्नत ज्ञान निहित रहा है। उन्होंने आर्यभट्ट, भास्कराचार्य, चरक, सुश्रुत और कणाद जैसे भारतीय मनीषियों के ज्ञान को केवल अतीत की स्मृति मानने के बजाय आधुनिक वैज्ञानिक विमर्श के साथ संवाद स्थापित करने योग्य परंपरा के रूप में देखने का प्रयास किया।

शोधार्थियों की पीढिय़ाँ तैयार करने वाले गुरु
लगभग 55 वर्ष की शोध-यात्रा में प्रोफेसर राजपूत ने 35 शोध छात्रों को पीएचडी और चार छात्रों को D.Sc. के लिए मार्गदर्शन दिया। उनके अनेक शिष्य आज विभिन्न विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर हैं और उनमें से एक कुलपति पद तक पहुँचा है। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक यह है कि उन्होंने केवल शोध नहीं कराया, बल्कि ऐसी विद्वत्-परंपरा विकसित की जिसमें आधुनिक विज्ञान और भारतीय वैज्ञानिक दृष्टि के बीच सेतु बनाने वाले शोधार्थियों की पीढिय़ाँ तैयार हुईं।

विज्ञान से समाज और राष्ट्र तक
प्रो. राजपूत का व्यक्तित्व केवल वैज्ञानिक का नहीं, बल्कि राष्ट्रचिंतक का भी रहा है। वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विद्या भारती और विज्ञान भारती जैसी संस्थाओं से जुड़े रहे। नई शिक्षा नीति के निर्माण में भी उनका योगदान रहा। वे आज भी स्वतंत्र शोधकर्ता के रूप में सक्रिय हैं और भारतीय ज्ञान-विज्ञान की परंपरा को आधुनिक वैज्ञानिक विमर्श में स्थापित करने के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं।

एक जीवन, अनेक आयाम
बलवंत सिंह राजपूत का जीवन वस्तुत: तीन धाराओं का संगम है—आधुनिक भौतिकी का गहन वैज्ञानिक अनुसंधान, उत्कृष्ट शैक्षणिक नेतृत्व और भारतीय ज्ञान-विज्ञान की पुनस्र्थापना का सांस्कृतिक-वैज्ञानिक अभियान। लच्छीरामपुर के एक साधारण कृषक परिवार से निकला वह बालक, जो कभी प्रतिदिन छह किलोमीटर पैदल चलकर विद्यालय जाता था, आगे चलकर विश्वस्तरीय वैज्ञानिक, शिक्षक, शोध-मार्गदर्शक, संस्थान-निर्माता और भारतीय ज्ञान-परंपरा का साधक बना। उनका जीवन यह संदेश देता है कि संसाधनों का अभाव प्रतिभा को रोक नहीं सकता; यदि लक्ष्य स्पष्ट हो, परिश्रम निरंतर हो और ज्ञान के प्रति समर्पण अटूट हो, तो गाँव की पगडंडी से निकलकर विज्ञान के शिखर तक पहुँचा जा सकता है। और शायद उनके जीवन की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि उन्होंने विज्ञान को केवल प्रयोगशाला की सीमा में नहीं देखा। उनके लिए विज्ञान ज्ञान की खोज था, शिक्षा समाज-निर्माण का माध्यम थी और भारतीय ज्ञान-परंपरा अपनी जड़ों से जुड़कर भविष्य की ओर बढऩे की प्रेरणा।

प्रोफेसर बलवंत सिंह राजपूत का जीवन इसलिए केवल उपलब्धियों की सूची नहीं, बल्कि एक सतत साधना की कथा है। उस साधना की, जिसमें आधुनिक विज्ञान की तार्किकता, शिक्षा की व्यापकता और भारतीय ज्ञान-परंपरा की गहराई एक साथ दिखाई देती है। लच्छीरामपुर से शुरू हुई यह यात्रा आज भी यही संदेश देती है कि जब प्रतिभा परिश्रम से मिलती है, ज्ञान राष्ट्रबोध से जुड़ता है और विज्ञान अपनी सांस्कृतिक जड़ों से संवाद करता है, तब एक व्यक्ति केवल अपना जीवन नहीं बदलता—वह आने वाली पीढिय़ों के लिए एक नई दिशा भी निर्मित करता है।