सांस्कृतिक चेतना के अप्रतिम साधक : प्रो. रामेश्वर मिश्र ‘पंकज’

धरोहर प्रतिनिधि


भारतीय सभ्यता की विराट यात्रा में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो केवल अपने समय के साक्षी नहीं होते, बल्कि अपने चिंतन, साधना और कर्म के माध्यम से समय को दिशा देने का प्रयत्न करते हैं। वे शब्दों को केवल लिखते नहीं, उन्हें समाज की चेतना से जोड़ते हैं; वे इतिहास को केवल पढ़ते नहीं, बल्कि उसके भीतर निहित आत्मा को पहचानने का प्रयास करते हैं; और वे संस्कृति को केवल अतीत की स्मृति नहीं मानते, बल्कि वर्तमान और भविष्य के निर्माण की जीवंत शक्ति के रूप में देखते हैं।

प्रो. रामेश्वर मिश्र ‘पंकज’ ऐसे ही विरल व्यक्तित्वों में हैं—एक सुप्रसिद्ध चिंतक, लेखक, दार्शनिक और भारतीय ज्ञान-परंपरा के विद्वान, जिनका जीवन भारतीय दर्शन, भारतीय इतिहास, समाज चिंतन, संस्कृति और शिक्षा के विविध आयामों को समझने, उन पर विचार करने और समाज के समक्ष भारतीय दृष्टि से प्रस्तुत करने के लिए समर्पित रहा है।
उनकी वैचारिक यात्रा केवल लेखन की यात्रा नहीं है; यह भारतीय अस्मिता, सांस्कृतिक चेतना और ज्ञान-परंपरा के प्रति एक दीर्घ साधना का प्रमाण है।

असाधारण यात्रा
प्रो. रामेश्वर मिश्र ‘पंकज’ ने भारतीय संस्कृति, इतिहास, समाज, शिक्षा और दर्शन पर व्यापक लेखन एवं शोध किया है। उनके 3,000 से अधिक लेख और अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। यह संख्या केवल लेखन की व्यापकता का संकेत नहीं देती, बल्कि उस सतत वैचारिक सक्रियता का परिचायक है जिसके माध्यम से उन्होंने भारतीय जीवन और चिंतन के विविध प्रश्नों पर अपनी दृष्टि प्रस्तुत की है। उनका चिंतन भारतीय ज्ञान-परंपरा की उस धारा से जुड़ता है, जिसमें ज्ञान का उद्देश्य केवल बौद्धिक विस्तार नहीं, बल्कि समाज और जीवन के व्यापक हित से उसका संबंध स्थापित करना भी है। भारतीय संस्कृति, सभ्यता, इतिहास और समाज के प्रश्नों पर उनका सतत मनन इस बात का प्रमाण है कि उनके लिए विचार एक अकादमिक उपक्रम भर नहीं, बल्कि जीवन और समाज के प्रति उत्तरदायित्व है।

समृद्ध सार्वजनिक एवं बौद्धिक जीवन
प्रो. रामेश्वर मिश्र ‘पंकज’ ने अपने दीर्घ बौद्धिक और व्यावसायिक जीवन में अनेक महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया है। वे गांधी विद्या संस्थान, वाराणसी निदेशक रहे हैं। उन्होंने संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार में सलाहकार के रूप में भी दायित्व निभाया। वे धर्मपाल शोध पीठ, भोपाल के निदेशक रहे। उन्होंने निराला सृजनपीठ, भोपाल के निदेशक के रूप में भी अपनी सेवाएँ दीं। वे वागर्थ, भारत भवन, भोपाल के निदेशक रहे तथा भारत भवन, भोपाल में ट्रस्टी सचिव का महत्वपूर्ण दायित्व भी संभाला। वर्तमान में आप हिन्दू विद्या केन्द्र, राजसूय परमधाम आश्रम, भोपाल के निदेशक हैं। ये दायित्व उनके व्यक्तित्व के विविध पक्षों को उद्घाटित करते हैं। एक ओर वे गहन चिंतन और लेखन से जुड़े विद्वान हैं, तो दूसरी ओर सांस्कृतिक, शैक्षणिक और शोध संस्थानों के माध्यम से भारतीय समाज की वैचारिक और सांस्कृतिक चेतना से सक्रिय रूप से जुड़े रहे हैं।

पुनर्जागरण के प्रति समर्पण
प्रो. रामेश्वर मिश्र ‘पंकज’ के कार्य का एक महत्वपूर्ण आयाम भारतीय ज्ञान-परंपरा, सनातन दर्शन और भारतीय इतिहास के पुनर्पाठ से जुड़ा है। उन्होंने भारतीय दृष्टि से इतिहास, अर्थशास्त्र और सामाजिक चिंतन पर अनेक पुस्तकें लिखीं और भारतीय सभ्यता को समझने के लिए भारतीय बौद्धिक परंपरा के आलोक में विचार करने का आग्रह किया।

भारतीय शिक्षा, संस्कृति और सभ्यता पर उनका व्यापक शोध एवं जनजागरण कार्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वे उस सांस्कृतिक चेतना के प्रतिनिधि हैं, जो भारतीय परंपरा को केवल अतीत की विरासत के रूप में नहीं देखती, बल्कि उसे समाज की निरंतर प्रवहमान चेतना से जोड़ती है। देशभर में व्याख्यानों और शोध गतिविधियों के माध्यम से उन्होंने भारतीय संस्कृति के संरक्षण एवं प्रसार के लिए निरंतर कार्य किया है। यह कार्य केवल संस्थागत दायित्वों तक सीमित नहीं दिखाई देता, बल्कि भारतीय ज्ञान और संस्कृति के प्रति उनके गहरे वैचारिक सरोकार का विस्तार है।

पुस्तकों में व्यक्त भारतीय दृष्टि
प्रो. रामेश्वर मिश्र ‘पंकज’ की प्रमुख कृतियाँ उनके चिंतन के व्यापक विषय-क्षेत्र का परिचय देती हैं। उनकी उल्लेखनीय पुस्तकों में शामिल हैं— ‘भारत कभी पराधीन नहीं रहा’, ‘गाय: सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक’, ‘भारत का संविधान और भारत का धर्म’, ‘विश्व सभ्यता : भारतीय परिप्रेक्ष्य’, ‘समृद्धि भी अहिंसक हो सकती है’, एकात्म दर्शन (भाग 1 एवं 2)। इन कृतियों के विषयों को देखें तो स्पष्ट होता है कि उनका चिंतन भारतीय इतिहास से लेकर सांस्कृतिक अस्मिता तक, संविधान और धर्म से लेकर विश्व सभ्यता तक तथा समृद्धि, अहिंसा और एकात्म दर्शन तक विस्तृत है। यह विस्तार उनके वैचारिक व्यक्तित्व की व्यापकता को रेखांकित करता है। वे भारतीय जीवन को किसी एक खंड में विभाजित करके नहीं देखते, बल्कि इतिहास, संस्कृति, समाज, दर्शन और शिक्षा के परस्पर संबंधों को समझने और उनके माध्यम से भारतीय दृष्टि को अभिव्यक्ति देने का प्रयास करते हैं।

एक सजग चिंतक
प्रो. रामेश्वर मिश्र ‘पंकज’ का व्यक्तित्व हमें उस परंपरा की याद दिलाता है जिसमें विद्वता का अर्थ केवल ज्ञान-संचय नहीं, बल्कि ज्ञान के प्रति निष्ठा और समाज के प्रति उत्तरदायित्व भी होता है। भारतीय धरोहर का संरक्षण केवल स्मारकों या ग्रंथों के संरक्षण का प्रश्न नहीं है। वह उन विचारों, मूल्यों, ज्ञान-परंपराओं और सांस्कृतिक स्मृतियों को जीवित रखने का भी प्रश्न है, जिन्होंने भारतीय सभ्यता को उसकी विशिष्ट पहचान प्रदान की है। प्रो. रामेश्वर मिश्र ‘पंकज’ का कार्य इसी व्यापक सांस्कृतिक दायित्व से जुड़ा हुआ दिखाई देता है। भारतीय ज्ञान-परंपरा के पुनर्जागरण, भारतीय इतिहास के पुनर्पाठ, सनातन दर्शन के प्रति वैचारिक प्रतिबद्धता और समाज में सांस्कृतिक चेतना के प्रसार के लिए उनका योगदान उन्हें विशिष्ट बनाता है।

सनातन परंपरा से जुड़ाव
भारतीय धरोहर, समाजोपयोगी कार्य, उच्च योग्यता, जीवित व्यक्तित्व, सनातन परंपरा से जुड़ाव और राष्ट्रीय प्रतिष्ठा जैसे मानदंडों के आधार पर प्रो. रामेश्वर मिश्र ‘पंकज’ एक अत्यंत उपयुक्त उम्मीदवार के रूप में सामने आते हैं। उनका जीवन और कार्य भारतीय संस्कृति, सनातन दर्शन, भारतीय इतिहास और राष्ट्रीय चिंतन के प्रति उनके दीर्घकालिक समर्पण का परिचायक है। उन्होंने लेखन, शोध, संस्थागत दायित्वों, व्याख्यानों और वैचारिक गतिविधियों के माध्यम से भारतीय ज्ञान-परंपरा और सांस्कृतिक चेतना के क्षेत्र में निरंतर योगदान दिया है। तीन हजार से अधिक लेखों की व्यापक वैचारिक यात्रा, अनेक पुस्तकों का लेखन, प्रतिष्ठित संस्थानों में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन और वर्तमान में भी भारतीय ज्ञान एवं सांस्कृतिक चेतना से जुड़े कार्यों में सक्रियता—ये सभी उनके व्यक्तित्व को विशिष्ट गरिमा प्रदान करते हैं।

वैचारिक विरासत
प्रो. रामेश्वर मिश्र ‘पंकज’ का व्यक्तित्व केवल उपलब्धियों की सूची में सीमित नहीं किया जा सकता। उनके जीवन की वास्तविक पहचान उस निरंतर वैचारिक यात्रा में है, जिसमें भारतीयता के प्रश्न, संस्कृति की चेतना, इतिहास की दृष्टि, समाज की दिशा, शिक्षा का स्वरूप और दर्शन की व्यापकता एक-दूसरे से जुड़ते हैं। उन्होंने भारतीय चिंतन की उस परंपरा को अपने अध्ययन और लेखन का आधार बनाया, जिसमें मनुष्य, समाज, संस्कृति और सभ्यता को अलग-अलग खंडों में नहीं, बल्कि एक व्यापक एकात्म दृष्टि से समझने का प्रयास किया जाता है। आज जब भारतीय ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक अस्मिता और सभ्यतागत चेतना पर नए सिरे से विचार हो रहा है, तब प्रो. रामेश्वर मिश्र ‘पंकज’ जैसे चिंतकों का कार्य विशेष महत्व रखता है। उनका लेखन, उनका शोध और उनकी वैचारिक सक्रियता भारतीय दृष्टि के प्रति एक गंभीर, सतत और समर्पित बौद्धिक साधना का परिचय देती है।

प्रो. रामेश्वर मिश्र ‘पंकज’ निश्चय ही उन व्यक्तित्वों में हैं जिनका सम्मान केवल एक विद्वान के सम्मान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वह भारतीय ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक चेतना और उस दीर्घ वैचारिक साधना के सम्मान के रूप में भी देखा जाएगा, जिसे उन्होंने अपने जीवन और कर्म के माध्यम से निरंतर आगे बढ़ाया है।

भारतीयता को बनाया चिंतन का केंद्र
उनकी यात्रा हमें यह स्मरण कराती है कि सभ्यताएँ केवल भौतिक उपलब्धियों से महान नहीं बनतीं। वे अपने विचारकों, अपने मनीषियों, अपने सांस्कृतिक साधकों और उन व्यक्तित्वों के कारण भी जीवित रहती हैं, जो समय के प्रवाह में अपनी परंपरा की ज्योति को बुझने नहीं देते। प्रो. रामेश्वर मिश्र ‘पंकज’ का जीवन और कार्य इसी अर्थ में भारतीय ज्ञान-परंपरा की एक सजग, सक्रिय और प्रेरणादायी उपस्थिति है—एक ऐसा व्यक्तित्व, जिसने विचार को साधना बनाया, भारतीयता को अपने चिंतन का केंद्र बनाया और संस्कृति को समाज की जीवंत चेतना से जोडऩे का सतत प्रयत्न किया।

ऐसे विद्वान, चिंतक और सांस्कृतिक साधक का सम्मान वस्तुत: उस भारतीय आत्मा का सम्मान है, जो युगों से ज्ञान, दर्शन, संस्कृति और सभ्यता के माध्यम से स्वयं को निरंतर अभिव्यक्त करती रही है।