धरोहर प्रतिनिधि
भारतीय ज्ञान परंपरा की जीवंत धारा आयुर्वेद, जब आधुनिक विज्ञान, अनुसंधान और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ती है, तो कुछ ऐसे व्यक्तित्व सामने आते हैं जो परंपरा और भविष्य के बीच सशक्त सेतु का निर्माण करते हैं। प्रो. वैद्य करतार सिंह ‘धीमान’ ऐसे ही व्यक्तित्व हैं। श्रीकृष्ण आयुष विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र के कुलपति के रूप में वे आज आयुर्वेद शिक्षा, अनुसंधान और संस्थागत विकास के प्रमुख स्तंभों में गिने जाते हैं। उन्हें भारतीय धरोहर सम्मान से सम्मानित किया जाना न केवल उनके व्यक्तिगत योगदान का सम्मान है, बल्कि आयुर्वेद को वैज्ञानिक, व्यावहारिक और वैश्विक स्वरूप प्रदान करने की दिशा में उनके दीर्घकालीन कार्यों की भी स्वीकृति है।
जन्म और शिक्षा
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जनपद की ज्वाली तहसील के सिद्धपुरघाड़ (भरमाड़) गाँव में जन्मे करतार सिंह ‘धीमान’ का बचपन भले ही साधारण परिस्थितियों में बीता, लेकिन उनके संकल्प असाधारण थे। प्राथमिक शिक्षा के दौरान ही उनके पिता, श्री ज्ञान सिंह जी का निधन हो गया। इसके बाद माता श्रीमती प्रीतम कौर और अग्रज श्री वरयाम सिंह जी के सहयोग से परिवार ने उन्हें डॉक्टर बनाने का सपना देखा और उसे साकार करने में निरंतर सहयोग दिया। गाँव की पाठशाला से आरंभ हुई उनकी शैक्षणिक यात्रा वर्ष 1988 में आर.जी. पोस्ट-ग्रेजुएट आयुर्वेद कॉलेज, पपरोला से बी.ए.एम.एस. की उपाधि प्राप्त करने तक पहुँची। वर्ष 1991 में उन्होंने गुजरात आयुर्वेद विश्वविद्यालय, जामनगर से प्रो. कुलवंत सिंह के मार्गदर्शन में शालाक्य तंत्र (आयुर्वेद के ‘अष्टांग आयुर्वेद’ की आठ प्रमुख शाखाओं में से एक) में एम.डी. (आयु.) की उपाधि प्राप्त की। बी.ए.एम.एस. के दौरान वैद्य सुरेंद्र कुमार शर्मा के मार्गदर्शन ने उन्हें आयुर्वेद के प्रति गहरे समर्पण की दिशा दी। वर्ष 2007 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से शालाक्य में पीएच.डी. पूर्ण कर उन्होंने अपनी शैक्षणिक और शोध-आधारित नींव को और सुदृढ़ किया।
विभिन्न दायित्व
फरवरी 1992 से सितंबर 2008 तक पपरोला आयुर्वेद कॉलेज में ए.एम.ओ. से लेकर शालाक्य विभागाध्यक्ष तक विभिन्न दायित्वों का निर्वहन करते हुए उन्होंने विभाग को आधुनिक स्वरूप प्रदान किया। नेत्र, कर्ण-नासा-गल तथा मुख-दंत रोगों की चिकित्सा को व्यवस्थित एवं पृथक करते हुए उन्होंने एक आदर्श शालाक्य विभाग की नींव रखी। अक्टूबर 2008 में जामनगर के आई.टी.आर.ए. में प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष के रूप में कार्यभार संभालने के बाद उन्होंने आधुनिक निदान उपकरणों से विभाग को सुसज्जित किया। उनके नेतृत्व में क्रियाकल्प कक्ष, नेत्र, ईएनटी एवं मुख चिकित्सा इकाइयों के साथ-साथ प्रयोगशाला और शल्यकर्म (ऑपरेशन) थिएटर को भी सक्रिय एवं सुदृढ़ किया गया। तीन दशक से अधिक के उनके व्यावसायिक जीवन का विस्तार देश के अनेक प्रतिष्ठित संस्थानों तक रहा है। पपरोला में रीडर एवं विभागाध्यक्ष, जामनगर में प्रोफेसर एवं निदेशक/प्रभारी, आयुष मंत्रालय के केंद्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद (सीसीआरएएस) के महानिदेशक तथा आई.एम.एस., बीएचयू के आयुर्वेद संकाय में प्रोफेसर के रूप में उन्होंने महत्वपूर्ण दायित्व निभाए। वर्ष 2015 से 2021 तक सीसीआरएएस के महानिदेशक तथा कुछ समय तक सीसीआरयूएम के अतिरिक्त प्रभार के दौरान उन्होंने परिषद की अनुसंधान एवं प्रशासनिक गतिविधियों को नई गति प्रदान की।
आयुर्वेद नेत्र विज्ञान में योगदान
शोध के क्षेत्र में उनकी विशेषज्ञता विशेष रूप से आयुर्वेद नेत्र-विज्ञान में उल्लेखनीय रही है। उन्होंने 40 एम.एस. (आयु.) और 9 पीएच.डी. शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया। ड्राई आई और माइग्रेन जैसे विषयों पर शोध परियोजनाओं को पूर्ण किया गया। एनपीसीडीसीएस में आयुर्वेद के एकीकरण (समावेश), महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में आरसीएच कार्यक्रम तथा रसौषधियों के मानकीकरण (एक समान गुणवत्ता तय करने) एवं सुरक्षा संबंधी अध्ययनों में भी उनके नेतृत्व की महत्वपूर्ण भूमिका रही। प्रकृति आकलन स्केल, स्वास्थ्य आकलन स्केल, मानकीकृत (तय मानकों पर आधारित) आयुर्वेदिक केस-टेकिंग प्रोटोकॉल और चतुर्विध अग्नि आकलन स्केल जैसे वैधीकृत (जिनकी वैज्ञानिक रूप से पुष्टि की गई हो) उपकरणों का विकास उनके शोध नेतृत्व की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल है। सूचना प्रौद्योगिकी और नवाचार के क्षेत्र में भी उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही है। हृ्ररू्रस्ञ्जश्व, ्र-॥ढ्ढरूस्, आयुर प्रकृति वेब पोर्टल और ्रक्कञ्ज्र डिजिटल लाइब्रेरी जैसी पहलें (नई योजनाएँ) उनके योगदान से आगे बढ़ीं। आईआईटी, दिल्ली के सहयोग से क्षारसूत्र स्वचालन (काम को स्वचालित करने), स्वचालित शिरोधारा प्रणाली और बस्ति यंत्र जैसी तकनीकी परियोजनाओं पर कार्य किया गया। आयुष-82 (मधुमेह), आयुष-एसजी (गठिया) और आयुष-सीसीटी (हृदय देखभाल) जैसे उत्पादों के व्यावसायीकरण तथा लगभग 15 औषधीय मिश्रणों के विकास में भी उन्होंने दिशा और नेतृत्व प्रदान किया। झाँसी में डिजिटल हर्बेरियम, अनुसंधान फार्मेसी तथा गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशाला की स्थापना भी उनके कार्यकाल की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में रही।
मर्म चिकित्सा पर पुस्तक
मर्म चिकित्सा पर प्रामाणिक पाठ्यपुस्तक का प्रकाशन, पशु आयुर्वेद के क्षेत्र में सहयोगात्मक (मिल-जुलकर काम करने वाले) केंद्र की स्थापना तथा एएफआई भाग-ढ्ढङ्क का विकास उनके व्यापक और बहुआयामी दृष्टिकोण को दर्शाता है। जेआरएएस और जेडीआरएएस के ऑनलाइन संस्करणों को सुदृढ़ करना, उनका यूजीसी-केयर सूची में समावेश तथा 98 पुस्तकों एवं मोनोग्राफ (किसी एक विषय पर केंद्रित पुस्तक/अध्ययन) का प्रकाशन उनके वैज्ञानिक नेतृत्व और अकादमिक योगदान को रेखांकित करता है। क्षमता निर्माण (कौशल और कार्यक्षमता बढ़ाने) के क्षेत्र में सैकड़ों अधिकारियों की भर्ती, पीएच.डी. फेलोशिप तथा पंचकर्म तकनीशियन पाठ्यक्रमों की शुरुआत की गई। मिलान, स्वीडन, लातविया, जर्मनी, म्यांमार और जापान में आयुष मंत्रालय का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर आयुर्वेद की वैज्ञानिक और चिकित्सकीय संभावनाओं को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।
शैक्षणिक और ज्ञान विस्तार
कोविड-19 महामारी के दौरान सीसीआरएएस की टीम ने निवारक (रोकथाम संबंधी) एवं उपचारात्मक कार्य-योजनाओं के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस दौरान 23 नैदानिक परीक्षण (मरीजों पर किए जाने वाले चिकित्सकीय परीक्षण) किए गए और विभिन्न संस्थानों को तकनीकी सहायता प्रदान की गई। डब्ल्यूएचओ-एसईएआरओ के साथ क्षेत्रीय अनुसंधान दिशानिर्देशों के विकास में भी उनका मार्गदर्शन महत्वपूर्ण रहा। राष्ट्रपति द्वारा सीसीआरएएस को वयोश्रेष्ठ सम्मान से सम्मानित किया जाना भी उनके नेतृत्व की एक उल्लेखनीय उपलब्धि रही। उनके कार्यकाल में परिषद को वृद्धजनों के हित में उत्कृष्ट अनुसंधान संगठन के रूप में सम्मान प्राप्त हुआ। शैक्षणिक और ज्ञान-विस्तार के क्षेत्र में भी उनका योगदान व्यापक रहा है। उन्होंने 133 से अधिक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में सहभागिता की तथा 114 से अधिक शोध-पत्रों और 96 पुस्तकों के माध्यम से अपने ज्ञान एवं अनुभव को व्यापक अकादमिक समुदाय तक पहुँचाया। वर्ष 2023 में उन्हें राष्ट्रीय आयुर्वेद विद्यापीठ द्वारा फेलो सम्मान तथा नेपाल सरकार द्वारा इंटरनेशनल आयुर्वेद पर्सनैलिटी अवार्ड से सम्मानित किया गया।
कुलपति के रूप में
जुलाई 2023 से श्री कृष्ण आयुष विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र के कुलपति के रूप में उनके कार्यकाल में विश्वविद्यालय के शैक्षणिक, प्रशासनिक और संस्थागत विकास को नई दिशा मिली है। नशामुक्त एवं स्वच्छ परिसर, शोध की गुणवत्ता में सुधार, नियमित व्याख्यानों की व्यवस्था, पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया, अस्पताल में मरीजों की संख्या में वृद्धि तथा गुणवत्तापूर्ण औषधियों की उपलब्धता सुनिश्चित करने जैसे अनेक कदम उठाए गए। नए ऑडिटोरियम का निर्माण, गल्र्स हॉस्टल का शुभारंभ और विभिन्न भवन परियोजनाओं को गति देना भी उनके कार्यकाल की महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैं। इन कार्यों के परिणामस्वरूप हरियाणा सरकार ने उन्हें तीन वर्ष का कार्यकाल विस्तार प्रदान किया। विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद पुन: कार्यकाल विस्तार पाने वाले वे प्रथम कुलपति बने।
प्रो. वैद्य करतार सिंह ‘धीमानÓ का व्यक्तित्व शिक्षा, अनुसंधान, चिकित्सा, प्रशासन, तकनीकी नवाचार और सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति समर्पण का परिचायक है। उन्होंने आयुर्वेद की प्राचीन ज्ञान-परंपरा को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सूचना प्रौद्योगिकी और वैश्विक संवाद से जोडऩे का महत्वपूर्ण कार्य किया है। भारतीय धरोहर सम्मान उनके इसी दीर्घकालीन और बहुआयामी योगदान का उपयुक्त सम्मान है।





