वेदों में यज्ञ के माध्यम से रोग निवारण

मुरारी शरण शुक्ल
सह सम्पादक, हिन्दू विश्व


प्राचीन भारतीय संस्कृति में वैदिक दिनचर्या का आरम्भ हवन, यज्ञ, अग्निहोत्र आदि से होता था। भारत के सभी लोग त्रिकाल संध्या (यज्ञ) करके संसार के सभी रोगों का निवारण किया करते थे। दूसरों को लाभान्वित करने के हेतु से उत्तम पदार्थ, घृत, मिष्ठान्न, रोगनिवारक व बलवर्धक वनौषधियाँ इत्यादि हवन में डालकर संसार में सुख, शांति फैलाते थे, वहीं वैज्ञानिक नियमों के आधार पर स्वयं भी शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करते थे। दीर्घायुष्य प्राप्ति, रोग निवारण, स्वास्थ्य संवर्धन, सुसंतति की प्राप्ति, साम्राज्य की प्राप्ति, प्रजा व पशु संवर्धन, शत्रुदमन व युद्ध में विजय, व्यक्तित्व विकास, आध्यात्मिक विकास एवं आत्मोत्कर्ष, प्राण-पर्जन्य की अभिवृद्धि, वृष्टि नियंत्रण, जलवायु शुद्धिकरण, पर्यावरण संशोधन, ऋतुचक्र नियमन, प्रकृति अनुकूलन, पोषक तत्वों से परिपूर्ण वृक्ष-वनस्पतियों की अभिवृद्धि आदि सभी कार्य यज्ञों द्वारा सम्पन्न होते थे।

ज्ञान-विज्ञान को समझाने के लिए यज्ञ
पृथ्वी को ठीक से जानने के लिए नक्शा बनाया जाता है। भूगोल नामक विषय विकसित किया गया, अंतरिक्ष को जानने के लिए खगोलशास्त्र का विकास हुआ, प्राचीन ऐतिहासिक घटनाओं के सम्यक ज्ञान के लिए रंगमञ्च एवं नाट्यशास्त्र का विकास हुआ, ठीक उसी प्रकार ऋषियों ने आधिदैविक जगत के रहस्यों को भली प्रकार जानने के लिए द्रव्यमय यज्ञों का प्रवर्तन किया। द्रव्य यज्ञों का मूल आधार है- आधिदैविक। जगत् में सतत चलने वाले देवयज्ञ का संकेत यजुर्वेद (31) करता है- यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्। अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेधादि यज्ञों के माध्यम से ऋषियों ने वेदविहित आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक, आधिसामाजिक आदि विभिन्न ज्ञान-विज्ञान को समझाने का प्रयास किया है।

यज्ञमयी भारतीय संस्कृति
भारत की संस्कृति यज्ञमयी संस्कृति रही है। यज्ञमय मानव जीवन का श्रेष्ठतम कर्म यज्ञ (शतपथ ब्राह्मण 7/1/4) कहा गया है और यज्ञकर्म में युक्त मानव जीवन को भुवन की नाभि (यजुर्वेद 23/11) कहा गया है। यज्ञ के लिए जलाशयों के निकट दिव्यभूमि के चयन की चर्चा हुई है। निष्काम आध्यात्मिक उन्नति के लिए स्थान जलाशय के उत्तरी एवं पूर्वी तट पर और सकाम भौतिक उन्नति के लिए स्थान जलाशय के दक्षिणी व पश्चिमी तट पर निश्चय किया जाता था। उत्तम भूमि के चयन के उपरांत वेदी निर्माण (ऋ.10/114/3) होता था। शुल्व सूत्रों में वेदी रचना के मान, उन्मान, निवेश आदि प्रक्रियाओं का वर्णन है। वेदों में यज्ञादि कार्य और निवास योग्य भूमि को वास्तु कहा है।

यज्ञस्थल बने तीर्थस्थल
नदी जलाशय के निकट के यज्ञ स्थल देवस्थल में परिणत हुए। ये देवस्थल कालांतर में तीर्थ कहलाए। मंदिरों का निर्माण तीर्थों से प्रारंभ हुआ। तीर्थों का विकास यज्ञ, याग, प्रकृष्ट यागों से हुआ। उत्तम वास्तु भूमि, विशिष्ट दिशा में प्रवाहित पवित्र नदी की धारा, देवताओं के अवतरण स्थल, संतों का निवास व समाधि स्थल, विशिष्ट धर्मयुद्धों के क्षेत्र इत्यादि भी तीर्थों के निर्माण के हेतु हुए। मंदिर निर्माण कला का उद्भव ऋग्वेद में (ऋ 7/56/16, 7/76/2) वर्णित है। यज्ञ, तीर्थ, पवित्र नदियाँ, पवित्र जलाशय, पवित्र पर्वत, पवित्र स्थल, तदनुरूप विकसित/निर्मित हुए मंदिर, मंदिरों से सम्बद्ध मेले और इन सभी से सम्बद्ध पर्व, उत्सव, संस्कार यही तो भारत के जीवन के उत्कर्ष के हेतु रहे हैं। इन्हीं के इर्द-गिर्द कृषि, वाणिज्य, विज्ञान, तकनीक, सेवाओं का विकास हुआ। भारत उत्तमता को प्राप्त हुआ। दुनिया की सबसे उत्कृष्ट संस्कृति के रूप में स्थापित हुआ।

यज्ञवेदी से देवालयों का निर्माण
यज्ञवेदी के चारों ओर यूप निर्माण (ऋ. 10/11/15) होता था। यूप अर्थात् खंभे (ऋ 10/11/15), (कृष्ण यजुर्वेद 6/3/4)। यज्ञ वेदी के आसपास बांस या लकड़ी के स्तंभ गाड़ देते थे। ऐसे स्तंभों को स्थूण, स्तंभ, स्कम्भ, उपामिति, धरुण आदि नामों से जाना जाता था (ऋ. 1/59/1, 3/31/12, 4/5/1)। स्तम्भसूक्त के 44 मंत्रों में स्तंभों के महत्व का वर्णन (अथर्ववेद 10/7) है। जिस प्रकार गृह का छादन स्तंभ पर टिका है, उसी प्रकार यह द्युलोक ब्रह्म के सहारे टिका हुआ है (ऋग्वेद 4/5/1)। प्रारंभ में लकड़ी के स्तंभ और छत, किन्तु बाद में प्रस्तर और इष्टिका के निर्माण का समावेश हुआ। क्रमश: देवालय निर्माण की प्रक्रिया विकसित होती गई। प्रकारों के अनुरूप प्राकारों के नामकरण भी होते गए।

यज्ञ से कृषि संवर्धन
यजुर्वेद (18/09) में ऋषि यज्ञ से कृषि संवर्धन की कामना करते हैं- कृषिश्च में….. यज्ञेन कल्पन्ताम्। आधुनिक कृषि वैज्ञानिकों ने अपने शोधों के आधार पर कृषि संवर्धन एवं फसलों के रोग नाश हेतु यज्ञ के धुएँ एवं राख (भष्म) को बहुत उपयोगी पाया है। गाँव के लोग अपनी रसोई में गाय के गोबर और विभिन्न कृषि अवशेषों के मिश्रण से बने उपले और विशेष लकडिय़ों के द्वारा मिट्टी के चूल्हे में भोजन पकाने की यज्ञीय प्रक्रिया में से जले राख को भी खेतों में अन्य ऊर्वरकों के साथ डालते रहे हैं। यह राख न केवल कीटनाशक का काम करती है, वरन यह फसलों को आवश्यक ऊर्वर क्षमता भी देने में समर्थ है।

गोमेध यज्ञ
शतपथ ब्राह्मण में ‘अन्नं हि गौ:’ अर्थात् अन्न को ही गौ कहा गया है। गोमेध शब्द का सीधा अर्थ है अन्न के योग्य अर्थात् कृषि योग्य भूमि का निर्माण। कृषि के लिए भूमि के निर्माण में बैलों से हल चलाने की पद्धति का विवरण भी वेदों में वर्णित है। बैलों को गौवंश का प्रमुख सदस्य माना गया है। अस्तु उचित सौर नक्षत्र में गौशक्ति के माध्यम से हल द्वारा भूमि विदारण, अन्न बुवाई, समतली करण इत्यादि प्रक्रियाओं का नाम है गोमेध यज्ञ।

कृषि भी यज्ञकर्म
ऋग्वेद में कृषि को “यज्ञ का कर्म” कहा गया है, जो इसके पवित्र और सामुदायिक महत्व को दर्शाता है। कृषि पर आधारित परंपराएँ, जैसे- हलषष्ठी, मकर संक्रांति, अक्षय तृतीया, आदि, केवल पर्व नहीं, बल्कि गहन कृषि दर्शन के स्तंभ थे। भारत की मिश्रित फसल प्रणाली, पारंपरिक बीज बैंक, देसी गोवंश आधारित कृषि और नक्षत्र आधारित बुवाई, जल संरक्षण पद्धतियाँ- ये सब हिंदू कृषि संस्कृति के अभिन्न अंग थे। यह एक ऐसी व्यवस्था थी, जहाँ किसान केवल अन्न उगाता नहीं था, बल्कि प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व में रहता था।

यज्ञ से दीर्घायुष्य प्राप्ति
ये यज्ञ ऋतु संधियों में किए जाते हैं, इनसे ऋतु परिवर्तन से होने वाले रोगादि दूर हो जाते हैं। जो यज्ञ आरोग्यवर्धक, पुष्टिकारक और बलवर्धक होंगे, वे दीर्घ आयु नि:संदेह प्रदान करेंगे। अथर्ववेद 3/11/2- आयु समाप्त हो गई हो, मनुष्य मृत्यु के, समापन के निकट पहुँच गया हो, तो भी उस विनाश की अवस्था से मैं तुम्हें वापस लाता हूँ और सौ वर्ष की दीर्घ आयु प्राप्त कराता हूँ। ऋषि का यह उद्घोष सामान्य बात नहीं है। शतायु बनाने वाले यज्ञों का वर्णन करते हुए तीसरे मंत्र में शतायुषा हवि का विवरण किया गया है।

धूम्र रूप यज्ञीय औषधि
आधुनिक चिकित्सा में भी अनेक औषधियों का सेवन धूम्रपान में कराया जाता है। आवश्यक होने पर वायुरूप ऑक्सीजन और एनिस्थिसिया की औषधियाँ भी गैस के रूप में ही दी जाती है। श्वास रोगों के इनहेलर भी वायु रूप में दिया जाता है। शीघ्र असर करने वाले बहुत प्रकार के नशीले पदार्थ भी धूम्र रूप में सेवन किए जाते हैं। इसी रूप में अनेक औषधियाँ भी धूम्र रूप में हुक्के से लेने का चलन था, आज भी वाष्प लेने की पद्धति वैदिक यज्ञ परम्परा से ही समाज में स्थापित हुई है। आयुर्वेद में धूम्रपान द्वारा नस्य मार्ग से औषधि दिए जाने की प्रक्रिया यज्ञ विज्ञान का एक हिस्सा है, जिससे गम्भीर और असाध्य रोग ठीक हो जाते हैं। कोरोना के समय हवन की यज्ञीय पद्धति से असंख्य लोगों की प्राण रक्षा हो पाई थी।

1.वनौषधि वर्ग- चार सौ प्रकार के ज्ञात यज्ञों में पाँच सौ प्रकार की वनौषधियों के प्रयोग का वर्णन उपलब्ध है। यथा- तुलसी, ब्राह्मी, शंखपुष्पी, शतावर, सर्पगंधा, जटामांसी, कंटकारी, अश्वगंधा, हल्दी, कालमेघ, चिरायता, गोक्षुरू, नागरमोथ, तेजपत्र आदि।
2.काष्ठ वर्ग- हवन की लकडिय़ों के चयन में यह ध्यान रखा जाता है कि रोगी की जैव रासायनिक संरचना के अनुकूल समिधाओं का प्रयोग हो। प्रमुख समिधाओं में चंदन, देवदार, अगर, तगर, आम, शमी, वट, उदुम्बर, पलाश, गूलर, पीपल, अशोक, विल्ब, चित्रक आदि का प्रयोग होता है।
3.घृत वर्ग- सामान्यत: गौघृत का प्रयोग होता है यज्ञ-हवन में, परन्तु अन्य पशुओं के घृतों में भी पृथक विशेषताएँ हैं। घी को जलाने से वो लाभ होते हैं, जो उसको खाने से नहीं होता है। न्यूरो की अनेक व्याधियों में इस चिकित्सा की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
4.धान्य वर्ग- चावल, जौ, जंगली धान, तिल, चना, गेहूँ इत्यादि।
5.शर्करा वर्ग- गुड़ वाली शक्कर, खाँडसारी गुड़, चीनी, शहद, फल, सुखा मेवा, नारियल, सुपारी इत्यादि।
6.पूर्णाहुति- (अ) स्विष्टकृत होम- इसमें मिष्ठान्न होम किया जाता है। (ब) पूर्णाहुति- इसमें फलों से आहुति होती है। (स) वसोधारा- इसमें घी की धारा छोड़ी जाती है। इन तीनों कृत्यों को मिलाकर पूर्णाहुति की जाती है। यह विधान प्राण पोषक प्रयोग के रूप में किया जाता है। रोग निरोधक सामग्री तो इससे पूर्व ही हवन की जा चुकी होती है।
ज्ञात हो कि हवन सामग्रियों का विवरण मात्र प्रतिकात्मक रूप में दिया गया है, केवल समझने की दृष्टि से। सामग्रियों की पुरी सुचि छोटे लेख में दे पाना कठिन कार्य है।

हृदय रोग

चरक संहिता चि. 26/3-4 में कहा गया है कि मानव शरीर में 107 मर्म स्थान हैं, जिनमें तीन प्रमुख हैं- वस्ति, हृदय एवं शिर और उसमें भी सबसे प्रमुख हृदय को माना जाता है। जब तक यह धड़कता है तब तक ही जीवन है, जैसे इसने धड़कना बंद किया, व्यक्ति मृतक घोषित हो जाता है। समुचित प्रकार की हवन सामग्रियों से नियमित हवन करने से हृदय रोग ठीक हो जाता है।

सभी रोगों का निदान
केवल हृदय के ही नहीं, तो रोगानुसार शरीर की प्रकृति को समझकर हवन सामग्रियों का चयन करके रोगी के पथ्यापथ्य, आहार-विहार, दिनचर्या, ऋतुचर्या का ध्यान रखते हुए उचित यज्ञ प्रक्रिया अपनाने से सभी प्रकार के रोग दूर हो जाते हैं। ऐसे अनेकानेक प्रयोग भारत में हुए हैं, अन्य देशों में यज्ञ चिकित्सा के अनेक प्रयोग किए गए हैं, आज भी हो रहे हैं और पर्याप्त सफलता मिल रही है। ऋग्वेद (2/21/6) में यज्ञ एवं इन्द्र की चर्चा करते हुए ‘तनूनां अरिष्टिं’ कहा गया है, अर्थात् इन्द्र शरीर को निरोगता प्रदान करें।

रोग निवारण के वैदिक संदर्भ
ऋग्वेद 1/12/7 में ऋषि ने रोगों को नष्ट करने वाले यज्ञाग्नि का मंत्रों द्वारा गुणगान करने का उपदेश किया है। अथर्ववेद 19/48/1 में यज्ञाग्नि से प्रार्थना और कामना की गई है कि रोगों से स्रोत्र, नेत्र, प्राण आदि नष्ट न हों, आयु और तेज भी नष्ट न हों। वैदिक यज्ञ उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण साधन है और यह यज्ञ संसार का केन्द्र है।- अयं यज्ञो भुवनस्य नाभि:- ऋग्वेद (1/164/35)। ऋग्वेद 3/10/3 में कहा है कि जो मनुष्य यज्ञ की अग्नि में रोगनाशक औषधियों की समिधाओं का आधान करता है, वह श्रेष्ठ बल को धारण करता हुआ स्वस्थ रहता है। अथर्ववेद के भैषज्य सूक्तों में विभिन्न रोगों के निदान, कृमिनाश तथा वृक्षों की औषधीय उपयोगिता का विवरण मिलता है। तक्मन्-ज्वर (अथर्व. 5/22), गण्डमाला (अथर्व 7/74), बलास (क्षयरोग- अथर्व 6/14), यक्ष्मा (अथर्व 1/12, 3/7), श्वेतकुष्ठ (अथर्व 1/23-24), उन्माद इत्यादि रोगों का यज्ञ द्वारा निवारण का वर्णन हुआ है। रुग्ण शरीर में विद्यमान ज्वर जन्य उपद्रवों को दूर करने की यज्ञीय प्रक्रिया का वर्णन किया गया है- अथर्ववेद (5/22/1)।