वैदिक विदुषियाँ

आचार्य अनमोल
वरिष्ठ शिक्षाविद्


भारतीय संस्कृति में वैदिक काल से ही नारी का स्थान सम्माननीय रहा है और कहा गया है कि-
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:।। मनुस्मृति

अर्थात जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है, वहीं पर देवता रहते हैं और जहाँ स्त्रियों का सम्मान नहीं होता है, वहाँ सब कर्म निष्फल होते हैं। उन दिनों परिवार मातृसत्तात्मक था। किंतु कालान्तर में धीरे-धीरे सभी समाजों में सामाजिक व्यवस्था मातृसत्तात्मक से पितृसत्तात्मक होती गई और नारियाँ समाज के हाशिए पर चली गईं। वैदिक सभ्यता और संस्कृति के प्रारम्भिक काल में महिलाओं की स्थिति बहुत सुदृढ़ थी। अर्धनारीश्वर की कल्पना स्त्री और पुरुष के समान अधिकारों तथा उनके संतुलित संबंधों का परिचायक है। वैदिक काल में परिवार के सभी कार्यों और भूमिकाओं में पत्नी को पति के समान अधिकार प्राप्त थे। नारियाँ शिक्षा ग्रहण करने के अलावा पति के साथ यज्ञ का सम्पादन भी करती थीं। ऋग्वेद काल में स्त्रियाँ उस समय की सर्वोच्च शिक्षा अर्थात् बृह्मज्ञान प्राप्त कर सकती थीं। वेदों में अनेक स्थलों पर रोमाला, घोषाल, सूर्या, अपाला, विलोमी, सावित्री, यमी, श्रद्धा, कामायनी, विश्वम्भरा, देवयानी आदि विदुषियों के नाम लिखे हुए मिलते हैं।

वैदिक ग्रन्थों और उपनिषदों में अनेक महिलाओं का उल्लेख के साथ उपनिषदों के सवाल—जवाब में भी गार्गी, लोपामुद्रा, घोषा, सुलभ, मैत्रीय आदि का उल्लेख मिलता है। वैदिक युग में महिलाओं की जो उन्नत दशा भारतीय महिलाओं की थी वह अन्य देशों में कभी नहीं रही। इसिलए वैदिक युग को भारतीय महिलाओं का स्वर्णिम युग कहा जाता है।

चारों वेद भारतीय साहित्य के धार्मिक ग्रंथ माने जाते हैं। वैदिक काल के लोग वेदों के माध्यम से ज्ञान और धर्म का पालन करते थे। इस काल के महत्वपूर्ण धार्मिक प्रथाओं में यज्ञ, हवन, और तप का पालन किया जाता था। इस समय की जीवनशैली और संस्कृति का गहरा संबंध वेदों में दर्शाया गया है। वैदिक काल भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है और हमारे पुराने इतिहास के बारे में अधिक जानने का माध्यम है।

वैदिक युग में वेदों के अलावा उपनिषद, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद्, भाष्य जैसे प्रमुख ग्रंथ सम्मिलित थे। वैदिक साहित्य ने धार्मिक और दार्शनिक विचारों को प्रमुखता दी और भारतीय संस्कृति को पुष्ट किया। वैदिक काल में आजीवन विवाह न करने वाली स्त्री को अमाजु/कुलिनी कहा गया है। गार्गी ने आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन किया था।

प्रमुख वैदिक विदुषियाँ/ऋषि कन्याएँ
1. वाणी की देवी सरस्वती- ऋग्वेद में सरस्वती को वाणी की देवी कहा गया है जो उस समय की नारी की शास्त्र एवं कला के क्षेत्र में निपुणता का परिचायक है।
2. शतरूपा- ये स्वायम्भुव मनु की पत्नी थीं। ये चारों वेदों की प्रकाण्ड विदुषी थीं। जल प्रलय के बाद मनु और शतरूपा से ही दोबारा सृष्टि का आरम्भ हुआ। ये योगशास्त्र की भी प्रकांड विदुषी और साधिका थीं।
3. ब्रह्मवादिनी गार्गी- के पिता का नाम वचक्नु था, जिसके कारण इन्हें वाचक्नवी भी कहते हैं। गर्ग गोत्र में उत्पन्न होने के कारण इन्हें गार्गी कहा जाता है। ये वेद शास्त्रों की महान विदुषी थीं। इन्होंने शास्त्रार्थ में अपने युग में महान विद्वान महर्षि याज्ञवल्क्य तक को पराजित कर दिया था।
4. विदुषी मैत्रेयी- महर्षि याज्ञवल्क्य की पत्नी थीं। इन्होंने पति के सान्निध्य में बैठकर वेदों का गहन अध्ययन किया। पति परमेश्वर की उपाधि इन्हीं के कारण जग में प्रसिद्ध हुई, क्योंकि इन्होंने पति से ज्ञान प्राप्त किया था और फिर उस ज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए कन्या गुरुकुल स्थापित किए।
5. विदुषी लोपामुद्रा- महर्षि अगस्त्य की धर्मपत्नी थीं। ये विदर्भ देश के राजा की बेटी थीं। राजकुल में जन्म लेकर भी ये ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ की समर्थक थीं, तभी तो इनके पति ने इन्हें कहा था- तुष्टोअहमस्मि कल्याणि तव वृत्तेन शोभने, अर्थात् कल्याणी तुम्हारे सदाचार से मैं तुम पर बहुत संतुष्ट हूं। ये इतनी महान विदुषी थी कि एक बार इन्होंने अपने आश्रम में राम, सीता एवं लक्ष्मण को ज्ञान की बहुत सी बातों की शिक्षा दी थी।
6. ब्रह्मवादिनी घोषा- काक्षीवान् की कन्या थीं। इनको कुष्ठ हो गया था, लेकिन उसकी चिकित्सा के लिए इन्होंने वेद और आयुर्वेद का गहन अध्ययन किया और ये कुष्ठ रोगी होते हुए भी विदुषी और ब्रह्मवादिनी बन गईं। अश्विनी कुमार द्वय ने इनकी चिकित्सा की और ये अपने काल की विश्वसुन्दरी भी बनीं।
7. ब्रह्मवादिनी विश्ववारा- ये वेदों पर अनुसंधान करने वाली महान विदुषी थीं। ऋग्वेद के पाँचवें मण्डल के द्वितीय अनुवाक के अ_ाइसवें सूक्त षड्ऋकों का सरल रूपांतरण इन्होंने ही किया था। अत्रि महर्षि के वंश में पैदा होने वाली इस विदुषी ने वेदज्ञान के बल पर ऋषि की पदवी प्राप्त की थी।
8. सन्ध्या- वेदों की प्रकाण्ड विदुषी थीं। इन्होंने महर्षि मेधातिथि को शास्त्रार्थ में पराजित किया था। ये यज्ञ को सम्पन्न कराने वाली पहली महिला ऋत्विज थीं। उन्हीं के नाम पर प्रात: संध्या और सायं सन्ध्या का नामकरण हुआ।
9. विदुषी अरुन्धती- ब्रहर्षि वशिष्ठ की धर्मपत्नी थीं। ये भी वेदों की प्रकाण्ड विदुषी थीं। अपने ज्ञान के बल पर ही ये एकमात्र ऐसी विदुषी हैं, जिन्होंने सप्तर्षि मंडल में ऋषि पत्नी के रूप में गौरवशाली स्थान प्राप्त किया। महर्षि मेधातिथि के यज्ञ में ये बचपन से ही भाग लेती थीं और यज्ञ के बाद वैदिक विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किया करती थीं।
10. ब्रह्मवादिनी अपाला- ये अत्रि मुनि के वंश में ही उत्पन्न हुई थीं। अपाला को कुष्ठ रोग हो गया था, जिसके कारण इनके पति ने इन्हें घर से निकाल दिया था। ये अपने पिता के घर चली गईं और आयुर्वेद पर अनुसंधान करने लगीं। सोमरस की खोज इन्होंने ही की थी। इन्द्रदेव ने सोमरस इनसे प्राप्त कर इनके ठीक होने में चिकित्सकीय सहायता की। आयुर्वेद चिकित्सा से ये विश्वसुंदरी बन गईं और वेदों के अनुसंधान में संलग्न हो गईं। ऋग्वेद के अष्टम मंडल के 91वें सूक्त की 1 से 7 तक ऋचाएँ इन्होंने ही संकलित कीं।
11. विदुषी तपती- ये आदित्य की पुत्री और सावित्री की छोटी बहन थीं। देवलोक, दैत्यलोक, गंधर्वलोक और नागलोक में उन दिनों उनसे अधिक सुंदरी कोई और नहीं थी। वे वेदों की भी प्रकाण्ड विदुषी थीं। उनके रूप और गुणों से प्रभावित होकर ही अयोध्या के महाराजा संवरण ने उनसे विवाह किया था। तपती ने अपने पुत्र कुरु को स्वयं वेदों की शिक्षा दी, जिनके नाम पर कुरुकुल प्रतिष्ठित हुआ।
12. ब्रह्मवादिनी वाक्- अभृण ऋषि की कन्या थीं। ये प्रसिद्ध ब्रह्मज्ञानी थीं। इन्होंने अन्न पर अनुसंधान किया और अपने युग में उर्वरक खेती के लिए वेदों के आधार पर नए-नए बीजों को खेती के लिए किसानों को अनुसंधान से पैदा करके दिया।
13. ब्रह्मवादिनी रोमशा- ये बृहस्पति की पुत्री और भावभव्य की धर्मपत्नी थीं। इनके सारे शरीर में रोमावली थी, इससे इनके पति इन्हें नहीं चाहते थे। लेकिन इन्होंने ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया, ऐसी बातों का प्रचार किया, जिससे नारी में शक्ति का विकास होता हो।
14. देवमाता अदिति- चारों वेदों की प्रकाण्ड विदुषी थीं। ये दक्ष प्रजापति की कन्या एवं महर्षि कश्यप की पत्नी थीं। इन्होंने अपने पुत्र इन्द्र को वेदों एवं शास्त्रों की इतनी अच्छी शिक्षा दी कि उस ज्ञान की तुलना किसी से नहीं की जा सकती। यही कारण है कि इन्द्र अपने ज्ञान के बल पर तीनों लोकों का अधिपति बने। अदिति को अजर-अमर माना जाता है।
15. देवसम्राज्ञी शची- इन्द्र की पत्नी थीं, वे वेदों की प्रकांड विदुषी थीं। ऋग्वेद के कई सूक्तों पर शची ने अनुसंधान किया। शची देवी पतिव्रता स्त्रियों में श्रेष्ठ मानी जाती हैं। शची को इंद्राणी भी कहा जाता है। ये विदुषी के साथ-साथ महान नीतिवान भी थीं। इन्होंने अपने पति द्वारा खोया गया साम्राज्य एवं पद—प्रतिष्ठा ज्ञान के बल पर ही दोबारा प्राप्त किया।
16. शाकल्य देवी- ये महाराज अश्वपति की पत्नी थीं। एक बार अश्वपति महाराज ने ऋषियों से कहा कि मैं राष्ट्र में कन्याओं का भी निर्वाचन चाहता हूँ। देश में ऐसी कौन महान वेदों की विदुषी है जो देवकन्याओं को वेदों की शिक्षा प्रदान करे। ऋषियों ने बताया कि आपकी पत्नी से बढ़कर वेदों की विदुषी और कोई नहीं है। यह सुनकर राजा ने अपनी पत्नी शाकल्य देवी को वनवास दे दिया, ताकि वे वनों में रहकर कन्याओं के गुरुकुल और आश्रम स्थापित करें, जिसमें सभी कन्याएँ शिक्षा पाएँ। उन्होंने ऐसा ही किया।
17. विदुषी सुलभा- ये महाराज जनक के राज्य की परम विदुषी थीं। इन्होंने शास्त्रार्थ में राजा जनक को हराया एवं स्त्री शिक्षा के लिए विद्यालयों की स्थापना की।
18. विदुषी उशिज- ममता के पुत्र दीर्घतमा ऋषि की धर्मपत्नी थीं। महर्षि काक्षीवान इन्हीं के सुपुत्र थे। इनके दूसरे पुत्र दीर्घश्रवा महान ऋषि थे। वेदों की शिक्षा इन्होंने ही अपने पुत्रों को प्रदान की थी। इन्होंने ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 116 से 121 तक के मंत्र पर अनुसंधान किया।
19. विदुषी प्रातिथेयी- महर्षि दधीचि की धर्मपत्नी थीं। ये विदर्भ देश के राजा की कन्या और लोपामुद्रा की बहिन थीं। इनका पुत्र पिप्पललाद बहुत बड़ा विद्वान हुआ है।
20. ममता दीर्घतमा- ये ऋषि की माता थी। ये बहुत बडी विदुषी एवं ब्रह्मज्ञानसम्पन्न थीं।
वैदिक कालोत्तर की विदुषियाँ
1. विदुषी भामती- ये विद्वान वाचस्पति मिश्र की पत्नी थीं। ये वेदों की प्रकाण्ड विदुषी थीं।
2. विदुषी विद्योत्तमा- इनसे परास्त होकर पण्डितों ने एक मूर्ख को मौनी गुरु बताकर संकेत से शास्त्रार्थ की चुनौती दी थी। पण्डितों ने दो अंगुली और मुक्का आदि के अलग अर्थ बताकर विद्योत्तमा को परास्त घोषित करके मूर्ख से विवाह करने को विवश कर दिया। विद्योत्तमा ने पति से उष्ट्र को उट्र सुनकर उसे रात में ही घर से निकालकर दरवाजा बंद कर दिया। कुछ वर्ष बाद एक घनघोर रात्रि में पति ने पुकारा-”अनावृत्तकपाटं द्वारं देहि।” विद्योत्तमा ने द्वार खोलकर कहा, ”अस्ति कश्चित् वाक् विशेष:।” पत्नी के उपरोक्त तीन शब्दों पर अस्ति से ‘कुमार सम्भवम्’ महाकाव्य, कश्चित् से ‘मेघदूत’ खण्डकाव्य और वाक्विशेष: से ‘रघुवंश महाकाव्य’ की रचना कर डाली। इन तीनों कालजयी ग्रंथ के रचनाकार थे वही अतीत के मूर्ख, विश्व के सर्वश्रेष्ठ संस्कृत साहित्यकार अमर महाकवि कालिदास।
3. उभय भारती- मंडन मिश्र की पत्नी उभय भारती से आदि शंकराचार्य को शास्त्रार्थ करने में कोई कठिनाई नहीं थी। जब उभय भारती ने शंकराचार्य से कामशास्त्र पर प्रश्न किए तो शंकराचार्य ने उन्हें रोका नहीं बल्कि अपने अज्ञानता के लिए माफी माँगी और कुछ समय के लिए शास्त्रार्थ रोकने को कहा।