वेद और आधुनिक विज्ञान

सरोज बाला
पूर्व निदेशक, वेदों पर वैज्ञानिक शोध संस्थान


प्रसिद्ध प्रमाणु वैज्ञानिक डॉ. डी. एस. कोठारी ने कहा था, ”भारतीयों में राष्ट्रीय गौरव की अनुभूति की कमी पर हम शोक कैसे कर सकते है, जबकि हमने अतीत की अपनी अद्भुत वैज्ञानिक उपलब्धियों से उन्हें सुपरिचित ही नहीं कराया है।ÓÓ प्राचीन संस्कृत साहित्य, विशेषकर वैदिक साहित्य, वैज्ञानिक सिद्धान्तों, रहस्यों, पद्धतियों व तकनीकों का असीम भण्डार है। वेदों की ऋचाओं में निहित गूढ़तम एवं प्राचीनतम ज्ञान हमारी अमूल्य धरोहर है। वैदिक साहित्य में चारों वेद, चारों उपवेद शामिल हैं।

नि:सन्देह वैदिक साहित्य ने आधुनिक विज्ञान को बहुत कुछ दिया है और बहुत कुछ अभी पढऩा, समझना तथा कार्यान्वित करना बाकी है। परन्तु पिछले पाँच-छ: सौ वर्ष में संस्कृत भाषा का प्रयोग लगभग समाप्त हो गया तथा इसका ज्ञान संस्कृत विद्धानों तक सिमट कर रह गया। परिणाम—स्वरूप वैदिक साहित्य का अनुवाद मुख्यत: धार्मिक पंडितों या भाषाविदों द्वारा किया गया, जिन्होंने इनका अर्थ मुख्यत: धार्मिक स्तुतियों के रूप में निकाला। कई बार तो वो इनमें निहित गूढ़ वैज्ञानिक रहस्यों को शायद समझ ही नहीं पाये, क्योंकि उनके समय में आधुनिक वैज्ञानिक आविष्कारों की शब्दावली का ज्ञान बहुत कम था। उदाहरणत:

(i) ऋग्वेद को केवल धार्मिक स्तुतियों का संकलन मान लिया गया, जबकि उसमें जल, सूर्य, वायु व आकाश सम्बन्धित अनेक वैज्ञानिक तथ्यों के साथ-साथ नक्षत्र विद्या व प्राचीनतम कैलेंडर इत्यादि के बारे में विस्तृत वृत्तान्त हैं। कृषि विज्ञान के साथ-साथ कई बीमारियों तथा उनके उपचारों का वर्णन भी है। इसीलिये तो यूनेस्को ने इसे ‘मेमोरी ऑफ दी बल्र्ड रजिस्ट्रर’ में शामिल कर लिया है।

(ii) इसी तरह यजुर्वेद को यज्ञ सम्बन्धी प्रक्रियाओं तथा बलि, आहुति व भेंट इत्यादि से सम्बन्धित मन्त्रों का संकलन मान लिया गया, जबकि उसमें खगोलीय विज्ञान (विशेषकर 27 नक्षत्रों), गणित विज्ञान (विशेषकर दशमलव व शून्य) तथा कृषि विज्ञान से सम्बन्धित अनेक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक तथ्य शामिल हैं।

(iii) अथर्ववेद को जादू-टोने, उपचार-सम्बन्धी मंत्रों का संकलन मान लिया गया, जबकि इसमें तो वैज्ञानिक ज्ञान का असीम भंडार है- विशेषकर खगोलीय विज्ञान, गणित, कृषि विज्ञान, वृक्ष विज्ञान व आयुर्विज्ञान आदि से सम्बन्धित अति-उन्नत वैज्ञानिक तथ्यों, विधाओं व उपकरणों का वर्णन इसमें किया गया है, जिनमें से कईओं को तो अभी समझना बाकी है।
पिछले 30-40 वर्ष में ऐसी अनेक वैज्ञानिक विधाओं तथा उपकरणों का विकास हुआ है, जिनके प्रयोग से वेदों में निहित वैज्ञानिक तथ्यों / विधाओं को उद्धृत किया जा सकता है, उनको आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर परखा जा सकता है तथा नये आविष्कारों के लिए आधार भी बनाया जा सकता है। इन विधाओं व उपकरणों में शामिल हैं— कम्प्यूटर व प्लेनेटेरियम सॉफ़्टवेयर, भूगर्भीय शोध, रेडियो कार्बन डेटिंग, पुरावनस्पति व पुराजलवायु के अध्ययन, सामुद्रिक अन्वेषण तथा जलस्तरों का अध्ययन, उपग्रह चित्र और मानव जीनोम में शोध।

वेदों का आधुनिक विज्ञान से सह-सम्बन्ध इतना विस्तृत है कि थोड़े से समय में उसे प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। सौभाग्य से कुछ विषयों पर व्याख्यान पहले ही आदरणीय विद्वान दे चुके है, जैसे कि: आयुर्वेद व आधुनिक चिकित्सा शास्त्र, वृक्षायुर्वेद तथा आधुनिक वनस्पति विज्ञान आदि। इसीलिये यह निश्चय किया गया कि कुछ ऐसे अत्यन्त रोचक व नये तथ्य प्रस्तुत किये जायें जिनके अन्तर्गत वैदिक साहित्य में निहित ज्ञान का सह-सम्बन्ध निम्नलिखित विज्ञानों से स्थापित किया जाये— खगोल विज्ञान, शुद्ध वैज्ञानिक आधार पर वेदों व महाकाव्यों में वर्णित घटनाओं का तिथि निर्धारण, पुरातत्व विज्ञान, पुरावनस्पति विज्ञान, समुद्र विज्ञान, उपग्रह चित्र, आनुवंशिक अध्ययन और भूगर्भ विज्ञान।

वैदिक साहित्य तथा खगोल विज्ञान
वेदों में विश्व का प्राचीनतम खगोलीय ज्ञान भरा हुआ है, उदाहरणत:
(i) आयं गौ: पृक्ष्निरक्रमीद सदन मातरं पुर: । पितरं च प्रयन्त्स्व ।। ऋग्वेद10/189/1
अर्थात्:- आकाश को सामने रख पृथ्वी अपने पिता समान सूर्य के चारों ओर घूम रही है।

(ii) सप्त युञ्जन्तिरथमेकचक्रमेको अश्वो वहति सप्तनामा। ऋग्वेद1/164/2
अर्थात्:- एक चक्र वाले रथ सूर्य से ये सातों जुड़े हैं। सात नामों रंगों वाला एक किरण रूपी अश्व इस चक्र को चलाता है। अर्थात सूर्य की किरणें सात रंगों की हैं।

(iii) 27 नक्षत्र और उनके आधार पर चन्द्रमास की तिथियों का निर्धारण तथा अन्तर्वेषी मास Intercalary month अथर्ववेद, आर्यभटीयम् तथा सूर्यसिद्धान्त।

दु:ख की बात यह है कि आज़ादी के 70 वर्ष बाद भी विद्यालयों व महाविद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों में इनके नाम तक नहीं हैं और पढ़ाया जाता है कि ये सब खगोलीय सिद्धान्त पंद्रहवी-सोलहवी शताब्दी में गैलीलियो तथा कॉपरनिकस ने खोजे, जिससे भारतीयों के स्वाभिमान को धक्का भी लगता है और गलत तथ्य भी उनके दिमाग में बस जाते हैं।

वेदों व महाकाव्यों में महत्त्वपूर्ण घटनाओं के समय के आकाशीय दृश्य वर्णित है। प्लैनेटेरियम सॉफ्टवेयर के माध्यम से इनकी वास्तविक तिथियों का निर्धारण किया जा सकता है और इस तरह इतिहास को पूर्णत: वैज्ञानिक ढ़ंग से दुबारा लिखा जा सकता है। ऋग्वेद में वर्णित खगोलीय स्थितियाँ तारामंडल (प्लैनेटेरियम) सॉफ्टवेयर के अनुसार 7000 वर्ष ई.पू. से 3000 वर्ष ई.पू. के आकाशीय दृश्यों से सम्बन्ध रखती हैं तथा वाल्मीकि रामायण में वर्णित खगोलीय स्थितियाँ लगभग 5000 वर्ष ई.पू. में क्रमिक रूप से आकाश में देखी जा सकती थीं। उदाहरणत: शरद् आयनान्त (Winter Solistice Point) 19 दिसम्बर 7000 ई.पू. अश्विनी नक्षत्रों (मेष राशि) में स्थित था। (ऋ.स. 1/112/13)

(vii) वैदिक साहित्य में वर्णित घटनाओं के समय की ग्रहों- नक्षत्रों की स्थितियों का तारामंडल सॉफ्टवेयर द्वारा निकाली गई तिथियों से सीधा सम्बन्ध है। ऋग्वेद के श्लोको की रचना करने वाले मुख्य ऋषियों में निम्नलिखित नाम शामिल हैं— ऋषि वशिष्ठ, ऋषि विश्वामित्र, अत्रि ऋषि और अगस्त्य मुनि।

वेदों में निहित भूगर्भविज्ञान का आधुनिक भूगर्भविज्ञान से सम्बन्ध:-
(i) ऋग्वेद में कहा गया है कि पृथ्वी की सात परतें हैं, जो गतिशील हैं तथा इसके गर्भ में अग्नि है:- विष्णुर्विचक्रमे पृथ्व्या: सप्त धामभि: । (ऋ.सं.1/22/16, 10/1/6)
अग्निगर्भा पृथ्वी । (शतपथ ब्राह्मण, 14-9-4-21)
आधुनिक वैज्ञानिक भी पृथ्वी की बिल्कुल यही बनावट मानते हैं।

(ii) वैदिक साहित्य तथा पुराणों में भूगर्भ विज्ञान (त्रद्गशद्यशद्द4) का भी अद्भुत उल्लेख है। इनके अनुसार भारतवर्ष में बारह ज्योतिर्लिंग स्वयंभू हैं(शिव पुराण / तृतीय रुद्रसंहिता / 42)-
(1) कैलाश (2) केदारनाथ (3) सोमनाथ (4) नागेश (गुजरात) (5) महाकाल (उज्जैन) (6) काशी विश्वनाथ (7) वैद्यनाथ (झारखंड) (8) अमरकंटक (उदयाचल,नर्मदाउद्गम) (9) ओंकारेश्वर (नर्मदा) (10) त्रयम्बकेश्वर (11) मल्लिकार्जुन (शैल पर्वत, कृष्णा नदी) (12) रामेश्वरम्

जब इन बारह धामों की आधुनिक भूविज्ञानिकों ने खोजबीन की तो पता चला कि यह सभी बारह धाम असाधारण भू-प्रक्रियाओं द्वारा स्वत: ही सृजित हुई ऐसी अद्वितीय व शानदार भू-आकृतियों के स्थान हैं, जिनमें सृष्टि के चिह्न (शिवलिंग) स्वत: बने हुए है। (1) कैलाश (2) रामेश्वरम्

इस बात का उत्तर ढूँढऩे की आवश्यकता है कि कई हज़ार वर्ष पहले इनके स्वरूप, जिनमें से कईयों को केवल हवाई मार्ग से ही देखा जा सकता है, को कैसे जाना तथा वर्णित किया गया।

वैदिक साहित्य तथा पुरातात्त्विक साक्ष्य

पिछले 60 वर्ष में अनेक ऐसे उत्खनन हुए हैं, जिन के आधार पर यह पूर्णतया सिद्ध होता है कि पिछले 9000 वर्षों से लगातार स्वदेशी सभ्यता का विकास भारतीय उपमहाद्वीप में होता रहा है। ये पुरातात्त्वीय रिपोर्टें वेदों तथा रामायण में दिये गये अनेको संदर्भों की सत्यता को भी सिद्ध करतीं हैं। वैदिक साहित्य में वर्णित भारतवर्ष का क्षेत्र आज से बहुत अधिक विशाल था। उत्तर में हिमालय तथा दक्षिण में समुद्र तक फैले भारतवर्ष में शामिल थे अफगानिस्तान, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, बंगला देश, बर्मा आदिइन स्थानों पर वेदों व महाकाव्यों के वर्णनों से हूबहू मिलते हुए सुनियोजित नगर, जल टैंक परिसर, बन्दरगाह, स्नानागार, अनाज भंडार, पक्की ईंटों के मकान व कुएँ, टैराकोटा (पकी मिट्टी) की कलाकृतियाँ, सोने, चाँदी, सींप व अद्र्ध कीमती पत्थरों के आभूषण आदि उत्खनन में मिले हैं:

(i) भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर पश्चिमी क्षेत्र में मेहरगढ़ के उत्खनन में 9000 वर्ष पूर्व की उन्नत सभ्यता के प्रमाण मिले हैं। आश्चर्य चकित करने वाला एक तथ्य यह है कि 9 वयस्क लोगों के जबड़ों में जड़े गये मोलर क्राऊन (Molar Crown) के साक्ष्य मिले हैं जो प्रमाणित करते हैं कि आज से 9000 वर्ष पूर्व दन्त-चिकित्सा कितनी विकसित थी।

(ii). मध्य गंगा के मैदान में लहुरादेवा, झूसी, टोकवा तथा हेटापट्टी में पिछले 7000 वर्षों से सभ्यता के निरन्तर विकास के प्रमाण मिलते हैं। यहाँ पर 7000 वर्ष पुराने चावल, सेलखड़ी के मनके, ताँबे के वाणाग्र आदि के अवशेष मिले हैं जो वैदिक साहित्य के संदर्भों से मेल खाते हैं।

(iii). सरस्वती और सिन्धु घाटी के मैदान में हड़प्पा, मोहनजोदाड़ों, मेहरगढ़ए कोटदीजी, कालीबंगन तथा भिराना आदि में उत्खनन से मिले सोने, चाँदी तथा अर्धबहुमूल्य पत्थरों के आभूषण, अनाज भंडार के स्थान पकी ईंटों के मकान/कुएँ आदि मिले हैं जिनका काल 5000 से 6000 वर्ष पूर्व आँका गया है। ये सभी वेदों तथा महाकाव्यों के वर्णनों से बिल्कुल मिलते हैं।

(iv). गुजरात में ढोलावीरा, लोथल, प्रभास तथा डूबी हुई द्वारका नगरी का काल 5000 वर्ष से 3500 वर्ष पूर्व निर्धारित हुआ है और वहाँ मिले हैं जलटैंक परिसर, बन्दरगाह, अनाज भंडार गृह आदि जो वैदिक साहित्य के संदर्भों से बहुत मिलते हैं।
आज से 30-40 वर्ष पहले केवल पुरातात्त्विक साक्ष्य ही किसी सभ्यता के काल निर्धारण का एकमात्र माध्यम के परन्तु वर्तमान में कई महत्त्वपूर्ण नई वैज्ञानिक पद्धतियों व विधाओं का विकास हो चुका है, जिनके माध्यम से प्राचीन काल में घटी घटनाओं का स्पष्ट तथा सटीक तिथिकरण किया जा सकता है, उदाहरणत: पुरावनस्पति विज्ञान, समुद्र विज्ञान, उपग्रह चित्र, आनुवांशिक अध्ययन आदि।

वेद तथा पुरावनस्पति विज्ञान
वेदों तथा महाकाव्यों में वर्णित घटनाओं की खगोलीय तिथियाँ 7000 ई.पू. से 1400 ई.पू. तक से सम्बन्ध रखती हैं। इनमें सैकड़ों वृक्षों, तथा जड़ी बूटियों का वर्णन है। बीरवल साहनी पुरावनस्पति संस्थान, लखनऊ के वैज्ञानिकों ने बहुत से पुरातात्त्विक अवशेषों का रेडियो कार्बन डेटिंग के माध्यम से काल निर्धारण किया जिनसे वैदिक सन्दर्भों का पुष्टीकरण होता है:

(i) गेहूँ, चावल, जौ तथा खजूर की खेती 7000 वर्ष ई.पू. 9000 वर्ष से लगातार भारतवर्ष के कई भागों में होती रही है।
(ii) मसूर, मटर, ज्वार, बाजरा, बादाम व अंगूर की कृषि 5000 वर्ष ई.पू.7000 वर्ष से लगातार हो रही है।
(iii) खरबूज़ा, नीम्बू, अनार तथा नारियल 4000 वर्ष ई.पू. 6000 वर्ष से लगातार भारतवर्ष में उगाए जाते रहे हैं।
(iv) सेमफली, मेंहदी, चमेली, करौंदा, रीठा, आँवला तथा शिकाकाई 3000 वर्ष ई.पू. 5000 वर्ष से लगातार भारत में उगाए जा रहे हैं तथा इनका प्रयोग हर्बल शैम्पू के रूप में भी पिछले 5000 वर्षों से हो रहा है।
बहुआयामी वैज्ञानिक अनुसंधानों से यह प्रमाणित हुआ है कि भारतीय सभ्यता पिछले दस हज़ार वर्षों से लगातार भारत में विकसित हो रही है तथा फलफूल रही है और हमारे पूर्वज, अन्य लोगों को सभ्य बनाने के लिए यहाँ से बाहर गए थे। नवीनतम वैज्ञानिक उपकरणों और अनुसंधानों से यह भी साबित हुआ है कि वेदों तथा महाकाव्यों में वर्णित घटनाओं की न केवल ऐतिहासिकता सिद्ध होती है अपितु उनकी सटीक तथा स्पष्ट तिथियाँ भी निर्धारित की जा सकती हैं। इस विषय पर और अधिक विस्तार में पढऩे के इच्छुक व्यक्ति निम्नलिखित पुस्तकों को पढ़ सकते हैं-

1- ”वैदिक युग एवं रामायण काल की ऐतिहासिकता” समुद्र की गहराइयों से आकाश की ऊँचाइयों तक के वैज्ञानिक प्रमाण” – संक्षिप्त संस्करण

2- रामायण की कहानी, विज्ञान की ज़ुबानी, सरोज बाला; विजऩ इंडिया पब्लिकेशन्स www.sarojbala.com or https://www.youtube.com/@RigvedatoRobot देखकर और दिलचस्प जानकारयां भी ले सकते हैं। प्रिण्ट एवं इलेक्ट्रोनिक मीडिया से अनुरोध है कि प्राचीन घटनाओं से सम्बन्धित इन वैज्ञानिक तथ्यों की ओर ध्यान दे तथा ऐसा माहौल बनाए जो हमारे युवाओं को प्राचीन संस्कृत साहित्य में निहित ऐतिहासिक तथा वैज्ञानिक ज्ञान में अन्वेषण के लिये प्रेरित करे तथा वैज्ञानिक खोज के इन परिणामों को विश्व के सम्मुख निर्भय होकर प्रस्तुत करने के लिए प्रोत्साहित करे।