प्रकाश और प्रशांति का पर्व

इंदिरा मोहन
सुप्रसिद्ध लेखिका, कवयित्री और अध्यक्ष, दिल्ली हिन्दी साहित्य सम्मेलन


वर्षा ऋतु के बाद धुले-धुले से पेड़ पौधे, साफ-सुथरे कोने-आंगन, महकती शीतल पुरवाई सब मिलकर दीपावली के स्वागत को उत्सुक हैं। जगर-मगर करती दीपावली आ पहुंची है। चारों ओर हर्ष और उल्लास का वातावरण। बन्दनवार सजे, धुले-पुछे घर। जगमगाते बाजार। सड़कों पर बेतहाशा भीड़। सभी परिवार-मित्रजन के लिए खरीद-फरोख्त में व्यस्त हैं। जहां-तहां, गली-गली मिट्टी के दीयों, खील-बताशों, खांड के खेल-खिलौनों की ढेरी लगी है। छोटी-छोटी दुकानों पर मिट्टी के श्रीगणेश-लक्ष्मी के स्वरूप का कहना ही क्या। कुल मिलाकर हर व्यक्ति अपनी सामथ्र्य के अनुसार प्रकाशोत्सव में भाग ले रहा है।

इस त्योहार के बहाने पूरे देश में, यहां तक कि विदेशों में भी उमंगों का संचार नवीनता को नई क्रांति दे रहा है। यह नयापन ही जीवन का सौंदर्य है। यह सौंदर्य केवल शरीर का अथवा किसी अंग विशेष का नहीं है। यह किसी एक घर अथवा किसी एक वर्ग का भी सौंदर्य नहीं है। यह सौंदर्य है जीवन की पूर्णता का, सामंजस्य और संतुलन का। एक-दूसरे के प्रति सद्भाव और सहयोग के बिना यह संतुलन संभव नहीं, क्योंकि समाज के सभी अंग एक-दूसरे पर निर्भर हैं। जरा सोचिए, दीया कुम्हार बनाता है, बाती के लिए कपास किसान उगाता है तो खेतों में लहलहाती सरसों के दानों को पेर कर बाजारों तक तेल पहुंचाने वाला वर्ग अलग है। तीनों का कार्य भिन्न है, प्रयास भी अलग है किंतु लक्ष्य सबका एक है। सबको सुख चाहिए, प्रकाश और प्रशांति चाहिए। सच पूछिए तो आस्था का यही भाव जगाने दीपावली आती है। अमावस्या की घोर अंधकारमयी वाली रात को हम सब मिट्टी के दीयों से प्रकाश फैलाने का व्रत लेते हैं। रोशनी से भरे नन्हें-नन्हें दीयों का हौसला देखिए वे अपने बल पर अंधकार को मिटाने का संकल्प कर रहे हैं। सच पूछिए तो उन्होंने अंधियारे को चीरने का संकल्प लिया है। वे कहते हैं, ‘आत्म दीपो भव:’ स्वयं अपना दीपक बनिए औरों की ओर देखना छोड़ दीजिए। अपने भीतर की चेतना को पहचानिए। आपके आंगन की उजियाली दूसरों को भी दीपक जलाने का आमंत्रण दे सकती है। अन्तरमन में विद्यमान दुख, नैराश्य एवं अवसाद को नष्ट करके उन्हें दिव्य आलोक प्रदान कर सकती है। यही प्रकाश पूर्ण आनंद, सृष्टि के प्रत्येक पर्व का लक्ष्य है। जिसकी पूर्ति के लिए हमारे पूर्वजों ने पर्वों की रचना की।
हमारे शास्त्रों में दीप, दीपदान और दीपावली का विविध प्रकार से वर्णन है-
दीपज्योति: परब्रह्म, दीपज्योति: जनार्दन:।
दीपज्योति: तमोहारी, दीप: सर्वसुखप्रद:।।
काल के अनुरूप दीपक के स्वरूप, रंग-रूप, बनावट में अंतर आया है, परंतु सदियों बीतने पर भी दीप प्रज्ज्वलन की परंपरा में कोई अंतर नहीं आया। दीपक का प्रचलन अत्यंत प्राचीन काल से माना जाता है। प्राचीन मिस्र सभ्यता, समेरियन सभ्यता, रोम और सिंधु घाटी के अवशेषों में विभिन्न प्रकार के दीपक प्रकाश में आए हैं। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई में लक्ष्मी जी की मूर्तियां भी मिली हैं। ऐसे संकेत भी प्राप्त हुए हैं कि यहां लोग दीप जलाकर दीपावली भी मनाते हैं।
दीपावली मुख्य रूप से धन-धान्य तथा श्री एश्वर्य की देवी महालक्ष्मी, ऋद्धि-सिद्धि प्रदाता गणेश और ज्ञान की देवी सरस्वती की पूजा-आराधना का त्योहार है। रोली-चावल, पंचामृत सहित लाल चंदन, कलावा, लाल पुष्प, पान, फल, फूल मिष्ठान, खील-बताशे सहित धूप दीप अर्पित किया जाता है। अपने पूर्ण विकास में त्रिगुणात्मक प्रकृति ही लक्ष्मी है जिसके आशीष की वरदमुद्राएं दरवाजे के दोनों ओर थापों में गेरू से अंकित की जाती हैं। लक्ष्मी का वास वहीं संभव है जहां साधक सुरुचिपूर्ण वेशभूषा में रहे। स्वच्छ और पवित्र रहे तथा भीतरी रूप से निर्मल हो। गंदे, मैले, असभ्य और बातूनी लोगों के जीवन में लक्ष्मी का वास संभव नहीं है। इस मान्यता के कारण ही दीपावली से पूर्व घरों की सफाई, पुताई तथा नए कपड़े पहनने का प्रचलन है।

अहलाद का पर्व
हम सब प्रकृति में तथा अपने चारों ओर नई ऊर्जा का अनुभव करते हैं। यह ऊर्जा एक वर्ष के लिए हमें जीवनी शक्ति से भर देती है। वास्तव में यह पर्व पांच त्योहारों की एक उल्लासपूर्ण शृंखला है। दीपावली से दो दिन पहले धनतेरस को घरों की सजावट, बर्तन तथा सोना-चांदी खरीदना, छोटी दिवाली को रूप चतुर्दशी का स्नान व शृंगार सहित यमराज के निमित्त दीप-दान इसे नरक चतुर्दशी भी कहा जाता है। कहते हैं इस दिन भगवान कृष्ण ने नरकासुर का वध किया था। गोकुलवासियों ने दूसरे दिन इस खुशी में दीप जलाए। दीपावली के दिन विशेष रूप से श्री गणेश-लक्ष्मी का पूजन विधि-विधान से किया जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार इसी पवित्र मुहूर्त में सागर मंथन के समय महालक्ष्मी दीप्तिमान रत्न के रूप में सागर के गर्भ से प्रकट हुई थीं जिन्हें भगवान विष्णु ने वरण कर जग—जननी का गौरव दिया। दीपावली के दूसरे दिन अन्नकूट, गोवर्धन पूजन के बाद द्वितीया को भइया दूज के त्योहार के साथ ही पांच दिन का यह क्रम पूरा होता है।
इस लोकप्रिय त्योहार के साथ अनेक मान्यताएं जुड़ी हैं। पहला मान्यता है कि भगवान श्रीराम के 14 वर्ष के वनवास, लंकादहन एवं रावण वध के बाद अयोध्या लौटने पर जनता ने कार्तिक माह की अमावस्या की अंधेरी रात में राम-लक्ष्मण-सीता के स्वागत में दीप जलाकर अपनी खुशी का प्रदर्शन किया। दूसरी मान्यता है कि भारत सदैव से कृषि प्रधान देश रहा है। इसलिए रबी की फसल पर किसान धनदा लक्ष्मी गणेश कुबेर का पूजन कर उत्सव मनाते रहे हैं।
तीसरी मान्यता है कि कहते हैं कि वर्षा से शिशिर ऋतु आने पर जो रोग उत्पन्न हो जाते हैं, दीप जलाकर उन रोगों को दूर करने का प्रयास करते हैं। दीपक की ज्योति से शरीर में रोगों से लडऩे की शक्ति उत्पन्न होती है।

उजाला और ऊष्मा
इस प्रकार दीपोत्सव ज्योति पर्व है। अंधकार मनुष्य का काम्य नहीं है, वह चुनौती है। इस चुनौती से पैदा होते हैं संकल्प के दीप-छोटे हों, बड़े हों, एकाकी हों या कतारबद्ध -सब दीप होते हैं-अंधकार की प्रकाश को चुनौती के प्रतीक। दीपक यदि मानव की शक्ति पुरुषार्थ, परिश्रम की विजय का उजाला है तो ज्योति नारी से नारी के हाथों प्रज्ज्वलित होने वाले उजाले का विस्तार। वास्तव में उजाला और ऊष्मा हमारे जीवन रथ के दो पहिए हैं। ये ऊर्जा के ही दो रूप हैं, इनका आदि स्रोत सूर्य है। सूर्य सबसे पुराने देवता हैं। उनकी व्यापकता, उनके विस्तार को देखकर हम परमसत्ता की परमशक्ति का अंदाजा लगाते रहे हैं। अंधेरा चाहे कैसा भी शक्तिशाली क्यों न हो, प्रकाश उसे खदेड़ देता है। दोनों आमने-सामने नहीं रह सकते। जीवन में जो कुछ भी शुभ है, सुखद है उनका प्रतीक है उजाला। इसलिए शुभ कार्य के समय सूर्य अथवा अग्नि को साक्षी बनाने का रिवाज है। जिंदगी में अंधेरे और उजाले की आंख मिचौनी तो चलती रहती है। सवाल यह है कि हमारे आस-पास उजाले की ताकत कितनी है और अंधेरे ने कितनी जगह घेर रखी है। उजाला सात्विकता का प्रतीक है, नैतिकता का प्रतीक है। यह सबके कल्याण में अपना हित समझता है, जबकि अंधेरा कायर और कलुष से भरा होने के कारण कहता कुछ है, करता कुछ है। केवल अपने हित को, अपने स्वार्थों को महत्व देकर अपने को ताकतवर बनाने में जुटा रहता है।

इसकी ताकत को, सोच को केवल उजाला ही कमजोर कर सकता है। उजाले की रेखा को बढ़ाकर तमस की कालिमा को दुर्बल किया जा सकता है, किंतु उजाले की भी एक शर्त है। उजाला अपना पूरा मूल्य चाहता है। उजाले के साथ समझौता नहीं हो सकता। प्रतिदिन के व्यवहार में आने वाली वृत्तियों के साथ सुलह करने से काम नहीं चलेगा। कठोर संयम और त्याग द्वारा ही उसे सबल और सजग बनाया जा सकता है।

अत: बाहर की तरह अपने भीतर को भी साफ-सुथरा करना होगा। उजाले का स्रोत सबके पास है। आत्मा भी एक दीपक है, चिराग है जिसमें निरन्तर सत्य, ज्ञान और आनंद का प्रकाश झिलमिलाता रहता है। यही आत्मविश्वास का आधार है। यही अंधकार के विरुद्ध लडऩे की ताकत है। अपने धर्म के अनुरूप, परोपकार सहित जीने की प्रेरणा आत्मा ही देती है, किंतु जब हम तीतरी आवाज की अनसुनी कर देते हैं तब वह संकेत द्वारा बार-बार रोकने की कोशिश करता है, किंतु अंतिम निर्णय तो हमारा है। अन्तरमन की जीत और हार इंसान पर ही तो निर्भर करती है। जीवन यात्रा में असत्-अंधेरा-मृत्यु वह बिंदु है, जहां से हम चलना शुरू करते हैं और सत-उजाला-अमरता वह बिंदु है जहां हमें पहुंचना है। उन दो बिंदुओं के बीच ज्ञान-विज्ञान, धर्म-दर्शन, राजनीति-समाज नीति, तपस्या और साधना की रेखाएं हैं जिन्हें पार कर ऊपर की ओर उठना है। यही विकास है, यही प्रगति है, यही उन्नति है। इसी के द्वारा समाज की विविध धाराओं को राष्ट्रहित में एकजुट किया जा सकता है।

हमारा आनन्द भी दूसरों को आनंदित कर ही सार्थक होता है। यदि हमारे आंगन में उजाला बरस रहा हो और साथ का आंगन अंधेरे से घिरा हो तब हमारा आनंद भी ज्यादा देर तक टिक नहीं सकेगा। सबके सुख में ही धन-धान्य की देवी लक्ष्मी प्रसन्न होकर सुख साधनों का वितरण करती हैं। हमारी यात्रा सदैव अज्ञान से आनंद की ओर, निर्बलता से सबलता की ओर, परतंत्रता से स्वतंत्रता की ओर होनी चाहिए, यही मनुष्य जीवन की सार्थकता है।

विश्व आज बहुत तेजी से विनाश की ओर बढ़ रहा है। अधिकतर देशों के शासक ईष्र्या, द्वेष, प्रतिहिंसा में लिप्त हैं। संपत्ति और सत्ता की भूख से पीडि़त लोगों के हाथों में लाखों मनुष्यों के जीवन की बागडोर है। आज न हमारा जीवन सुरक्षित है और न अस्मिता। तब क्या हमारा यह कर्तव्य नहीं है कि एक ऐसे नए समाज के बारे में सोचें जहां अधिकतम लोगों को अधिकतम न्याय मिल सके। कुछ लोगों के हितों से सबका कल्याण नहीं होना है। यहां तो सभी को अपने आंगन के साथ दूसरे के आंगन का भी ध्यान रखना है। हमें अपने भीतर की संपन्नता को पहचानना है। वह संपन्नता और कुछ नहीं हमारे साधारण जन का आत्मविश्वास है। सच्चा रास्ता वही है जो स्वयं बनाया जाता है अन्यथा अपने रास्ते से भटकाव मृगतृष्णा ही साबित होती है। दीपक स्वयं जलता है। क्या हम उस तप के लिए तैयार हैं? हमें मोमबत्ती सस्ती पड़ती है, उसे खरीद लेते हैं, तेल महंगा हो गया है, दीए में तेल नहीं भरते पर क्या हम स्वयं को मोमबत्ती बनाकर पिघला सकते हैं?

हमारी आंखें नन्हें दीए पर टिकी हैं। इस बार सस्ती विदेशी रंग-बिरंगी बिजली की झालरों का बहिष्कार कर, लक्ष्मी जी के स्वागत में माटी का दीप आलोकित करें। स्नेह की एक-एक बूंद प्रकाश दामिनी ज्योति का अवतरण कर असंख्य दीप जलाएगी। धरती पर प्रकाश उतरेगा, साधना सफल होगी, विजय निश्चित है।
तन मन में उल्लास सबल हो, आलोकित कर दें पथ सारे।
जग जीवन हो लक्ष्य समर्पित, भू तल में बिखरा दे तारें।।