‘संकल्प’ प्रशासनिक सेवाओं में संस्कार

-भारतीय धरोहर प्रतिनिधि


भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में प्रशासनिक सेवाओं की भूमिका केवल प्रशासन संचालन तक सीमित नहीं है। ये सेवाएं समाज में न्याय, समानता, करुणा और जनकल्याण के मूल्यों को जीवंत रखने की क्षमता रखती हैं। किंतु प्रशासनिक सेवाओं में आ रहे युवाओं का दृष्टिकोण कैसा हो, यह प्रश्न सदैव महत्वपूर्ण रहा है। क्या वे केवल करियर और व्यक्तिगत उपलब्धि की सोच से आएं या फिर राष्ट्रसेवा, भारतीय संस्कार और समाज के प्रति प्रतिबद्धता को ध्येय बनाकर? इसी मूल प्रश्न को लेकर ”संकल्प” के विचार का बीजारोपण हुआ।

आपातकाल के दौरान अंकुरित हुई सोच
”संकल्प” की परिकल्पना उस समय हुई जब देश आपातकाल जैसी त्रासदी से गुजर रहा था। राष्ट्र जीवन में संकट के उन क्षणों ने यह अनुभव कराया कि प्रशासनिक सेवाओं में केवल कुशलता और दक्षता पर्याप्त नहीं है, बल्कि वहां ऐसे व्यक्तित्व चाहिए, जो समाज के अंतिम पायदान पर बैठे व्यक्ति की चिंता करें, न्याय के लिए खड़े हों और निस्वार्थ भाव से राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानें। इसी सोच को मूर्त रूप देने के लिए 1986 में संकल्प का गठन हुआ, जिसका ध्येय सिविल सेवाओं में जाने के इच्छुक युवाओं को राष्ट्र सेवा और भारतीय संस्कारों के प्रति प्रेरित करना है।

”संकल्प” की उत्पत्ति
जन कल्याण शिक्षा समिति के तत्वावधान में सिविल सेवा मार्गदर्शन प्रकल्प यानी ‘संकल्प’ की स्थापना की गई। यह केवल एक कोचिंग संस्थान नहीं था, बल्कि युवाओं के लिए एक ऐसा मंच था, जहाँ उन्हें जीवन के उद्देश्य, भारतीय दर्शन और प्रशासनिक जिम्मेदारियों का संतुलित बोध कराया जाए। यहां से निकलने वाले युवाओं को केवल परीक्षा उत्तीर्ण कराना ही ध्येय नहीं, बल्कि समाज में परिवर्तन का वाहक बनाना है।

”संकल्प” की विशेषताएं
प्रारंभ से ही ”संकल्प” का यह भाव स्पष्ट है कि वह संख्या और परिणामों की होड़ में शामिल नहीं होगा। भले ही सफल अभ्यर्थियों की संख्या सीमित हो, लेकिन प्रत्येक के भीतर सामाजिक संवेदनशीलता, राष्ट्रभक्ति और सेवा का भाव प्रखर हो। ”संकल्प” द्वारा दिल्ली में सिविल सेवा प्रतिभागियों के लिए विभिन्न गतिविधियां चलाई जाती हैं—
1. आवास, भोजनालय और वाचनालय जैसी सुविधाएं छात्रों को घर जैसा वातावरण देती हैं।
2. पुस्तकालय और मार्गदर्शन कक्षाएं (आधुनिक शब्दों में कोचिंग) विद्यार्थियों को अध्ययन में सहयोग देती हैं।
3. सबसे प्रभावशाली गतिविधि है साक्षात्कार मार्गदर्शन कार्यक्रम, जिसकी सफलता के आंकड़े स्वयं बोलते हैं।

सफलता की मिसाल
पिछले अनेक वर्षों से यूपीएससी द्वारा घोषित सिविल सेवा परीक्षा के परिणामों में ”संकल्प” से लाभान्वित विद्यार्थियों की संख्या 60 प्रतिशत अधिक रहती आई है। वर्ष 2025 में घोषित सिविल सेवा परीक्षा परिणामों में कुल 1,009 अभ्यर्थियों में से 721 अभ्यर्थी संकल्प से लाभान्वित रहे। यह संकल्प के इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धि है। यह आँकड़ा बताता है कि ”संकल्प” केवल मार्गदर्शन ही नहीं, बल्कि युवाओं के संपूर्ण व्यक्तित्व निर्माण की प्रयोगशाला है।

भारतीयता और मूल्यबोध
संकल्प में छात्रों को केवल किताबों और पाठ्यक्रम का ज्ञान नहीं दिया जाता। विद्यार्थियों में भारतीय परंपरा, चिंतन और दर्शन के प्रति चेतना जगाने का प्रयास भी किया जाता है। यही कारण है कि अन्य कोचिंग संस्थानों से भिन्न ”संकल्प” विद्यार्थियों को एक पारिवारिक माहौल देता है। घर से दूर रह रहे छात्रों को यहाँ एक ऐसा वातावरण मिलता है, जहाँ वे अपनेपन का अनुभव करते हैं।

गुरुकुल योजना
”संकल्प” का एक महत्वपूर्ण आयाम है— ‘गुरुकुल’ योजना। इसमें वंचित वर्ग के मेधावी विद्यार्थियों को नि:शुल्क रहने, पढऩे और भोजन की सुविधा प्रदान की जाती है। यह व्यवस्था उदार दानदाताओं के सहयोग से संभव हो पाती है। गुरुकुल से निकले कई विद्यार्थी आज विभिन्न प्रशासनिक पदों पर अपनी प्रतिभा और सेवा का परिचय दे रहे हैं। वर्ष 2025 में ”संकल्प” ने महिलाओं के लिए एक बड़ा कदम उठाया। दिल्ली में आधुनिक सुविधाओं से युक्त कन्या छात्रावास का शुभारंभ हुआ, जिसमें 85 छात्राओं के रहने की सुविधा है।

विस्तार और नेटवर्क
ज्यों-ज्यों ”संकल्प” की गतिविधियां और सफलताएं बढ़ती गईं, त्यों-त्यों देश के विभिन्न भागों से ”संकल्प” के केंद्र खोलने की मांग भी उठने लगी। सीमित संसाधनों के साथ आगे बढ़ रहे “संकल्प” के लिए अखिल भारतीय विस्तार की दिशा में कदम बढ़ाना थोड़ा कठिन अवश्य था, लेकिन अनेक सामाजिक संस्थाएं और कार्यकर्ताओं ने आगे बढ़कर इस दायित्व को उठाया। आज दिल्ली में चार प्रमुख परिसरों के साथ-साथ संकल्प के चैप्टर देशभर में सक्रिय हैं- इनमें जम्मू, लुधियाना, चंडीगढ़, जयपुर, वडोदरा, बेंगलुरु, हुबली, कन्नूर, कोच्चि, तिरुवनंतपुरम, कोयंबटूर, चेन्नई, हैदराबाद, भोपाल, इंदौर, भिलाई, आगरा और गुवाहाटी जैसे शहर शामिल हैं। इस प्रकार आज ”संकल्प” ने एक राष्ट्रीय स्वरूप ग्रहण कर लिया है।

स्वैच्छिक योगदान, संकल्प की शक्ति
”संकल्पÓÓ की सबसे बड़ी शक्ति वे 100 से अधिक पूर्व सिविल सेवक और अन्य विशेषज्ञ हैं, जो स्वैच्छिक रूप से राष्ट्र सेवा का भाव लेकर इससे जुड़े हैं और सिविल सेवा प्रतिभागियों का मार्गदर्शन करते हैं। इनमें सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी, कॉरपोरेट क्षेत्र के विशेषज्ञ, शिक्षाविद् और सामाजिक कार्यकर्ता भी शामिल हैं। ”संकल्प” के साक्षात्कार मार्गदर्शन कार्यक्रम में इन सभी महानुभावों का विशेष योगदान रहता है और विद्यार्थियों को गहन अनुभवशील विभूतियों का मार्गदर्शन प्राप्त होता है।

असली ध्येय
”संकल्प” की उपलब्धियां केवल परिणामों में नहीं, बल्कि उन अधिकारियों के जीवन और दृष्टिकोण में दिखाई देती हैं, जो यहाँ से प्रेरणा लेकर मानव सेवा के भाव से अपनी उत्कृष्ट सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। विश्वसनीयता, संवेदनशीलता और उत्कृष्टता का ध्येय लेकर आगे बढ़ रहे ”संकल्प” का मूल मंत्र यही है- ‘सिविल सेवा सिर्फ एक करियर नहीं, बल्कि राष्ट्रधर्म और जीवन का मिशन है।’

तप और त्याग
”संकल्प” की पूरी यात्रा को समझने के लिए संस्था के संस्थापक श्री संतोष कुमार तनेजा के व्यक्तित्व को जानना आवश्यक है। संतोष जी ने न केवल ”संकल्प” की स्थापना की, अपितु उन्होंने ”संकल्प” के संकल्प को जीकर दिखाया। आज भी उनकी दिनचर्या का प्रतिपल ”संकल्प” के चिंतन और उसे दिशा देने में व्यतीत होता है।

”संकल्प” ने संतोष जी के रूप में एक ऐसे कर्मनिष्ठ, समर्पित एवं सृजनशील व्यक्तित्व को दिशानिर्देशक के रूप में पाया, जिन्होंने अपने जीवन के प्रत्येक आयाम में अनुशासन, परिश्रम और सेवा को सर्वोपरि रखा है। अपने समस्त कार्यकर्ताओं और देश में कार्यरत तमाम प्रशासनिक अधिकारियों के लिए वे एक प्रेरणा-स्रोत हैं।

अविभाजित भारत के डेरा स्माइल खान (NWFP) में जन्मे संतोष जी ने थापर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से उच्च शिक्षा प्राप्त की और हुडको (HUDCO) में अपनी सेवाएं प्रदान कीं। कुछ वर्षों तक आप संघ के प्रचारक भी और निरंतर संघ से जुड़े विभिन्न उत्तरादायित्वों का निर्वहन करते हुए आप सात वर्ष तक भारत प्रकाशन दिल्ली लि. के अवैतनिक प्रबंध निदेशक भी रहे।

मानवीय मूल्यों, नैतिक आदर्शों और पारंपरिक भारतीय संस्कृति के प्रति संतोष जी की गहरी आस्था है। उनके व्यक्तित्व में भारतीय जीवनमूल्यों और आधुनिक दृष्टिकोण का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। वर्ष 1986 में एक विचार बिंदु के रूप में प्रारंभ हुई ”संकल्प” संस्था ने आज अगर देश में एक विशिष्ट पहचान बनाई है, तो उसमें संतोष जी का तप, त्याग और मार्गदर्शन का बहुत बड़ा योगदान है।

”संकल्प” की स्थापना के पीछे उनका उद्देश्य केवल एक संस्था खड़ी करना नहीं था, बल्कि युवाओं में सामाजिक चेतना, नैतिक मूल्यों और राष्ट्रभक्ति की अलख जगाना था। शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण का भी साधन है। इसी सोच से ”संकल्प” एक ऐसे मंच के रूप में विकसित हुआ, जिसने अनगिनत विद्यार्थियों और युवाओं के जीवन में नई ऊर्जा और दिशा का संचार किया। उनका जीवन संघर्ष और साधना की कहानी तो है ही, साथ ही यह इस बात का प्रमाण भी है कि यदि भाव सच्चे हों और विचार उच्च हों, तो सीमित संसाधनों के बीच भी महान कार्य किए जा सकते हैं और ”संकल्प” इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।