अमिय भूषण
अध्येता, भारतीय संस्कृति परंपरा
दीपावली उत्सवों के संसार का एक विशिष्ट पर्व है। यह ज्ञान के प्रकाश में रत भारत भूमि पर युगों—युगों से मनाया जाता रहा है। आखिर जहाँ ज्ञान है वहीं तो प्रकाश है और ज्ञान का अस्तित्व बिना प्रकाश के सर्वथा असंभव है। वैसे भी आत्मिक ज्ञान, आध्यात्मिक ज्ञान को प्रकाश की संज्ञा दी गई है। वास्तव में यह अविद्या, अज्ञान और अभिमान के ऊपर विजय का पावन पर्व है। तभी तो ब्रह्मज्ञान के पौराणिक स्रोत उपनिषदों में आया है-
असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय।
बृदराण्यक उपनिषद की ये पंक्तियाँ कह रही हैं कि मुझे असत्य से सत्य, अंधकार से प्रकाश और नश्वर जीवन से अमरत्व की ओर ले चलो। यहाँ आत्म साक्षात्कार द्वारा आसक्ति के नाश की बात कही जा रही है। वास्तव में यह सार्थक जीवन श्रेष्ठ कर्म तथा स्मरणीय कृतियों का संदेश है। बात प्रकाश पर्व की विशेषताओं की करें तो यह स्वयं में विशेष और अशेष है। एक ऐसा उत्सव जो पूरा देश मनाता है, ऐसा पर्व दीपावली है। वहीं दूसरे पर्व के रूप में केवल होली है।विविधताओं से भरी इस भूमि पर उत्सव के नाम पहचान और स्वरूप सब अंचल तथा जनपदों के साथ बदल जाते हैं। कोस कोस पर पानी और चार कोस पर वाणी बदलने वाले इस देश के अधिकांश उत्सव किसी क्षेत्र विशेष की पहचान का हिस्सा हैं। किंतु दीपोत्सव भारत भूमि की वैश्विक पहचान का हिस्सा है। इसे दुनिया भर के देशों में हिंदू समुदाय के एक महत्वपूर्ण पर्व के रूप में मनाया जाता है। यहाँ तक कि कई पाश्चात्य देशों द्वारा इसे शासकीय तौर पर आयोजित भी किया जाता है। दुनिया भर में इसे एक सांस्कृतिक सद्भावना उत्सव की दृष्टि से देखा जाता है। आखिर हो भी क्यों नहीं, मान्यताएं भी तो कुछ ऐसी ही हैं। जब से यह सृष्टि है तब से दीपोत्सव होता आया है। जितना पुरातन भारतवर्ष है उतना ही पुराना यह पर्व है। इससे संबंधित आख्यान पौराणिक साहित्यों में वर्णित है।
यहाँ दीप प्रज्वलन की मान्यता एवं महत्व से लेकर दीपावली उत्सव तक की चर्चा उपलब्ध है। वेद, उपनिषद, पुराण एवं रामायण-महाभारत जैसे महाकाव्यों में इससे संबंधित कई मंत्र और प्रसंग हैं। यह पर्व कार्तिक मास की अमावस्या की तिथि को आता है। घोर तमस से घिरे इस रात्रि में सर्वत्र प्रकाश ही प्रकाश होता है। यह उस भारतीय मान्यता की पुष्टि भी करता है कि कुछ भी चिर और स्थाई नहीं है। अंधियारा उजाले के आने तक ही तो है। परिवर्तन और नूतन नवीन का आगमन ही वास्तविक सत्य है। वास्तव में यह असत्य पर सत्य, अधर्म पर धर्म, अनीति पर नीति और दरिद्रता पर सौभाग्य के संदेश का वाहक त्योहार है। सनातन पुरातन मान्यताओं के अनुसार ऐश्वर्य एवं वैभव की देवी लक्ष्मी का प्रादुर्भाव इसी दिन को हुआ था। तब समुद्र मंथन से हरिप्रिया प्रगट हुईं। इस नाते इस दिन धन धान्य एवं सौभाग्य हेतु इन माता भुवनेश्वरी की विशेष पूजा—अर्चना होती है।
यह रावण के संहार उपरांत माता सीता एवं प्रभु श्रीराम के अयोध्या आगमन का भी दिवस है। तब सर्वत्र पंक्तियों में जलाए दीपों के द्वारा उनका स्वागत किया गया था। इस घटना ने इसे एक और अर्थपूर्ण नाम दीपावली दिया है। दीपों की ये पंक्तियाँ कतार मालिकायें और समूह वास्तव में बड़ी ही सुंदर दिखती है।
इस उत्सव से संबंधित एक और रोचक प्रेरक कथा पुराणों में वर्णित है। शोणितपुर के दुराचारी शासक नरकासुर के द्वारा कभी सोलह हजार नवयुवतियों का हरण किया गया था। कारागृह में बंद इन देवियों को नरकासुर के वध के साथ ही मुक्ति मिलनी थी। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचार के अंत हेतु जिस दिन का चयन किया था वो यही था। इन सभी कारणों से इस अवसर पर दीपों से चारों तरफ प्रकाश ही प्रकाश किया जाता है। वैसे प्रकाश के इन दीपों वाले उत्सव के और भी कई लाभ तथा मायने मतलब हैं। इससे पूर्व बारिश के घनघोर महीने होते हैं तब कीट—पतंग तथा सूक्ष्म जीवों की आबादी अतिशय बढ़ जाती है। ऋतु परिवर्तन के बावजूद सर्वत्र इन हानिकारक एवं अनुपयोगी कीट—पतंगों का भयंकर प्रकोप बना रहता है। यह कृषि कर्म से लेकर भोजन की थाली, रसोई गृह और व्यक्तिगत स्वास्थ्य सभी के लिए परेशानी का सबब हैं। ऐसे में दीपोत्सव के प्रकाश संग ये स्वत: समाप्त हो जाते हैं। यह त्योहार सभी के लिए नवीन अवसर लिये आता है। बच्चे हर्षोल्लास के साथ दीपक मिट्टी के घरौंदे और आतिशबाजी संग इसे मनाते हैं। जबकि बड़ों के लिए यह लक्ष्मी पूजा, काली पूजन का मौका होता है।
इस अवसर पर बाजार में भी काफी सारी खरीददारी एवं व्यापार होता है। बाकी इसकी सबसे बड़ी बात है कि यह पर्यावरणीय दृष्टिकोण, सीमित साधन और बेहद सादगी से भी मनाया जा सकता है। लक्ष्मी गणेश भगवान की मूर्ति, मिट्टी के दीये, रुई की बाती और थोड़े से सरसों अथवा तिल तेल के अतिरिक्त चाहिये भी क्या? बात यदि इस अवसर पर होने वाली आतिशबाजियों की करें तो यह हर्ष और उल्लास का प्रतीक है। यह हमारे देवों द्वारा दानवों के ऊपर विजय का दिवस है। दुराचारी दानवों के अंत उनके दंभ और छल के मानमर्दन का भी दिन है। इसलिए एक सनातनी इस अवसर पर पटाखों के तुमुल ध्वनि द्वारा न केवल श्रद्धा निवेदित करता है, अपितु इन घटनाओं का स्मरण भी चिरकाल से करता आया है। किंतु दुर्भाग्यवश हिंदू धर्म से द्वेष रखने वालों के लिए यह ध्वनि प्रदूषण का मसला है। जबकि दूसरे समुदाय के किसी त्योहार विशेष से इन्हें कोई आपत्ति नहीं होती है।
वास्तव में आवश्यकता दीया और बाती के पीछे के सद्विचारों को समझने की है। मिट्टी का दीपक ‘आत्म दीपो भव’, ‘धर्म दीपो भव’ का संदेश देता है। दीपक ज्ञान विवेक कर्तव्य आत्मनिर्भरता सत्य के संधान तथा अंधकार से मुक्ति का प्रतीक है। यह स्वयं को तिल—तिल जलाकर परोपकार और दूसरों के लिए प्रकाश की शिक्षा देता है। तभी तो जगमग करने वाले जुगनू और दीपक में जमीन तथा आकाश का अंतर है। हर जुगनू की रोशनी की मियाद रात भर की ही होती है। किंतु दीपक हर बार बूझकर भी जल उठता है। इसके दीप्तमान होने के गुण के नाते ही इसे ‘आत्म दीपो भव’ और ‘धर्म दीपो भव’ की संज्ञा दी गई है। यदि इन सब बातों के इतर इस दीप पर्व की बात करें तो यह कई पर्वों को संग लिए आता है। इससे ठीक पहले कार्तिक कृष्ण पक्ष त्रयोदशी को धनतेरस तो अगले दिन यानी की चतुर्दशी को छोटी दीपावली के नाम से मनाते हैं। धनतेरस नई खरीददारी तथा आयुर्विज्ञान के देव धन्वंतरि के पूजनोत्सव का दिन है, जबकि छोटी दीपावली को नरक चतुर्दशी के नाम से भी मनाया जाता है। इस अवसर पर दीपावाली की पूर्व संध्या पर मृत्यु एवं कर्म विधान के देव धर्मराज, यमराज के नाम से दीप दान तथा दीपक का प्रकाश किया जाता है। यह अपने पितरों की प्रसन्नता एवं स्वयं के कल्याण हेतु किया जाता है।
जबकि दीपावली के ठीक अगले दिन प्रतिपदा तिथि पर सर्वत्र अन्नकूट उत्सव की धूम होती है।यह अवसर शरीर को पोषण—पुष्टि देने, कृषि को लाभकारी बनाने और अन्न व गोवंश से समृद्ध बनाने वाले गऊ वंश पशुओं के सम्मान में मनाया जाता है। इस दिन वृंदावन में गोवर्धन पर्वत की पूजा और परिक्रमा का विशेष विधान भी है, जिसके महात्म्य की कथा पुराणों में वर्णित है।इस तिथि के उपरांत अगले दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष द्वितीया को भातृ द्वितीया आती है। इसे अलग—अलग नामों के साथ मनाया जाता है। नेपाल में भाई टीका तो भारत के अन्यान्य क्षेत्र में कहीं भाई दूज, कहीं भाऊ बीज या यम द्वितीया के नाम से इसे मनाया जाता है। यह भाई बहन के प्रेम स्नेह का पर्व है, जहाँ बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र एवं सुख—समृद्धि की कामनायें करती हैं। इस प्रकार एक दीपोत्सव अपने संग कई उत्सवों को लिये आता है। आवश्यकता बदलते परिवेश के साथ इनके महत्व के प्रचार और मूल स्वरूप को बनाये रखने की भी है। तभी ये सार्थक, अर्थपूर्ण और युग—युगीन बने रहेंगे।





