न्यायपालिका की स्वतन्त्रता

समाज को राज्य के सहयोग द्वारा जो अन्य कार्य करणीय है वह है न्यायपालिका की स्वतंत्रता। भारत में वर्तमान में तो यह स्थिति है कि प्रथम स्तर के न्यायकर्ता तो सर्वथा राज्य के अधीन है। उनकी नियुक्ति, उन्नति और स्थानन्तरण यह सब पूर्णतया गृहमन्त्रालय के अधीन होता है। उच्च स्तर के न्यायाधीश भी राज्य की अभिरूचि के बिना नियुक्ति नहीं किये जा सकते और न ही वे अपने पद पर स्वेच्छा से स्थिर ही रह सकते है। इस स्तर के न्यायाधीशों का स्थानान्तरण भी राज्य की रूचि के आधार पर ही होता हैं। अनको मिलन वाला वेंतन, भत्ता और उन्नति बिना राज्य की अभिरूचि के नही हो सकता।

भारतीय संविधान के उच्च न्यायालय तथा सर्वोंच्च न्यायालय के न्यायाधिश की नियुक्ति से सम्बधित एक प्रावधान है कि इस सम्बन्ध में सर्वोंच्च न्यायालय के सर्वोंच्च न्यायाधीश से परामर्श कर लिया जाए। किन्तु अब इस विषय पर भी शासन और न्यायापालिका के मध्य खींचातानी होने लगी है। शासन अब धीरे धीरे इस किंचिन्मात्र सुविधा पर भी अधिकार जमाने का यत्न करने लगा है।

यह शुभ लक्षण नहीं है। जबकि शासन व्यवस्था दिनानुदिन जटिल होती जा रही है तब ऐसे समय में न्यायापालिका इसके प्रशासन से सर्वथा विमुक्त रखी जानी चाहिए। देश और समाज में न्याय—व्यवस्था सब बन्धनों से स्वतंत्र हो और वह धीमान ज्ञानवान और आसक्तिरहित व्यक्तियों के हाथ में होनी चाहिए। जब भारत परतन्त्र था तो उस समय जो स्वतंत्रता के लिए आन्दोलन चल रहा था, स्वतन्त्रता का यह अर्थ भी माना जाता था कि देश की न्यायपालिका राज्य से सर्वथा स्वतन्त्र होनी चाहिए।

ब्रिटिशकाल में हम लोग जो स्वराज्य की आकांक्षा रखते थे और इस दिशा में देश की प्रगति को बड़ी सूक्ष्मता से देख रहे थे, स्वराज्य की उपलब्धि में न्यायपालिका के राज्य से स्वतंत्र होने को स्वराज्य का एक महान गुण मानते थे। किन्तु इस समय देश में न्याय प्रपंच की जो दुर्दशा हो रही है उसे देखकर जो निराशा का संचार हुआ वह अकल्पनीय है।

हमे भी एक छोटे से अभियोग का अनुभव हुआ है। हमारी एक छोटी सी पुस्तक पर किसी अन्य लेखक ने यह दावा कर दिया कि हमने उसकी पुस्तक के नाम की नकल कर उसको हानि पहुंचाई है। हम समझते थे कि यह विषय प्रथम पेशी में ही एक दो घंटे के विचार विनिमय में समाप्त हो जाना चाहिए था। पुस्तक के नाम के ‘कापी राइट’ का अभी तक कोई प्रावधान नहीं है। और जिस व्यक्ति ने हम पर दावा किया था स्वत: उसकी पुस्तक का नाम किसी अन्य की पुस्तक के नाम की नकल था। और फिर दोनों पुस्तकों की विषयवस्तु में तो किंचिन्मात्र भी कहीं समानता नहीं थी। इतना होने पर भी इस अभियोग का निर्णय होने में सात वर्ष का समय लगा था। इतना ही नहीं, साधारणतया दस से बीस वर्ष तक अभियोगों के निर्णय में लगने लगे हैं और उसके बाद भी यदि कोई व्यक्ति समय की साथ न्याय नहीं हुआ है तो वह पुनरावलोकन की याचिका प्रस्तुत कर सकता है।

हम समझते हैं कि इस दुव्र्यवस्था का कारण देश के विधि विभाग और न्यायपालिका का राज्याधीन होना ही है। इस प्रकार जब विलम्ब हो जाता है तो न्याय भी नहीं होता। हमसे सम्बन्धित अभियोग में चार पक्ष थे। दो लेखक, एक प्रकाशक और एक मुद्रक। हम समझते हं कि इस प्रसंग में प्रकाशन और मुद्रक किसी भांति भी उत्तरदायी नहीं माने जा सकते थे। परन्तु उन दोनों को भी अपनी बात स्पष्ट करने के लिए दो पृथक पृथक वकीलों को नियोजित करना पड़ा।

लेखक पर अनुचित लाभ उठाने का आरोप था। इस छोटे से अभियोग पर उसका लगभग आठ नौ हजार रूपया व्यय हुआ था। अनुमान यह है कि प्रकाशन और मुद्रक की भी न्यूनाधिक इतना ही व्यय हुआ होगा।

यह दुव्र्यवहार केवल इस कारण है कि कानून बनाने वाला और उसका वितरण करने वाला राज्याधीन है। राज्य न तो इन दोंनों कार्यों की योग्यता रखता है और न ही उसको इसके लिए अवकाश है।

हमारा यह निश्चित मत है कि शिक्षा और विधि निर्माणकार्य राज्य नहीं कर सकता और न उसमें विधि वितरण की ही किसी प्रकार की योग्यता है। हमने ऊपर जो अपने पर किए गये अभियोग का उल्लेख किया है उसमें राष्ट्रपति की भूमिका
राज्य का अपना कुछ भी लेना देना नहीं था। जिन विषयों में राज्य स्वंय रूच् िरखता है उसमें तो न्याय की आशा रखनी ही नहीं चाहिए फिर ठीक समय ही तो बात ही दूर है।

हम यह जानते हैं कि सब प्रकार की बाधाओं के होने पर भी देश सर्वोंच्च न्यायपीठ कुछ सीमा तक स्वतन्त्रता का प्रदर्शन कर ही रही है। तदपि ऐसे उदाहरण कम नहीं हैं जब कभी न्यायपीठ का निर्णय राज्याधिकारियों की अभिरूचि के अनुसाार नही होता है तो न्यायपीठ को कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उसके साथ ही न्यायालय का निर्णय राज्याधिकारियों के अनुसार न होने पर राज्य और विधि विधान निर्माता एक ही होने के कारण न्यायालय का निर्णय बदलने के लिए संसद में नया बिल प्रस्तुत कर दिया जाता है।

इस सबको देखते हुए हमारा यह सुनिश्चित मत है कि देश की न्यायापालिका राज्य से सर्वथा स्वतन्त्र होनी चाहिए। हिन्दू समाज को इसमें विशेष रूचि होनी चाहिए। उसका कारण यह है कि एक तो देश में हिन्दू समाज ही बहुमत में है और इसका दूसरा कारण यह है कि हिन्दू समाज का पूर्ण प्रपंच न्याय और बुद्धियुक्त व्यवहार पर आधारित है। इस श्रेष्ठ और बुद्धियुक्त विधान से हिन्दू समाज की ही सर्वाधिक लाभ होने वाला है। शिक्षा, विधि विधान का निर्माण और न्यायाधिकरण, ये तीनों ही ऐसे विभाग हैं, जिनका समाज की सुख और शान्ति से घना सम्बन्ध है। इस कारण यह तीनों विभाग समाज के सर्वोंच्च विद्वानों और सच्चरित्र व्यक्तियों के अधीन होने चाहिए।

जिस देश में एक से अधिक समाज हों और फिर उनमें कुछ समाज ऐसे भी हों जिनका आधार बुद्धि नहीं, अपितु कोरी श्रद्धा हो, वहां ये तीनों विभाग राज्याधीन होकर कभी भी हितकारी सिद्ध नहीं हो सकते।
(हिंदू राष्ट्र)