परित्राणाय साधुनाम्

राज्यप्रासाद का प्रांगण भीड़ से रिक्त हुआ तो मृत शवों को उठा उठाकर प्रासाद के बाहर फेंक दिया गया, जिससे मृतकों के सम्बन्धी उन शवों को उठाकर ले जा सकें। संरक्षकों ने प्रासाद के द्वार पर सुरक्षा का प्रबन्ध कड़ा कर दिया।

कुन्ती के आवास में सब वृद्धजन तथा दुर्योंधनादि राजकुमार एकत्रित हुए हो भीम से उसके लापता होने के विषय में पूछा जाने लगा। भीम ने अपनी कथा सुना दी।

मैं भी यह सब हल्ला सुनकर समझ गया था कि भीम जीवित लौट आया है। अत: मैं भी कुन्ती के आवास में पहुंच गया था। मैंने भीम की कथा सुनी तो मेरी और विदुरजी की धारणा सत्य सिद्ध हुई।

भीम ने बताया,’पितामह! आपकी कृपा से मैं अधिक खाता हूं। जितना मेरे सब भाई खाते हैं, मैं अकेला ही खा जाता हूं। साथ ही भोजन अति स्वादिष्ट था। मैंने उस सायंकाल सबके सम्मिलित भोजन से भी दुगना खाया होगा। परिणाम यह हुआ कि मैं सबसे पहले नींद में निमग्न हो गया। मुझको अपने तन मन की सुध नहीं रही थी।

‘जब मैं जागा तो मैं रस्सियों में जकड़ा हुआ था। मेरे सब वस्त्र भीग रहे थे और मुझको शीत लग रहा था। मेरे चारों ओर नाग लोग खड़े मुझको उत्सुकता से देख रहे थे। जब मुझको चेतना हुई तो उन्होंने मेरे बन्धन खेालकर मुझको मुक्त कर दिया और सब मेरी ओर प्रश्न भरी दृष्टि से देखने लगें।

‘मैने अपना परिचय दिया और अपने बंधे होने के कारण से अपनी अनभिज्ञता प्रकट की। इस पर उन्होंने बताया कि मुझको विष दे दिया गया था। मैं अचेत सा गंगा में बहा जाता था। उन्होंने मुझको देखा,निकाला और मेरे विष का परीक्षण कर उसका निराकरण किया। मैं बच गया तो मेरे बन्धन खोल दिये।

‘मैंने उनका धन्यवाद किया। तत्पश्चात वे मुझको उपने राजा वासुकि नाग के पास ले गये। वहां मेरा परिचय सुन मेरे नाना के नाना आर्यक ने तथा नागराज ने मेरा बहुत आदर सत्कार किया। मेरे साथ स्नेहपूर्ण व्यवहार किया और सात दिन तक मेरी चिकित्सा कराकर मुझकों पूर्ण रूप से स्वस्थ हो जाने पर यहां आने की स्वीकृति दे दी।’

शकुनि ने पूछा,’तो भीम नहीं जानता कि किसने उसको बांधा था और गंगा में बहा दिया था।’

‘मैंने देखा नहीं; मै अचेत था। भोजन में तो विष था, इसमें सन्देह नहीं।’

‘भेाजन विषयुक्त था तो तुम्हारे अन्य भाइयों ने भी तो खाया था। वे तो जीवित रहे हैं।’

‘मुझको अधिक खाने से अधिक विष मिला होगा।’

दुर्योंधन ने बात हंसी में उड़ा दी, परन्तु भीष्म ने दुर्योंधन की ताडऩा की और कहा,’दुर्योंधन ! इस बार तुमको क्षमा किया जाता है, पुन: कोई ऐसी बात की तो धर्मयुक्त दण्ड के भागी होगें।’

‘कैसी कोई बात न करूं?’दुर्योंधन ने मुस्कराते पूछा।

‘भाइयों को विष खिलाकर हत्या करने का प्रयास।’

‘आपको विश्वास है कि मैंने किया है?’

‘हां, मैंने इस घटना की जांच की है और भीम के कथन से मिलान करने पर यही सिद्ध हुआ है कि तुमने भोजन में विष मिलवा दिया था।’

‘संजयजी के कहने की बात कर रहे हैं न? वह तो मेरे शत्रु हैं। उनको मेरे अच्छे कार्य भी बुरे प्रतीत होते हैं।’
‘मुझको उस दिन के पाचक ने सब बात बताई है। मैं समझता हूं कि यदि तुम राज्य परिवार के सदस्य न होते तो मृत्युदण्ड पा चुके होते।’

शकुनि बीच में ही बोल उठा,’पितामह ! आपने उस नीच पाचक का विश्वास कर लिया है और राजकुमार की बात नहीं मानी?’

‘तो क्या पाचक ने यह झूठ कहा है कि दुर्योंधन ने अपने हाथ से उसको विष दिया था।’

‘यह झूठ है। इसमें कुछ भी तथ्य नहीं।’

इस प्रकार बात समाप्त हो गयी। जब अपराधी को दण्ड ही नहीं दिया जाना था तो अधिक जांच करने की आवश्यकता नहीं समझी गयी।

मेरे मन पर इस घटना का गम्भीर प्रभाव पड़ा। मैं यह समझने लगा था कि इस अन्याययुक्त राज्य में रहने से किसी का कल्याण नहीं हो सकता। मैं वहां से चले जाने का निश्चय करने लगा।

उर्मिला का कहना था कि हमको अपने बच्चों की शिक्षा दीक्षा उनके बाबा के आश्रम में ले जाकर करनी चाहिए, अन्यथा वे अत्यन्त दुराचारी हो जायेंगे। हस्तिनापुर के वातावरण में किसी भी बालक का चरित्र ठीक रह सकेगा, यह आशा नहीं करनी चाहिए।

अत: एक दिन मैं राज्य से लम्बी छुट्टी लेने के लिए महाराज धृतराष्ट्र के आवास में जा पहुंचा। वहां पहुंचते ही मुझको भीतर ले जाकर महाराज के सामन उपस्थित कर दिया गया। उस दिन महाराज अकेले बैठे विह्वल हो रो रहे थे। मैंने उन्हें पहले इतना दु:खी कभी नहीं देखा था। विस्मयजनक बात यह थी कि उस दिन महारानी उनके साथ नहीं थी।

मुझको वहां छोड़ सेवक वहां से खिसक गया। इससे मेरी उत्सुकता और बढ़ गई। मेरे वहां होने से महाराज अनभिज्ञ थे। अत: मैंने अपने वहां पर होने का संकेत करने के लिए पुन: आगार द्वार के समीप जाकर खटका कर दिया। खटका सुन उन्होंने मुख ऊपर कर पूछ लिया, ‘कौन?’

मैंने नमस्कार की और आगार में आकर उनके सामने बैठ गया। वे आंखे पोंछकर बोले, ‘संजयजी’

‘हां महाराज!’

‘कब से यहां हैं?’

मैने बात बनाकर कहा, ‘अभी आया ही हूं। आज महारानीजी नहीं हैं। उनका स्वास्थ्य तो ठीक है?’

‘ठीक है, बैठ जाइए। मैं आज बहुत दु:ख कर रहा हूं। मैं नहीं जानता कि किस प्रकार इससे छुटकारा जाऊं?’

‘महाराज ! यदि मैं कोई सेवा कर सकता हूं तो आज्ञा कीजिये।’

‘यह किसी के वश की बात नहीं। दुर्योंधनादि राजकुमारों ने प्रासाद में भारी ऊधम मचा रखा है। शकुनि उनको इस उच्छृंखलता में प्रोत्साहन देता है।’

मुझको यह विदित था कि कोई भी युवा दासी उनसे अछूती नहीं बचती थी। इसके अतिरिक्त अब वे दासियों को नग्न करा उनसे नृत्य कराते और उनकी हंसी उड़ाते थे। कदाचित इसी ओर धृतराष्ट्र का संकेत था। मैं अभी विचार कर ही रहा था कि महाराज कहने लगे,’मैंने महारानी को कहा था कि यह सब उसी का दोष है। एक सौ राजकुमारों को जन्म देकर उसने भू भार ही बढ़ाया है। इस पर वह रूष्ट हो गई हैं । मैं अकेला यहां बैठा अपने भाग्य को कोस रहा हूं।’

‘महाराज!’ मैंने उनको सान्त्वना देते हुए कहा,’इसमें महारानीजी का कुछ दोष नहीं। उन्होंने सौ पुत्रों की प्राप्ति के लिए वर इस कारण मांगा था कि सब भाई परस्पर सहयोग देकर कौरव राज्य का तीनों लोकों में विस्तार करेंगे। इन सबको इकट्ठा देखकर किसी शत्रु को साहस नहीं हो सकेगा कि वह राज्य के अनिष्ट का विचार कर सके ।

‘देाष तो महाराज, इनकी शिक्षा का हो रहा है। इनको किसी ऋषि के आश्रम में शिक्षा मिलनी चाहिए थी। चरित्र की शिक्षा इनको अभी नहीं मिली।

‘आचार्य कृपा और आचार्य द्रोण, देानों धनुर्विधा के विद्वान होते हुए भी, दोनों के जन्मजात संस्कार निकृष्ट हैं। ये दोनों अविवाहित संयोग के परिणाम हैं। इस कारण उनके मानस पुत्र आपके राजकुमार हीन मन और हीन चरित्र रखते हैं।’

इस सूचना से धृतराष्ट्र के मस्तक पर बल पड़ गये। कृपाचार्य उनको शिक्षा दे चुके थे। इस कारण वे उनमें गुरू की भावना रखते थे। अत: वे मेरे इस कथन से प्रसन्न नहीं हुए। मैंने उनकी चढ़ी भृकुटि देखकर कहा,’महाराज! इसमें क्रोध करने की कोई बात नहीं है। यह एक वस्तुस्थिति है। इसको समझना चाहिए।

‘जीवन चरित्र और जातियों के इतिहास पढ़े जाते हैं। यदि इतिहास का ज्ञान और पूर्व चरित्र पढऩे का कुछ भी प्रभाव वर्तमान पर न होना होता तो उसके पढऩे से लाभ ही क्या था?’

‘तो क्या आप समझते हैं कि इन दोनों आचायों का जन्म विधिवत् विवाह सम्बन्ध का परिणाम नहीं था?’

‘हां महाराज! दोनों महानुभाव काम के आवेग में फंसे पिताओं एवं फुसलाने के लिए आई अप्सराओं का फल हैं।

‘महाराज ! महर्षिं गौतम के पुत्र शरद्धान गौतम एक बार वन में बैठे धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहे थे। उनकी तपस्या भंग करने के लिए इन्द्रलोक से जनपदा नाम की देवकन्या वहां भेजी गयी। शरद्धान गौतम ने वन में एकवस्त्रा इस अप्सरा को देखा। उस वस्त्र में से उसके सुन्दर अंग दिखाई दे रहे थे। जब शरद्धान की दुष्टि उस अप्सरा पर पड़ी तो वहां से भागी। इस समय उसका वह एक वस्त्र भी वन के सरकण्डों से अटककर उसके शरीर से उतर गया और सर्वथा नग्न हो गयी। शरद्धान ने उसके नग्न शरीर को देखा तो काम से व्याकुल, उसके पीछे वहां सरकण्डों में जा पहुचें। वहां महर्षिं का वीर्य उस अप्सरा को प्राप्त हुआ।

‘जनपदा को गर्भ ठहर गया और उसने एक लड़के और एक लड़की को जन्म दिया।

‘महाराज! देवलोक की यह प्रथा है कि वहां की अप्सरायें न तो कभी मानवों से स्थाई सम्बन्ध रख सकती हैं और न ही मानवों की सन्तान को देवलोक में ले जा सकती है। अत: जनपदा ने अपने दोनों बच्चों को वहां सरकण्डों में,जहां उसका शरद्धान से समागम हुआ था, छोड़ दिया और स्वयं देवलोक को चली गई।

‘इस समागम के स्थान पर, अर्थात सरकण्डों में, महर्षिं शरद्धान के कामामिभूत होने के समय धनुष बाण गिर पड़े थे। समागम के पश्चात महर्षि को अपने पतन पर इतनी लज्जा लगी कि वह धनुष बाण उठाए बिना वहां से भाग खड़े हुए। अत: जनपदा ने उस धनुष बाण को देख समझा कि महर्षि अपनी सन्तान को लेने आयेंगे।

‘संयोगवश महाराज शान्तनु उसी समय वहां मृगया करते हुए पहुंच गए। उन्होंने उन बच्चों को मृगचर्म, धनुष बाण इत्यादि के समीप पड़े देखा तो किसी ब्राह्राण की सन्तान समझ उठा लिया और अपने यहां ले आये।

‘महाराज ने इन बच्चों का पालन पोषण किया और शिक्षा दीक्षा देकर योग्य बनाया। ये दोनों महाराज की कृपा से पले। इस कारण इनका नाम कृपा और कृपि हुआ। यही बालक आगे चलकर कृपाचार्य हुए। इनकी शिक्षा दीक्षा से ही दुर्योंधनादि बन रहे हैं। भीष्मजी भी उन कृपाचार्य के शिष्य हैं। धनुर्विद्या में तो शिष्यों की निपुणता बढ़ रही है, परन्तु आचार की शिक्षा से वे अशिक्षित रह रहे हैं।’

‘संजयजी ! क्या आप समझते हैं कि इनके जन्म का प्रभाव इतना गम्भीर हुआ है कि वह पूर्ण शिक्षा पर भी छा गया है?’
‘हां महाराज ! विवाह को मैं केवल एक विधान मात्र नहीं मानता। विवाह के पीछे एक भावना होती हैं। वह पति के मन में पत्नी के लिए और पत्नी के मन में पति के लिए निष्ठा बनाती है। इसका सन्तान पर बहुत ही प्रबल प्रभाव होता है।

‘ समाज में सम्मानित ढंग से पति पत्नी परस्पर सहयोग करते हुए, निर्भय, निष्पाप, धर्मपरायण और पितृ ऋण से मुक्त होते हुए अनुभव करते हैं।

कामाभिभूत होकर अथवा छल कपट के अर्थ सम्पन्न संयोग का प्रभाव सन्तान के मस्तिष्क को विकृत कर देता है।

‘दुर्भाग्य से द्रोणाचार्य की कथा भी वैसी है। महर्षिं भारद्धाज गंगा पर आश्रम में रहते थे। यह महर्षि कठोर व्रतों का पालन करने वाले थे। एक दिन गंगा में स्नान करने गए तो वहां घृताची अप्सरा स्नान करके वस्त्र बदल रही थी। भीगे कपड़ों में उसके अनुपम सौन्दर्य को देखकर महर्षि स्तब्ध रह गए। घृताची ने भी महर्षि जी को अन्य ऋषियों के साथ आते देखा था। उसको भारी संकोच उत्पन्न हुआ। वह जल्दी जल्दी वस्त्रों को बदलने लगी। इसी जल्दी में उसका गीला कपड़ा भी खिसक गया। उसको नग्न देख महर्षि के मन में उग्र वासना जाग पड़ी।

‘इस प्रकार समागम से जो सन्तान हुई, उसको घृताची ने उस दोने में रख दिया, जिसमें महर्षि उस समय गंगा पूजा के लिए पुष्प पत्र लाए थे। उस दोने में एक नवजात बच्चे को पड़ा देख महर्षि समझ गये कि घृताची से उसका अपना पुत्र है। ऋषि उसको अपने आश्रम में ले गए। उसका पालन पोषण हुआ। दोने में पड़ा होने के कारण बच्चे का नाम द्रोण रखा गया और आगे चलकर वह द्रोणाचार्य हुए।

‘महाराज ! ये दोनों आचार्य वास्तव में वर्णसंकर है। इसी कारण ये आचार-व्यवहार की ठीक शिक्षा देने के सर्वथा अयोग्य हैं। वे जो कुछ शिक्षा देते हैं, वह प्रभावहीन ही रहती है।

‘पाण्डवों में यह गुण है कि वे शतश्रंग पर्वत पर ऋषि आश्रम में रहते हुए सात्विक आचार व्यवहार का अभ्यास रखते हैं। वे नित्य यहां होम करते हैं। जीवन को यज्ञमय बनाने में संलग्न रहते हैं। यही कारण है कि जहां वे परस्पर झगड़ा नहीं करते, वहां उनसे किसी अन्य को भी दु:ख नहीं पहुचता।’

‘तो यह महारानीजी का दोष नहीं है?’

‘महारानीजी ने अधिक सन्तान उत्पन्न कर परिवार का हित चिन्तन किया है। बिगाड़ हुआ है तो इन आचार्यों की अशुद्ध शिक्षा के कारण हुआ है। परिवार अथवा देश में जनसंख्या में वृद्धि किसी प्रकार भी अकल्याणकारी नहीं होती। अकल्याण होता है प्रजा की मानसिकता विकृति के कारण अधिक संख्या में लोग देश और परिवार की समृद्धि,सम्पन्नता, सुदृढ़ता और सुरक्षा में सहायक ही होते है।

‘हां, यदि उच्छृंखलता, प्रमाद, आलस्य, उद्दण्डता परिवार के सदस्यों अथवा देश के नागरिकों में व्याप्त हो जाए तो फिर उस परिवार और देश का भी विनाश अवश्यम्भावी है।’

धृतराष्ट्र ने ताली बजाई तो एक दासी उपस्थित हुई। धृतराष्ट्र ने दासी से कहा,’महारानी से कहो, संजयजी आए हैं। वह एक अत्यावश्यक निवेदन करना चाहते हैं। उनके दर्शन की प्रार्थना कर रहे हैं।’

दासी गई और महारानी गान्धारी की हाथ पकड़े हुए वहां आ पहुची। गान्धारी बैठी तो मैने प्रणाम कर दिया। महारानी ने पूछ लिया, ‘संजयजी क्या कहना चाहते हैं?’

महारानी के प्रश्न का उत्तर महाराज ने स्वंय दिया, प्रिये! मैं भूल रहा था। मैंने तुमको बहुत दुर्वचन कहे हैं। अब संजयजी के उपदेश से मुझे ज्ञात हुआ है कि दोष तुम्हारा नहीं। दोष तेा उस शिक्षा का है, जो कुमारों को मिल रही है। शिक्षक अशुद्ध शिक्षा दे रहे हैं। वे ठीक बताते नहीं। बताते हैं तो उनकी बात प्रभावहीन होती है।’

मैने पुन: अपना पूर्ण कथन उनके सम्मुख दुहरा दिया और अन्त में कहा,’महारानी ! आपने पूर्वजन्म में बहुत पुण्य कर्म किए हैं, जिससे आपको महाराज जैसे देवता पति मिले है। जितनी सुगमता से ये अपना देाष मानने पर तैयार हुए हैं, यह इनमें दैवी गुणों के कारण ही है।’

इसके पश्चात जब महाराज और महारानी प्रसन्न हो गए तो मैने अपने पिजाजी के आश्रम, गन्धमादन पर्वत पर जाने के लिए अवकाश मांग लिया। वह तुरन्त मिल गया और अगले दिन मैं सपरिवार तीन रथों में आश्रम की ओर चल पड़ा।

राज्यप्रासाद का प्रांगण भीड़ से रिक्त हुआ तो मृत शवों को उठा उठाकर प्रासाद के बाहर फेंक दिया गया, जिससे मृतकों के सम्बन्धी उन शवों को उठाकर ले जा सकें। संरक्षकों ने प्रासाद के द्वार पर सुरक्षा का प्रबन्ध कड़ा कर दिया।

कुन्ती के आवास में सब वृद्धजन तथा दुर्योंधनादि राजकुमार एकत्रित हुए हो भीम से उसके लापता होने के विषय में पूछा जाने लगा। भीम ने अपनी कथा सुना दी।

मैं भी यह सब हल्ला सुनकर समझ गया था कि भीम जीवित लौट आया है। अत: मैं भी कुन्ती के आवास में पहुंच गया था। मैंने भीम की कथा सुनी तो मेरी और विदुरजी की धारणा सत्य सिद्ध हुई।

भीम ने बताया,’पितामह! आपकी कृपा से मैं अधिक खाता हूं। जितना मेरे सब भाई खाते हैं, मैं अकेला ही खा जाता हूं। साथ ही भोजन अति स्वादिष्ट था। मैंने उस सायंकाल सबके सम्मिलित भोजन से भी दुगना खाया होगा। परिणाम यह हुआ कि मैं सबसे पहले नींद में निमग्न हो गया। मुझको अपने तन मन की सुध नहीं रही थी।

‘जब मैं जागा तो मैं रस्सियों में जकड़ा हुआ था। मेरे सब वस्त्र भीग रहे थे और मुझको शीत लग रहा था। मेरे चारों ओर नाग लोग खड़े मुझको उत्सुकता से देख रहे थे। जब मुझको चेतना हुई तो उन्होंने मेरे बन्धन खेालकर मुझकों मुक्त कर दिया और सब मेरी ओर प्रश्न भरी दृष्टि से देखने लगें।

‘मैने अपना परिचय दिया और अपने बंधे होने के कारण से अपनी अन भिज्ञता प्रकट की। इस पर उन्होंने बताया कि मुझको विष दे दिया गया था। मैं अचेत सा गंगा में बहा जाता था। उन्होंने मुझको देखा,निकाला और मेरे विष का परीक्षण कर उसका निराकरण किया। मैं बच गया तो मेरे बन्धन खोल दिये।

‘मैंने उनका धन्यवाद किया। तत्पश्चात वे मुझको उपने राजा वासुकि नाग के पास ले गये। वहां मेरा परिचय सुन मेरे नाना के नाना आर्यक ने तथा नागराज ने मेरा बहुत आदर सत्कार किया। मेरे साथ स्नेहपूर्ण व्यवहार किया और सात दिन तक मेरी चिकित्सा कराकर मुझकों पूर्ण रूप से स्वस्थ हो जाने पर यहां आने की स्वीकृति दे दी।’

शकुनि ने पूछा,’तो भीम नहीं जानता कि किसने उसको बांधा था और गंगा में बहा दिया था।’

‘मैंने देखा नहीं; मै अचेत था। भोजन में तो विष था, इसमें सन्देह नहीं।’

‘भेाजन विषयुक्त था तो तुम्हारे अन्य भाइयों ने भी तो खाया था। वे तो जीवित रहे हैं।’

‘मुझको अधिक खाने से अधिक विष मिला होगा।’

दुर्योंधन ने बात हंसी में उड़ा दी, परन्तु भीष्म ने दुर्योंधन की ताडऩा की और कहा,’दुर्योंधन ! इस बार तुमको क्षमा किया जाता है, पुन: कोई ऐसी बात की तो धर्मयुक्त दण्ड के भागी होगें।’

‘कैसी कोई बात न करूं?’दुर्योंधन ने मुस्कराते पूछा।

‘भाइयों को विष खिलाकर हत्या करने का प्रयास।’

‘आपको विश्वास है कि मैंने किया है?’

‘हां, मैंने इस घटना की जांच की है और भीम के कथन से मिलान करने पर यही सिद्ध हुआ है कि तुमने भोजन में विष मिलवा दिया था।’

‘संजयजी के कहने की बात कर रहे हैं न? वह तो मेरे शत्रु हैं। उनको मेरे अच्छे कार्य भी बुरे प्रतीत होते हैं।’

‘मुझको उस दिन के पाचक ने सब बात बताई है। मैं समझता हूं कि यदि तुम राज्य परिवार के सदस्य न होते तो मृत्युदण्ड पा चुके होते।’

शकुनि बीच में ही बोल उठा,’पितामह ! आपने उस नीच पाचक का विश्वास कर लिया है और राजकुमार की बात नहीं मानी?’

‘तो क्या पाचक ने यह झूठ कहा है कि दुर्योंधन ने अपने हाथ से उसको विष दिया था।’

‘यह झूठ है। इसमें कुछ भी तथ्य नहीं।’

इस प्रकार बात समाप्त हो गयी। जब अपराधी को दण्ड ही नहीं दिया जाना था तो अधिक जांच करने की आवश्यकता नहीं समझी गयी।

मेरे मन पर इस घटना का गम्भीर प्रभाव पड़ा। मैं यह समझने लगा था कि इस अन्याययुक्त राज्य में रहने से किसी का कल्याण नहीं हो सकता। मैं वहां से चले जाने का निश्चय करने लगा।

उर्मिला का कहना था कि हमको अपने बच्चों की शिक्षा दीक्षा उनके बाबा के आश्रम में ले जाकर करनी चाहिए, अन्यथा वे अत्यन्त दुराचारी हो जायेंगे। हस्तिनापुर के वातावरण में किसी भी बालक का चरित्र ठीक रह सकेगा, यह आशा नहीं करनी चाहिए।

अत: एक दिन मैं राज्य से लम्बी छुट्टी लेने के लिए महाराज धृतराष्ट्र के आवास में जा पहुंचा। वहां पहुचते ही मुझको भीतर ले जाकर महाराज के सामन उपस्थित कर दिया गया। उस दिन महाराज अकेले बैठे विह्रल हो रो रहे थे। मैंने उन्हें पहले इतना दु:खी कभी नहीं देखा था। विस्मयजनक बात यह थी कि उस दिन महारानी उनके साथ नहीं थी।

मुझको वहां छोड़ सेवक वहां से खिसक गया। इससे मेरी उत्सुकता और बड़ गई। मेरे वहां होने से महाराज अनभिज्ञ थे। अत: मैंने अपने वहां पर होने का संकेत करने के लिए पुन: आगार द्वार के समिप जाकर खटका कर दिया। खटका सुन उन्होंने मुख ऊपर कर पूछ लिया,’कौन?’

मैंने नमस्कार की और आगार में आकर उनके सामने बैठ गया। वे आंखे पोंछकर बोले,’संजयजी’

‘हां महाराज!’

‘कब से यहां हैं?’

मैने बात बनाकर कहा, ‘अभी आया ही हूं। आज महारानीजी नहीं हैं। उनका स्वास्थ्य तो ठीक है?’

‘ठीक है, बैठ जाइए। मैं आज बहुत दु:ख कर रहा हूं। मैं नहीं जानता कि किस प्रकार इससे छुटकारा जाऊं?’

‘महाराज ! यदि मैं कोई सेवा कर सकता हूं तो आज्ञा कीजिये।’

‘यह किसी के वश की बात नहीं। दुर्योंधनादि राजकुमारों ने प्रासाद में भारी ऊधम मचा रखा है। शकुनि उनको इस उच्छृखलता में प्रोत्साहन देता हैं।’

मुझको यह विदित था कि कोई भी युवा दासी उनसे अछूती नहीं बचती थी। इसके अतिरिक्त अब वे दासियों को नग्न करा उनसे नृत्य कराते और उनकी हंसी उड़ाते थे। कदाचित इसी ओर धृतराष्ट्र का संकेत था। मैं अभी विचार कर ही रहा था कि महाराज कहने लगे,’मैंने महारानी को कहा था कि यह सब उसी का दोष है। एक सौ राजकुमारों को जन्म देकर उसने भू भार ही बढ़ाया है। इस पर वह रूष्ट हो गई हैं । मैं अकेला यहां बैठा अपने भाग्य को कोस रहा हूं।’

‘महाराज !’मैंने उनको सान्त्वना देते हुए कहा,’इसमें महारानीजी का कुछ दोष नहीं। उन्होंने सौ पुत्रों की प्राप्ति के लिए वर इस कारण मांगा था कि से सब भाई परस्पर सहयोग देकर कौरव राज्य का तीनों लोकों में विस्तार करेंगें। इन सबको इकठा देखकर किसी शत्रु को साहस नहीं हो सकेगा कि वह राज्य के अनिष्ट का विचार कर सके ।

‘दोष तो महाराज ! इनकी शिक्षा का हो रहा है। इनको किसी ऋषि के आश्रम में शिक्षा मिलनी चाहिए थी। चरित्र की शिक्षा इनको अभी नहीं मिली।

‘आचार्य कृपा और आचार्य द्रोण, देानों धनुर्विधा के विद्वान होते हुए भी, देानों के जन्मजात संस्कार निकृष्ट हैं। ये दोनों अविवाहित संयोग के परिणाम हैं। इस कारण उनके मानस पुत्र आपके राजकुमार हीन मन और हीन चरित्र रखते हैं।’

इस सूचना से धृतराष्ट्र के मस्तक पर बल पड़ गये। कृपाचार्य उनको शिक्षा दे चुके थे। इस कारण वे उनमें गुरू की भावना रखते थे। अत: वे मेरे इस कथन से प्रसन्न नहीं हुए। मैंने उनकी चढ़ी भृकुटि देखकर कहा, ‘महाराज! इसमें क्रोध करने की कोई बात नहीं है। यह एक वस्तुस्थिति है। इसको समझना चाहिए।

‘जीवन चरित्र और जातियों के इतिहास पढ़े जाते हैं। यदि इतिहास का ज्ञान और पुर्व चरित्र पढऩे का कुछ भी प्रभाव वर्तमान पर न होना होता तो उसके पढऩे से लाभ ही क्या था?’

‘तो क्या आप समझते हैं कि इन दोनों आचायों का जन्म विधिवत् विवाह सम्बन्ध का परिणाम नहीं था?’

‘हां महाराज! दोनों महानुभाव काम के आवेग में फंसे पिताओं एवं फुसलाने के लिए आई अप्सराओं का फल हैं।

‘महाराज ! महर्षिं गौतम के पुत्र शरद्धान गौतम एक बार वन में बैठे धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहे थे। उनकी तपस्या भंग करने के लिए इन्द्रलोक से जनपदा नाम की देवकन्या वहां भेजी गयी। शरद्धान गौतम ने वन में एकवस्त्रा इस अप्सरा को देखा। उस वस्त्र में से उसके सुन्दर अंग दिखाई दे रहे थे। जब शरद्धान की दृष्टि उस अप्सरा पर पड़ी तो वहां से भागी। इस समय उसका वह एक वस्त्र भी वन के सरकण्डों से अटककर उसके शरीर से उतर गया और सर्वथा नग्न हो गयी। शरद्धान ने उसके नग्न शरीर को देखा तो काम से व्याकुल, उसके पीछे वहां सरकण्डों में जा पहुंचे। वहां महर्षिं का वीर्य उस अप्सरा को प्राप्त हुआ।

‘जनपदा को गर्भ ठहर गया और उसने एक लड़के और एक लड़की को जन्म दिया।’

‘महाराज! देवलोक की यह प्रथा है कि वहां की अप्सरायें न तो कभी मानवों से स्थाई सम्बन्ध रख सकती हैं और न ही मानवों की सन्तान को देवलोक में ले जा सकती है। अत: जनपदा ने अपने दोनों बच्चों को वहां सरकण्डों में,जहां उसका शरद्धान से समागम हुआ था, छोड़ दिया और स्वयं देवलोक को चली गई।

‘इस समागम के स्थान पर, अर्थात सरकण्डों में, महर्षिं शरद्धान के कामाभिभूत होने के समय धनुष बाण गिर पड़े थे। समागम के पश्चात महर्षि को अपने पतन पर इतनी लज्जा लगी कि वह धनुष बाण उठाए बिना वहां से भाग खड़े हुए। अत: जनपदा ने उस धनुष बाण को देख समझा कि महर्षि अपनी सन्तान को लेने आयेगें।

‘संयोगवश महाराज शान्तनु उसी समय वहां मृगया करते हुए पहुंच गए। उन्होंने उन बच्चों को मृगचर्म, धनुष बाण इत्यादि के समीप पड़े देखा तो किसी ब्राह्राण की सन्तान समझ उठा लिया और अपने यहां ले आये।

‘महाराज ने इन बच्चों का पालन पोषण किया और शिक्षा दीक्षा देकर योग्य बनाया। ये दोनों महाराज की कृपा से पले। इस कारण इनका नाम कृपा और कृपि हुआ। यही बालक आगे चलकर कृपाचार्य हुए। इनकी शिक्षा दीक्षा से ही दुर्योधनादि बन रहे हैं। भीष्मजी भी उन कृपाचार्य के शिष्य हैं। धनुर्विद्या में तो शिष्यों की निपुणता बढ़ रही है, परन्तु आचार की शिक्षा से वे अशिक्षित रह रहे हैं।’

‘संजयजी ! क्या आप समझते हैं कि इनके जन्म का प्रभाव इतना गम्भीर हुआ है कि वह पूर्ण शिक्षा पर भी छा गया है?’
‘हां महाराज ! विवाह को मैं केवल एक विधान मात्र नहीं मानता। विवाह के पीछे एक भावना होती हैं। वह पति के मन में पत्नी के लिए और पत्नी के मन में पति के लिए निष्ठा बनाती है। इसका सन्तान पर बहुत ही प्रबल प्रभाव होता है।

‘समाज में सम्मानित ढंग से पति पत्नी परस्पर सहयोग करते हुए निर्भय, निष्पाप, धर्मपरायण और पितृ ऋण से मुक्त होते हुए अनुभव करते हैं। कामाभिभूत होकर अथवा छल कपट के अर्थ सम्पन्न संयोग का प्रभाव सन्तान के मस्तिष्क को विकृत कर देता है।’

‘दुर्भाग्य से द्रोणाचार्य की कथा भी वैसी है। महर्षिं भारद्वाज गंगा पर आश्रम में रहते थे। यह महर्षि कठोर व्रतों का पालन करने वाले थे। एक दिन गंगा में स्नान करने गए तो वहां घृताची अप्सरा स्नान करके वस्त्र बदल रही थी। भीगे कपड़ों में उसके अनुपम सौन्दर्य को देखकर महर्षि स्तब्ध रह गए। घृताची ने भी महर्षि जी को अन्य ऋषियों के साथ आते देखा था। उसको भारी संकोच उत्पन्न हुआ। वह जल्दी जल्दी वस्त्रों को बदलने लगी। इसी जल्दी में उसका गीला कपड़ा भी खिसक गया। उसको नग्न देख महर्षि के मन में उग्र वासना जाग पड़ी।

‘इस प्रकार समागम से जो सन्तान हुई, उसको घृताची ने उस दोने में रख दिया, जिसमें महर्षि उस समय गंगा पूजा के लिए पुष्प पत्र लाए थे। उसी दोने में एक नवजात बच्चे को पड़ा देख महर्षि समझ गये कि घृताची से उसका अपना पुत्र है। ऋषि उसको अपने आश्रम में ले गए। उसका पालन पोषण हुआ। दोने में पड़ा होने के कारण बच्चे का नाम द्रोण रखा गया और आगे चलकर वह द्रोणाचार्य हुए।

‘महाराज ! ये दोनों आचार्य वास्तव में वर्णसंकर है। इसी कारण ये आचार-व्यवहार की ठीक शिक्षा देने के सर्वथा अयोग्य हैं। वे जो कुछ शिक्षा देते हैं, वह प्रभावहीन ही रहती है।

‘पाण्डवों में यह गुण है कि वे शतश्रंग पर्वत पर ऋषि आश्रम में रहते हुए सात्विक आचार व्यवहार का अभ्यास रखते हैं। वे नित्य यहां होम करते हैं। जीवन को यज्ञमय बनाने में संलग्न रहते हैं। यही कारण है कि जहां वे परस्पर झगड़ा नहीं करते, वहां उनसे किसी अन्य को भी दु:ख नहीं पहुचता।’

‘तो यह महारानीजी का दोष नहीं है?’

‘महारानीजी ने अधिक सन्तान उत्पन्न कर परिवार का हित चिन्तन किया है। बिगाड़ हुआ है तो इन आचार्यों की अशुद्ध शिक्षा के कारण हुआ है।

‘परिवार अथवा देश में जनसंख्या में वृद्धि किसी प्रकार भी अकल्याणकारी नहीं होती। अकल्याण होता है प्रजा की मानसिकता विकृति के कारण अधिक संख्या में लोग देश और परिवार की समृद्धि,सम्पन्नता, सुदृढता और सुरक्षा में सहायक ही होते है।

‘हां, यदि उच्छृंखलता, प्रमाद,आलस्य, उद्दण्डता परिवार के सदस्यों अथवा देश के नागरिकों में व्याप्त हो जाए तो फिर उस परिवार और देश का भी विनाश अवश्यम्भावी है।’

धृतराष्ट्र ने ताली बजाई तो एक दासी उपस्थित हुई। धृतराष्ट्र ने दासी से कहा,’महारानी से कहो, संजयजी आए हैं। वह एक अत्यावश्यक निवेदन करना चाहते हैं। उनके दर्शन की प्रार्थना कर रहे हैं।’

दासी गई और महारानी गान्धारी की हाथ पकड़े हुए वहां आ पहुची। गान्धारी बैठी तो मैने प्रणाम कर दिया। महारानी ने पूछ लिया, ‘संजयजी क्या कहना चाहते हैं?’

महारानी के प्रश्न का उत्तर महाराज ने स्वयं दिया, ‘प्रिये! मैं भूल रहा था। मैंने तुमको बहुत दुर्वचन कहे हैं। अब संजयजी के उपदेश से मुझे ज्ञात हुआ है कि दोष तुम्हारा नहीं। दोष तेा उस शिक्षा का है, जो कुमारों को मिल रही है। शिक्षक अशुद्ध शिक्षा दे रहे हैं। वे ठीक बताते नहीं। बताते हैं तो उनकी बात प्रभावहीन होती है।’

मैने पुन: अपना पूर्ण कथन उनके सम्मुख दुहरा दिया और अन्त में कहा, ‘महारानी ! आपने पूर्वजन्म में बहुत पुण्य कर्म किए हैं, जिससे आपको महाराज जैसे देवता पति मिले है। जितनी सुगमता से ये अपना देाष मानने पर तैयार हुए हैं, यह इनमें दैवी गुणों के कारण ही है।’

इसके पश्चात जब महाराज और महारानी प्रसन्न हो गए तो मैने अपने पिजाजी के आश्रम, गन्धमादन पर्वत पर जाने के लिए अवकाश मांग लिया। वह तुरन्त मिल गया और अगले दिन मैं सपरिवार तीन रथों में आश्रम की ओर चल पड़ा।