नास्तिक्य

पतित—पावनी गंगा के तट पर बसी हई मोक्षदायिनी काशी, जहां जन्म—भर के पापों से पीडि़त नर—नारी मरने से पूर्व अपनी आत्मा की शन्ति के लिए आते हैं और जहां वेदों के प्रकाण्ड विद्धानों तथा कर्मकाण्डियों की परम्परा—सी चल पड़ी हैं, वहीं चार्वाक जैसे वामपक्षीय एवं नास्तिक का पन्थ भी चल पड़ा था। चार्वाक से प्रशिष्य नाकेश, विपरीत विचारघारा के पोषक होते होते हुए भी राज्य—परिषद् के सदस्य बन, दीपक और छाया की कहावत चरितार्थ करते थे।

महाराज शूरसेन की राज्य—सभा में प्रत्येक विद्वान का मान होता था और भिन्न—भिन्न विचारों के विचारक वहां स्थान पाते थे। जहां आस्तिक, कर्मवादी और पुनर्जन्म पर विश्वास रखने वाले महाराज के दक्षिण पाŸव में बैठते थे, वहां नाकेश इत्यादि विद्वान महाराज के वाम पाश्र्व में आसन पाते थे। इसी कारण इनका नाम वामपक्षीय पड़ गया था।

नाकेश इत्यादि पण्डितों ने वाममार्गीय नाम स्वीकार भी कर लिया था। वह इस कारण नहीं कि उनको राज्य सभा में महाराज के बायें हाथ की ओर स्थान मिलता था, प्रत्युत इस कारण कि वे अपने मार्ग अर्थात् अपनी विचारधारा को सुन्दर, सुखप्रद और सुगम मानते थे।

महाराज शूरसेन की राज्य—परिषद् की एक विशेष बैठक हो रही थी। इसका विशेष प्रयोजन था। नगरपाल ने एक अपराघी को मृत्युदण्ड दिया था और उसके सम्बन्धियों ने महाराज के समक्ष क्षमा—याचिका प्रस्तुत की थी। उस याचिका को सुनने के लिए ही परिषद् बुलाई गई थी।

सभा में महाराज शूरसेन उच्च सिंहासन पर विराजमान थे और उनके दक्षिण हाथ की ओर कुछ नीचे आसनों पर महामात्य वीरभद्र, न्यायाधीश पण्डित चतुरंग, नगरपंच श्री केशव और सेनापति राजन विद्यमान थे। महाराज के वाम हाथ की ओर महापण्डित नाकेश, प्रजाप्रतिनिधि शूद्रक, करनायक शूलांग और महिलाशिरोमणि प्रेक्षादेवी विराजमान थे। इनके अतिरिक्त साधारण कोटि के अन्य अनेकों विद्वान भी उपासीन थे। अपराधी एक बाह्राण बालक था। उन्नीस—बीस वर्ष की आयु का; बह्राचारी के बीस—खर्च वस्त्र पहने, नग्न शिर, शिखा को बड़ी सी गांठ दिये, ओजस्त्री मुख और लम्बे कद वाला। वह सभा भवन के मध्य में खड़ा था। उसके पीछे रक्षार्थ चार सैनिक खड़े थे। अपराधी के सम्बन्धी भी भवन में एक ओर खड़े थे। नगरपाल अपने स्थान पर एक चौकी पर कुछ पत्र, पत्रक अथवा पुस्तकें रखे खड़ा था। अपराधी के पीछे कुछ अन्दर पर कई नागरिक सम्मानयुक्त मुद्रा में खड़े थे।

महाराज की आज्ञा पाकर नगरपाल ने झुक कर नमस्कार किया, फिर उच्च स्वर में कहा, ”काशिराज की जय हो।”
इस घोषणा के बाद अपराधी के सम्बन्धियों में से एक वृद्ध ने, ”महाराज की जय हो”कह कर आशीर्वाद दिया। इस पर महाराज ने नगरपाल को सम्बोधित कर पूछा, ”इस बालक का क्या अपराध है ?”

”महाराज! इसने गुरु—पत्नी से सम्भोग किया है और हमारे शास्त्र के विधानानुसार इस अपराधी को चिता में जीवित जला देना है।”

महाराज ने बालक के सुकुमार मुख को देखा तो उसके अपराधी होने में सन्देह करते हुए पूछा, ”बालक! क्या यह सत्य है?”

”सत्य है महाराज! मैं इस नीच कर्म के करने का अपराधी हुं।”

”तुमको मृत्यु—दण्ड मिला है, जानते हो?”

”हॉं महाराज! जानता हूं।”

”तुम क्या चाहते हो?”

”मैं इस दण्ड के शीघ्र दिये जाने की प्रार्थना कर रहा हूं।”

”क्यों ?”

”इस पतित शरीर से मैं मुक्ति पाना चाहता हूं। इसको भस्म कर देना चाहता हूं जिससे इस पवित्र नगरी का वायुमण्डल दूषित न हो।”

”तो यह क्षमा—याचिका किसने की है?”

सभा—मण्डप में एक ओर खड़े बालक के सम्बन्धियों में से एक वृद्ध ब्राह्मण ने आगे बढ़, हाथ जोड़कर कहा, ”महाराज! भगवान् आपको चिरंजीवी रखे।

इस याचना को करने वाला, करबद्ध यह बृद्ध ब्राह्मण सम्मुख उपस्थित हैं।”

”क्षमा किये जाने के लिए क्या युक्ति है?”

”प्रथम, बालक का अपराध इतना नहीं जितना इससे सहवास करने वाली स्त्री का है। वह भोग और विलास—क्रिया से परिचित थी। इसको इस विषय में बालक का पथ—प्रदर्शन कर उसे इस मार्ग पर चलने का प्रलोभन देना उचित नहीं था। वह स्त्री तीस वर्ष की आयु की होकर इस विषय में पर्याप्त अनुभव रखती होगी। अत: बालक इस कार्य में एक गौण अपराधी होने से क्षमा का भागी है।

”द्वितीय, यह बालक इस वृद्ध और इस समीप खड़ी वृद्धा की एक—मात्र सन्तान है। यह हमारी वृद्धावस्था का एक—मात्र आश्रय है। इसको दण्ड देने से हम निर्दोष दण्डित हो जावेंगे। यह वृद्ध ब्राह्मण अपनी विद्या और ज्ञान से काशी के नागरिकों की सेवा करता रहा है। अपनी सेवाओं के उपलक्ष में इस बालक के जीवन—दान की याचना करने आया है।

”तृतीय, बालक अल्प—वयस्क है, सुन्दर है, युवा है, मेधावी है, शास्त्र और समाज की सेवा के योग्य है। इस कारण दया का भागी है। ”

महाराज ने ब्राह्मण की युक्तियॉं सुन कहा, ”किसी अन्य की कुछ कहना है?”ब्राह्मण के समीप खड़ी वृद्धा ब्राह्मणी ने घुटने टेक, माथा भूमि पर रख,रुदन करते हुए कहा, ”मेरे पुण्य कर्मों का फल, जिनसे मुझको ब्राह्मण—जन्म मिला है, महाराज को लगे। इस जन्म में किये मेरे सब श्रेष्ठ कर्मों के फल के महाराज भागी हों। मेरा बेटा मुझको मिल जाये।”
महाराज आसन से उठ खड़े हुए और बोले, ”देवी उठो! तुम्हारे साथ न्याय होगा। दया के लिए भगवान् से प्रार्थना करो। वह दयालु है, दयानिधि है, कृपासागर है।”

ब्राह्मण ने अपनी अद्र्वागिनी को उठाया। उसके सिर पर हाथ फेरा और ढाढस बंधाते हुए कहा, ”प्रिये! अधीर मत बनो। इस पवित्र काशी में अन्याय नहीं हो सकता; साथ ही यह न्याय दयायुक्त भी होगा।”

ब्राह्मणी सिसकियॉं भरती हुई उठी और अपनी दयनीय अवस्था को छिपाने के लिए ब्राह्मण के पीछे खड़ी हो गई।
महाराज शूरसेन ने नगरपाल से पूछा, ”इस बालक से सहवास करने वाली स्त्री को क्या दण्ड मिला है?”

”महाराज! हमारे राज्य में स्त्रियों को दण्ड देने का विधान नहीं है। उनको अपने पतियों के हाथ में ही छोड़ दिया जाता है और वे ही उनके दण्ड का विधान करते हैं।”

”ऐसा क्यों है? क्या वे राज्य की नागरिक नहीं हैं”

”हैं महाराज! परन्तु यह प्रश्न तो महामात्य जी से अथवा न्यायाधीश से किया जाना चाहिए। यह सेवक व्यवस्था नहीं दे सकता और न ही किसी व्यवस्था पर समालोचना कर सकता है।”

”वीरभद्र!”महाराज ने महामात्य से पूछा, ”स्त्रियों के लिए यह पृथक् विधान क्यों है?”

”महाराज! वैदिक संस्कृतियों में स्त्रियों को पति के अधीन रहने की व्यवस्था है। इस बन्धन के प्रतिकार में विधान ने उनको सुविधा दी है कि उनके गुण/दोष देखने का अधिकार भी उनके पति को होना चाहिए। पति अपनी पत्नी का अन्तरंग साथी होने से अपने व्यवहार में अधिक न्याययुक्त होगा, ऐसा माना गयाहै।”

”महापण्डित नाकेश इस विषय में हमको क्या सम्मति देते है?” महाराज ने अपने वायें हाथ की ओर घूमकर पूछा।

”क्षत्रिय—कुलप्रवर! यह बालक अपराधी नहीं है। इसने कोई अपराध नहीं किया। भोग स्त्री—पुरुष का स्वाभाविक कर्म है।

इसके लिए किसी को प्राण—दण्ड देना न्यायोचित नहीं है।”

”परन्तु पण्डित! यह दण्ड केवल सम्भोग के कारण नहीं दिया गया है। गुरु—पत्नी से सम्भोग दण्डनीय है और अपनी विवाहिता पत्नी से वैध है।”

”ठीक है, परन्तु वे तो किसी की भार्या नहीं होतीं। साथ ही गुरु—पत्नी माता तुल्य होने से असम्भोग्या है।”

”यह बन्धन मनुष्य निर्मित है। यह धर्म नहीं है। अधर्म तो वह कर्म होता है, जो प्रकृति से मनुष्य के न करने के लिए बना हो। जैसे, मनुष्य का अग्नि में कूद जाना अथवा मात्रा से अधिक खाना अधर्म है।”

”न्यायाधीश इस विषय में क्या कहते हैं ?”

”धर्म, अधर्म की व्याख्या जो महापण्डित नाकेश ने की है, वह मनुष्य के प्राकृत धर्म की है। मनुष्य के कुछ सामाजिक धर्म भी होते हैं। इस बालक ने समाज द्वारा नियत धर्म का उल्लंधन किया है। अत: यह दण्ड का भागी है।”

महाराज ने पुन: नाकेश की ओर देखा। उसने हार न मानते हुए कहा, ”जब समाज कोई नियम ऐसा बना दे, जो प्रकृति के विरुद्ध हो, तो समाज अपराधी है, न कि प्रकृति की पुकार सुनने वाला मनुष्य। ”

”प्रकृति की पुकार क्या है?”

”पुरुष—स्त्री में सम्भोग प्रकृति द्वारा नियम कृत्य है। प्रकृति ने इसकी सीमा बांधी है। यह सीमा अरुचि, थकान, आयु और जाति है। जाति से मेरा अभिप्राय गधा, घोड़ा, कुत्ता इत्यादि है।”

”यह ठीक है,”न्यायाधीश का कहना था,”परन्तु समाज में सुव्यवस्था रखने के लिए भी कुछ कर्मों की सीमा बांधी गई है। गुरु—पत्नी से सम्भोग इस सीमा के बाहर है। माता तथा भगिनी से भी सम्भोग वर्जित है। ”

”क्यों वर्जित है?”

”समाज में दुव्र्यवस्था रोकने के लिए।”

महाराज ने इस वाद—विवाद को रोकते हुए कहा, ”महापण्डित नाकेश के कथन में तथ्य है अथवा नहीं, यह मेरे अथवा इस सभा के विचार का विषय नहीं है। नाकेश पण्डित चाहते हैं कि प्रचलित धर्म—व्यवस्था बदल दी जाय। उनका कहना है कि धर्म—व्यवस्था केवल प्रकृति के नियमों के आधार पर होनी चाहिए। इसको स्वीकार अथवा अस्वीकार करना धर्मशास्त्रियों का काम है। हम इस सभा में धर्मशास्त्र के अनुकूल ही राज्य—कार्य चलाने के लिए बैठे हैं। अत: मुझको आप मन्त्रीगण सम्मति दें कि प्रचलित धर्मशास्त्र के अनुसार नगरपाल की यह प्राणदण्ड की आज्ञा न्यायसंगत है अथवा नहीं?”

नाकेश ने महाराज से विनीत भाव में कहा, ”महाराज! न्याय वह है जो लोग—हित में हो। इस दण्ड के देने से कौन—सा लोकहित सिद्ध होगा?”

स पर महाराज का कहना था, यह विषय दया करने के समय विचार कर लिया जायगा।”

न्यायाधीश ने कहा, ”जहां तक न्याय का प्रश्न है, नगरपाल की आज्ञा यथोचित है। इस समय प्रश्न केवल क्षमा—याचना का उपस्थित है। इस अपराधी को क्षमा करने का अर्थ, प्रजा में इस प्रकार के अपराध करने को प्रोत्साहन देना होगा। इस कारण क्षमा नहीं प्रदान करनी चाहिए।

”किन्तु प्रार्थी क्षमा के अतिरिक्त दया की याचना भी कर रहा है अपराधी क्षमा के योग्य नहीं है। बालक तथा बालक के माता—पिता दया के भागी हो सकते हैं। इसका निर्णय महाराज स्वयं अपनी अन्तरात्मा की प्रेरणा से ही कर सकते है।”

इस समय महाराज ने पुन: बाल के वृद्ध पिता से पूछा,”ब्राह्मण देवता! तुम्हें इस विषय में और कुछ कहना है क्या?”

महाराज,आप भगवान् का अवतार हैं। इस वृद्ध—दम्पति पर दया करिए।

महाराज ने अपनी आज्ञा सुना दी, ”नगरपाल की आज्ञा न्यायोचित है। यह अपराध क्षमा नहीं हो सकता। दया करना भगवान् के हाथ में है। इसके लिए उससे प्रार्थना करो।

इतना कह काशिराज शूरसेन अपने आसन से उठ खड़े हुए। यह इस बात का संकेत था कि सभा समाप्त हो गई है। यह देख वृद्धा चीख मार, अचेत हो गिर पड़ी। महाराज ने प्रतिहार को आज्ञा दी, ”इस देवी को आतुरालय में ले जाओ।

यह आज्ञा दे महाराज अपने निवास भवन को चले गये।

2— अपराधी बन्दी गृह में ले जाया जाने लगा तो पण्डित नाकेश उसके पास आकर खड़ा हो गया और ब्राह्मण कुमार की ओर देखकर पूछने लगा, क्या नाम है तुम्हारा बालक!

मनोज भगवान।
महाराज की आज्ञा सुनी है?
मैं उनका आभारी हूं।
इससे क्या मिल रहा है तुमको?
इस पतित कलेवर से मुक्ति।
नाकेश मुस्कराया और यह कहता हुआ, तुम इसी योग्य हो। आगे चल पड़ा।
नाकेश जब सभा—भवन से बाहर निकला तो पूर्ण कौशेय वस्त्रों में, तथा पॉंवों में बहुत ही कोमल चर्म की पादुका पहिने एक युवक सम्मुख आ खड़ा हुआ। वह हाथ जोड़कर बोला, भवगन्! दर्शन की चिर—संचित अभिलाषा आज पूर्ण हुई ह। अवन्ति—कुमार का प्रणाम स्वीकार करें।

”आप श्रीमान कुमारदेव हैं? नाम और ख्याति तो सुनी है। किस निमित आना हुआ है?

तीर्थाटन के लिए घर से निकला था। काशी में पहुंचा तो भारत के विख्यात विद्वान महर्षि चार्वाक के प्रशिष्य महापण्डित नाकेश के दर्शन के बिना, तीर्थयात्रा का फल संशित मान, श्रीमान के निवास स्थान पर गया था। द्वार पर खड़ी सुन्दरी से पता चला कि महापण्डित राज्य सभा में पधारे हैं। सभा का प्रयोजन जानने पर काशी के न्याय का स्तर जानने के लिए ‘एक पन्थ दो काज’ की कहावत सार्थक करने यहां चला आया हूं।

इस समय नाकेश सभा—भवन से निकलकर बाहर पथ के तट पर खड़े रथ के समीप पहुंच गया था। यह रथ नाकेश का था। सारथि तरुण अश्वों की लगाम पकड़े खड़ा था। राज्यभवन के बाहर भारी भीड़ एकत्रित थी। उनके मुखों पर ब्राह्मण बालक के क्षमा न किये जाने के कारण भारी शोक छाया हुआ था। नाकेश उनकी ओर ध्यान दिये बिना, रथ तक पहुंचा और कुमार से बोला, श्रीमान रथ में पधारें और ब्राह्मण का आतिथ्य स्वीकार करें। केवल दर्शन तो मूर्खों के लिए होता है। आपसे तो अधिक घनिष्ठ सम्बन्ध का सौभाग्य प्राप्त होना चाहिए।

सेवक इस अपार कृपा के लिए कृपज्ञ होगा।

इस पर पण्डित नाकेश रथ पर सवार हो गया और कुमार को अपने समीप बैठाकर सारथि से बोला, निवास—गृह पर चलो।

सारथि के रथ पर बैठते ही वह रथ हवा से बातें करने लगा और पलक की झपक में पण्डित नाकेश के निवास—स्थान पर जा खड़ा हुआ। रथ के द्वार पर पहुंचते ही द्वार खुल गया। दो अति सुन्दर युवतियां हाथों में गुलाब की पंखुडिय़ों से भरी टोकरियां लिए हुए निकली और पण्डित तथा कुमार के द्वार में प्रवेश करते ही, पथ पर फूल बिखेरने लगीं। पण्डित बिना इस और ध्यान दिये कुमार को साथ लिए हुए उन पुष्प पंखुडिय़ों पर चलता हुआ भवन के एक कुसुमोद्यान में जा पहुंचा।
पण्डित नाकेश के भवन में प्रवेश करते ही कुमार ने अनुभव किया कि वहां का वायुमण्डल भांति—भांति की सुगन्धियों से भरा हुआ है। भीतरी उद्यान में कुसुमित वृक्षों की शोभा से तो वह चकित रह गया। उद्यान के प्रवेश द्वार पर, एक जंगली जाति के पुरुष की सर्वथा नग्न मूर्ति, हाथ में भाला लिए खड़ी दिखाई दी। कुमार की दृष्टि उधर गई तो पण्डित ने मुस्कराकर कहा, ”यह इस उद्यान का प्रहरी है। इस मूर्ति को यवन देश के प्रसिद्ध मूर्तिकार फरऊन ने बनाया था। इसके लिए मुझे दो सहस्त्र स्वर्ण—मुद्रायें व्यय करनी पड़ी थीं।

कुमार ने एक क्षण ते उस मूर्ति को देखा और कहा, भगवन्! इसमें क्या सौन्दर्य है?

यह गौंड जाति के एक वीर का सर्वथा प्रतीक है। उस जति की प्रत्येक विशेषता, इस मूर्ति में अंकित है। नीचा मस्तक, चपटी नाक, कृष्णवर्ण, छोटी—छोटी आंखें, झुके हुए कन्धे, लम्बी टांगे और छोटी—छोटी परन्तु चपल भुजाएं, अर्थात् उस जाति की सब बातें मूर्तिकार ने बहुत यत्न से इसमें साकार कर दी हैं।

”यह किसी कुरूप पुरुष की प्रतिमूर्ति हो सकती है, परन्तु क्या इस कुरूपता का निरूपण करने के लिए मूर्तिकार ने अपनी कला का और शक्ति का अपव्यय नहीं किया है?”

”आप अपने विचार से ठीक कहते हैं कुमार! परन्तु प्रकृति जैसी है उसको वैसा ही दिखाना, कला का एक मुख्य उद्देश्य है। आप आदर्शवादी हैं। मैं प्रकृति में विचरने वाला जीव हूं। आप प्राप्त को निकृष्ट समझ त्याग करते हैं। मैं भविष्य की चिन्ता न कर वर्तमान को लम्बे—लम्बे घूंट भर कर पीता हूं।

उनकी बात समाप्त नहीं हो पाई थी कि दोनों वाटिका में पहुंच गये। घास के मैदान थे, पुष्पों की क्यारियां थीं। बीच—बीच में छोटी—छोटी पुष्करणियां बनी थीं, जिनमें जल—प्रपात बहुत बारीक फुआर फेंक रहे थे। घास के मैदानों में पुष्पित लताओं के निकुंज बने थे। कुमार को वह स्थान बहुत पसन्द आया। उसने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई और बहुत आनन्द अनुभव किया। पण्डित ने उसके मन के भावों को अनुभव कर, अनुमान लगा पूछा, श्रीमान विश्राम यहां करेंगे अथवा गृह के भीतर?

जहां आपको रुचिकर हो।

तो पधारिये। वह कुमार को एक निकुंज में ले गया। वहां पत्थर की चौकियों पर मखमल के गद्दे लगे थे। पण्डित ने कुमार को एक चौकी पर बैठने का संकेत किया और दूसरी पर वह स्वयं बैठ गया। बैठते हुए उसने पूछा, श्रीमान क्या पान करेंगे — सुरा माधवी अथवा आसव?

भगवान्! मैं तीर्थाटन करने निकला हूं इस कारण इन वस्तुओं का मैने त्याग कर दिया है। साथ ही मुझे मद्य—पान में रुचि नहीं है, न ही हमारे राज्य इसका पान उचित समझा जाता है।

ठीक है। हम दोनों के दृष्टिकोण में भेद है। देखिए कुमार! आप गंगा में स्नान करते हैं अपने पाप धोने के लिए और मैंने गंगा—जल से सींचकर इस मनोहर उद्यान का सृजन किया है। आप इसके जल का पूजन करते हैं, मैं इससे माधवी निर्माण कर पान करता हूं। आपको इससे शीतलता मिलती है, जिससे इन्द्रियां कुण्ठित होकर संसार का स्वाद भूल जाती हैं और मैं इससे उत्तेजना प्राप्त करता हूं, जिससे संसार का स्वाद मन भरकर पाता हूं।

कुमार महापण्डित की युक्तियां और मनोद्गार सुनकर चकित रह गया। इस समय सुन्दर वस्त्राभरण पहिने, एक सुन्दर युवती आई। नाकेश ने उसका परिचय कराया, ये मेरी धर्मपत्नी हैं। ये गन्धर्व देश के एक प्रकाण्ड विद्वान सुमतिदेव की सुपुत्री मंदाकिनी देवी है और मेरी विचारधारा को श्रेष्ठ मानती हैं।”

देवी! नाकेश ने अतिथि का परिचय कराया, आप हैं अवन्तिमहाराज पालकदेव के कनिष्ठ भ्राता कुमारदेव। तीर्थाटन करते हुए काशी पधारे हैं। यहां आने पर इस क्षुद्र ब्राह्मण को दर्शन देने की कृपा की है।

मंदाकिनी ने मुस्कराते हुए हाथ जोड़कर नमस्कार किया और कहा अतिथिवर! इस गृह की प्रत्येक वस्तु सेवा के लिए प्रस्तुत हैं। आर्य। उसने अपने पति की ओर देखकर पूछा, पूज्य अतिथि के मनोरंजन से लिए क्या आयोजन किया जाय?
जैसी श्रीमान की रुचि हो। ये मद्य—पान नहीं करते, इस कारण इनके पान के लिए शुद्ध गंगा जल आए। ये तीर्थाटन पर घर से निकले हैं। अत: निरामिष भोजन का प्रबन्ध हो। सुन्दरियां नृत्य तो करें परन्तु इनको छुएं नहीं। संगीत में शुद्ध सामवेद का गान हो। आज पूर्णिमा है। रात्रि को जल—विहार होगा। अपना बजरा तैयार रहे। इनको गंगा—दर्शन से मोक्ष मिलेगा, मुझको कथित—स्वर्ण का स्वाद, इसी लोक में प्राप्त होगा।

मंदाकिनी ने मुस्कराते हुए कहा, जैसी आर्य की आज्ञा। इस पर भी इतना तो निवेदन कर देना ठीक होगा कि समाज की कृत्रिम श्रृंखलाओं में बंधे हुए मानव को इस प्रकार झकझोरने से मुक्ति नहीं मिल सकती। इसको तो प्यार से, कोमल थपकियां देकर नींद से जगाने की आवश्यकता है। एकदम झटका देकर जगाने से तो हृदय की गति भी रुक सकती है।

तुम इनको नहीं जानतीं मंदाकिनी! ये बहुत शूरवीर हैं। तीन वर्ष में तीन बार अवन्ति पर हुए आक्रमण को विध्वंस करने वाली वीर सेना के ये शूर सेनापति रहे हैं। इनके भाई महाराज पालकदेव तो केवल भक्त व्यक्ति हैं। प्रात: से सायं तक उपनिषदों की कथा सुना करते हैं। भोजन से पूर्व एक सहस्त्र मुद्रा नित्य दान करते हैं। आधी राज तक भगवत् भजन करते हैं। राज्य कार्य के लिए तो उनके पास समय ही नहीं। मन्त्री एक अन्य भक्त है। सब काम चौपट करते रहते हैं। इस दुव्र्यवस्था को देख मल्ल राज्य वाले आक्रमण करते हैं। परन्तु कुमार सेनापति की चतुराई और शौर्यता के सम्मुख परास्त होकर लौट जाते जाते हैं।

परन्तु आर्य, जो लोहे से लड़ते हैं वे कोमलांगी लता समान मृदुल भुजाओं का बन्धन तोड़ नहीं सकेंगे। समुद्र में तैरने वाले, प्राय: छोटी पुष्करणी में डूब जाते हैं। इन पर दया करो भगवन्!

इस विवाद को सुना कुमार हंस पड़ा। एकाएक उसका ध्यान मंदाकिनी के अभी तक खड़े रहने की ओर गया। उसने देखा कि वहां पर कोई तीसरा आसन नहीं है। अत: उसने खड़े होकर कहा, क्षमा करें देवी! आप आसन ग्रहण करें।

ओह! मैं तो भूल ही गया था। पंण्डित नाकेश ने उसको अपनी जंघा पर बैठने का संकेत कर दिया। मंदाकिनी लपककर पण्डित जी की बायीं जंघा पर बैठ गई।

कुमार विस्मय में दोनों का मुख देखता रह गया। पण्डितजी ने कहा, श्रीमान को विस्मय करने की कोई आवश्यकता नहीं। आपने कभी चित्रों में पार्वती को शिवजी की गोद में बैठे देखा क्या?

कुमार की पुन: हंसी निकल गई। उसने कहा, मैं कहने वाला था कि देवीजी का मेरे आतिथ्य की चिन्ता करने से मेरा ह्दय उनका अत्यन्त आभारी हैं, परन्तु मैं आज मध्याह्र पश्चात् यहां से प्रस्थान करने वाला हूं। मैं यह सब वैभव और ऐश्वर्य देखकर बहुत प्रसन्न हुआ हूं। रात को सम्भवत: इसकी पराकाष्ठा देखने को मिलती। इस पर भी यदि महापण्डित नाकेश इसका रहस्य बता दें तो मैं उसको समझकर, देखने जैसा आनन्द प्राप्त कर सकूंगा।

पण्डित ने प्यार से मंदाकिनी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, रहस्य सरल है। इसके समझने के लिए बहुत वेद—शास्त्र पढऩे की आवश्यकता नहीं। प्रकृति के अध्ययन ने एक नवीन मार्ग हमारे सामने उपस्थित किया है। महामुनि कणाद ने अपने वैशेषिक दर्शन में इस मार्ग की बीज—रूप में दर्शन कराने का यत्न किया है। उस बीज का विकास होकर वृक्ष—रूप में में दर्शन कराने का यत्न किया है। उस बीज का विकास होकर वृक्ष—रूप में यह वाममार्ग आपके सामने उपस्थित है। इतना सुन्दर सुलभ और रसमय मार्ग कहीं नहीं है।

जीव प्रकृति की एक विशेष अवस्था का नाम है। जैसे चांद के बढऩे—घटने से ज्वार उठता है, वैसे ही मनुष्य के जीवन—निर्माण के समय उस पर नक्षत्रों का प्रभाव पड़ता है। जिस ऋतु, घड़ी और नक्षत्र में बीजारोपण होता हे, उसमें मनुष्य के शरीर और बुद्धि पर उनका प्रभाव पड़ता है और वैसा ही मनुष्य बन जाता है। इसमें न किसी पूर्व जन्म की आवश्यकता है न पूर्व—जन्म के फल की।

न स्वर्गों नापवर्गो वा नैवात्मा पारलौकिका।
नैव वर्णाश्रमादीनां किया फलदायिका।।

जब पूर्व जन्म नहीं तो भविष्य के जन्म की भी आवश्यकता नहीं। यह संसार और उसमें यह जन्म ही सब कुछ है इसी को सुखमय बनाने का यत्न करना कत्र्तव्य है।

सब लोग एक ही परिस्थिति में उत्पन्न नहीं होते, इस कारण सब एक समान सफल नहीं हो सकते। इस पर भी जो इस जीवन को सुखमय बनाने में संलग्न हो जाते है, वे अपनी शक्तियों का अधिक—से—अधिक लाभ उठाकर अधिक—से अधिक सुख—संचय करते हैं। भावी—जन्म न किसी ने देखा है न इसका प्रमाण है। कुछ चतुर जनों ने संसार को मूर्ख बनाने के लिए इस अति रहस्यमय गल्प का निर्माण किया है—

इह लोकात् परो नान्य: स्वर्गास्ति नरका: न च।
शिवलोकादयो मूढ़ै: कल्पयन्तेन्ये प्रतारकै:।।

श्रीमान समझे हैं कुछ।

श्रवण किया है इस पर मनन करूंगा और यदि समझ पाया तो कार्यान्वित करने में लग जाऊंगा।

एक ब्राह्मण का आशीर्वाद श्रीमान के साथ है।

तत्पश्चात् कुछ विचारकर पण्डित नाकेश ने कहा एक वस्तु और दिखाता हूं शायद वह श्रीमान की सेवा के योग्य हो सके।
(वाममार्ग उपन्यास का एक अंश)