दो लहरों की टक्कर

मुसलमानी राज्य से हुए हिन्दुस्तान के विक्षुब्ध मानस—सरोवर में अंग्रेज के आने पर शान्ति स्थापित हो गयी थी।
इस प्रशान्त वातावरण में लार्ड मैकाले ने एक तरंग उत्पन्न की। यह तरंग थी लार्ड मैकाले द्वारा चलाई अंग्रेजी शिक्षा—पद्धति, जो धीरे—धीरे समाज को अपने लपेट में लेती जा रही थी। ब्रह्म—समाज उस तरंग की लपेट में आ चुकी थी।
परन्तु मथुरा के एक प्रज्ञा—चक्षु वृद्ध संन्यासी ने भी एक तरंग उत्पन्न कर हिन्दुस्तानी मानस—सरोवर में हलचल उत्पन्न कर दी थी। यह तरंग एक लंगोटघारी संन्यासी दयानन्द के रूप में कलकत्ता पहुंची और उसकी मैकाले साहब से उत्पन्न प्रबल तरंग से टक्कर हो गयी।

इस टक्कर का दृश्य बाबू केशवचन्द्र सेन की कोठी पर 9 जनवरी सन् 1873 को उपस्थित हुआ। स्वामी दयानन्द सरस्वती प्रथम बार भगवे कौशेय वस्त्रों में वहां पधारे। कलकत्ता के ब्रह्म—समाज के प्रसिद्ध कार्यकर्ता एंव नेतागण भी वहां उपस्थित थे। स्वामी जी वहां तीन बजे मध्याह्रोत्तर पहुंचे थे।

स्वामी जी ने बहुत ही संक्षेप में अपने कार्य की रूप—रेखा वर्णन कर दी। उन्होंने कहा, मैं वेदों को ईश्वरीय ज्ञान मानता हूं। इनमें सब सत्य विद्याओं का मूल उपस्थित है और इनमें सत्य के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है। ऐसा मेरा मत है। वेदानुसार मानव—लिखे ग्रन्थ हैं ब्राह्मण, दर्शन—शास्त्र और ग्यारह उपनिषद्। इनको मैं आर्ष—ग्रन्थ मानता हूं। अन्य ग्रन्थ वेदानुकूल होने से ही माननीय है।

हिन्दू समाज में बहुत सी कुरीतियां घुस आयी है। मैं उन कुरीतियों को, वेदानुकूल न होने से, हिन्दू समाज का अंग नहीं मानता। उनको हटाने के लिये सदैव तत्पर रहता हूॅं।

मैं चाहता हूं कि इस देश में बसे सब लोग सत्य मत को मानें और परस्पर मैत्री—भाव से रहते हुए सुख तथा शान्ति का सुख—भोग करें।

मेरा किसी से द्वेष नहीं। असत्य और अधर्म से ही मेरा विरोध है और इसका खण्डन मैं प्रेमपूर्वक वार्तालाप द्वारा करना चाहता हूं।

ब्रह्म—समाज का साहित्य मैंने सुना है। इसके विषय में मेरा केवल मात्र यह कहना है कि संसार में भले लोग सब देशों में रहते हैं। सब मत—मतान्तरों में भी सत्य और हितकर बातें हैं। वे सब भलाई की हितकर एंव सत्य बातें वेदों से ही उनके देश अथवा मतों में गयी है। उनमें बहुत कुछ मिथ्या और भ्रममूलक मिलावट है। अत: मेरा यह आग्रह है कि सत्य के मूल स्रोत वेदों को ही मानना कल्याणकारी हो सकता है।

इस वक्तव्य के उपरान्त स्वामी जी से प्रश्न पूछे जाने लगे। अंग्रेजी ढंग के कोट, पतलून, नैक्टाई, कालर पहने एक व्यक्ति ने पूछ लिया, वेदों में भी तो बहुत अंट—शण्ट बातें लिखी हैं।

बताइये, कौनसी बात आपको अण्ट—शण्ट प्रतीत हो रही है?

अंग्रेजी सूटधारी व्यक्ति ने कहा — देखिये, यजुर्वेद के तेइसवें अध्याय का बाईसवां मन्त्र है।
यकासको शकुन्तिकाहलगिति वंचति।
आहन्ति गमे पसो निगल्गजीति धारका।।
इसका अर्थ है— अध्वय्र्वादय: कुमारीपत्नीभि: सह सोपहासं संवदन्ते। अङ्गुल्यां योनिं प्रदेशयत्राह, स्त्रीणां शीघ्रगमने योनौ हलहलाशब्दो……।

स्वामी जी ने हाथ के संकेत से प्रश्नकर्ता को रोक कर कहा, यह आप किसी वाममार्गी ग्रन्थ को पढ़ कर आ गये है? यह महीधर का भाष्य हैं वह प्रामाणिक नहीं और न ही महीधर के भाष्य में तथा वेद मन्त्र में किसी प्रकार का सामंजस्य प्रतीत होता है। इस मन्त्र का अर्थ इस प्रकार है—

यकासको उस राजा को कहते हैं जो कि तानाशाह हो। अकेला ही सब कुछ करने की इच्छा रखता हो। ऐसे राजा की प्रजा शकुन्तिका भूमि पर हल चलाने के समान पीडि़त होती है। ऐसी प्रजा उक्त राजा से दु:खी होती है। और पीडि़त होती है। अभिप्राय यह कि ऐसा राजा नहीं होना चाहिये। आपने मिथ्या अर्थ बताये हैं।

अब एक अन्य ने पूछ लिया, महाराज! इस विषय में आपका क्या कहना है—
अष्टवर्षा भवेद् गौरी नववर्षा च रोहिणी।
दशवर्षा भवेत्कन्या तत ऊध्वं रजस्वला।।
माता चैव पिता तस्या ज्येष्ठो भ्राता तथैव च।
त्रयस्ते नरकं यान्ति दृष्ट्वा कन्यां रजस्वलाम्।।

स्वामी जी ने कह दिया, यह किसी मूर्ख व्यक्ति का बनाया हुआ श्लोक है। यह मान्य नहीं। इसके विपरीत मनु महाराज ने यह कहा है।
त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत कुमार्युतुमती सती।
ऊध्र्व तु कालादेतस्माद्विन्देत सदृशं पतिम्।।

वेद में यह लिखा है कि लड़की जब गर्भ धारण करने के योग्य हो जाये तब वह पति को प्राप्त हो।
इस गोष्ठी में राजा शौरीन्द्र मोहन और उनके दोनों भाई तथा घर की स्त्रियां आयी हुई थी। स्त्रियों के बैठने के लिये स्थान एक ओर पृथक में बनाया गया था। नलिनी राजा साहब के पीछे बैठा था। सबके बैठने के लिये कुर्सियां लगायी गयी थीं और स्वामी जी के लिये एक ऊंचे मंच पर चौकी थी और उस पर दरी तथा कालीन बिछाया गया था।

एक घण्टा—भर के प्रश्नोत्तरों के उपरान्त केशवचन्द्र जी ने स्वामी जी का तथा अन्य वहां पधारने वालों का धन्यवाद करते हुए कहा, हम शीघ्र ही कलकत्ता के प्रतिष्ठित नागरिकों की एक सभा इस प्रयोजन से बुलाने वाले हैं कि कलकत्ता में स्वामी जी की देख—रेख में एक वैदिक पाठशाला स्थापित की जाये।
स्वामी जी के राजधानी में आने को यहां की सरकार बहुत रुचिपूर्वक देख रही है। इससे मुझे बहुत अच्छे परिणामों के निकलने की आशा है।

इस गोष्ठी में लगभग एक सौ पुरुष और लगभग इतनी ही स्त्रियां उपस्थित थीं।

गोष्ठी के उपरान्त स्वामी जी को एक पृथक् कमरे में ले जाकर बैठा दिया गया और उनके पीने के लिये दूध लाया गया। स्वामी जी ने कहा मैं इस समय दूध नहीं लेता। अब अपने शिविर पर जाऊंगा और शौचादि तथा सन्ध्योपासना से निवृत्त होकर दूध लूंगा।

जिस कमरे में स्वामी जी को बैठाया गया, राजा साहब शौरीन्द्र मोहन, नलिनी, गजेन्द्र, विभूति देवी, पूर्णिमा तथा कामिनी आदि साथ ही सेन बाबू के घर की स्त्रियां वहां आ गयीं। एक प्रकार की पारिवारिक गोष्ठी हो गयी। सेन बाबू ने कहा मेरे एक मित्र रैवरैण्ड ब्राउन हैं। वे कलकत्ता के लाट पादरी हैं। वे भी आपसे मिलने के लिये आये हैं। इस पारिवारिक—समारोह के उपरान्त कुछ मिनट आप उनके लिये भी दें।

स्वामी जी की दृष्टि नलिनी पर पड़ी तो पूछने लगे, सरकार बाबू! विवाह किया है अथवा नहीं?
महाराज! अभी नहीं। कदाचित् अब विवाह नहीं होगा।

अरे! किसलिये?
मुझे कुछ ऐसा ज्ञात हुआ है कि मैं सुषुप्ति अवस्था में स्वप्न ले रहा था। उस दिन आपके स्थान से जाने के उपरान्त नींद खुली और देखा कि वह तो स्वप्न मात्र था। अब मैं जाग्रत अवस्था में हूं और विवाह से अधिक आवश्यक एक अन्य प्रयोजन सामने आ गया है।

तब तो नलिनी! तुम बहुत भाग्यशाली हो जो तुम्हारी आंखें इस आयु में ही खुल गयी है; परन्तु अब जीवन का क्या प्रयोजन दिखायी देने लगा है? कहीं ऐसा न हो कि यह भी स्वप्न हो और पहली अवस्था ही जाग्रत हो।
देखो मैं तुम्हें समझाता हूं। स्वामी शंकराचार्य मतावलम्बी वेदान्ती यह मानते हैं कि मनुष्य स्वप्नवत् इस संसार को सत्य मानने लगता है। सत्य यह है कि यह स्वप्नवत् मिथ्या है। वास्तव में यह मिथ्या सत्य है और इसे मिथ्या मानने वाले सोये हुए स्वप्न देख रहे हैं। ये लोग कहते हैं – ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापर:।
मुझे तो यह मानने वाले स्वप्न देख रहे प्रतीत होते हैं।
श्रीमन्मध्वमते हरि: परतर: सत्यन्जगत्तत्वतो,
भेदो जीवगणा हरेननुचरा नीचोच्चभावंगता:।
तो यह जगत् स्वप्नवत् नहीं है? नलिनी ने विस्मय में पूछा।
यह तो प्रत्यक्ष है। इसके ये भिन्न—भिन्न रूप क्षर हैं। मूल प्रकृति अर्थात् जिससे यह सब दिखायी देने वाला बना है, अनादि और अक्षर है।

तो यह सत्य है?

निस्सन्देह। यदि तुम विवाह करोगे तो वह भी सत्य ही होगा। संसार में रहते हुए संसार का भोग सत्य और हितकर है।
पर महाराज! आपने संन्यास क्यों ले लिया है? संसार सत्य है तो निस्सन्देह संन्यास मिथ्या है।

यह कैसे हो गया? राजा साहब पुरुष हैं। माता जी स्त्री है। स्वामी जी ने शौरीन्द्र मोहन और विभूति देवी की ओर संकेत कर कह दिया, इससे यह कैसे सिद्ध हो गया कि यदि राजा साहब सत्य हैं तो माता जी मिथ्या हैं। इसी प्रकार गृहस्थ सत्य है तो संन्यास भी सत्य है। जीवन के दो पक्ष हैं। मैंने संसार के भोगों से पूर्व—जन्म में ही, निवृत्ति प्राप्त कर ली प्रतीत होती है। इसी कारण मैं इस जन्म में इस ओर रुचि नहीं रखता। परन्तु इसका अर्थ यह कैसे हो गया कि जिस वस्तु में मेरी रुचि नहीं वह मिथ्या है?

शौरीन्द्र मोहन स्वामी जी की तर्क—शक्ति को देख चकित रह गया था। साथ ही बात इस प्रकार सतर्कता से होती थी कि उसमें छिद्र दिखायी नहीं देते थे।

पर महाराज! नलिनी ने आगे निवेदन कर दिया, मेरे लिये तो समस्या ज्यों की त्यों ही बनी रही। मैं गृहस्थ में रहूं अथवा संन्यास लूं?

जिसमें तुम्हारा चित्त करे। गृहस्थ और सन्यास में अन्तर नहीं है। दोनों आश्रमों में रहते हुए मनुष्य लोक—कल्याण का कार्य कर सकता है। उसे फिर मोक्ष की प्राप्ति भी सिद्ध हैं।

मोक्ष—प्राप्ति में स्वामी जी का कहना था, यह मानव जन्म ऊपर चढऩे का एक साधन है। गृहस्थ, संन्यास और फिर विवेक तथा मोक्ष। ये पग—पग कर चलने की बातें हैं। जो प्रथम पग न चल कर द्वितीय पग चलते हैं, वे लम्बी छलांग न लगा सकने पर गिर भी सकते हैं।

हां, एक बात और है वह है कर्म। आत्मा किसी भी पग पर कर्महीन नहीं हो होता। जीव कर्महीन तो केवल प्रलय काल में होता है। उस काल में वह सोया रहता है। अन्य काल में वह जाग्रत होता है और कर्म करता रहता है। कर्म भिन्न—भिन्न सोपानों पर भिन्न—भिन्न है। अर्थात् मोक्षावस्था में भी कर्म होते हैं।

यह सत्य नहीं कि मनुष्य कर्महीन होने से मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

इस पर केवशचन्द्र बाबू ने पूछ लिया, कर्म फल देता है। यदि मोक्ष पद पर भी जीव कर्म करता है तो वह कर्म—फल के बन्धन में बंध जायेगा

यह बात सत्य नहीं। कारण यह है कि कर्म मरण—जन्म में नहीं बांधता। यह फल की कामना है जो बांधती है। निष्काम भाव से किया कर्म मनुष्य को किसी भी स्थिति से नहीं बांधता।

मोक्षावस्था में जीव को सब—कुछ जो है अथवा हो सकता है, वह प्राप्त हो जाता है। अन्य कुछ प्राप्त नहीं रहता। अत: कामना नहीं होती और बन्धन में बंधने की सम्भावना अति न्यून होती है।

सेन बाबू हंस पड़े। हंसकर वह पूछने लगे, महाराज इस न्यून के क्या अर्थ है?

न्यून का अभिप्राय पूर्ण नहीं। सब—कुछ प्राप्त होने पर भी जीव में उत्कण्ठा रहती है कि कुछ और है और कभी कभी वह उत्कण्ठा उसे इस संसार में पुन: आ जाने पर विवश कर देती है।

देखिये, सेन महाशय! मोक्ष का परम पद ज्ञानवान होने से होता है। यह ज्ञान जीव का नैसर्गिक गुण नहीं। यह उसकी उत्कण्ठा अर्थात् इच्छा का ही फल है। उत्कण्ठा ज्ञानवान होने पर भी बनी रहती है। अत: पूर्ण पर ब्रह्म का सान्निध्य प्राप्त होने पर भी उत्कण्ठा के कारण जीव पुन: संसार में आ, प्रकृति का भोग करने लग जाता है और वह पुन: इस ब्रह्म—चक्र में फंस जाता है।

यह इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि ज्ञान संस्कारों की देन है। संस्कारों का स्थान अर्थात् मन मोक्ष अवस्था में साथ नहीं रहता। अत: मोक्षावस्था में नवीन ज्ञान प्राप्त नहीं होता। ज्ञान रूपी संस्कार काल व्यतीत होने पर झड़ते चले जाते हैं। और समय पाकर मन्वन्तर अथवा कई मन्वन्तरों के उपरान्त ज्ञान कम होने से ही उत्कण्ठा जाग्रत हो पड़ती है तथा जीव प्रकृति के भोगों की लालसा करने लगता है। वह पुन: इस लोक में अथवा अन्य किसी लोग में आ जाता है और पुन: हंस के समान नवीन भंवर में फंस जाता है।

इस सबका प्रमाण क्या है? सेन बाबू का अगला प्रश्न था।

प्रमाण तीन प्रकार के हैं — प्रत्यक्ष अनुमान एंव शब्द। इन तीनों प्रमाणों से यही सिद्ध होता है। इस ब्रह्माण्ड में कुछ भी नहीं जो इनसे सिद्ध नहीं हो सकता।

सांख्या दर्शन में कहा है—
तत्सिद्धौ सर्वसिद्धेर्नाधिक्यसिद्धि:।
इनसे ही सब—कुछ सिद्ध होता है। इनसे अधिक सिद्ध होने को कुछ नहीं। इसी प्रकार प्रत्पक्षान्तर्गत ही योग से सिद्धि को गिनाया हैं

योगिनामबाहा्रप्रत्यक्षतवान्न् दोष:।।
योगीजन जो कुछ प्रत्यक्ष देखते हैं, उसमें दोष नहीं होता। अनुमान प्रमाण के आधार पर ही तो दर्शनशास्त्र वास्तविक सत्य का दर्शन कराते हें। अनुमान का दूसरा नाम युक्ति है। इसे सत्तवस्थ बुद्धि से किया गया तर्क भी कह सकते हैं।
और शब्द प्रमाण भी है। ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के प्रथम दो सूक्त के मन्त्रों में यह लिखा है कि मुक्त आत्मायें भी ईश्वर की कृपा से पुन: माता—पिता को प्राप्त होती हैं।

सेन बाबू ने कहा, आजकल के दार्शनिक आपकी युक्तियों को नहीं मानेंगे। न ही उनका वेदों पर विश्वास है।
ठीक है। पहली श्रेणी के छात्र को उच्च कक्षाओं की बात पढ़ाने से पूर्व पहले उनमें उस कक्षा में बैठने की योग्यता उत्पन्न करनी चाहिये ?। वह योग्यता कैसे उत्पन्न होगी?

योग—साधना से। इससे बुद्धि निर्मल होती है और बुद्धि ही जीव की उत्कण्ठा को मोक्ष की ओर अभिमुख करती है।
इस प्रकार इस गोष्ठी का उपसंहार स्वामी जी ने स्त्रियों को उपदेश में किया। उन्होंने कहा, Óभगवान् कृष्ण ने कहा है कि अपने नियत कर्म को करता हुआ प्राणी प्रत्येक प्रकार की सिद्धि प्राप्त कर सकता है। वेद का भी यही मत है। आप सब अपने स्त्री—धर्म का पालन करती हुई ज्ञान—प्राप्ति और मोक्ष—प्राप्ति के लिये यत्न कर सकती है।
मेरी प्रबल इच्छा है कि पुरुषों, और स्त्रियों के लिये भी वेद पढ़ाने का प्रबन्ध हो। यह यहां के श्रीमा और धर्माभिमुख लोग कर सकते हैं।’

इस प्रकार गोष्ठी समाप्त होने पर सेन बाबू स्वामी जी को अपने निवास के बैठकघर मे ले गये। वहां एक गौरवर्णीय व्यक्ति लम्बा चोगा पहने, सिर से नंगा, परन्तु पांव में बहुत चमचमाता हुआ जूता धारण किये बैठा था। इस व्यक्ति की लम्बी दाढ़ी और मूछें भूरे रंग की थीं। परन्तु सिर के बाल कटे थे। कमर पर चोगे के ऊपर एक रस्से के समान कमरबंध था।

स्वामी जी के भीतर आते ही वह व्यक्ति उठ खड़ा हुआ और हाथ जोड़ स्वामी का अभिवादन करने लगा।
स्वामी जी ने भी हाथ जोड़ नमस्ते कही और दोनों बैठ गये। सेन बाबू उनके समाने बैठ गये। सेन बाबू ने परिचय कराया, डाक्टर रैवरैण्ड ब्राउन आर्च विशप आफ कलकत्ता। और डाक्टर ! ये है पण्डित स्वामी दयानन्द सरस्वती। वेदों के महान् विद्वान और हिन्दू—समाज के सुधार के पक्ष में संघर्ष करने वाले। इनके सुधार की बातें सुनकर हिन्दू—समाज के रूढि़वादी पण्डित स्वामी जी को गालियां देते हैं। हमारे ब्रह्म—समाज के सिद्धान्तों से इनकी बहुत दूर तक सहमति है।
परन्तु स्वामी जी, लार्ड पादरी महोदय पूछने लगे, हमने सुना है कि आप ईसा मत को भी मिथ्या मानते है?

मैने ऐसा कभी नहीं कहा। मेरा कहना यह है कि सब मत—मतान्तरों में कुछ—कुछ सच्चाई उपस्थित है। वह सच्चाई वेद से ही उनमें गयी है। उस सच्चाई के साथ मनुष्य विचारित बहुत सी बातें जो गलत हैं, मिल गयी हैं। अत: सत्य असत्य का निर्णय कर सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करना चाहिये। वेद एक कसौटी है जिस पर कस कर सत्य और असत्य का निर्णय किया जा सकता है।

‘परन्तु संसार में बहुत लोग है जो वेद को ईश्वरीय ज्ञान नहीं मानते।’

इस बात को सिद्ध किया जा सकता है कि वेद सत्य विद्याओं की पुस्तक है। इसको छोड़कर भी प्रत्येक विषय को युक्ति द्वारा भी सिद्ध किया जा सकता है। युक्ति करने का यन्त्र बुद्धि है अत: बुद्धि को निर्मल और सबल करने के लिये कुछ उपाय हैं। उनको प्रयोग किया जाना चाहिये। हमारे दर्शन—शास्त्र इसका ज्ञान देते है।

परन्तु पहले उद्देश्य का विश्वास हो, तभी तो उसके साधनों को बटोरा जायेगा। उद्देश्य है वेदों को ईश्वरीय ज्ञान प्रामाणित करना।

जी नहीं। उद्देश्य है सत्य ज्ञान को प्राप्त करना। सत्य ज्ञान की प्राप्ति में वेद भी साधन हैं। इनके अतिरिक्त भी साधन हैं। प्रत्यक्ष से भी हम वेदों की प्रामाणिकता सिद्ध कर सकते हैं।

कैसे ?

आप ईश्वर को मानते हैं अथवा नही? यदि नहीं तो पहले ईश्वर को सिद्ध करना होगा। ईश्वर के सिद्ध हो जाने पर यह प्रश्न उपस्थित होगा कि उसने मनुष्य को ज्ञान दिया है अथवा नहीं? यदि नहीं दिया तो वह अन्यायी सिद्ध होगा। इससे यह प्रत्यक्ष है कि ज्ञान दिया है। यह भी हम जानते हैं कि मनुष्य को जब तक लिखाया—पढ़ाया न जाये, तब तक मनुष्य अज्ञानी रहता है। अत: ज्ञान प्राप्त करने का साधन सब मनुष्यों की पहुंच में लाने के लिये उस दयालु परमात्मा के ज्ञान का उपदेश आदि सृष्टि में अथवा मानव—सृष्टि के होते ही दिया गया मानना पड़ेगा। वेद सबसे प्राचीन ग्रन्थ हैं। इससे

यह स्पष्ट है कि ये ईश्वरीय ज्ञान के ग्रन्थ हैं।
तो आप मानते है कि वेदों में पूर्ण ज्ञान है।

पूर्ण तो केवल मात्र परमात्मा ही है। हाँ, मनुष्य को जो कुछ जानना आवश्यक है, वह सब वेद में है। उस सबका भी मूल मात्र ही है। उस मूल का ही, मनुष्य बुद्धि के प्रयोग द्वारा विस्तार करता है।

पादरी महोदय ने बात बदल दी। वह कहने लगे, मैं कल आपके विषय में बाइसराय महोदय से बात कर रहा था। इस पर उन्होंने इच्छा व्यक्त की है। कि आप उनको दर्शन दें।
मुझे उनसे मिलकर बहुत प्रसन्नता होगी।

तब ठीक है। मैं उनसे मिलकर समय निश्चय कर आपको उनके पास ले चलूंगा।

परन्तु मैं तो अंग्रेजी समझ और बोल नहीं सकता।

मैं दुभाषिये के रूप में कार्य करूंगा।

इस दिन का कार्यक्रम देानों के दृष्टिकोण से सफल रहा। बाबू केशवचन्द्र सेन यह विचार कर रहे थे कि वे स्वामी दयानन्द को अपने दृष्टिकोण में पूर्णतया ले आने में सफल हो रहे हैं। स्वामी जी समझ रहे थे कि वे देश की राजधानी के बुद्धिशील लोगों पर अपनी छाप लगा रहे हैं।

वास्तविकता यह नहीं थी।

(दो लहरों की टक्कर नामक उपन्यास का अंश)