विज्ञान और तकनीकी

वैद्य गुरुदत्त की यह १२५वीं जन्मशती है। इस अवसर पर उनका स्मरण करने के लिए उनकी कुछेक प्रमुख रचनाओं के कुछ अंश हम इस अंक में प्रकाशित कर रहे हैं। वैद्य गुरुदत्त की रचनाएं अधिक से अधिक लोग पढ़ें और उससे ज्ञानलाभ करें, यही हमारी इच्छा है।
-संपादक

वर्तमान का विज्ञान भारतीय दृष्टिकोण से सामान्य ज्ञान ही है। अर्थात यह कार्य जगत का ही वर्णन है। भारतीय दृष्टिकोण से तो विज्ञान कार्य जगत के मूल पदार्थों का वर्णन है। इसे वर्तमान युग के वैज्ञानिक या तो अनावश्यक समझकर छोड़े हुए हैं अथवा उन तक अभी इनकी पहुंच नहीं है। दूसरे शब्दों में वर्तमान विज्ञान केवल मात्र प्रकृति के अष्टधा स्वरूप के गुण, कर्म और स्वभाव तक ही सीमित है।

इस पर भी वर्तमान ज्ञान विज्ञान का, जो भी इसे कहें, बहुत विस्तार हुआ है। अभिप्राय यह है कि यह विकास ‘टैक्नोलॉजी’ (तकनीक) में हुआ है। विशुद्ध ज्ञान (क्कह्वह्म्द्ग स्ष्द्बद्गठ्ठष्द्गह्य) में बहुत ही कम उन्नति हुई है। विज्ञान में तो सैद्धान्तिक रूप में बहुत कम प्रगति हुई है। हां, विज्ञान के प्रयोग में बहुत उन्नति हुई है। दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि, विज्ञान के प्रयोग की कला में विशेष प्रगति हुई है।

प्रकृति के आठ प्रकार के परिणामों के अनेकानेक प्रयोगों का ढंग सीखा गया है और उसका प्रयोग किया गया है। प्रकृति के उन आठ रूपों के अतिरिक्त कुछ भी प्रतीत नहीं किया जा सका। यह ठीक है कि ज्ञान को भली प्रकार समझे बिना उसका प्रयोग सम्भव नहीं। अत: वर्तमान युग के वैज्ञानिकों ने विशुद्ध विज्ञान को जितना भी समझा है उसका भरपूर प्रयोग किया है। कदाचित यह प्रयोग सीमा से अधिक हो रहा है। इसके विषय में पुस्तिका के अन्त में, उपसंहार में लिखा गया है।

यहां केवल इतना बताने से ही प्रयोजन है कि विज्ञान का प्रयोग(टैक्नोलॉजि) कला कहलाती है। भारतीय वैज्ञानिकों ने, हमारे विचार से, विशुद्ध विज्ञान को कुछ अधिक जानते हुए भी कला में प्रगति नहीं की।

एक उदाहरण दे दें तो अधिक ठीक रहेगा। पृथिवी का एक धर्म है। वह अन्य वस्तुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है। इसें भू—आकर्षण (द्दह्म्ड्ड1द्बह्ल4) कहते है। एक प्रकार की धड़ी बनायी जाती है। इसमें एक भारी गोला एक जंजीर से लटका रहता है। उस गोले के नीचे गिरने को नियमबद्ध करने के लिए उसकी गरारी पर एक खटका लगा रहता है। इससे जंजीर से लटक रहा गोला एक नियमिल गति से नीचे गिरता है और इससे जंजीर खिंचती है जो धड़ी के कल पुर्जों को चलाती है। इसे ग्रेविटेशनल क्लॉक कहा जाता है। इसमें सिद्धांत तो यह है कि पृथिवी सब पदार्थो को अपनी ओर खींचती है और कलाकार ने इस सिद्धांत का प्रयोग कर धड़ी का निर्माण कर दिया है।

एक अन्य उदाहरण ले सकते हैं। ऐटम का अस्तित्व, उसके द्रव्यमान, आकार और विस्तार का अनुमान हो विज्ञान है। ऐटम को तोड़ सकना कला है। ऐटम पर न्यूट्रोन से बमबारी की जाती है और वह जब टूटता है तो उसमें से प्रकाश और ताप निकलता है। इससे ऐटमबम्ब का निर्माण किया गया है। ऐटम टूट सकता है; क्योकिं यह छोटे—छोटे टुकड़ों से बना है। यह जानना तो विशुद्ध विज्ञान है, परन्तु इसे तोडऩे का ढग़ ‘टैक्नोलॉजि’ (कला) हैं। इसके लिये एक प्रकार की भट्टी बनायी गयी है जिसे ‘रिऐक्टर’ कहते हैं। यह भी कला है।

विशुद्ध ज्ञान का अर्थ है इस ब्रह्राण्ड के रहस्यों को समझना। इसमें सन्देह नहीं कि इसमें भारतीय वैज्ञानिकों ने बहुत उन्नति की थी। यह नहीं कि प्राचीन वैज्ञानिक प्रकृति के रहस्यों का उपयोग करते ही न हों। चिकित्सा शास्त्र में, ज्योतिष ज्ञान में, मन और बुद्धि के विकाश में भारतीयों ने बहुत उन्नति की थी। इस उन्नति की झलक आज तक भी विद्यमान है।

इस पर भी विज्ञान में अति उन्नत भारतीय लोग उस विज्ञान के प्रयोग में पिछड़े हुए थे। क्यों? यह ज्ञान विज्ञान का विषय नहीं, प्रत्युत इतिहास का विषय है। इस कारण इसकी विवेचना इस पुस्तक में नहीं की गई है।

अनुसन्धान के उपाय
कुछ लोग कहते हैं कि भारतीयों के पास ऐसे साधन नहीं थे जिनसे ये जगत् के रहस्य को जान सकते। अत: जो यह कहा जाता है कि भारतीयों को बहुत कुछ पता था, यह सत्य है। साधन थे अथवा नहीं थे, यह एक पृथक प्रश्न है। यह सत्य है कि प्रकृति और जगत के रहस्यों को भारतीयों जानते थे। कुछ एक का वर्णन हम इस पुस्तक में करेंगे। यहां उन साधनों का ही वर्णन करेंगे। प्राय: प्रकृति के रहस्य जानने के लिए बहुत बड़े बड़े यन्त्रों की आवश्यकता नहीं होती। भाप से देगची के ढकने को हिलता देख भाप के कार्य करने की शक्ति का ज्ञान हो गया और फिर इस ज्ञान से भाप का इन्जन बना और लकड़ी तथा कोयले की शक्ति का प्रयोग करने का ढग़ निकल आया। बड़े—बड़े कारखाने और रेलगाडि़ेयों चलन लगी।
एक गडरिये की लकड़ी से घास के तिनके के चिपकने से विद्युत के रहस्य का उद्घाटन हुआ। इसी प्रकार उड़ती पतंग को देख हवाई जहाज निर्माण करने का विचार बन गया। इसमें रहस्य यह था कि बहती हवा वस्तुओं को आकाश में उड़ा ले जाती है अर्थात असमें वस्तुओं को ऊपर उठाये रखने को सामथ्र्य होती है। अत: यदि ध्यानपूर्वक देखा जाये तो पता चलेगा कि विशुद्ध साइस को समझने के लिए प्राय: बहुत ही सरल परीक्षणों की आवश्यकता पड़ी है। परीक्षणों से अधिक परीक्षणों को समझने के लिये मनन की आवश्कता रहती है।

प्रकृति ने अपने रहस्य बहुत छुपा कर नहीं रखें। वे तो प्रकृति के मुख पर ही लिखे मिल जाते हैं। हां उनको देखने के लिये आंखों की आवश्कता हेाती है और समझने के लिए बुद्धि के प्रयेाग की। देखने वालों को बहुत ही सरल सी घटनाओं से गम्भीर रहस्य प्रकट हो जाते हैं। देखकर उनको समझने के लिए बुद्धि की आवश्यकता होती है। बुद्धि का प्रयोग कर, युक्ति करने को ‘लौजिक’ कहते हैं। प्राय: पेचीदा परीक्षण तो प्रकृति के सरल रहस्यों को उपयोगी बनाने में आवश्यक होते हैं।

अवलोकन पहले होता है और उसका अर्थ समझना पीछे की बात है। वास्तव में विज्ञान में उन्नति देखने और समझने से ही सम्बन्ध रखती हैं और ये दोनों बातें मनुष्य के अपने पास ही होती हैं। इसको बाजार से खरीदने के लिए जाना नहीं पड़ता। ये दोनों साधन भारतीयों के पास थे। यही कारण है कि वे प्रकृति के गूढ़तम रहस्यों को जान सके थे। परन्तु उन रहस्यों को मानवोपकारी कामों में प्रयोग करने के लिए कभी कभी अति जटिल उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है।
(स्व अस्तित्व की रक्षा, भाग एक)