धरोहर को जीएं धरोहर के अंग बनें

130 करोड़ के इस देश में कोई न कोई बात रही होगी कि यूनान, मिश्र, रोमां, सब मिट गए जहाँ से, अब तक मगर है बाकी नामों निशां हमारा। हमारे देश में साहस, वीरता, प्रखरता, बुद्धिमत्ता आदि की कोई कमी नहीं रही है। जो कमी रही है, उसे दूर करने के लिए ही भारतीय धरोहर की आवश्यकता है।

डॉ. रमेश पोखरियाल नि:शंक, केंद्रीय मानवसंसाधन मंत्री

वैसे समय में, जब दुनिया में कोई विद्यालय भी नहीं होते थे, तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालय जिस देश में रहे हों, वह वास्तव में देश और उसकी परंपराएं स्वयं एक धरोहर ही हैं। इस धरोहर की रक्षा में जो तन-मन-धन से लगना चाहते हैं, आज वैसे लोगों की ही आवश्यकता है। परिवर्तन के लिए कुछ लोगों की ही आवश्यकता होती है। जैसे शरीर में ढेर सारी हड्डियां होती हैं, जिनके ढांचे से शरीर बनता है, परंतु रीढ़ की हड्डी टूट जाने पर शरीर का अस्तित्व बेकार हो जाता है। ऐसे ही 130 करोड़ के इस देश में कोई न कोई बात रही होगी कि यूनान, मिश्र, रोमां, सब मिट गए जहाँ से, अब तक मगर है बाकी नामों निशां हमारा। हम तमाम थपेड़े खाते रहे, हजारों वर्षों से आक्रमण और सैंकड़ों वर्षों की गुलामी झेली है, परंतु फिर भी हम टिके रहे। हमारे देश में साहस, वीरता, प्रखरता, बुद्धिमत्ता आदि की कोई कमी नहीं रही है। जो कमी रही है, उसे दूर करने के लिए ही भारतीय धरोहर की आवश्यकता है।

मेरा यह व्यक्तिगत लेकिन प्रबल मत है कि दुनिया की सबसे पहली भाषा जिससे सारी भाषाएं निकली हैं, वह संस्कृत ही हो सकती है। यदि दुनिया का पहला ग्रंथ वेद है, वेद से पहले के किसी ग्रंथ का कोई इतिहास नहीं मिलता, और वह वेद देववाणी यानी संस्कृत में हैं तो वह देववाणी संस्कृत दुनिया की पहली भाषा हुई। इसलिए जब मैंने संस्कृत को उत्तराखंड की द्वितीय राजभाषा बनाने की पहल की तो दुनिया 53 देशों ने इसका स्वागत किया और कहा कि संस्कृत वैज्ञानिक भाषा है। जैसी सुनी जाती है, वैसी ही बोली जाती है, वैसी ही लिखी जाती है, जैसी लिखी जाती है, वैसा ही उच्चारण होता है। इसलिए भारत की जो परंपराएं हैं, धरोहर हैं, उन्हें न केवल संरक्षित करने की आवश्यकता है, बल्कि उन पर शोध करने और नवाचार के साथ उन्हें बढ़ाने का समय आ गया है।

हमारे देश की वर्तमान कठिनाई यह है कि हम राम और कृष्ण को तो मानते हैं, परंतु राम और कृष्ण की नहीं मानते। मैं कुछ समय पहले इंडोनेशिया गया था, जोकि दुनिया का सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाला देश है। वहाँ मैंने देखा कि इंडोनेशिया के रग-रग में राम हैं। घटोत्कच की सबसे उत्कृष्ट प्रस्तुति इंडोनेशिया में ही देखा। वहाँ हर दो किलोमीटर की दूरी पर श्रीराम की मूर्ति दिखती है। वहाँ का एक भी ऐसा विश्वविद्यालय नहीं है जहाँ श्रीराम और हनुमान की आदमकद प्रतिमाएं न लगी हों। इंडोनेशिया श्रीराम को अपना आदर्श मानता है। श्रीराम पुरुषोत्तम हैं, क्या हम अपने बच्चे को पुरुषोत्तम बना सकते हैं? वह राम हमारे धरोहर हैं। क्या हम उन्हें अपने अंदर संजो सकते हैं? इन्हें हमें अपने जीवन में धारण करना होगा।

भारत की संस्कृति भारत की धरोहर है, भारत का संस्कार भारत की धरोहर है। भारत की परंपरा और ज्ञान भारत की धरोहर है। इस ज्ञान, परंपरा को हम जीएंगे, अपने मन में लाएंगे, तब हम भी इस धरोहर के एक अंग और अंश बन सकेंगे।