ज्ञान ही भारत की धरोहर है

डॉ. सत्यपाल सिंह, पूर्व केंद्रीय मानवसंसाधन मंत्री


सभ्यता की कहानी यानी स्टोरी ऑफ सिविलाइजेशन नामक पुस्तक के लेखक विल ड्युरैंट ने लिखा है कि सारी दुनिया के ज्ञान का गुरु भारत है। हमारे यूरोप की भाषाओं की जननी संस्कृत है, जो भारतभूमि से निकली है। हाल ही में कोलंबिया विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर शेल्डन पोकॉक ने कहा कि भारत में इस समय जो शिक्षा पद्धति चल रही है, अगर वह कुछ और वर्षों तक चलती रही तो भारतीय ज्ञान-विज्ञान और वांग्मय को समझने वाले लोग कुछ दिनों के बाद मिलेंगे नहीं। यह हमारे सामने बहुत ही गंभीर समस्या है। भारतीय ज्ञान-विज्ञान की परंपरा उतनी ही पुरानी है, जितनी गंगा नदी। जिस प्रकार गंगा का अजस्र स्रोत लाखों-करोड़ों वर्षों से बहता चला आया है, उसी प्रकार भारत के ज्ञान-विज्ञान का अजस्र स्रोत केवल भारतवर्ष मे ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में फैलता आया है। मैथिली शरण गुप्त ने सही ही लिखा है – फैला यहीं से ज्ञान का आलोक सब संसार में, जागी यहीं थी, जग रही जो ज्योति अब संसार में। इंजील और कुरान आदि न थे तब संसार में, हमको मिला था दिव्य वैदिक बोध तब संसार में। दुनिया की सभ्यताओं ने अपने नाम को अमर करने के लिए अनेक उपाय किए। किसी ने महल बनाए, किसी ने दूर्ग बनाए, किसी ने किले बनाए, किसी ने विश्वविद्यालय बनाए, किसी ने पिरामिड बनाए, ईँटो, पत्थरों, मारबलों से, किंतु समय के थपेड़ों ने, आँधी और तूफानों ने, भूकंपों ने इन महलों को गिरा दिया, किलों को ध्वस्त कर दिया, पर भारतीय सभ्यता और संस्कृति का जो महल था, वह ईंट और पत्थरों के अनित्य चीजों से नहीं बना था। वह नित्य यानी हमेशा रहने वाली चीजों से बना था, जिसे हम ज्ञान कहते हैं, जिसे हम शब्द कहते हैं, जिसे हम अक्षर कहते हैं। अक्षर और ज्ञान का कभी विनाश नहीं होता।

यह ज्ञान-विज्ञान ही भारतीय संस्कृति का मूल था। इसलिए हजारों वर्षों तक नहीं, लाखों-करोड़ों वर्षों से यह सभ्यता संस्कृति चली आई है। हमारे विद्यालयों और महाविद्यालयों में भारत को पाँच हजार वर्ष पुरानी सभ्यता पढ़ाने वाले लोग भारत के बारे में कुछ नहीं जानते। हमारे पंडित जब संकल्प करवाते हैं तो वे हमारी प्राचीनता को भी स्मरण करते हैं – एक अरब, 97 करोड़, आठ लाख, 53 हजार वर्ष, इस प्रकार एक-एक दिन गिनते आए हैं वे और हम कहते हैं कि हम केवल पाँच हजार वर्ष पुराने हैं। जो लोग यह कहते थे कि यह दुनिया केवल 4004 ईसा पूर्व में बनी है और यह केवल छह हजार वर्ष पुरानी है, वे तो कब कहने लगे हैं कि यह सही नहीं है, यह दुनिया लाखों-करोड़ों वर्ष पुरानी है। हमने उस प्राचीन काल से ही कहा है – एतद्देश प्रसूतस्य सकाशाददग्र जन्मन:, स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्व मानवा:। पूरी दुनिया के लोग आओ, अगर धर्म के बारे में, चरित्र के बारे में, शिक्षा के बारे में, अपने जीवन को सुखी बनाने के बारे कुछ सीखना चाहते हो तो भारतीय ऋषियों के चरणों में आओ।

गोस्वामी तुलसीदास ने रामराज्य का वर्णन किया है। उसमें उन्होंने लिखा है कि दैहिक, दैविक भौतिक तापा, रामराज काहू नहीं व्यापा। रामराज में किसी प्रकार का दुख नहीं था। वे आगे लिखते हैं – करहीं स्वजन परस्पर प्रीति, चलेहीं, स्वधर्म निरत, श्रुति, नीति। श्रुति यानी वेद, नीति और प्रीति, तीनों थे। हमें फिर से वेदों को जानना होगा। वेदों को हम जब तक पढ़ते रहे, तब तक यह देश वीरता, वैभव और ज्ञान में दुनिया का सिरमौर बना रहा। इसी भारतीय धरोहर को हमें संभाल कर रखना है।


भारत स्वयं एक धरोहर है

स्वामी अवधेशानंद गिरी

ऋग्वेद में कहा गया है – अग्निमीळे पुरोहितं। पहला शब्द ही अग्नि यानी ऊर्जा यानी शक्ति है। इस धरती को प्रतिशत, दशमलव, शून्य आदि का अवबोध जिसने कराया है, वह भारतवर्ष है। प्रतिशत, अंक और उसकी गणनाएं कोई जानता नहीं था। काल की गणना करना सिखाया। अन्न का ज्ञान दिया। लगभग 47 सभ्यताएं कालविशेष में शीर्षस्थ अथवा चर्चित रहीं, परंतु वे सभी समाप्त हो गई हैं। परंतु भारतीय सभ्यता और विचार चूँकि वैदिक सभ्यता और विचार है, इसलिए सनातन है, शाश्वत है, समीचीन है, प्रत्येक समय में नूतन और सामयिक है, यह चिरजीवी है, क्योंकि यह ईश्वरीय संस्कृति है। इसे और समझना हो तो स्वाध्याय की ओर बढ़ें। उपनिषदों को पढ़ें, गीता को टटोलें। योग वाशिष्ठ को देखें। संभव हो तो ब्रह्मसूत्रों को पढ़ें, जिसका पहला ही सूत्र है – अथातो ब्रह्म जिज्ञासा। आओ, ईश्वर को जानें। ईश्वर को जानने का विचार यानी स्वयं को समझने का विचार। यह विचार भारत ने दिया है। स्वयं को जानने का प्रश्न मनुष्य के सामने आया पहला प्रश्न है। यही पहली पहेली और शंका है कि मैं कौन हूँ। इसका उत्तर भारतीय शास्त्रों में है।

ब्रह्मसूत्र का चौथा सूत्र है – तत्तु समन्वयात्। हमारी संस्कृति समन्वय की संस्कृति है। पश्चिम के विद्वान काफी पहले से कहते रहे हैं कि मनुष्य एक सामाजिक पशु है, पर भारत कहता है कि मनुष्य चिरजीवी है, सनातन है, शुद्ध है, प्रबुद्ध है और वह ईश्वर का ही अंश है। अहं ब्रह्मास्मि, प्रज्ञानं ब्रह्म, अयमात्मा ब्रह्म। यह पश्चिम और हमारे ज्ञान में फर्क है।