डॉ. केदारनाथ प्रभाकर
आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व जब बौद्धों के प्रभुत्व के फलस्वरूप भारत के क्षत्रिय गृहस्थ छोड़कर विहारवासी होने लगे तब क्षात्रवृत्ति करने वाले वीरों से यह देश खाली होना शुरू हो गया। अंतत: उन्होंने काषाय वस्त्र धारण कर अपनी तलवार घर के कोनों में टिका दी। उसका परिणाम यह निकला कि भारत का पश्चिमोत्तर भू-भाग विदेशी आक्रमणों द्वारा निरन्तर आक्रांत रहने लगा। आगे चलकर इस समूचे क्षेत्र पर ही पहले पारसियों, फिर ग्रीकों और उसके बाद शकों ने अपना अधिकार जमा लिया। बात यहीं समाप्त नहीं होती। बलख से आये ग्रीक तो तक्षशिला से पाटलिपुत्र तक जा पहुंचे। इसी प्रकार शक भी सुदूर दक्षिण तक फैल गये। उन्होंने मथुरा, अवन्ती, गुजरात, सौराष्ट्र, सिंधु और महाराष्ट्र के समूचे क्षेत्र में अपने क्षत्रप (सत्रप) बिठा दिये।
ग्रीकों का सफाया
भारत की इस दुर्दशा को देखकर ब्राह्मणों से रहा नहीं गया। उन्होंने अपनी शक्ति को एकत्रित किया और राजन्यों के घर के कोनों में टिकाई तलवार उठा ली। और सातवाहन आदि ने क्रमश: मगध, कलिंग और दक्षिण से ग्रीकों को मार भगाया।
शकों का उन्मूलन
ब्राह्मणों को देखकर क्षत्रियों का खून भी खौलने लगा और उन्होंने तपस्वियों का बाना उतार अपनी तलवारें सम्भाल लीं। विक्रमादित्य के नेतृत्व में मालवा के गणों ने शकों को धूल चटाई और पश्चिमोत्तर भारत को उनके चुंगल से मुक्त कराया। यह घटना ईस्वी सन् के शुरू होने से 57 वर्ष पूर्व की है।
विक्रम संवत्
मालवा ने इस राष्ट्रीय विजय के उपलक्ष्य में न केवल नये सिक्के (मालवानांजय) ही चलाये, बल्कि एक नया संवत्, जो पहले ‘कृत’, ‘मालव’ नाम से और बाद में ‘विक्रम’ नाम से प्रसिद्ध हुआ, भी चलाया। इस अवसर पर उन्होंने अवन्ती देश का नया संस्कार (मालवा-देश) भी किया।
विक्रमादित्य
मालवों ने विक्रमादित्य को अपना सम्राट घोषित किया और उसे ‘शकारिÓ यानि शकों का शत्रु कहकर सम्मानित किया। इस प्रकार भारत से शकों का सफाया हुआ। इस घटना के बाद ‘विक्रमादित्यÓ नाम तो भारत से विदेशी सत्ता को खदेडऩे का प्रतीक ही बन गया। इस शृंखला में सम्राट हेमचन्द्र भारत के अंतिम ‘विक्रमादित्यÓ हुए, जिन्होंने मुगल सत्ता को 29 दिन तक दिल्ली से खदेड़े रखा।
विक्रम संवत् का प्रारम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से (नर्मदा के दक्षिण में कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से) होता है। पूर्वोत्तर भारत में मेषार्क (वैशाखी) पर नया संवत् शुरू होने की परम्परा भी रही है। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर आदि में आज भी वैशाखी पर ही नया संवत् शुरू होता है। चाहे कुछ भी हो युधिष्ठिर संवत् के बाद भारत में सबसे लम्बा जीवन-विस्तार यदि किसी संवत् को मिला तो वह विक्रम संवत् ही है।
मिहिरावली
भारतीय विज्ञानमूर्ति आचार्य वराहमिहिर सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्नों में प्रमुख थे। उन्होंने ही कालगणना के लिए दिल्ली में एक विशाल वेधशाला (मिहिरावली) का निर्माण करवाया। मिहिरावली (आधुनिक मेहरौली) तो अब खण्डहरों में बदल चुकी है किन्तु उसका गगनचुम्बी मेरुस्तम्भ, जिसे अब कुतुबमीनार कहते हैं, आज भी सम्राट विक्रमादित्य की कीर्ति गा रहा है।





