जानिए दिक् और काल को

डॉ. इच्छाराम द्विवेदी
पूर्व प्राध्यापक, लाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ, नई दिल्ली


परमपिता परमात्मा की इस परमसुन्दर सृष्टि में सम्पूर्ण जैव जगत् और जागतिक प्रपंच को नियमित करने वाले दो तत्त्व हैं- दिक् और काल। दिक् अर्थात् दिशा, और काल अर्थात् समय। इस काल के नियामक हैं सूर्य और चन्द्र। इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मण्डल के चक्र को निरपेक्ष भाव से चलाने वाले, देखने वाले द्रष्टा हैं सूर्य नारायण एवं चन्द्रदेव अत: ये दोनों भी उपास्य हैं।

ब्रह्मपुराण के अनुसार दिक् और काल की इसी सत्ता के बीच आज से 1955885110 मानव वर्ष पूर्व इस सृष्टि में जीवन का प्रवेश हुआ। वह क्षण जो ब्रह्माण्ड में जीवन के प्रवेश का साक्षी बना वह चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि थी। इसीलिये भारतीय ज्योतिष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा वर्ष का शुभारम्भ मानता है। इस दिक् और काल का नियमन या तो भगवान् महाकाल करते हैं या परब्रह्म के अवतार। दिक् और काल निरपेक्ष है। युगावतार इस निरपेक्ष सत्ता को अपने अधीन बनाकर विश्व को स्व सिद्धान्तानुकूल बना देते हैं और एक दीर्घकाल तक यह सृष्टि आबाधगति से चलती रहती है।

सृष्टि के इस कालात्मक परिवेश को कुछ महापुरुषों ने अपने नाम से प्रवर्तित करने का उपक्रम किया। इसी कारण से विक्रम संवत्, शक संवत्, भारतीय स्वातं=य संवत्, श्रीकृष्ण संवत्, महाभारत युद्ध संवत्, श्री राम-रावण युद्ध संवत्, हिजरी संवत् या बुद्ध संवत् जैसे नाम काल को दिये गये। वैदिक ज्योतिष तो वत्सर, परिवत्सर, इद्वत्सर, उदवत्सर और संवत्सर भेद से पाँच प्रकार के वर्षमान को रेखांकित करता है।

वत्सर का अर्थ है जो हमारे लिये वत्सं राति लाति ददाति-अर्थात् वत्स को प्रिय वस्तुओं को लाता है वह वत्सर है। चैत्र मास में हमारे देश में फसल कटती है और नवान्न हमारे घर में आता है। सारी प्रकृति हमें धन-धान्य से पूर्ण बना देती है, हमारे बाल-बच्चे प्रसन्न हो उठते हैं अत: वत्सर अपने नाम को सार्थक करता है। यह सुन्दर समाज हमारे लिए सुख, सौभाग्य, शान्ति, कीर्ति, लेकर आये तो प्रभु की कृपा है।

इस संवत्सर में शुभ कर्म करने से वे कर्म स्थिर पुण्य के कारण बनते हैं। अत: हमें चाहिए कि इस वर्ष अधिक से अधिक शुभ कर्मों का संचय करें।