ठाकुर राम सिंह
लेखक बाबा साहब आप्टे स्मारक समिति के संरक्षक थे।
आज विश्व में 70 से अधिक कालगणनाएं प्रचलित हैं। उनसे संबंधित देशों में उनके नववर्ष अपने-अपने हिसाब-किताब के अनुसार आते हैं और अपने-अपने देश की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं के अनुसार मनाए जाते हैं। परन्तु इन सभी कालगणनाओं के बारे में महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इनका आधार सारे ब्रह्माण्ड को व्याप्त करने वाला कालतत्व न होकर व्यक्ति विशेष, घटना विशेष, वर्ग विशेष, सम्प्रदाय विशेष अथवा देश विशेष है। इसी कारण इन कालगणनाओं से संबंधित देशों की संस्कृतियां आदि भी हैं।
भारतीय संस्कृति
विश्व में केवल भारतीय संस्कृति ही एक ऐसी संस्कृति है जो अनादि है क्योंकि उसका मूल वेद है। वेदों में दिये सिद्धांत शाश्वत सत्य और नित्य हैं। प्राचीनतम होने पर भी वे सदैव नवीन हैं। उनमें आज तक कोई भूल निकाली नहीं जा सकी है। यदि कभी विज्ञान से मतभेद हो गया तो भी वैज्ञानिकों को घूम फिर कर पुन: वेदों की ही शरण में आना पड़ा है। वेदों के सिद्धांत अपरिवर्तनीय हैं और इसी कारण ये परिस्थिति निरपेक्ष हैं।
वर्ष प्रतिपदा का इतिहास
वर्तमान मानव सृष्टि के बारे में विद्वानों में बहुत मतभेद हैं। पश्चिम के खगोल शास्त्री, दार्शनिक, विचारक और उनके धर्मग्रंथ इसे 6-7 हजार वर्ष पुरानी मानते हैं। परंतु भूगर्भीय क्षेत्र में निरंतर हो रहे अनुसंधानों के कारण यह बात अब वैज्ञानिक भी स्वीकार करने लगे हैं कि मानवीय सृष्टि की प्राचीनता मानव की कल्पनाशक्ति से परे है।
भारतीय कालतत्व विशेषज्ञ मनीषियों या वेदों में दिये विवरणानुसार यह मानवीय सृष्टि लगभग 2 अरब वर्ष पुरानी है। भूगर्भीय क्षेत्र में निरन्तर पाश्चात्य वैज्ञानिकों के जो अनुसंधान हो रहे हैं उनमें प्राप्त तथ्यों के अनुसार मानवीय सृष्टि की प्राचीनता 6-7 हजार वर्ष के बजाए 20 हजार वर्ष के निकट जा पहुंची है। इससे पाश्चात्य विद्वानों की पूर्व अवधारणा कि यह विश्व 6-7 हजार वर्ष पूर्व बना था, धराशायी हो जाती है। अब उसमें परिवर्तन अनिवार्य हो गया है।
विश्व के प्राय: सभी भूगर्भशास्त्री यह मानते हैं कि इस पृथ्वी का पहले अपना कोई अस्तित्व नहीं था। यह सूर्य का हिस्सा, उसका अभिन्न अंग थी। प्राकृतिक और दैवी कारणों से यह हिस्सा सूर्य से पृथक हो गया आज से 4,13,29,49,111 वर्ष पूर्व। यही इस पृथ्वी की जन्मतिथि है। उस समय यह पृथ्वी पूर्णत: जलमग्न थी और इसका तापमान 2000 डिग्री था। इसको ठंडा होने में लाखों वर्ष लगे और जब इसका तापमान 200 डिग्री तक पहुंच गया तब इसमें प्राकृतिक-दैवी कारणों से भूनिर्माण शुरू हुआ।
कालक्रम में जो इसमें से प्रथम हिस्सा बाहर आया उसका नाम सुमेरू पर्वत है। इसी सुमेरू पर्वत के एक पवित्र भूखंड पर आज से 1,97,29,49,125 वर्ष पूर्व चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को रविवार के दिन प्रात: 9 बजे प्रथम मानव का प्रादुर्भाव इस अद्भुत विश्व के महाविकल्पक, सृष्टि निर्माता ब्रह्मा के रूप में हुआ। तद्नुसार आगामी 30 मार्च, 2025 को उसका 1,97,29,49,125 वां वर्ष पूरा होकर 1,97,29,49,126 वां वर्ष प्रारम्भ होने जा रहा है। इसी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से भारतीय नववर्ष, नवमास और नवदिन एक साथ शुरू हुए।
वर्ष प्रतिपदा का महत्व
भारतीय संस्कृति में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का बहुत बड़ा महत्व है, क्योंकि इस पृथ्वी पर पहले मानव की उत्पत्ति इसी दिन हुई। इस कारण यह दिन हम भारतवासियों के ही लिए नहीं, सारी मानव सृष्टि के लिए भी अत्यंत पूजनीय है।
इस शुभ दिन देश भर में अनेक सामाजिक और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन होता है। शुभ कामनाओं का आदान-प्रदान करने के लिए अभिनंदन पत्र अपने संबंधियों और इष्ट मित्रें को भेजे जाते हैं। नये वर्ष की नई दैनंदिनी खरीदी जाती है।
देश के हर नगर और हर गांव, परिवार में नये वर्ष का फल सुनने के लिए पारिवारिक कार्यक्रमों में कुल के पुरोहित आते हैं। परिवार के सारे सदस्य एक स्थान पर एकत्रित हो जाते हैं और पुरोहित नये पंचांग से नये वर्ष के फल के बारे में बताता है। बाद में प्रसाद और मिठाइयां बांटी जाती हैं। इस शुभ दिन के उपलक्ष्य में नयी वस्तुएं खरीदने का भी रिवाज है।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के साथ कुछ ऐसी विशेष घटनाएं संबंधित हैं जिनके कारण इसका महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। यथा प्रभु रामचन्द्र का राज्याभिषेक, धर्मराज युधिष्ठिर का राजतिलक, विक्रमादित्य के विक्रम संवत् का शुभारंभ, सम्राट शालिवाहन का शक संवत्, स्वामी दयानंद द्वारा आर्य समाज की स्थापना, प्रखर देशभक्त संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निर्माता डॉ- केशव बलिराम हेडगेवार का जन्मदिन।
ईसाई संवत् का इतिहास
ईसवी सन् का प्रारंभ ईसा की मृत्यु पर आधारित है। परंतु उनका जन्म और मृत्यु अभी भी अज्ञात है। ईसवी सन् का मूल रोमन संवत् है। यह 753 ईसा पूर्व रोमन साम्राज्य के समय शुरू किया हुआ था। उस समय उस संवत् में 304 दिन और 10 मास होते थे। उस समय जनवरी और फरवरी के मास नहीं थे। ईसा पूर्व 56 वर्ष मेें रोमन सम्राट जूलियस सीजर ने वर्ष 455 दिन का माना। बाद में इसे 365 दिन का कर दिया। उसने महीनों के बाद दिन संख्या भी तय कर दी। इस प्रकार ईसवी सन् में 365 दिन और 12 मास होने लगे। फिर भी इसमें अंतर बढ़ता गया। क्योंकि पृथ्वी को सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने के लिए 365 दिन 6 घंटे, 9 मिनट और 11 सेकंड लगते हैं। ईसवी सन् 1583 में इसमें 18 दिन का अंतर आ गया।
तब ईसाइयों के धर्मगुरु पोप ग्रेगरी ने 4 अक्टूबर को 15 अक्टूबर बना दिया और आगे के लिए आदेश दिया कि 4 की संख्या से विभाजित वाले होने वर्ष में फरवरी मास 29 दिन का होगा। 400 वर्ष बाद इसमें 1 दिन और जोड़कर इसे 30 दिन का बना दिया जाएगा। इसी को ग्रेगरियन कैलेंडर कहा जाता है जिसे सारे ईसाई जगत ने स्वीकार कर लिया।
ईसाई संवत् के बारे में यह भी ध्यान रखना चाहिए कि पहले इसका आरंभ 25 मार्च से होता था परन्तु 18वीं शताब्दी से इसका आरंभ 1 जनवरी से होने लगा। इस कैलेंडर में जनवरी से जून तक के नाम रोमन देवी देवताओं के नाम पर हैं। जुलाई, अगस्त का संबंध सम्राट जूलियस सीजर और उसके पोते अगस्टस से है। सितम्बर से दिसंबर तक के मासों के नाम रोमन संवत् के मासों की संख्या के आधार पर है। जिसका क्रमश: अर्थ है 7,8,9 और 10 है। इससे ईसवी सन् के खोखलेपन की पोल और ईसाई जगत की अवैज्ञानिकता जग जाहिर हो जाती है।
भारत में मासों का नामकरण
इसके विपरीत भारत में मासों का नामकरण प्रकृति पर आधारित है। यथा-चित्र नक्षत्र वाली पूर्णिमा के मास का नाम चैत्र है, विशाखा का वैशाख है, ज्येष्ठा का ज्येष्ठ है, श्रवण का श्रावण, उत्तराभाद्रपद का भाद्रपद, अश्विनी का आश्विन, कृतिका का कार्तिक, मृगशिरा का मार्गशीर्ष, पुष्य का पौष, मघा का माघ और उत्तरा फाल्गुनी का फाल्गुन मास होता है।
इसी तरह भारत में 354 दिन के चान्द्र वर्ष और 365 दिन 6 घंटे, 9 मिनट 11 सेकेंड के अंतर को दूर करने के लिए हमारे ज्योतिषियों ने 2 वर्ष 8 मास 16 दिन के उपरांत एक अधिक मास या पुरुषोत्तम अथवा मल मास की व्यवस्था करके कालगणना की शुद्धता और वैज्ञानिकता बरकरार रखी है।
उपरोक्त तथ्यों के संदर्भ में यही उचित होगा कि हम सभी भारतवासी पूर्णत: वैज्ञानिकता पर आधारित अपनी युगों की वैज्ञानिक एवं वैश्विक भारतीय कालगणना का प्रयोग करें। इस कालगणना का प्रथम दिवस चैत्र शुक्ल प्रतिपदा श्री ब्रह्माजी का सृष्टि रचना का दिन होने के कारण यह वर्ष प्रतिपदा केवल हम भारतवंशियों के ही लिए नहीं अपितु संपूर्ण सृष्टि के लिए भी पूजनीय दिन है। इधर-उधर से जोड़-तोड़, मनगढ़ंत कल्पनाओं, मिथ्या सिद्धांतों और कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा-भानुमति ने कुनबा जोड़ा के नमूने पर बने ईसवी सन् के नववर्ष को ईसाई जगत मनाये, हम इसे क्यों मनायें? यूरोपीय ईसाई साम्राज्य के प्रभाव काल में यह ईसाई कालगणना हम पर थोपी गई थी।
उस समय की मानसिक दासता के कारण हम ईसाई वर्ष को मनाते चले आ रहे हैं। यह हमारे लिए लज्जा का विषय है। आईये हम इसका परित्याग कर अपना भारतीय नववर्ष बनायें।





