दीपावली पर पांच त्यौहार एक साथ आते हैं, दीपावली अकेला त्यौहार नही है बल्कि त्यौहारों का समुच्चय है, जो धनतेरस से शुरू होकर क्रमश: नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा एवम् भैया दूज तक चलता है। यह पांच दिवसीय महोत्सव देवताओं और और राक्षसों के द्वारा क्षीर सागर के मंथन से पैदा हो हुई लक्ष्मी के जन्म दिवस से शुरू होता है। दीपावली की रात वह दिन है, जब लक्ष्मी अपने पति के रूप में भगवान विष्णु को चुना और उनसे विवाह किया ऐसी मान्यता है।
भारत में प्राचीन काल से दीपावली को हिंदू कैलेंडर के कार्तिक माह की अमावस्या के दिन त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। दीपावली का उल्लेख पद्मपुराण और स्कंद पुराण में मिलता है, स्कंद पुराण में दीपक को सूर्य के हिस्से में प्रतिनिधित्व करने वाला माना गया है, सूर्य जीवन के लिए प्रकाश और ऊर्जा देता है जो जो हिंदू कैलेंडर के अनुसार कार्तिक माह में अपनी स्थिति बदलता है।
सातवीं शताब्दी के संस्कृत नाटक नागनद में राजा हर्ष ने इसे दीपप्रतिपादुत्सव कहा है, जिसमें दिए जलाए जाते थे और दुल्हन और दुल्हे को उपहार स्वरूप दिए जाते थे, नौवी शताब्दी में राजशेखर ने इसे काव्य मीमांसा में इसे दीपमालिका कहा जिसमे घरों में पुताई कि जाती थी ओर तेल के दियों से रात मे घरों सड़को और बाजारों को सजाया जाता था।
आमतौर पर दीपावली को लंका विजय के बाद राम के अयोध्या लौटने की तिथि के रूप मे मनाया जाता है, पर कुछ क्षेत्रों के लोग दीपावली यम और नचिकेता की कथा से भी जोड़ते हैं। नचिकेता की कथा, जो सही बनाम गलत, ज्ञान बनाम अज्ञान, सच्चा धन बनाम क्षणिक धन आदि के बारे में बताती है। कृष्ण भक्ति के धारा के लोगों का मत है कि इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी राजा नरकासुर का वध किया था इस नृशंस राक्षस के वध से जनता में अपार हर्ष फैल गया और प्रसन्नता से भरे लोगों ने घी के दिए जलाए। एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने नरसिंह रूप धारण कर हिरण्य कश्यप का वध किया था।
वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो देसी घी का दीपक जलाने से उसमें उपस्थित विशिष्ट रसायनों का ऑक्सीकरण होने के कारण घर की सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि होती है। गाय के दूध से बना घी स्वास्थ्य और पवित्रता की दृष्टि से सर्वोपयोगी है, अत: इसका प्रयोग सुबह-शाम पूजा के दौरान किया जाता है। देशी घी के दीपक की ऊर्जा से वातावरण में उपस्थित सूक्ष्म कीटाणुओं का नाश होता है। ऐसा सकारात्मक वातावरण स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है, इसलिए सभी शास्त्रों में देवी-देवताओं के समक्ष देसी घी का दीपक जलाने का विधान है। देसी घी के अलावा तेल का दीपक जलाने का वर्णन भी शास्त्रों में मिलता है।
नकारात्मक ऊर्जा तथा शनि ग्रह से संबंधित ऊर्जाओं के संतुलन के लिए घी की अपेक्षा तेल का दीपक जलाने का विधान है। दीपावली पर घी के साथ तेल के असंख्य दीये जलाकर पर्यावरण की नकारात्मक ऊर्जा को सकारात्मक में बदलने का प्रयास किया जाता है, ताकि सकारात्मक ऊर्जा में लक्ष्मी का प्रवेश हो सके।
ऐसी मान्यता है कि तेल का दीपक जलाने पर उससे उत्पन्न ऊर्जा का अक्सर काजल बनाने में भी प्रयोग किया जाता है। समृद्धि एवं सुख लाभ के लिए घी का दीपक जलाया जाता है तथा शत्रु संहार, ऋण मुक्ति एवं रोगमुक्ति के लिए तेल का दीपक जलाने का विधान है। पुराने जमाने में जब कोई मेहमान किसी के घर आता था, तो प्रवेश के समय उसकी आरती उतारने का विधान इसलिए था, ताकि दूर-दराज से व्यक्ति के साथ आने वाले सूक्ष्म कीटाणु एवं नकारात्मकता आरती से उत्पन्न सकारात्मक तरंगों में परिवर्तित हो जाएं। कीटाणु अग्नि और आरती की लौ और ऊर्जा से नष्ट हो जाते हैं, जिससे प्राणवायु सकारात्मकता से भर जाती है जो कि स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है।
दीपक जलाते समय अक्सर जिस मंत्र का उच्चारण किया जाता है। इसमें दीपक से प्रार्थना की जाती है, ‘हे सुंदर और कल्याणकारी, आरोग्य और संपदा को देने वाले दीप, शत्रु के विनाश के लिए हम तुम्हें नमस्कार करते हैं।’
तेल का दीपक जलाया जाए तो उससे उत्पन्न होने वाली तरंगें दीपक बुझने के आधा घंटे बाद तक वातावरण को पवित्र बनाए रखती हैं। लेकिन घी वाला दीपक बुझने के बाद चार घंटे से अधिक समय तक सात्विक ऊर्जा को बनाए रखता है। दीपक चाहें तेल का हो अथवा घी का, इससे वातावरण में सात्विक तरंगों की उत्पत्ति होती है और अंधकार दूर होता है, शुभ शक्तियां आकर्षित होती हैं, हानिकारक किरणों का नाश होता है, फलस्वरूप घर में सुख-समृद्धि आती है।
इस प्रकार से अनेक पौराणिक कथाएं और वैज्ञानिक दृष्टि से भी देखें तो हम ये कह सकते हैं कि ”दीप जलेगा तम हटेगा” दीपावली अहंकार, अज्ञान रूपी राक्षस के संहार का पर्व है।





