भारतीय परंपरा में गंगा का स्वरूप

डॉ. बालकृष्ण राय


वैदिक काल से लेकर पूरी सनातन परंपरा ने प्रकृति को अत्यधिक महत्व दिया और उसके विभिन्न उपादानों-पृथ्वी, नदी, पर्वत आदि की महिमा वर्णित की। यह सच है कि सभ्यता तथा संस्कृति का विकास नदियों के तट पर ही हुआ इसीलिए नदियों का माहात्म्य विविध रूपों में संपूर्ण वांग्मय में अंकित है। विशेषत: महानदी गंगा की महिमा व्यापक परिदृश्य में व्याख्यायित है। गंगा न केवल हमारे समाज की एक पवित्र नदी रही है, अपितु अनेक आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा वैज्ञानिक गुणों के कारण रचना के केन्द्र में रही है।

संस्कृत वाङ्मय में गंगा के विविध रूपों का विशाल भण्डार है और कई विद्वानों ने इसकी विशद विवेचना की है। आचार्य रमापद चक्रवर्ती ने सन् 2001 में ‘गङ्गा ज्ञान महोदधि:’ नामक ग्रंथ में 11वीं से 18वीं शताब्दी की प्राचीन देवनागरी, शारदा, बंगला, मैथिली, उडिय़ा एवं मिश्र लिपियों तथा संस्कृत भाषा की 52 पाण्डुलिपियों का संकलन कर देवनागरी में लिपयांतर किया है। इसमें गंगा विषयक दुर्लभ सामग्री है, पर तात्विक विवेचन नहीं है। इसी तरह पुराणों में गंगा पर भी प्रयाग के हिन्दी साहित्य सम्मेलन से सामग्री प्रस्तुत की गई। गंगा के संबंध में पुराणों में फैले हुए प्रसंगों को ‘गंगा माहात्म्यम्’, ‘उत्पत्ति खण्ड’ और ‘स्तुति खण्ड’ इन तीन खण्डों में विभक्त कर संकलित कर दिया गया है। यहाँ संस्कृत वाङ्मय में गंगा के माहात्म्य का संक्षिप्त रूप दर्शाया गया है।

वेद एवं उपनिषद् में गंगा
भारतीय गंगा नदी की प्राचीनता, प्रधानता और महत्ता इसी से प्रमाणित है कि ऋग्वेद ने अपने ‘नदीसूक्तÓ में जिन मुख्य नदियों का स्मरण किया है, उनमें गंगा का आवाहन सर्वप्रथम है-
इमं मे गङ्गे यमुने सरस्वति शुतुद्रि स्तोमं सचता परुष्ण्या।
असिकन्या मरुद् वृधे वितस्तयाजीकीये शृणुह्या सुषोमया
अर्थात् हे गंगा, यमुना, सरस्वती तथा शुतुद्रि! नदी रूप देवियो! परुष्णी (इरावती रावी) नदी के साथ मेरी इस स्तुति को सनो। हे मरुत नामक देवों से संवद्र्धित समस्त नदियों, आर्जिदीना, असिकनी, सुषोना तथा वितस्ता के साथ मेरे स्तवन को सुनो।। पुन: इसी ऋग्वेद में वर्णित है-कक्षोन गाङ्ग्य. गंगा के उच्च कगारों के समान

यहाँ गंगा के तटों की भी महिमा प्रतिपादित की गई है और गंगा आधिदैविक सत्ता के रूप में अंकित है। परवर्ती ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद् आदि ग्रंथों में भी गंगा का यही स्वरूप दिखाई पड़ता है। ‘शतपथ ब्राह्मण’ तथा ‘ऐतरेय ब्राह्मण’में दौष्यंति भरत ने अपनी विजयों के उपलक्ष्य में जो यज्ञ किये थे, उनकी गाथा का वर्णन है। ये यज्ञ गंगा और यमुना के तटीय प्रदेशों में हुए थे। तैत्तिरीय आरण्यक में सन्ध्यावन्दन और स्वाध्याय में संलग्न उन मुनिजनों का स्तवन किया गया है, जो गंगा—यमुना के मध्य स्थित पवित्र भूभाग पर निवास करते हुए तपस्या में लीन हैं। उनकी तपस्या से आसपास की धरती में एक अपूर्व आभा का संचार हुआ करता था।

इसी प्रकार अन्य ब्राह्मण और आरण्यक ग्रन्थों में गंगा जी से सम्बद्ध आख्यान दृष्टिगत होते हैं। उपनिषदों में गंगाजी की महिमा एवं आख्यान बड़े मार्मिक हैं। श्री रामोत्तरतापनीयोपनिषद् के एक विवरण के अनुसार सत् चित् एवं आनन्द की मूर्ति ईश्वर रूप भगवान् शिव साक्षात् श्रीराम से यह वर माँगते हैं कि मणिकर्णी तीर्थ शिव का क्षेत्र तथा गंगा जी के तट पर मरने वाले प्रत्येक जीव को सांसारिक भव बाधा से मुक्ति प्राप्त हो।

योगशिखोपनिषद् के अनुसार गंगा जी में मन से, वचन से और कर्म से पवित्र भावापन्न होकर स्नान करने पर उस परम भाव की प्राप्ति होती है, जिसे योगीजन इड़ा-पिंगला मध्यगत सुषुम्ना नाड़ी के आधान रूप साधन से भी कठिनता से प्राप्त कर पाते हैं।

इस प्रकार वेदों और उपनिषदों में से कतिपय उद्धरण भारतीय मानस में स्थित गंगा जी की पावनता को स्पष्ट रूप से व्यक्त करते हैं।

वाल्मीकीय रामायण में गंगा
भारतीय वाङ्मय में गंगा के द्विविध रूपों, भौतिक और आध्यात्मिक को एक साथ लेकर चलने का प्रयत्न रहा है। यह पुण्यतोया मात्र जल प्रवाह ही नहीं है, प्रत्युत इनकी एक आध्यात्मिक सत्ता भी है, यह विष्णुपदी और आराध्या भी है। वाल्मीकीय रामायण में गंगा के विविध रूपों के चित्र मिलते हैं। इनमें मिलने वाली नदियों का वर्णन, गंगोत्पत्ति, गंगावतरण, उनके विभिन्न नाम और उनकी अर्थवत्ता और उनके त्रिपदगामी स्वरूपों का अनेक वर्णन है।

वाल्मीकि ने सर्वप्रथम बालकांड में गंगा का उल्लेख किया है। राम और लक्ष्मण, विश्वामित्र के साथ जा रहे हैं, तो वहाँ सरयू और गंगा के संगम का दृश्य वर्णित है। उन्हें वहाँ दोनों नदियों के जलप्रवाह की भीषण ध्वनि सुनाई पड़ती है। मिथिला की ओर जाने पर उन्हें गंगा के दर्शन होते हैं। वहाँ विश्वामित्र जी राम-लक्ष्मण की जिज्ञासा पर गंगावतरण की कथा, कार्तिकेय जन्म आदि का वृत्तांत बताते हैं। विश्वामित्र के अनुसार हिमवान नामक पर्वत की प्यारी पत्नी मैना है। ये ही गंगा के माता-पिता हैं। गंगा हिमवान की ज्येष्ठ पुत्री है, उनकी दूसरी कन्या उमा है। देवताओं ने देवकार्य की सिद्धि के लिये गंगाजी को हिमवान से मांग लिया। ये ही बाद में जल रूप में परिवर्तित हो गयीं। पहले तो ये आकाश मार्ग में गयीं, तत्पश्चात् ये गिरिराजकुमारी गंगा रमणीया देवनदी के रूप में देवलोक में आरूढ़ हुई थीं। फिर जलरूप में प्रवाहित हो लोगों के पाप को दूर करती हुई रसातल में पहुंची थीं।

गंगावतरण की पूरी कथा बहुत विस्तार से वाल्मीकि रामायण में (बालकांड 38-44) दी गई है। राजा सगर के साठ हजार पुत्रों के व्यवहार से क्रुद्ध होकर कपिल जी ने उन्हें भस्म कर दिया। अंशुमान ने उनके उद्धार की कामना की। गरुड़ ने उन्हें रोका और कहा कि गंगा जी से तुम्हारे पितरों का उद्धार हो सकता है। अंशुमान ने घोर तपस्या की, पर गंगा को न ला सके। उनके पौत्र भगीरथ की तपस्या से ब्रह्मा प्रसन्न हुए। उन्होंने शिव जी से गंगा को सँभालने की प्रार्थना की। गंगा उतरी, पर शिव की जटा में समा गयी। भागीरथ ने पुन: तपस्या की। शिवजी प्रसन्न हुए। गंगा प्रवाहित होने लगी। राजा सगर के साठ हजार पुत्रों का उद्धार हो गया। यह सारा वर्णन अत्यंत काव्यात्मक शैली में प्रस्तुत हुआ है।

भागीरथ के अद्भुत प्रयास से गंगा पृथ्वी पर आयी, इसलिए प्रजापति ब्रह्मा ने उन्हें भागीरथ की ज्येष्ठ पुत्री के नाम से पुकारा और उन्हें भागीरथी कहा।

इस प्रकार वाल्मीकि रामायण में गंगा की कथाएँ और उनके विविध नामों की प्रसंगानुसार व्याख्या होती चली गयी है।
‘गंगावतरण’ का चित्रात्मक वर्णन
महर्षि वाल्मीकि की काव्य-प्रतिभा उनकी चित्रण कला में स्पष्ट दिखाई पड़ती है। भागीरथ के अलौकिक प्रयत्न से जब गंगा की धारा आगे बढ़ी तो त्रिपथगा का स्वरूप कैसा था-
तत्र त्रिपथगां दिव्यां शीततोयामशैवलाम्।
ददर्श राघवो गंगा रम्यामृषि निषेविताम्।।
‘दिव्या’ ‘शिवतोया’, ‘पुण्या’ और ‘ऋषिनिषेविता’ ये शब्द हमारे मानस में सद्य: पवित्रता और श्रद्धा का संचार करते हैं और गंगा के आध्यात्मिक स्वरूप का निर्देश करते हैं। इस दिव्य नदी के जल प्रवाह का चित्रण द्रष्टव्य है- ”कहीं उनका जल निश्चल एवं गहरा है, कहीं वे महान वेग से व्याप्त हैं, कहीं उनके जल से मृदंग आदि के समान गम्भीर घोष प्रकट होता है और कहीं वज्रपात आदि के समान भयंकर नाद सुनाई पड़ता है।”

प्रस्तर खण्डों के टकराने से जो शब्द होता है, वही मानो उनका उग्र अट्टहास है, जल से जो ”फेन प्रकट होता है, वही उन दिव्य नदी का निर्मल हास है, कहीं तो उनका जल वेणी के आकार का है और कहीं वे भँवरों से सुशोभित होती है।” ”उनका जल इतना स्वच्छ है कि मणि के समान निर्मल दिखाई पड़ता है। उनके तटवर्ती वन का भीतरी भाग मदमत्त दिग्गजों, जंगली हाथियों तथा देवराज की सवारी में आने वाले श्रेष्ठ गजराजों से कोलाहलपूर्ण बना रहता है।”

”हंसों और सारसों के कलरव वहाँ गूंजते रहते हैं, चकवे उन देवनदी की शोभा बढ़ाते हैं, सदा मदमत्त रहने वाले विहंगम उनके जल पर मँडराते रहते हैं।” ”कहीं तटवर्ती वृक्ष मालाकार होकर उनकी शोभा बढ़ाते हैं, कहीं तो उनका जल खिले हुए उत्पलों से आच्छादित है और कमलवनों से व्याप्त है।”

इस प्रकार महर्षि वाल्मीकि ने गंगा के पाश्र्ववर्ती भाग की सारी शोभा को जीवंत कर दिया है। उनकी चित्रण कला में दृश्य बिम्ब के साथ श्रव्य बिम्ब का स्वरूप व्यक्त हुआ है। सबसे महत्व की बात यह है कि महर्षि की प्रतिभा ने गंगा के आध्यात्मिक और पारमार्थिक स्वरूप को अनेक वाणी दी है। गंगा विष्णुपादच्युता ‘दिव्या’ पापनाशिनीम् सलिला ‘शिवा’ अर्थात् लोक कल्याणकारिणी हैं। वनयात्रा के क्रम में सीता जी ने माँ गंगा से जो प्रार्थना की है, उसमें गंगा के दिव्य स्वरूप के दर्शन होते हैं। वे प्रार्थना करती हैं कि उनके पति श्रीराम और देवर लक्ष्मण सकुशल लौटें।

अत: आदिकाव्य रामायण में गंगा का चित्रण समग्र सौन्दर्य और तत्ववाद के साथ हुआ है। उनके भौतिक और आध्यात्मिक स्वरूप को इस रूप में उकेरा गया है कि वह परवर्ती वाङ्मय का प्रेरक बन गया। आगे चलकर कालिदास के साहित्य में, स्तोत्र साहित्य में, हिंदी साहित्य में, लोक साहित्य में, फारसी और उर्दू साहित्य में गंगा के अनेकानेक रूप दृष्टिगत होते हैं, जो वर्णनातीत और पठनीय हैं।

(साभार: भारतीय ज्ञान परंपरा विभिन्न आयाम। शिप्रा पब्लिकेशंस से प्रकाशित इस पुस्तक की संपादक हैं प्रो. सरोज शर्मा। सह संपादक हैं डॉ. बालकृृष्ण राय और डॉ. सुनीता जोशी कथूरिया)