श्रीकृष्ण ‘जुगनू’
प्राचीन संस्कृत साहित्य के विद्वान
हमारे यहां मंदिरों के निर्माण के बाद उसके निरंतर प्रबंधन के लिए समिति का गठन किया जाता था। इसको गोष्टिक या गोष्ठिक कहा जाता और इसके सक्रिय सदस्य को गोष्टि। इसमें पद नहीं होता, केवल आयु के आधार पर सदस्य को वरिष्ठ या कनिष्ठ का मान दिया जाता। मथुरा सहित राजस्थान में 9वीं, 10वीं सदी में महारावल अल्लट, शक्तिकुमार के शासन काल में बने आदिवराह के मंदिर से लेकर चौहान शासक विग्रहराज के काल के हर्षनाथ मंदिर, सकराय मंदिर, केकिंद, सूर्य मंदिर, देवी मंदिर आदि अनेक मंदिरों के लिए ऐसे न्यास बने। आहाड़ की गोष्ठी में ज्योतिषी, वैद्य, आचार्य जैसे विद्वान थे। हूण को भी गोष्टिक बनाया गया। अधिकांश अभिलेखों में इस संस्था का उल्लेख मिलता है। अनुवाद के दौरान मुझे अनेक पदाधिकारियों के रोचक नाम जानने को मिले।
चौहान महासेनापति चामुंडराज के अभिलेख में गोष्ठिक सूची में पिताओं के नाम भी दिए गए हैं। यह अभिलेख अनेक खंडों वाला है और एक एक व्यवस्था, दान पालन आदि का निर्धारण किया गया है। सच में मंदिर संचालन किसी बड़े दायित्व से कम नहीं है। यह गोष्टिक संस्था की तरह काम करती। मंदिर की पूजा आदि नियमित व्यवस्था के लिए फूल, चौसर माला, तेल, घी, कपास, पेटक आदि का प्रबंध संभालती। जुआरियों से जीत पर अंश, स्थाई और आगंतुक व्यापारियों से आय पर मासिक दान आदि की अधिकृत रूप से देखरेख करती। मंदिर जीर्ण हो जाता, गिर जाता तो जीर्णोद्धार करवाती। यदि कोई सदस्य दिवंगत हो जाता तो उसका उत्तराधिकारी बेटा ही होता। कोई पीछे नहीं होता तो राजाज्ञा से नए गोष्ठिक को रखा जाता। गोष्ठिक को बहुत सात्विक जीवन जीना होता था। चढ़ावे का वितरण होता और यह विभाजन भाग भक्ति कहा जाता। आबू के पास वढवान के खंडहर हाल सूर्य मंदिर का अभिलेख आश्विन शुक्ला 5, संवत् 1315 तदनुसार 1258 ई. का है। यह मूलत: जीर्णोद्धार का साक्ष्य है।
इसमें गोष्ठिकों के नाम, सूत्रधार बाघसिंह धारसिंग के परिचय और व्यय पेटे 11 हजार दाम (उद्धरद्र) लगने की सूचना है। गांव का नाम ब्राह्मणस्थान लिखा गया है। इससे लगता है कि 13 वीं सदी तक यह संस्था प्रभावी रही। बाद में लुप्त हो गई! क्यों और कैसे ? अभिलेखों में उदाहरण नहीं मिलते। कितना बड़ा सच है कि मंदिर निर्माण का क्रम निरंतर बढ़ता रहा लेकिन ऐसी संस्था अर्थहीन हो गईं। कोषों में भी अर्थ नहीं! अभिलेख ही प्रमाण हैं।
इसी प्रकार हमें याद रखना चाहिए कि ‘रायपसनेई’, विशेषकर ‘अंगविज्जा’ और बाद में ‘आचार दिनकर’ इस दिशा में विचार देते हैं कि प्रतीकों के उपयोग से समृद्धि बनी रहती। जैन मंदिरों के निर्माण श्रेष्ठियों ने करवाए, प्रेरणा श्रमणों की रही और उद्देश्य था कीर्ति! प्रबंध चिंतामणि में इसकी एक सुंदर कथा आई है।
हिंदू मंदिर प्राय:राजाओं, सामंतों ने बनाए : विजित क्षेत्र पर, अपने शासित प्रदेश में और अपने प्रभावक क्षेत्र में। पहले उनका प्रबंधन गोष्ठियां (न्यास) करतीं और जुआ की जीत, मंडी में होने वाली बिक्री पर देवालय संचालन कर लिया जाता। बाद में मंदिरों में फूल फल जैसे नैवेद्य के लिए राजाओं ने खेत दिए और इन आज्ञाओं को ताम्रपत्र में लिखा। तब ‘चढ़ावा’ जैसा कोई नाम नहीं था। चढ़ाने के लिए आम आदमी के पीछे था ही क्या? कई ताम्रपत्र मैंने देखें, जिनमें पुजारी को 1 पाई रियासत से दी जाती थी। कभी अन्न की मुठ्ठी, एकादशी करने वाले आटा, दाल, मसाला वाला ‘सीधा’ चढ़ाते फिर चढ़ावे, बोलियों, चंदे और देखादेखी भेंट! चंदा कहां से आया? मंदिर कभी आकर्षक नहीं थे तब काम आदि के जो प्रयोग हुए तो लोग देखने जाने लगे और आज तक जा रहे हैं! मैंने ऐसी संस्थाओं के कोई 38 अभिलेख खोजे हैं। गुजरात से लेकर मथुरा तक। जैन मंदिरों का संचालन एक अलग प्रणाली से भी था।
मंदिर प्रबंधन कभी सरल नहीं रहा। कितना ही सुंदर हो लेकिन मंदिर में लोग कम ही आते और जो आते भी तो चढ़ावा क्या चढ़ाते? आज के बिलकुल विपरीत, तब चढ़ाने के लिए था ही क्या? नकद नहीं और कपड़ों में जेबें नहीं। घर मुठ्ठीभर अनाज ले जाया जाता जिसे ‘मुठ्ठी’ कहा जाता। एकादशी, अमावस, प्रदोष और कोई पर्व होता तो कच्ची सामग्री भेजी जाती, जो ‘सीधा’ कहलाती। पिष्ठ (आटा, दाल) होने पर पेटक कहा जाता। माला आदि के फूलों के लिए बाड़ी योग्य भूमि निर्माता द्वारा दी जाती। चढ़ावे से कभी मंदिर नहीं चले। मैंने मंदिरों के लेख पढ़े हैं जिनमें गोष्ठी (देवालय न्यास, प्रबंध समिति) यह ध्यान रखती थी कि नियमों के तहत घर, बाजार अथवा मंडी से प्रति भार, जुआ में जीत और घाणी से पली, द्रम, पेटक आदि मिला है या नहीं! मंदिर प्रबंधन किसी हाथी की व्यवस्था से कम नहीं। गोष्ठिक इन वसूलियों का ध्यान रखते। इस तरह की व्यवस्था सभी प्रमुख मंदिरों की रही। मेवाड़ की एक देवबही में पूरे राज्य के मंदिरों के संचालन के लिए देय राशि का बड़ा सुंदर विवरण वर्षवार लिखा मिलता है।
एक अभिलेख बारां के एक ध्वस्त शिव मंदिर में लगा है। उस शिलालेख से पता चलता है कि उसका नाम था: सोमेश्वरदेव मंदिर। इसका सूत्रधार था : कुंवर दुसाय। जिसने मंदिर बनाने के बाद कहा कि वह सोमेश्वर देव को सदैव प्रणाम करता है। यहीं लगे संवत 1215, चैत्र कृष्णा 14 तिथि के एक शिलालेख में लिखा गया है कि उस मंदिर के नैवेद्य के लिए हट्ट (वहां के हटवाड़ी, बाजार) और मंडी ( निकटवर्ती मंडपिका) से अलग अलग तरह की मुद्राएं नियमित देय होंगी। यह नियम सबको मान्य होगा ( विदितं)। हां, देवालय गोष्ठी शब्द किसी स्मृति, अर्थशास्त्र, नीति शास्त्र आदि में नहीं मिलता लेकिन अभिलेख भरे हैं।





