हाड़ौती प्रदेश की लोक साहित्य परम्परा

ललित शर्मा, प्रसिद्ध इतिहासकार


वर्तमान राजस्थान के दक्षिण पूर्व में स्थित बूंदी, कोटा, बाराँ तथा झालावाड़ जिले को हाड़ौती संभाग क्षेत्र या प्रदेश के नाम से जाना जाता है। इस प्रदेश की जनभाषा लोक के प्रभाव के कारण हाड़ौती भाषा कही जाती है। डॉ. ग्रियर्सन द्वारा 1908ई. में भारत की भाषाओं का अध्ययन किया गया था। उसमें उन्होंने हाड़ौती भाषा को स्वतंत्र भाषा के रूप में रेखांकित किया था। लोक के कोण से 18वीं सदी में उ.प्र. के रामपुर की ईसाई मिशनरी ‘न्यू टेस्टामेन्ट’ नाम से जो भाषानुवाद किया उसमें हाड़ौती भाषा का अनुवाद भी था। राजस्थान के भाषा विज्ञानी मोतीलाल मेनरिया के अनुसार, ‘राजस्थान भाषा की लोक रूपरेखा के अनुसार ढूंढ़ाड़ी का जो रूप बूंदी, कोटा भू-भाग में प्रचलित है मूलत: वही हाड़ौती के नाम से प्रसिद्ध है।

उक्त दोनों भाषा विज्ञानी के लोक तत्व पर गम्भीरता से विमर्श किया जाए तो ज्ञात होता है कि यह भाषा पुरानी और दृढ़ रूप से संयोजित है। इसका लोकजन द्वारा अपनाया शब्दकोश समृद्ध है तथा उच्चारण शैली में कुछ विशेषताएँ हैं। हाड़ौती प्रदेश का लोक साहित्य अत्यन्त समृद्ध रहा है, परन्तु अब यह विलुप्त प्राय: सा है। लिखने, गुनने, समझने और इन्हें प्रसारित करने वाले अब नहीं रहे, परन्तु जो हैं वे आधुनिकता की उजास में खो गए हैं। विवेच्य क्षेत्र का लोक साहित्य मौखिक जनकण्ठों में बड़ी मुश्किल से जो मिलता है वह स्वल्प मात्रा में है और दबा—बचा लिखित भी इसी रूप में है। इनका वर्गीकरण लोकगीत, लोकनाट्य, लोककथा-गाथा, लोकोक्ति, प्रहेलिका, हाड़ौती गद्य-पद्य एवं संत साहित्य में किया जा सकता है।

हाड़ौती के लोकगीत यहां की लोक परम्परा के जीवन की पूंजी रहे हैं। इसमें यहाँ के जनमानस के विविध लोकचित्र हैं। इनमें लोक हास, रूदन, उल्लास, विषाद, करूणा, शृंगार, भक्ति, वात्सल्य की भावनाओं का मार्मिक चित्रण है, अर्थात् लोकजीवन के हर पक्ष की अभिव्यक्ति इन लोकगीतों में विद्यमान है। इनमें संस्कार सम्बन्धी लोक गीतों में हिन्दू धर्म-शास्त्रों के अनुसार निर्दिष्ट सोलह संस्कारों के गीत गाये जाते हैं। इन संस्कारों के गीतों में एक विशेषता यह दिखायी देती है कि कन्या पक्ष के बहुत से गीत, वर पक्ष के गीतों से नहीं मिलते। विवाह के कुछ कर्मो में समानता होने से उसमें एक ही प्रकार के गीतों का गान भी किया जाता है। यहाँ पर्व, त्यौहार सम्बन्धी गीतों के देवताओं तथा व्रत आदि से सम्बन्धित लोक गीत गाये जाते हैं। इनमें सतियों और पितरों आदि के गीत भी सम्मिलित हैं। व्यवसाय से सम्बन्धित लोक गीतों में कृषि, चरखे और चक्की चलाने वाली स्त्रियों के गीत भक्ति भावना को प्रदर्शित करने वाले भजन आदि होते हैं। इसके अन्तर्गत ऐसे गीत भी गाये गये जो मीरा, तुलसी व कबीर के पदों के हाड़ौती रूपान्तरण में सम्बद्ध रहे, परन्तु अब ये लुप्त प्राय: हैं। यहाँ श्रृगारिक या वैलासिक लोक गीतों में प्रकृति ऋतु सम्बन्धी, परिवार सम्बन्धी वैभव गीत मनोरंजन हेतु गाये गये, परन्तु वे लिपिबद्ध नहीं किये गये।

हाड़ौती में लोकगीत लय और ताल में गाये जाते रहे, इसमें जब नृत्य होता है तब ताल और लय का साम्य अत्यन्त सुन्दर प्रतीत होता है। यहाँ श्राद्धों में जो सांझी प्रात: के समय गाई जाती थी उनमें भैरव राग के स्वर स्पष्ट सुनाई देते हैं। लोक गीतों के जानकार डॉ. चन्द्रशेखर भट्ट का मानना है, ”हाड़ौती क्षेत्र लोक साहित्य की दृष्टि से अत्यन्त समृद्ध परन्तु अछूता रहा है। यह अपने अंचल में लोकगीतों की अक्षय निधि को छिपाए हुए है। लोक जगत के श्रृंगार से लेकर शांत आदि सभी रसों में हाड़ौती लोकगीतों का प्रचलन पाया जाता है। इन गीतों की संवेदनशीलता, भाव वैभव, कलात्मकता के साथ मार्मिकता सभी कुछ प्रभावी है और इनमें विवेच्य क्षेत्र की संस्कृति सहज रूप से मुखरित हो उठती है।”

यदि लोकनाट्य के आलोक में हाड़ौती प्रदेश को देखा जाए तो इसके दो रूप क्रमश: लीलारूप और खेल या खयाल का रूप मुख्य है, परन्तु अब इनके प्रस्तोता कण्ठ नहीं है, केवल चर्चायें है वह भी पुरानी चन्द बन्द होती जुबानों पर। इनमें लीला के नाट्य ईश्वरीय अवतारों से सम्बन्धित होते थे तो खयाल सामान्य आम लोगों के लिए। लीलाओं में भक्तिरस और खयाल में लोक के श्रृंगार रस की बयार होती थी। विवेच्य क्षेत्र में लोक नाट्य लिखित रूप में थे परन्तु अब विलुप्त हैं लेकिन इनकी परम्परा मौखिक भी दीर्घावधि तक रही। ज्ञात जानकारी के अनुसार लिखित नाट्य पंजिकाओं को विवेच्य भू-भाग में ‘खरडे’ नाम से जाना जाता था। रामलीला में छन्दों को ‘डुआ’ कहा जाता था जिनकी राग अलग होती थी। इसे छन्द, लय और ताल के साथ गाया जाता था। लीलाओं में राम, कृष्ण, गोरधन, प्रहलाद, रूकमणी, मंगल थे तो खयाल में राज्यांहीर, ढ़ोलामारू, फूलादें तथा आमलदें खेवंरा प्रमुख थे।

विवेच्य क्षेत्र में लोकगाथा उन वीर पुरुषों से सम्बन्धित होती है, जिन्होंने युद्ध में परोपकार या धर्म के लिए अपना जीवन समर्पण किया है। ये कथात्मक गीत होते हैं जो कथानक को साथ लेकर स्थानीय भाषा में लोक को साथ लेकर चलते हैं। तेजाजी, बगड़ावतजी, हीरामनजी, रूकमणी को ब्याव, देवनारायण की फड़ के साथ एक विशेष वीरोत्सर्ग की गाथा ‘परथीराज की राड़ (लड़ाई)’, इस क्षेत्र में आल्हा ऊदल की बुन्देली गाथा की भाँति यहाँ नवरात्रा असोज में गायी जाती रही। यह गाथा 1000 पंक्तियों में शुद्ध हाड़ौती भाषा में है जो लगातार 9 रात तक चलती है और इसे सुनकर ग्रामीण लोक जन वीरत्व भावों से भर जाता है। इस लेख के लेखक ने इस सम्पूर्ण गाथा को मूलरूप में कथानक के इतिहास व लोकमानस के साथ अपने ग्रन्थ ‘झालावाड़-इतिहास, संस्कृति और पर्यटन’ में पूरा ही ‘महू-मैदाना’ अध्याय में समादृत किया है। इन सभी गाथाओं की पृष्ठभूमि में वीर पूजा के लोकभाव स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होते हैं।

हाड़ौती की कहावतों में देवत्व आध्यात्म की दृष्टि से लोकस्तुत्य है। लोकमानस में कहावतें एकान्त निर्णय की साधिका मानी जा सकती हैं, क्योंकि इनमें सांसारिक ज्ञान, दाम्पत्य जीवन और व्यावहारिक सम्बन्धों का चित्रण होता है। इनका वर्गीकरण हाड़ौती भाषा के विद्धान डॉ. नाथूलाल पाठक ने निम्न प्रकार किया है, ‘एक-ईश्वर तथा देवत्व सम्बन्धी, दो-इतिहास एवं पुराण सम्बन्धी, तीन-स्थानावलि तथा सामाजिक कहावतें, चार-दर्शन और कर्म सम्बन्धी, पांच-कृषि तथा ऋतु सम्बन्धी, छह-ज्योतिष एवं शगुन विचार सम्बन्धी, सात-धन, विद्या एवं ज्ञान से सम्बन्धित, आठ-सामान्य नीति सम्बन्धी, नौ-मनोविज्ञान सम्बन्धी आदि।’

हाड़ौती क्षेत्र बौद्धिक परम्परा में पहेली का अपना निजस्व है। लोक साहित्य के विद्वानों ने पहेलियों को लोकोक्ति साहित्य के अन्तर्गत माना है। अर्थ विस्तार की दृष्टि से पहेली का सामान्य अर्थ समस्या या उलझना है। प्रयोजन के अनुसार लोकोक्ति उलझी हुई बुद्धि को सुलझाती है और सुलझी हुई बुद्धि को उलझा देती है। अत: माना जा सकता है कि लोकोक्तियाँ और पहेलियाँ लोक साहित्य की दो विद्याएँ हैं, जो अपनी-अपनी पद्धति से अनिर्वचनीय आनन्द का सम्पादन करती हैं।

विद्धानों के अनुसार पहेली के लिए दो शब्द ‘पयाली’ व ‘पारसी’ प्रचलित है, परन्तु सामान्यत: ‘पयाली’ शब्द का ही प्रयोग देखा जाता है। ‘पयाल’ शब्द संस्कृत के प्रहेलिका शब्द का विकृत रूप है। हाड़ौती की लोकभाषा में पहेली के अर्थ में प्रयुक्त द्वितीय ‘पारसी’ शब्द विस्मयजनक सा लगता है। यदि ध्यान से देखा जाए तो यह शब्द हिन्दी साहित्य के अन्तर्गत अमीर खुसरो की कविता में इसी अर्थ के अन्तर्गत प्रयुक्त हुआ है। माना तो यह जाता है कि पारसी भाषा की कठिनाई और पहेली की रहस्यमयता व दुरूहता का समन्वय होकर ‘फारसी’ या ‘पारसी’ पहेली का वाचक बन गया है। हाड़ौती की पहेलियों का सूक्ष्म अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि वैदिक युग के विकसित चिन्तन और परिष्कृत अभिव्यक्ति पद्धति के मूल में जो परम्परा विद्यमान है वही इनमें भी चली आ रही है। उदाहरण के लिए लोक मुख से एक पहेली को देखिए:-
च्यार ठंड़ा च्यार गरम, च्यार झरण्या झरे।
एक टांग सूं बारा हरण्यां, न्यारी न्यारी चरे।।
अर्थात् चार ठण्डे हैं, चार गरम है और चार में झरने झरते हैं। बारह हिरनियाँ एक पैर से खड़ी होकर अलग-अलग (घास) चरती हैं। हाड़ौती लोक में प्रचलित इस पहेली में शीत, ग्रीष्म एवं वर्षा इन तीन प्रधान ऋतुओं तथा बारह महिनों का संकेत है और यही है हाड़ौती लोक साहित्य की प्रहेलिका का प्रमुख बुद्धि—विलास जिसमें मनोरंजन भी है और बुद्धि वैभव का प्रदर्शन भी। श्रोता की बुद्धि परीक्षा यहाँ ऐसी ही प्रहेलिकाओं से ली जाती थी। इन प्रहेलिकाओं के अध्ययन से यह बात भी सामने आती है कि विवेच्य भू-भाग में इनके द्वारा सारा वातावरण काव्यमय बना दिया गया है। भोजन करते समय, पानी भरने जाते समय, भोजन बनाते समय पति पत्नी अथवा स्त्री पुरूषों द्वारा एक—दूसर को पहेली का अर्थ बताने के लिए कहा जाता था। हाड़ौती की पड़ोसी स्त्रियाँ अपनी बातचीत ही पहेली में किया करती थीं। यह समूचा परिदृश्य देखा जाए तो अमीर खुसरो की पनहारियों में होती पहेली वार्ता का दृश्य ताजा कर देता है। हाड़ौती में उदाहरण हेतु एक स्त्री तंबाकू मांगने के लिए अपनी एक पड़ोसी सहेली के पास जाकर इस प्रकार कहती है:-
पत्थर दन्तरी छे सखी? संसारी में सार,
थ्हारे होवे तो दे सखी, म्हारो कारज सार।
अब दूसरी सहेली इसका उत्तर देते हुए इस प्रकार कहती है:-
बंटी बटाई छे नहीं, म्हारें पास बणाय,
बना पुरस की नार छे, धर दयूंगी पूगाय।
विवेच्य भू-भाग में प्रहेलिकाओं की रचना सरल और सीधी सादे ढंग से की जाती है। उनका कलेवर गद्य और पद्य दोनों से निर्मित हो सकता है। पद सन्धि का तो उनमें प्रश्न ही नहीं है। यह प्रहेलिका अपने स्वरूप, शैली, आयु के विषयों पर वर्गीकृत की जाए तो इसके भेद निम्न प्रकार के होंगे— धार्मिक और आध्यात्मिक, प्रकृति सम्बन्धी, जिनमें पशु-पक्षी, वृक्ष व पंचभूतादि वर्ग है। शरीर अवयव और मनोविकार सम्बन्धी, प्रसाधन वस्तु, गृहोपयोगी वस्तु, भोजन एवं व्यसन सम्बन्धी जिनमें दुग्ध, पकवान, शाक, फल वर्ग आदि हैं। इसके अलावा कृषि, कर्म-उपकरण व उपज सम्बन्धी तथा जातीय एवं व्यवसाय प्रमुख हैं। इनमें लोक जगत के तीज, त्योहार, मनोरंजन एवं रीति—रिवाज भी हैं।

हाड़ौती के लोक साहित्य में हाड़ौती के गद्य का प्रथम रूप हमें राज्य युगीन मिले ताम्र पट्टों, परवानों में दिखायी देता है। इस गद्य में संस्कृत के श्लोकों की हाड़ौती में की गई उस समय की व्याख्या भी मिलती है। इस गद्य का दूसरा रूप हमें रामायण, गीता व संस्कृत के काव्य ग्रन्थों के हाड़ौती गद्यानुवाद में मिलते हैं, सूचना तो यहाँ तक मिलती है कि हाड़ौती में कालिदास द्वारा विचरित रघुवंश का भी अनुवाद हुआ था।

हाड़ौती पद्य की बात करे तो इसके इसमें सर्वोत्कृष्ट रचना ‘परथीराज की लड़ाई’ है। यह युद्ध वर्तमान झालावाड़ मुख्यालय से लगभग 25 किमी दूर पूर्व में स्थित खीची राजपूतों की मध्ययुगीन राजधानी महू-बोरदा के महलों, दुर्ग में घटित हुई थी। इसे डेढ़ दशक पूर्व तक झालावाड़ के मोची मोहल्ले में लोक जगत दशहरे-नवरात्रा पर नगाड़ों के साथ डडेंल जोड़ते हुए गाया जाता था। भाव और कला पक्ष की दृष्टि से यह हाड़ौती की सर्वाधिक एवं प्रभावोत्पादक रचना है।

इस प्रकार यदि विवेच्य भू-भाग मे ंखोज करने या देखने पर हाड़ौती में लिखित गद्य में आयुर्वेद, स्वर शास्त्र, शकुन शास्त्र, शालिहौत्र, तन्त्र-मन्त्र, इतिहास औक्वर वीरता साहित्य यत्र तत्र बिखरे पड़े हैं, जिन्हें सहेजने, गुनने वाला केवल लोकजन है।
हाड़ौती मे ंराजाओं की प्रशस्ति में लिखी स्फुट रचनाएँ भी मिल जाती हैं परन्तु इनका संकलन अभी तक हो नहीं पाया है। बूंदी के सूर्यमल्ल मिश्रण द्वारा रचित वीर सतसई डिंगलका सर्वश्रेष्ठ काव्य है। उसमें तो सर्वत्र हाड़ौती भाषा की शब्दावली है जो यहाँ के लोकमानस में रही। उनका ‘रामरंजाट’ ग्रन्थ हाड़ौती लोक साहित्य की शोभा बढ़ाता है। बूंदी भू-भाग में नैणवा के कवि डूंगरसी और उनके वंशजों ने सामयिक विषयों पर गद्य रचनाएँ लिखीं। हाड़ौती में रचना करने वालों में गौरीलाल घड़ीसाज, बंशीधर का नाम लोक भाषा के सुकवि रूप में इतिहास सम्मत है। कुल मिलाकर जिस समय हाड़ौती के ये वरद पुत्र हाड़ौती के गीतों का गान करते थे उस समय नीरस हृदय व्यक्ति भी सरसता में डूब जाता था।

हाड़ौती लोक साहित्य का यह क्षेत्र अभी तक अछूता है। इसे जीवित रखने वाले अब नहीं हैं। कण्ठ भी अवरूद्ध हो गए है। पारम्परिक स्थानों पर लोक संस्कृति का स्थान आधुनिकता ने ले लिया। भाषा गाँवों, पनघटों, खेतों से सिमटकर टी.वी. चैनल पर आ ठहरी है। मौखिक परम्परा की लोक आवाजों में अंग्रेजी का बोलबाला हो गया। ऐसी स्थिति में अब एक मात्र मार्ग यह रह जाता है कि नई पीढ़ी इन्हें वापस स्थान-स्थान पर जाकर ढूंढे और जो कुछ जैसा भी जितना भी धरातल पर बचा है- यदि उतना भी समेट ले तो हाड़ौती का लोक साहित्य कम से कम विलुप्त तो ना होने पाएगा। ह्व