योग में ओम् का महत्व

डॉ. स्मिता, इतिहासकार


वर्तमान समय में योग शब्द व्यापक रूप से प्रचलित है और शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो योग से परिचित न हो। योग सिर्फ अध्यात्मिक उन्नति के लिए ही नहीं अपितु किसी भी व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक उन्नति के लिए भी एक महत्वपूर्ण घटक है। योग का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है। ओम् हिन्दू धर्म का प्रतीक चिह्न ही नहीं है बल्कि हिन्दू परम्परा का सबसे पवित्र शब्द भी है। ओम् को अनहद भी कहते हैं और इसे प्रणव भी कहा जाता है।

हमारे सभी वेदमंत्रों का उच्चारण भी ओम् से ही प्रारंभ होता है, जो ईश्वरीय शक्ति की पहचान है। इसका हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिख सभी धर्मों में विशेष स्थान है। यह सिर्फ आस्था ही नहीं है, इसका वैज्ञानिक आधार भी है। प्रतिदिन ओम् के उच्चारण से न सिर्फ ऊर्जा शक्ति का संचार होता है, अपितु शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है और इससे कई असाध्य बीमारियों को दूर करने में मदद भी मिलती है।

आज आधुनिक युग में वैज्ञानिकों ने भी शोध के माध्यम से ओम् के उच्चारण से होने वाले चमत्कारिक लाभ को माना है। योगियों में भी यह विश्वास है कि इसके अंदर मनुष्य की सामान्य चेतना को परिवर्तित करने की शक्ति है। यह मंत्र मनुष्य की बुद्धि व देह में परिवर्तन लाता है। योग और ओम् का अटूट संबंध है।

ओम् एक पवित्र ध्वनि है जिसे कई प्राचीन दार्शनिक ग्रंथों द्वारा ब्रह्मांड की ध्वनि माना जाता है। महर्षि पतंजलि के योग सूत्र के अनुसार ओम् शब्द वो बीज है जिससे दुनिया की सारी ध्वनियों और शब्दों का निर्माण हुआ है यानी ओम् शब्द का अर्थ सृजन से है। पवित्र शब्दांश ओम् वह मौलिक ध्वनि है जिससे अन्य सभी ध्वनियाँ निकलती हैं। यह सभी ध्वन्यात्मक रचनाओं का आधार है।

ओम को ”प्रथम ध्वनि” माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि ब्रम्हांड में भौतिक निर्माण के अस्तित्व में आने से पहले जो प्राकृतिक ध्वनि थी, वह थी ओम की गूँज। इस लिए ओम को ब्रह्मांड की आवाज कहा जाता है।

यह एक घंटे की ध्वनि की तरह है जो धीरे-धीरे एक बिंदु तक धीमी हो जाती है और मौन में विलीन हो जाती है। जो ओम् को प्राप्त कर लेता है, वह पूर्ण में विलीन हो जाता है। संस्कृत में, ओम् को प्रणव कहा गया है, जिसका अर्थ है गुंजन, और इसे असीमित या शाश्वत ध्वनि माना जाता है। यद्यपि यह शब्द भारतीय सनातन संस्कृति, बौद्ध धर्म, हिंदू धर्म और जैन धर्म से जुड़ा हुआ है, परन्तु ओम् का जाप एक आध्यात्मिक अभ्यास है जो संस्कृति और धर्म से परे है।

योग में ओम् का वैसा ही महत्व है जैसे आरती में घण्टे का। ओम् शब्द की प्रतिध्वनि से योग करने वाले को शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक शांति मिलती है। इस पर कई लोगों पर अनुसंधान भी हो चुके हैं। जिनकी एम.आर.आई. की रिपोर्ट से साफ है कि ओम् शब्द सिर्फ सुनने से दिमाग के दाएं और बांए दोनों हिस्सों पर प्रभाव पड़ता है और दोनों हिस्से सक्रिय होते हैं। दरअसल योग हो या ओम् ये ऐसी शारीरिक क्रियाएं और उच्चारण हैं, जो मानव स्वास्थ्य के लिए आश्चर्यजनक रूप से लाभदायी हैं।

हमारी भारतीय दर्शन परंपरा में माना गया है कि संसार का सार ‘वेद’ हैं और वेद का सार है ‘गायत्री मंत्र’ और गायत्री मंत्र का भी सार है ‘प्रणव’ और प्रणव का अर्थ है ओम्। देश-विदेश में हुए शोधों से भी इस बात की पुष्टि हुई है कि ओम् का नियमित जाप कई तरह के असाध्य रोगों के उपचार में रामबाण सिद्ध हुआ है। ओम् सृष्टि का एकमात्र ऐसा स्वर है जिसके उच्चारण में प्राण वायु शरीर के भीतर जाती है, जबकि शेष सभी उच्चारणों में प्राण वायु बाहर आती है यानी ओम् के उच्चारण से हम अधिकतम प्राण वायु अर्थात ऊर्जा ग्रहण करते हैं। इसके स्पष्ट उच्चारण से जो स्पंदन पैदा होता है वह हमारी संपूर्ण शारीरिक रचना को प्रभावित करता है। इसलिए ओम् के जाप को नकारने के बजाय जरूरत तो यह है कि भारतीय ज्ञान परंपरा के इस अनूठे अक्षर को और गहराई से परखा जाए।

आज सम्पूर्ण जगत का मानव निराशा, आक्रोश, अशांति, और असंतोष इन सब से इस तरह घिर चुका है कि वह जगत के कल्याण के लिए सोच भी नहीं पा रहा है। अत: जीवन में शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक संतुलन की बहुत जरूरत है और तीनों के समन्वय को स्थापित करने के लिए ओम् योग अति महत्वपूर्ण है। आध्यात्मिक उन्नति या शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए योग की आवश्यकता व महत्व को प्राय: सभी दर्शनों वह भारतीय संप्रदायों ने एकमत मुक्त कंठ से स्वीकारा है। योग पूर्ण रूप से प्रायोगिक विज्ञान और जीवन जीने की कला है।

ओम् योग एक महत्वपूर्ण चिकित्सा पद्धति है। ओम् का उच्चारण करने मात्र से ही शारीरिक और मानसिक रूप से शांति प्राप्त होती है, और आसपास के वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। अगर नियमित रूप से ओम् का जाप किया जाए तो एकाग्रता और स्मरण शक्ति में वृद्धि होती है तथा तनाव और अनिद्रा जैसी समस्याओं से भी मुक्ति मिलती है।
सनातन धर्म में जिस तरह से पूजा, पाठ व जाप आदि के लिए एक समय बताया गया है उसी तरह से ओम् का उच्चारण भी प्रात: सूर्योदय से पूर्व उठकर शांत वातावरण में सुखासन या पद्मासन मुद्रा में बैठेकर मन में ओम् की आकृति का ध्यान लगाते हुए करना चाहिए। एक बार में 108 बार ओम् का उच्चारण करना चाहिए, नहीं तो कम से कम दस बार तो ओम् का जाप करना ही चाहिए। ओम के जाप से मन और चित् शांत होते हैं तथा तनाव से मुक्ति मिलती है।

ओम् योग एवं ध्यान से आत्मविश्वास में वृद्धि होती है तथा कार्य क्षमता बढ़ती है। ध्यान करने से बुद्धि का विकास होता है। प्रतिदिन योगाभ्यास करके अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता और आन्तरिक ऊर्जा को बढ़ा सकते है। प्रतिदिन योग और ध्यान करने से जीवन आशावादी बनता है। ह्व