शोभनाथ पाठक
मनुष्य असीम शक्तियों का पुंज है। पूजा-अर्चना एवं आध्यात्मिक कार्यक्रमों से उसके मानवीय गुणों का विकास होता है, जबकि इसके प्रतिकूल आचरण करने पर दानवीय शक्ति का विकास होता है, जो उसके लिए एवं समाज के लिए हानिकारक होता है। मानवीय शक्ति से सर्वत्र सद्गुणों का फैलाव होकर सुख-समृद्धि और शांति का वातावरण बनता है, जिसमें सभी प्रकार के प्राणी सुख का जीवन जीते हैं। इन्हीं सब कारणों से हमारी संस्कृति में मानवीय मंगल के अनेक उपाय किए गए हैं, पूजा-अर्चना के विविध तरीके बताए गए हैं तथा सुख-शांति के पर्याप्त संबल प्रदान किए गए हैं। अपने-अपने पुण्य एवं क्षमता के अनुसार हम इनसे लाभान्वित हो सकते हैं।
भारतीय संस्कृति एक समन्वयात्मक समष्टि है, जिसमें सृष्टि के समस्त चराचर की अपनी-अपनी भूमिका को ऐसे नियोजित किया गया है कि सभी अपनी-अपनी मर्यादा के अनुसार विकास का लाभ लें। इन्हीं उददेश्यों की पूर्ति के लिए संभवत: सृष्टि के सभी तत्त्वों में देवत्व के दर्शन कर उसके संरक्षण एवं विकास की कामना की गई है। तभी तो पग-पग पर सत्कर्म करने की शिक्षा देकर सबके कल्याण की कामना की जाती है।
इसी क्रम में विविध प्रकार के पर्व, स्नान एवं व्रत-उपवास आदि की परंपरा हमारी संस्कृति में है। इसी कड़ी में कार्तिक स्नान का भी महत्त्व है, तभी तो कार्तिक माहात्म्य के विषय में बताया गया है कि महर्षि अत्रि ने अगस्त्य मुनि से कार्तिक मास की महत्ता के विषय में बताया है कि कार्तिक मास के समान सुखद और कोई महीना नहीं होता। बरसात के बाद अर्थात् वर्षा ऋतु की समाप्ति एवं शरद् ऋतु के प्रारंभ का यह कार्तिक महीना बड़ा सुखद प्रतीत होता है। जब वर्षा के कीचड़ और भारी वर्षा की तबाही से मुक्ति पाकर मनुष्य कार्तिक महीने की हल्की ठंड में बड़े आनंद की अनुभूति करता है। न अधिक गरमी, न अधिक वर्षा, न अधिक जाड़ा; अपितु गुलाबी सर्दी के नाम से सराहा जाने वाला कार्तिक महीना दीपावली की दिव्यता में वैसे भी द्विगुणित हो जाता है तथा प्राकृतिक सौंदर्य भी इस समय निखरा-निखरा सबको मोह लेता है। इस प्रकार कार्तिक सर्वश्रेष्ठ महीनों में माना जाता है।
कार्तिक की गुलाबी सर्दी में प्राय: पूरे महीने भर स्त्रियाँ कार्तिक स्नान करती हैं। प्रात:काल ब्राह्म मुहूर्त में उठकर वे समूह बनाकर जब सुमधुर गीत गाती हुई तालाब, कुएँ, नदी आदि पर जाती हैं और स्नान कर, दीप चढ़ाकर जब लौटती हैं तब एक अनुपम आह्लादक वातावरण बन जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो यह छवि और भी छलक पड़ती है, जब काफी संख्या में महिलाएँ एक साथ कार्तिक स्नान का पारंपरिक आयोजन करती हैं। इस अवसर पर जलाए जाने वाले दीपकों की लुभावनी लौ ब्राह्म मुहूर्त की पवित्रता को द्विगुणित कर देती है, जब तुलसी मैया के चौरे पर भी दीपक जलाकर कल्याण की कामना की जाती है। इस अवसर पर तुलसी की पूजा का बहुत अधिक महत्त्व है; जैसा कि शास्त्रों में बताया गया है-इस अवसर पर तुलसीदल का प्रसाद तो मानो सोने में सुगंध का काम करता है। एक तो प्रात:काल ब्राह्म मुहूर्त में उठना वैसे भी हमारी संस्कृति में श्रेष्ठ माना गया है, दूसरे स्नान-ध्यान, पूजा-पाठ, दीप-दान आदि धार्मिक अनुष्ठान सर्वांगीण मंगल के लिए अत्यधिक लाभकारी होते हैं।
कार्तिक मास की महत्ता में हमारे पौराणिक आख्यान बड़े प्रेरक बताए गए हैं। महर्षि वसिष्ठ ने महाराज जनक को भी इस मास की महत्ता के विषय में बताया था। सूतजी ने भी कार्तिक माहात्म्य पर बहुत कुछ बताया है। हमारे पौराणिक साहित्य में तो इन समस्त धार्मिक अनुष्ठानों एवं व्रत-उपवासों की महत्ता का भरपूर बखान किया गया है। भगवान् विष्णु का प्रसंग कार्तिक मास से जोड़कर कहा गया है कि- भगवान् विष्णु क्षीरसागर में शयन के पश्चात् कार्तिक मास में जाग जाते हैं तथा भगवान् श्रीहरि सर्वव्यापी होकर श्रद्धालु भक्तों की पूजा-अर्चना स्वीकार करते हैं। अत: कार्तिक मास के स्नान ध्यान, पूजा-पाठ की उक्त परिप्रेक्ष्य में अधिक महत्ता है।
यही नहीं वरन् और भी कहा गया है कि इस कार्तिक महीने के धार्मिक अनुष्ठान में प्रत्येक श्रद्धालु को अपने दैनिक कार्य संपन्न करने के पश्चात् विष्णु या शिव के मंदिर में जाकर अपनी शक्ति के अनुसार दीप, नैवेद्य आदि से आराधना करनी चाहिए।
भगवान् की पूजा-अर्चना में जितना अधिक समय संभव हो, लगाना चाहिए। इससे मानसिक शुद्धि तो होती ही है, पूरा वातावरण परिष्कृत होकर मंगलमय बन जाता है। इस प्रकार के वातावरण का प्रभाव दुर्जनों पर भी पड़कर उन्हें सज्जन बनाने में सहयोगी होता है। अत: कार्तिक मास का अनुष्ठान बहुत उपयोगी एवं लाभप्रद होता है, जिससे आत्मिक, सामाजिक संचार के साथ पापों का नाश होकर मुक्ति प्राप्त होती है।
जैसा कि बताया गया है कि पुनर्जन्म से मुक्त होने के लिए, भवसागर से पार उतरने के लिए, समस्त पापों से छुटकारा पाने के लिए कार्तिक महीने का धार्मिक, सांस्कृतिक अनुष्ठान प्रत्येक दृष्टि से किया जाना आवश्यक है।
कार्तिक मास में रुद्राभिषेक किया जाना भी अत्यधिक पुण्यकारक होता है। यदि सोमवार का दिन हो और उस दिन एकादशी तिथि पड़ जाए, तब तो कहना ही क्या-पुण्य-ही-पुण्य है। अत: कार्तिक मास का प्रत्येक दिवस-तिथि-क्षण पुण्यमय होता है। कार्तिक मास में शिवक्षेत्र या विष्णुक्षेत्र को दीप-मालाओं से अलंकृत करने पर बहुत अधिक पुण्य मिलता है। ज्ञान, बुद्धि के साथ मुक्ति भी मिलती है।
कार्तिक महीने की पावनता में नियमपूर्वक स्नान, ध्यान, पूजा-पाठ, देव-दर्शन, दीपदान आदि धार्मिक, सांस्कृतिक कार्य करने से सहस्रों अश्वमेध यज्ञों का पुण्य प्राप्त होता है। इस जन्म के तथा पूर्वजन्म के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। (साभार : सांस्कृतिक प्रतीक कोश)




