उमेश पाठक
लेखक सूकरक्षेत्र शोध संस्थान, उ.प्र. से संबंद्ध हैं।
सोरों सूकर क्षेत्र और अयोध्या का सम्बन्ध पुराणेतिहास काल से इतिहास और आज तक है। भगवान राम को जन—जन का राम बनाने में सूकर क्षेत्र सोरों में जन्मे विश्ववंद्य तुलसीदास का सर्वाधिक योगदान रहा है। राम और उनके पूर्वज ही नहीं अयोध्या का जनमानस भी सूकर क्षेत्र में अपनी श्रद्धा का विनियोग करने आते रहे हैं। अयोध्या का राजवंश सूर्यवंशी राजवंश कहा जाता है। अयोध्या में राम जन्म भूमि की खुदाई के समय भगवान वराह की प्रतिमा प्राप्त हुई थी इससे भी अयोध्या का राजवंश की पृथ्वीनाथ के प्रति श्रद्धा भाव का पता चलता है।
सूर्यवंशी क्षत्रियों के आदि पुरुष भगवान सूर्य हैं। इनके पुत्र मनु और मनु के दस पुत्रों में इक्ष्वाक थे, जिन्होंने अयोध्या को राजधानी बनाया था। राम के पूर्वजों में अनेक लोक लोकान्तर प्रसिद्ध राजा—महाराजा हुए हैं। इनके वंश/कुल को रघुवंश इक्ष्वाक वंश या सूर्य वंश कहा जाता है। वराह पुराण अध्याय 137 में वर्णन आता है कि भगवान सूर्य की दोनों पत्नियों संध्या और छाया के कोई संतान नहीं हुई तब वह सूकर क्षेत्र (सोरों) में आकर सन्तान कामना से तपस्या रत हो गये और दस हजार वर्ष तक कठोर तपस्या की तब परमसत्ता भगवान नारायण धरणीधर के आशीर्वाद से उन्हें संतान प्राप्त हुई थी। जब भगवान नारायण सूर्य को आशीर्वाद देने हेतु उनके सामने प्रकट हुए उस समय उन दोनों के मध्य जो संवाद हुआ वह ‘गीताज्ञान’ का पृथ्वी पर दूसरा चरण था। इस आख्यान से स्पष्ट है कि सूर्य द्वारा सूकर क्षेत्र सोरों में तपस्या करने के प्रभाव से ही सूर्यवंश की वृद्धि हुई गीता ज्ञान प्राप्त हुआ। अत: सूर्य व सूर्यवंशियों के लिए सोरों सूकर क्षेत्र उपास्य स्थल श्रद्धा और पूजा का स्थल है। समय—समय पर सूर्यवंशी राजा महाराजा व अयोध्या का जनमानस अपनी श्रद्धा, तप, नमन, वन्दन, पूजन आदि करने के लिए यहाँ पधारते रहे हैं। अत: सूर्य वंश की उत्पत्ति का हेतु स्थल है सोरों सूकरक्षेत्र।
ऐतिहासिक विवरण के अनुसार चालुक्य सोलंकी क्षत्रियों ने भी अयोध्या को अपनी राजधानी बनाकर शासन किया था। चालुक्य सोलंकियों की उत्पत्ति का स्थल भी सोरों सूकर क्षेत्र ही है। चालुक्यों के आदि पुरुष हारीत देव को ग्यारह पुत्रों में वेणु टीलाइती कुअर थे। इनके सात विवाह हुए तथा बत्तीस पुत्र हुए। इनमें सोनमति सबसे बड़े थे इनका पुत्र भौनदेव का पुत्र अजित का पुत्र नरसिंह का पुत्र रावरे अजयदेव था, जिसने अयोध्या पर शासन किया था इस तरह सूकरक्षेत्र सोरों और अयोध्या का पौराणिक काल और एतिहासिक कालीन सम्बन्ध स्थापित ज्ञात होता है।
पृथ्वी पर गंगा अवतरण हेतु जब महाराज सगर के पौत्र प्रपौत्र प्रयासरत थे तब भी यह स्थान सोरों सूकर क्षेत्र उनकी तप: साधन का स्थान था। सूकर क्षेत्र सोरों एक सुरम्य अरण्य भी रहा है। जहाँ महाराज हरिश्चन्द्र ने एक जंगली सुअर का वध किया था।
वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड 41 वां सर्ग 25 वें श्लोक के अनुसार सगर गंगा को लाने के बारे में कोई निश्चय न कर सके। बालकाण्ड सर्ग 42/4 के अनुसार अंशुमान ने 32 हजार वर्ष तक तपोवन सूकर क्षेत्र में तपस्या की थी फिर स्वर्ग प्राप्त किया। बालकाण्ड सर्ग 42/5-8 अंशुमान के पुत्र दिलीप इसी चिन्ता में रहते थे कि पितरों का उद्धार कैसे हो। वे रुग्ण होकर मृत्यु को प्राप्त हुए। बालकाण्ड सर्ग 42/11 के अनुसार भगीरथ के कोई सन्तान न थी। उन्हें यह ज्ञात था कि उनके वंश के आदि पुरुष सूर्य को सन्तान की प्राप्ति सोरों सूकरक्षेत्र में तपस्या करने से हुई थी। भगीरथ अपने दोनों अभीष्टों की पूर्ति के लिए आदि गंगाजी के तट पर सोरों सूकर क्षेत्र में तपस्या करने लगे थे।
योगवशिष्ठ निर्वाण प्रकरण में वर्णित है कि राजा भगीरथ अपने गुरु त्रितल के साथ त्याग और वैराग्य आदि पर चर्चा कर रहे हैं। इसी प्रकरण में आगे आता है कि भगीरथ ने एक सहस्र वर्ष तक तप करके गंगा को पृथ्वी पर लाकर कपिल की क्रोधाग्नि से भस्मीभूत हुए पितामहों को तारने के लिए सब कुछ त्याग दिया था और वह अरण्य में तप करने के लिए चले गये। वह अरण्य सूकर क्षेत्र सोरों ही था। यहाँ आदि गंगाजी भी थीं। भगीरथ इन्हीं के सामीप्य में बैठ कर इन्हें प्रसन्न कर अभीष्ट चाह रहे थे कि गंगाजी वहाँ चले जहाँ कपिल के शाप से भस्मीभूत हुए उनके पूर्वज हैं। आदि गंगाजी ने भगीरथ से प्रसन्न होकर कहा कि मैं तो अपने सूकर क्षेत्र में ही रहती हूँ, तुम मेरे जैसे स्वरूप वाली गंगा की आराधना करो वह तुम्हारे पूर्वजों का उद्धार करेंगी तब भगीरथ ने गंगा ब्रह्माजी विष्णु महेश की आराधना की थी।
गंगा अवतरण के संदर्भ में ज्ञात होना चाहिए ‘गंगाजी’ और ‘गंगा’ दोनों अलग हैं। वाल्मीकि रामायाण बालकाण्ड 42/23 के अनुसार ‘गंगा हिमवत सुता’ हैं और गंगाजी ‘आदि’ हैं, साक्षात ब्रह्म का निराकार रूप है, जो कल्पर्यन्त तक सूकर क्षेत्र सोरों में विराजती है। इन्हें ‘आदि गंगाजी’, ‘हरि की पौड़ी’, ‘बूढ़ी गंगा’, ‘वृद्ध गंगाजी’, ‘हरिपदी’, ‘वराह कुण्ड’ आदि नामों से जाना जाता है। ध्यातव्य है कि ब्रह्माजी के पुत्र दक्ष प्रजापति के यज्ञ जिसमें भगवान शंकर का विरोध हुआ था उस यज्ञ के बाद यज्ञ का ‘अवमृथ’ नामक स्नान गंगाजी में किया गया था यह गंगाजी जहाँ अवस्थित थीं यह स्थान सोरों सूकर क्षेत्र ही तो है। तब तक गंगा (भागीरथी) पृथ्वी पर कहाँ थीं? जब गंगा भगीरथ से प्रसन्न होकर पृथ्वी पर अवतरित हुई तब पहले वे भगीरथ के साथ सूकर क्षेत्र में अपनी स्वरूपा गंगाजी से मिलीं फिर सगर पुत्रों का उद्धार किया।
रामचरितमानस बालकाण्ड के अनुसार अयोध्या से मुनि विश्वामित्र के साथ राम-लखन चलते हैं। रामायाण बालकाण्ड 26 वें सर्ग के अनुसार ताड़का का वध राम करते हैं फिर मुनि के आश्रम में पहुंचते हैं उन्हें दिव्यास्त्र प्रदान करते है। यज्ञवाट (पहाडपुर) निकट सूकर क्षेत्र यहाँ ऋषि विश्वामित्र का सैन्य विज्ञान भगवान राम ने जब शौरद्वीप में यज्ञ किया था तब कुछ समय यहाँ (सोरों सूकरक्षेत्र) में निवा यज्ञ की रक्षा के समय राम मारीच को मारते हैं। वहाँ कुछ दिवस निवास के समय उन्हें जनकपुर में धनुष मिलता है तब वे मुनि विश्वामित्र के साथ आगे जाते हैं और गौतम की पत्नी अहिल्या (जिसका नाम तुलसी है) का उद्धार करते हैं। वहाँ से राम पावन गंगा पर पहुँचते हैं वहाँ वे मुनि से गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की कथा सुनते हैं। रामचरितमानस बालकाण्ड 211/1 के अनुसार चले राम लछिमन मुनि संगा। गए जहाँ जग पावन गंगा।। लिखा है यहाँ प्रश्न यह है कि गंगाजी तो सभी जगह पावन है फिर पावन गंगा विशेषण गंगा के लिए क्यों लिखा गया है? यहाँ मानसकार का पावन गंगा का आशय सूकर क्षेत्र सोरों अवस्थित गंगाजी की ओर संकेत है।
भगवान राम के ससुराल पक्ष मिथिला का सम्बन्ध भी सूकर क्षेत्र से रहा है। देवी भागवत के एक प्रसंग के अनुसार सीताजी के पिता भगवान वराह हैं तथा माता देवी पृथ्वी है। पृथ्वी देवी एक हजार वर्ष तक भगवान वराह की पत्नी के रूप में रही थीं तब सीताजी का जन्म हुआ था। मिथिला जनकपुर में तो उनका प्राकट्य हुआ सब जानते हैं कि जानकी भूसुता हैं। वाल्मीकि रामायाण बालकाण्ड सर्ग 71 में जनक जी सीता और उर्मिला के विवाह राम लक्ष्मण के साथ करने की प्रतिज्ञा करते हैं। इसी प्रसंग में वर्णन है कि संकिसा (सांकाश्च जनपद फर्रुखाबाद) का पराक्रमी राजा सुन्धवा था, उसने मिथिला को घेर लिया था और सीता को शिवजी का धनुष उसे सौंपने की बात कही तब जनक के साथ युद्ध में सुन्धवा मारा गया। और कुशध्वज जो जनक सीरध्वज के भाई थे को वहाँ का राजा बनाया गया।





