चक्रव्यूह, पद्मव्यूह और आज की राजनीति

राजीव रंजन
एनएचपीसी में इंजीनियर तथा प्रसिद्ध लेखक


पिछले दिनों संसद में एक वरिष्ठ राजनेता द्वारा चक्रव्यूह और पद्मव्यूह को एक ही उद्धारित किया। हिन्दी भाषा का सामान्य से सामान्य विद्यार्थी भी बता सकता है कि चक्र और पद्म दो अलग- अलग वस्तुएं हैं एवं उनका आकार तथा संरचना भी भिन्न-भिन्न है। महाभारत के महायुद्ध में चक्रव्यूह और पद्मव्यूह दोनों का ही पृथक-पृथक संदर्भ प्राप्त होता है। इसलिए चाहे महाभारत हो, रामायण हो अथवा कोई अन्य प्राचीन भारतीय वांग्मय, इससे संदर्भों को ग्रहण करते समय हमें पर्याप्त सावधानी रखनी चाहिए। गलत उद्धरण भ्रम उत्पन्न करते हैं और ग्रंथों की विश्वसनीयता तथा प्राचीन ज्ञान का माहौल उड़ाने वालों को बल प्रदान करते हैं।

प्राचीन भारतीय युद्ध-कला का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है व्यूह रचना। उन दिनों आक्रमण कब और किस दिशा से हो नहीं कहा जा सकता था, इसलिए पुरा-पुस्तकें कहती हैं कि यदि शत्रु के पीछे से आक्रमण करने का अंदेशा हो तो शकट व्यूह का निर्माण किया जाए, दाहिने या बायीं ओर से आक्रमण की सम्भावना हो तो वाराह या मकर व्यूह का निर्माण हो, आगे अथवा पीछे से आक्रमण हो सकता है तो गरुड व्यूह बनाया जाये, यही नहीं यदि चारों ओर से आक्रमण की संभावना प्रतीत होती है तब चक्रव्यूह का निर्माण किया जाना चाहिए। इसी आलोक में महाभारत काल के कुछ महत्वपूर्ण व्यूह और उनकी निर्माण पद्धति पर चर्चा करते हैं। महाभारत युद्ध अठारह दिवस तक चला। इस युद्ध में आरंभिक चौदह दिन तो दोनों पक्षों की ओर से किसी न किसी तरह की व्यूह-रचना का उल्लेख मिलता है, लेकिन इसके बाद जैसे-जैसे दोनों ओर की सेनाएं क्षीण हो गईं, युद्ध के परिणाम एक ओर झुकने लगे लगभग अराजकता की स्थिति निर्मित हो गई थी। अंतिम चार दिनों में भी युद्ध हुए लेकिन कमोबेश किसी व्यूह विशेष का उल्लेख नहीं मिलता। पाण्डवों द्वारा जो व्यूह रचनायें की गई वे हैं वज्र व्यूह, क्रौंच व्यूह, अर्धचंद्र व्यूह, श्येन व्यूह, मकर व्यूह, श्रृगाटक व्यूह, दुर्जेय महाव्यूह, मण्डल अर्धव्यूह तथा अर्ध चंद्रव्यूह। इन व्यूहों के समानांतर कौरवों द्वारा निर्मित किये गए व्यूह थे सर्वतोमुखी व्यूह, गरुड़ व्यूह, व्याल व्यूह, मकर व्यूह, महा व्यूह, सर्वतोभद्र व्यूह, शकट व्यूह, सुपर्ण व्यूह, चक्रव्यूह तथा चक्रशकट व्यूह। प्राय: सभी व्यूह ऐसे हैं जिनकी संरचना कैसी होगी इसको नाम से ही समझा जा सकता है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात है कि महाभारत के युद्ध में अ_ारह दिन के अंतर्गत बनाए गए व्यूहों में कमल अर्थात पद्मव्यूह का उल्लेख नहीं आता है, तब इसका प्रयोग, व रचना कब की गई थी?

चयनित उदाहरण लिए जायें तो क्रौंच व्यूह महत्व का है। किसी उड़ते हुए क्रौंच अथवा सारस पक्षी को देख कर इस व्यूह की रचना की गयी थी। सामने की ओर नुकीली चोंच, दोनां ओर खुले हुए पंख और पीछे की ओर पैर जिसके पंजे फैले हुए हैं। चोंच की आकृति साफ करती है कि सीधे प्रतिपक्षी की सेना में घुस जाना है, जबकि खुले हुए पंख मुख्य आक्रांता दल की सुरक्षा सुनिश्चित करते थे। क्रौंच व्यूह की काट गरुड़ व्यूह हुआ करता था। गरुड़ चूंकि क्रौंच का स्वाभाविक शत्रु है अत: उसकी शारीरिक गठन और उड़ान शैली की नकल का व्यूह रचती सेना मजबूत प्रत्याक्रमण प्रस्तुत करती थी। इसी कड़ी में यदि मण्डल व्यूह की बात की जाये तो यह अपने आकार-प्रकार में अर्धचंद्राकार हुआ करता था। यह यह एक रक्षात्मक व्यूह था जिसमें सेनानायक मध्य भाग से नेतृत्व करता था। सम्पूर्ण व्यूह कई छोटे-छोटे दलों में विभाजित था जिसका नेतृत्व दलनायक के हाथों में था। इसी तरह वज्र व्यूह आकार-प्रकार में भी किसी वज्र सदृश्य ही था जिसमें सेनानायक आगे से नेतृत्व करता था, मध्य भाग में महारथी समुपस्थित होते, जबकि पिछला भाग कतारबद्ध सैन्यशक्ति हुआ करती थी। मकरव्यूह वस्तुत: मगरमच्छ की आकृति की व्यूह रचना थी जिसमें सिर, आँख, तुण्ड, ग्रीवा, पीठ, दायें और बायें हिस्सों सहित पैरों वाले भाग पर महारथी रहा करते थे। अर्धचंद्र व्यूह उस आधे चंद्रमा की आकृति का हुआ करता था जिसके आगे सितारा हो। इस व्यूह में सितारे वाले भाग पर मुख्य आक्रमणकर्ता, मध्यभाग में राजा, दोनो कोणों सहित समान अंतर पर महारथी सज्जित होते थे। शकट व्यूह किसी रेखाचित्र की तरह लगता है जिसमें सेना और उसके नायकों को आड़े और सीधे की श्रृंखला में सजाया जाता था जो शत्रु में भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर सकता था। सर्वतोमुखी दण्डव्यूह महाभारत के पहले दिवस ही कौरव सेनापति भीष्म द्वारा निर्मित किया गया था जिसका अग्रभाग छह महारथियों से सज्जित चक्राकार था जबकि पिछला भाग समानांतर श्रृंखला में खड़ी हुई सेना थी। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि व्यूहों के नाम ही उनकी संरचना के द्योतक थे, इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि चक्रव्यूह और पद्मव्यूह भिन्न-भिन्न हैं। चक्रव्यूह की संरचना घूमते हुए चक्र सदृश्य तथा पद्मव्यूह की संरचना कमल के पुष्प सदृश्य हुआ करती थी। इन्हें क्रम से समझते हैं।
महाभारत युद्ध के तेरहवें दिवस पर चक्रव्यूह निर्मित किया गया था। इस समय कुरु सेना के सेनापति थे आचार्य द्रोण। यह समय महाभारत युद्ध में विकट परिस्थिति का है। दुर्योधन ने उनके प्रिय शिष्य अर्जुन के नाम पर ताने मार-मार कर द्रोणाचार्य को ऐसा अपमानित किया कि वे विचलित हैं। कुरु पक्ष द्वारा यह विचार किया जाने लगा था कि किसी तरह युधिष्ठिर को बंदी बना लिया जाए। इससे युद्ध ही समाप्त हो जाएगा। इस उद्देश्य में सबसे बड़ा अवरोधक थे अर्जुन। अर्जुन को मार्ग से हटाने के लिए संशप्तकगणों को सोद्देश्य उनके पीछे लगाया गया था, एक बार असफलता मिली। दूसरी बार अर्थात् युद्ध के तेरहवें दिन पुन: संशप्तकगणों को यह कार्य दिया गया था कि वे अर्जुन को युद्ध भूमि से जितना अधिक हो सके दूर ले जाए, इतना अधिक दूर कि इस दिवस के युद्ध समाप्त होने तक वह केंद्रीय व्यूह के निकट भी न पहुँच सके। यह दायित्व बखूबी निभाया गया, इसके पश्चात् महाभारत का द्रोण पर्व उल्लेखित करता है, ”उस समय वहाँ द्रोणाचार्य ने जिस व्यूह का निर्माण किया, वह मध्याह्नकाल में विचरते हुए सूर्य की भाँति शत्रुओं को संताप देता-सा सुशोभित हो रहा था। उसे जीतना तो दूर रहा, उसकी ओर आँख उठाकर देखना भी अत्यंत कठिन था।”

यह उल्लेख अधिक स्पष्ट तब हो जाता है जब महाकाव्य में वर्णित चक्रव्यूह की संरचना को हम ध्यान से देखते हैं। संजय धृतराष्ट्र को बताते हैं कि हे राजन! आचार्य द्रोण ने जिस चक्रव्यूह का निर्माण किया था, उसमें इन्द्र के समान पराक्रम प्रकट करने वाले समस्त राजाओं का समावेश था। उसमें चक्र के आरों के स्थान में सूर्य के समान तेजस्वी राजकुमार खड़े किये गये थे। उस समय वहाँ समस्त राजकुमारों का समुदाय उपस्थित हो गया था। इस विवरण में हम चक्र और उसके आरों की कल्पना कर सकते हैं। स्पष्ट है कि आरों की सुरक्षा के लिए सभी कुरु राजकुमारों को लगाया गया था। संक्षेपण करें तो चक्रव्यूह घूमते हुए चक्र की तरह था जिसे संचालित करने के लिये हजारों सैनिकों की आवश्यकता होती थी। चक्रव्यूह में सैनिक निरंतर अपना स्थान बदलते रहते थे जिस कारण व्यूह में अंदर जाने के बाद बाहर निकलने का कोई मार्ग नहीं दिखाई पड़ता था। चक्रव्यूह में सैनिकों की सात सुरक्षा पंक्ति या द्वार थे। पहली सुरक्षा पंक्ति पर सामान्य सैनिक होते थे, दूसरी पंक्ति में अधिक कुशल सैनिक, इसी तरह व्यूह के छठे द्वार तक युद्ध कौशल के अनुरूप योद्धाओं को तैनात किया जाता था। चक्रव्यूह के सातवें द्वार पर महारथी तैनात होते थे। चक्रव्यूह को समझने के लिए उसकी कुछ विशेषताओं पर गौर करते हैं। हम सभी ने वह खिलौना बचपन मे अवश्य देखा होगा जिसमें हम एक लोहे के छर्रे को गोलाकार मार्ग से ध्यान पूर्वक मध्य भाग तक ले जाते हैं। उस लोहे के छर्रे का मध्य तक पहुंचना जितना कठिन होता है बाहर निकालना उतना ही दुष्कर कार्य। ऐसा इसलिए क्योंकि इसमें भीतर प्रवेश करने और बाहर निकालने का मार्ग एक ही होता है। यह किसी लक्षित योद्धा को घेर कर मार डालने का मकडज़ाल जैसा व्यूह है जिसमं सैनिको की सात सुरक्षा पंक्ति हुआ करती थी। चक्रव्यूह मे सैनिकों को चक्र की तरह चलायमान रखा जाता था, इसमे जैसे ही किसी योद्धा अथवा सैनिक की मृत्यु हुई, तत्क्षण उसका स्थान इस तरह दूसरा सैनिक ले लेता कि प्रतिपक्षी को अपने द्वारा की जाने वाली शत्रुहानि का पता ही न चले। लाल रंग की वेशभूषा के कारण भी यह सहजता से संभव हो पाता होगा। हर स्तर के साथ कठिनाई बढ़ती जाती चूँकि सामान्य सैनिकों से आरंभ होने वाली बाह्य पंक्ति अपनी छठवी पंक्ति तक क्रमिकता से कुशल से कुशलतम सौनिकों और योद्धाओं का सम्मिश्रण हुआ करती थी। व्यूह मे फंस चुके योद्धा ने यदि छह चक्रों के छह द्वार तोड़ कर सातवें मे प्रवेश कर भी लिया तो वह वास्तविक कठिनाई के सामने स्वयं को पाता था। यही आखिरी द्वार अभिमन्यु के लिए भी मृत्युद्वार सिद्ध हुआ था। चूँकि इसी में प्रवेश के बाद जो महारथी क्रम से खड़े किए गए थे उनमें थे अश्वत्थामा, कृपाचार्य, शकुनी, दुर्मुख, दु:शासन, द्रोणाचार्य, दुर्योधन, विकर्ण, सुकर्ण और कर्ण।

अब बात पद्मव्यूह की
पद्मव्यूह का उल्लेख सीधे-सीधे इसलिए नहीं होता, क्योंकि इसका निर्माण व्यूह समूह के रूप में अथवा संयुक्त रूप से अनेक प्रकार की व्यूह-रचनाओं को मिला कर किया गया था। स्मरण कीजिए उस व्यूह को जिसका •ोदन अर्जुन भी नहीं कर सका। चक्रव्यूह के प्रथम द्वार पर जयद्रथ खड़ा था जिसे एक दिवस सभी पांडवों को पराजित कर देने का वरदान प्राप्त था। अभिमन्यु के चक्रव्यूह में प्रवेश करते ही प्रथम द्वार बंद हो गया तथा पांडव सेना जयद्रथ रक्षित द्वार का •ोदन कर भीतर प्रविष्ट नहीं कर सकी। इसीलिए अभिमन्यु की वीरगति का दोषी मानते हुए जब अर्जुन ने यह प्रण लिया कि वह सूर्यास्त से पूर्व जयद्रथ का वध कर देगा तब द्रोणाचार्य ने युद्ध के चौदहवें दिवस बहुत ही रुचिकर व्यूह बनाया था जिसे कई व्यूहों का समन्वित कहा जा सकता है। इस व्यूह का उद्देश्य था जयद्रथ को बचाना। इसलिए क्रोध से भरे अर्जुन को थकाने-भटकाने के दृष्टिगत यह लंबे-चौड़े भूभाग पर रचा गया था, इस व्यूह का नाम चक्रशकट व्यूह था। इस व्यूह की लम्बाई चौबीस कोस और उसके पिछले भाग की चौड़ाई दस कोस थी। द्रोणाचार्य ने स्वयं रथी, घुड़सवार, गजपति, पैदल चलने वाले शूरवीर योद्धा और अनेक पराक्रमी राजाओं को योग्य स्थान में स्थित करते हुए चक्रशकट व्यूह बनाया था। महाकाव्य के अनुसार द्रोणाचार्य ने चक्रशकटव्यूह के पिछले भाग में पद्मनामक एक गर्भव्यूह बनाया था, जो अत्यन्त दुर्•ोद्य था। चक्रव्यूह के अगले दिन जिस संयुक्त व्यूह की रचना की गई उसके पिछले भाग में कमल अथवा पद्मव्यूह बनाया गया था। इस व्यूह की रचना चक्रव्यूह की भांति किसी को घेर कर मारने के लिए नहीं, बल्कि जयद्रथ का जीवन बचाने के लिए की गई थी। इसी पद्मव्यूह के मध्यभाग में सूची नामक एक गूढ़ व्यूह और बनाया गया था। सूचीमुख व्यूह के प्रमुख भाग में धनुर्धर कृतवर्मा को खड़ा किया गया था विशाल सेना के साथ स्वयं राजा जयद्रथ सूचीव्यूह के पाश्र्वभाग में खड़ा था। महाभारत के अनुसार यह व्यूह अनुपम था जिसे चौदह दिन के युद्ध में पहले कभी न देखा और न ही सुना गया था। चक्रशकट व्यूह की रचना कर सभी संभावित आक्रमण से जयद्रथ की सुरक्षा का पूर्ण रूप से ध्यान रखा गया था। यह व्यूह अ•ोद्य और अप्रवेश्य था। यद्यपि अर्जुन ने अद्भुत साहस और युद्ध कौशल से युद्ध किया था, परन्तु इस अ•ोद्य व्यूह में सुरक्षित जयद्रथ तक नहीं पहुंच सका। केवल भगवान श्रीकृष्ण की सहायता से जयद्रथ को गुप्त स्थान से बाहर लाकर वध किया जा सका।

कथनाशय यह है कि कौरव सेनापति द्रोणाचार्य द्वारा महाभारत युद्ध के तेरहवें दिन चक्रव्यूह का निर्माण किया गया, जबकि चौदहवें दिन चक्रशकट व्यूह के अंतर्गत पद्मव्यूह का निर्माण किया गया था। चक्रव्यूह ने अभिमन्यु की हत्या निश्चित की अर्थात् उससे एक नकारात्मक ध्वनि उत्पन्न होती है, जबकि कमल व्यूह की निर्मिति जीवन रक्षण के दृष्टिगत थी जोकि सकारात्मक अर्थ देता है।