राजीव रंजन, एनएचपीसी में इंजीनियर तथा प्रसिद्ध लेखक
गुप्तचर शब्द ‘गुप्’ धातु से ‘क्त’ एवं ‘चर’ प्रत्यय से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ है गोपनीय रूप से भ्रमण करने वाला। वेदों में इन गुप्तचरों के लिए ‘स्पश’ शब्द का प्रयोग हुआ है तो शुक्रनीति में शुक्राचार्य इसके लिए ‘गूढाचार’ शब्द का प्रयोग करते हैं। अर्थशास्त्र में चाणक्य इन्हें ‘गूढपुरुष’ कहते हैं, तो पाणिनि की ‘अष्टाध्यायी’ में औपनिषदिक का उल्लेख मिलता है जिसका अर्थ है ऐसा व्यक्ति, जो गुप्त संधानों से अपना जीवन—यापन करता हो। प्राचीन भारतीय वांगमय में गुप्तचर के अनेक पर्यायवाची शब्द मिल जाएंगे, उदाहरण के लिए अपसर्प:, चार:, स्पश:, गुप्तगति:, मन्त्रगूढ:, परतत्त्वज्ञातार्थभ्रमणकर्ता, प्रतिस्क:, हितप्रणी:, उदस्थित: आदि। पर्यायवाची शब्दों का इतना विस्तृत आकाश यह बताता है कि गुप्तचर तत्कालीन राजनीति का अभिन्न हिस्सा हुआ करते थे। विषय में गहरे उतरने से पहले, बुद्ध युग की उस परिघटना का स्मरण कीजिए जबकि मगध नरेश अजातशत्रु ने वैशाली गणराज्य पर आक्रमण करने से पहले अपने विश्वासपात्र मंत्री वस्सकार से मनमुटाव का बहाना किया, उसे देश निकाला दे दिया। यही वस्सकार अब वैशाली जाता है और वहाँ स्वयं को मगध का शत्रु बता कर राजपद पाने में सफल रहता है। गोपनीय रूप से अपने लक्ष्य के लिए कार्य करते हुए वह वैशाली गणराज्य में फूट उत्पन्न करने में ही सफल नहीं होता, अपितु राज्य की गोपनीय जानकारियों को भी मगध भेजता है। वैशाली की पराजय में मगध की यही कूटनीति कारगर सिद्ध होती है, अथवा इस उदाहरण से हमें गुप्तचर की उपादेयता स्पष्ट होती है।
रामायण के लंका काण्ड में अनेक उद्धरण ऐसे हैं जब हम पाते हैं कि रावण ने बारम्बार गुप्तचरों को श्रीराम के शिविर में भेजा जिससे कि वह जानकारियों को इक_ा कर सके और शक्ति का आँकलन कर सके। महाभारत कालीन गुप्तचर व्यवस्था को जानने के लिए उन नीतियों को परखना होगा जो तब की राजनीति का हिस्सा थीं। हम हस्तिनापुर के महाअमात्य विदुर को जानते हैं, जिनकी नीतियों से आज भी प्रेरणा ली जाती है। विदुर गोपनीयता को ज्ञान से जोड़ते हुए कहते हैं ”यस्य कृत्यं न जानन्ति मन्त्रं वा मन्त्रितं परे। कृतमेवास्य जानन्ति स वै पण्डित उच्यते” अर्थात जिस व्यक्ति के कार्य, व्यवहार, गोपनीयता, सलाह और विचार को अन्य लोग कार्य की समाप्ति हो जाने के पश्चात् ही जान पाते हैं, ऐसा व्यक्ति ज्ञानी कहलाता है। विदुर की चर्चा हुई है तो हमें गुप्तचर व्यवस्था के अंतर्गत कूट शब्दों की महत्ता पर भी प्रकाश डालना चाहिए। वे गुप्तचर ही थे जिनके माध्यम से हस्तिनापुर के महा अमात्य को यह ज्ञात हो गया था कि वारणावत में लाख का महल बनाया जा रहा है जिसमें पांडवों को उनकी माता कुंती सहित जला कर मार देने की योजना दुर्योधन द्वारा बनाई गई है। यह सूचना युवराज युधिष्ठिर को देना अमात्य का कर्तव्य था परंतु दुर्योधन के गुप्तचरों की कड़ी निगरानी के कारण सीधे—सीधे ऐसा करना संभव नहीं था। विदुर ने इसलिए कूट भाषा का प्रयोग किया। कूट भाषा वह थी जिसे प्रयोक्ता जो प्राय: अमात्य अथवा गुप्तचर प्रमुख होता था और श्रोता जो प्राय: राजा, युवराज अथवा सैन्य प्रमुख होता था; ही आपस में समझ सकते थे। नीति की शिक्षा देने की आड़ में सूचना और सतर्कता कैसे प्रदान की जाती थी। इसे समझने के लिए वारणावत जाने से पहले के विदुर-युधिष्ठिर संवाद को ध्यान से समझना होगा जो कूट भाषा में है। विदुर कहते हैं कि हे युवराज एक ऐसा तीखा शस्त्र है, जो लोहे का बना तो नहीं है, परंतु शरीर को नष्ट कर देता है। ऐसे शस्त्र के आघात से बचने का उपाय जानने वाले पुरुष को शत्रु नहीं मार सकते। स-प्रसंग इस संवाद को समझें तो सूचना दी गई है कि भवन जिसमें ठहराया जा रहा है, संदिग्ध है। सस्त्र का एक अर्थ निवास अथवा घर भी है, और कूट भाषा में विदुर ने संप्रेषित कर दिया है कि शत्रुओं ने ऐसा भवन तैयार करवाया है, जो आग को भड़काने वाले पदार्थों से बना है। इसी क्रमिकता में विदुर कहते हैं कि युवराज युधिष्ठिर आपको ज्ञात होना चाहिए कि घास-फूस तथा सूखे वृक्षों वाले जंगल को जलाने और सर्दी को नष्ट कर देने वाली आग विशाल वन में फैल जाने पर भी बिल में रहने वाले चूहे आदि जंतुओं को नहीं जला सकती- यह समझकर जो अपनी रक्षा का उपाय करता है, वह जीवित रहता है। इस संवाद में सीधे—सीधे बात नहीं की गई है, सुनने वाले को लगा सकता है कि युवराज को उनका मंत्री नीति संदेश दे रहा है, जबकि स्पष्टत: कहा जा रहा है कि जंगल की आग में चूहे बचते हैं, क्योंकि वे बिलों में रहते हैं, लाख के भवन से एक सुरंग का निर्माण करना होगा जिससे पाण्डव जीवित रह सकें और कौरवों का षड्यंत्र विफल हो जाए। विदुर ने आगे कहा कि हे युवराज युधिष्ठिर,जिसकी आंखें नहीं होती हैं, वह मार्ग नहीं जान पाता, उसे सद्बुद्धि नहीं प्राप्त होती। अर्थात् यह स्पष्ट कह दिया गया कि केवल सुरंग बना लेना पर्याप्त नहीं है आसपास का अन्वेषण-परीक्षण कर लें, दिमाग में स्पष्टता होनी चाहिए कि सुरंग से निकलने की दिशा क्या है, आगे कहाँ से किस ओर सुरक्षित निकल जाना है। इसके आगे यह प्रसंग विस्तारित करने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि सर्वज्ञात है कि गुप्तचर तंत्र, विदुर की सलाह और अपनी सजगता से किस तरह पांडव लाक्षागृह से बच निकले थे।
धृतराष्ट्र की सभा में विदुर जैसे महामंत्री थे जो समग्रता में उच्च कोटि के आदर्शों के संवाहक थे तो कणिक जैसे कुटिल और नियमों से परे सोचने वाले ऐसे मंत्री भी जो कूटनीति को राजनीति का मूल मंत्र मानते थे। एक प्रसंग है कि मंत्री कणिक को बुलाया गया और गोपनीय बैठक में राजा धृतराष्ट्र ने सीधे ही पूछा, ”मंत्रीवर मेरी चिंता का कारण है युवराज युधिष्ठिर। उसे प्रजाजन से जो यश, सम्मान और समर्थन मिल रहा है, मैं उसके प्रति ईष्र्या का भाव रखता हूँ। मुझे पाण्डवों के साथ संधि करनी चाहिए या विग्रह?” इस पर कणिक और धृतराष्ट्र के मध्य संवाद को बहुत ध्यान से सुनिए समझिए। कणिक कहते हैं, राजन एक कथा सुनाना चाहता हूँ। किसी वन में पांच मित्र गीदड़, बाघ, चूहा, भेडिय़ा और नेवला रहते थे। एक हिरण था जिसका सभी शिकार कर खाना चाहते थे। वह चंचल जीव हाथ नहीं आ रहा था। गीदड़ ने युक्ति सुझाई। रात को चूहा, सोते हुए हिरण के खुर कुतर दे। ऐसे में लडख़ड़ाते हिरण का बाघ शिकार कर ले, फिर सभी मिल कर उसे खा लेंगे। अब इसी युक्ति से हिरण का शिकार कर लिया गया। दोपहर की दावत थी। सभी गीदड़ की निगरानी में हिरण को छोड़ नहाने चले गए। एक—एक कर लौटे….बाघ को शार्मिंदा करते हुए गीदड़ ने कहा, चूहा घमंड से कह रहा था, शिकार मैंने किया है। चूहे को विश्वास दिला दिया कि नेवला उसे खाना चाहता है। भेडिय़े से कहा कि बाघ नाराज है, क्योंकि शिकार में उसका क्या योगदान? जब सभी साथी शिकार से विरक्त हो कर चले गए, अकेले पड़े नेवले से कहा कि सभी साथियों को मैंने पराजित कर दिया है, अब तुम मुझसे लड़ लो…भला कमजोर क्यों लड़ता? समूचा हिरण इस तरह गीदड़ ने अकेले ही खाया…ऐसा अचारण करने वाला राजा सुख से रहता और उन्नति को प्राप्त होता है। राजनीति कहती है कि डरपोक को डर दिखा कर, बलवान के समक्ष हाथ जोड़ कर, लोभी को दान से और कमजोर को बल से वश में कर लेना चाहिए। इस कथा के परोक्ष में कणिक ने राजा को साम, दाम, दण्ड और भेद की नीतियों को सोदाहरण स्पष्ट नहीं किया साथ ही गुप्तचर क्यों महत्वपूर्ण हैं और उनसे क्या काम लिया जाना चाहिए इसकी भी बानगी प्रस्तुत की है। कणिक कहते हैं कि राजा सदा शत्रु की गतिविधि को जानने के लिए एकाग्र रहे। अपने राज्य के सभी अंगों को गुप्त रखे। राजा सदा अपने शत्रुओं की कमजोरी पर दृष्टि रखे और उनसे सदा सतर्क रहे। ‘अग्निहोत्र और यज्ञ करके, गेरुआ वस्त्र, जटा और मृगचर्म धारण करके पहले लोगों में विश्वास उत्पन्न करे; फिर अवसर देखकर भेडिय़े की भांति शत्रुओं पर टूट पड़े और उन्हें नष्ट कर दे। जब तक समय बदलकर अपने अनुकूल न हो जाए, तब तक शत्रु को कंधे पर बिठाकर ढोना पड़े, तो ढ़ोये भी। परंतु जब अपने अनुकूल समय आ जाए, तब उसे उसी प्रकार नष्ट कर दे, जैसे घड़े को पत्थर पर पटक कर फोड़ डालते हैं। शत्रु बहुत दीनतापूर्ण वचन बोले, तो भी उसे जीवित नहीं छोडऩा चाहिए। उस पर दया नहीं करनी चाहिए। अपकारी शत्रु को मार ही डालना चाहिए। साम, दाम, भेद एवं दण्ड सभी उपायों द्वारा शत्रु को मार डाले-उसे मिटा दे’। कणिक की नीति कठोर लगती है लेकिन उसने बिना लाग—लपेट राजा को बताया है कि अपने शत्रुओं पर यहाँ तक कि कर्मचारियों पर किस प्रकार दृष्टि रखनी चाहिए। अपने ही सगे—संबंधियों का कहाँ तक विश्वास करना चाहिए? राज्य विरोधी तत्वों की जानकारी कैसे हासिल करनी चाहिए। राजकोष की वृद्धि कैसे करनी चाहिए? अपने विरोधी राजा की सारी जानकारियाँ उसकी सैनिक जानकारी, कैसे हासिल करनी चाहिए और उसका दमन कैसे करना चाहिए।
कणिक और विदुर की नीतियां बहुत हद तक महाभारत युग में राजनीति, कूटनीति और गुप्तचर तंत्र के सहसंबंध को स्पष्ट कर देती है। कणिक के उदाहरणों से हमें भ्रमणशील गुप्तचरों की महत्ता का भान होता है। उदाहरण के लिए वे जब धृतराष्ट्र से कहते हैं कि ‘शत्रु के राज्य में ऐसे गुप्तचर की नियुक्ति करें, जो पाखण्ड-वेशधारी अथवा तपस्वी हो। कणिक उन सभी स्थानों पर जहाँ—जहाँ भी लोग इक_े होते हैं जैसे बाग-बगीचे, मंदिर, मद्यपान के अड्डे, तीर्थ स्थान, चौराहे, कुएँ आदि पर गुप्तचरों की आवश्यक उपस्थिति की बात करता है। यही कारण है कि महाभारत के शांतिपर्व में गुप्तचरों को विविधोपाय कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वह अलग अलग भेष धारण करने में समर्थ था जिससे किसी को भी संदेह न हो और वह शत्रु की शक्ति तथा स्थिति की जानकारी भी सहजता से पा सके। इसके उलट विदुर के गुप्तचर संस्थागत संरचना का द्योतक है। वे राज्य के पूर्ण नियंत्रण में हैं और निश्चित योजना के तहत कार्य करते हैं। वारणावत में सुरंग खोदने वाला खनिक से आरंभ कर पाण्डवों को निश्चित स्थान पर नाव का खड़ा मिलना, समय—समय पर सहायता और सलाह का प्राप्त होना तथा कब उन्हें पुन: प्रकट होना है, इसकी सूचना आदि सब कुछ योजना के तहत है, जो गुप्तचरों के माध्यम से संचालित समन्वयित हो रही है। ज्ञात होता है कि विभिन्न देशों के लिए अलग-अलग गुप्तचर-मण्डल की नियुक्ति होती थी। स्त्रियों की नियुक्ति भी गुप्तचर के रूप में हुआ करती थी।
संक्षेप में यह कहना उचित होगा कि महाभारत के युग ने गुप्तचरों को, उनकी आवश्यकताओं को भलीभांति समझा था तथा उनका उपयोग वे केवल शत्रु देश के विरुद्ध ही नहीं करते थे, अपितु राज्य के भीतर के असंतोष को समझने में भी किया करते थे। यह पद्धति सभी युगों में सामान्य महत्व की मानी रही है। आज का समय भी इससे अछूता नहीं है। ह्व




