वैद्य स्वाति त्यागी
BAMS. PGD-PPHC Garbhasanskar
अम्लपित्त रोग वह विकार है, जिसमें मन्दाग्नि के कारण खाया हुआ अन्न या भोजन उचित रूप से पच नहीं पाता है। इस कारण विदग्ध अन्न शुक्तता को प्राप्त हो जाता है। परिणामस्वरूप अन्न रस विदग्ध पित्त की उपस्थिति के कारण अम्लयुक्त हो जाता है। इस कारण खाया हुआ आहार विदग्ध होकर उसी प्रकार अम्ल (खट्टा) हो जाता है, जिस प्रकार अच्छी तरह से बिना सूखे हुए दही के बर्तन में यदि दूध डाल दिया जाए तो वह फट कर तुरन्त खट्टा हो जाता है। आधुनिक विज्ञान अम्लपित्त को ही ”हाइपर एसिडिटी” बोलता है।
कारण
मात्रा एवं संयोग विरुद्ध भोजन करने से, पुन: भोजन कर लेने से, मैदा एवं उड़द की पि_ी आदि से बने द्रव्य के सेवन करने से, अपक्व मद्य और गोरस (छाछ आदि) के खाने से, गरिष्ठ भोजन करने से, मल-मूत्र आदि के वेगों को रोकने से, अत्यधिक उष्ण-स्निग्ध-रूक्ष, अम्ल और द्रव पदार्थों के अधिक सेवन से, गुड़, राब, चीनी आदि कुलत्थी, भूना हुआ धान्य के अधिक प्रयोग से तथा चिउड़ा पोहा आदि के अधिक सेवन करने से, भोजन के बाद तुरन्त दिन में सोने से अत्यधिक स्नान और अवगाहन करने से, भोजन के मध्य में अधिक पानी पीने से बासी भोजन से वातादि रोग (विशेषकर पित्त) प्रकुपित होकर मन्दाग्नि उत्पन्न कर देता है जिसके परिणामस्वरूप खाया हुआ भोजन समुचित रूप से नहीं पचता है। इस कारण अम्लपित्त या हाइपर एसिडिटी होती है।
रोग का लक्षण
भोजन का भलीभांति पाचन न होना, बिना किसी प्रकार के शारीरिक परिश्रम किए हुए थकावट का अनुभव करना, मिचली आना, कड़वी या खट्टी डकार आना, शरीर में भारीपन की अनुभूति, हृदय प्रदेश एवं गले में जलन तथा अरुचि आदि लक्षण रोगी में मिलते हैं। इसी के आधार पर अम्लपित्त का रोगी कहा जा सकता है-अर्थात् वह व्यक्ति अम्लपित्त रोग (Deases of hyperacidity) से ग्रस्त हो गया।
वमन या विरेचन क्या करना चाहिए
अम्लपित्त रोगी को सर्वप्रथम वमन (उल्टी) कराना चाहिए। इस क्रिया से खट्टा, तीखा, कड़वा एवं दूषित पित्त बाहर निकल जाता है। इससे रोगी को इस प्रकार शान्ति मिलती है जैसे आग या गर्मी से झुलस रहे व्यक्ति को शीतल छाया में। वमन कराने के बाद विरेचन कराना चाहिए। इससे शरीर में अवशिष्ट पित्त, आम आदि दूषित और संचित तत्व बाहर निकल जाते हैं। इस क्रिया के बाद रोगी को स्नेहन देकर अनुवासन वस्ति देनी चाहिए। पुराने अम्लपित्त रोगियों में जो दोष अधिक हो अथवा अनुबन्ध हो तो उसका ज्ञान करके आस्थापन (निरूह) वस्तियाँ देनी चाहिए। कई बार रोगियों में बढ़े हुए दोषों को देखते हुए प्रत्येक सप्ताह वमन और विरेचन कराना पड़ता है। इस प्रकार शरीर के दोषों का निर्हरण हो जाने के बाद प्रमुख दोषों का विचार करके औषधि एवं आहार की व्यवस्था करनी चाहिए।
आहार और जीवन शैली
अम्लपित्त के रोगी को तीखे, खट्टे-चटपटे रूखे, दाहकारक आहार का परित्याग करना चाहिए और बिना पचे हुए भोजन पुन: दुबारा नहीं लेना चाहिए, चाहे वह भोजन कितना ही स्वादिष्ट या अमृततुल्य ही क्यों न हो। तली-भुनी चीजें, मादक पदार्थ, मिर्च मसालों को छोडऩा अति आवश्यक होता है। रात में दही नहीं खना चाहिए। शांत वातावरण में भोजन लें।
घरेलू उपचार
= भुना हुआ जीरा और धनिया के बीज (25 ग्राम प्रत्येक) का पाउडर लें और 50 ग्राम चीनी के साथ मिलाएं।
= सौंफ और मिसरी का सेवन करना चाहिए।
= आंवला का मुरब्बा खाएँ।
= मीठे पान का सेवन भोजन के पाश्चात् लाभकारी है।
= गुलकन्द का सेवन एसिडिटी को कम कर आराम देता है। ह्व





