सावरकर सा कौन!

हरीन्द्र श्रीवास्तव
प्रसिद्ध लेखक


महाराष्ट्र में नासिक नगर से लगभग दस कि.मी. दूर एक छोटा सा गांव है- भगूर। यहां बहती है तेज प्रवाह से मचलती-इठलाती नदी ‘दारणा’, जिसका पाट भले ही बहुत चौड़ा न हो, पर जिसे तैर कर पार कर पाना हर एक के बस की बात नहीं। सन् 1888 ई. के सावन मास में जब यही वेगवती ‘दारणा’ कुछ अधिक उफान पर थी और एक विशाल तैराकी प्रतियोगिता की तैयारी चल रही थी कि तभी जुड़ते हुए दर्शकों ने कुछ विचित्र सा दृश्य देखा। पाँच-छह वर्ष की आयु का एक बालक कहीं से चल कर आया, बिना इधर-उधर देखे भगूर ग्राम की ओर निकल गया। अन्य ग्रामों से आये अधिकांश दर्शक भौंचक्के थे। पर तभी आस-पास के कुछ स्थानीय लोगों ने बताया कि यह जल-पुत्र इसी ग्राम के एक चितपावन ब्राह्मण वंश की संतान है और यह गांव से बाहर आने-जाने के लिए प्राय: यही मार्ग अपनाता है। जल और अग्नि से हंसते-हंसते खेलने वाले इस बालक का प्यार से बुलाने का घर का नाम था ‘तात्या’, लिखने का पूरा नाम विनायक राव दामोदर सावरकर और इतिहास में सदा के लिए अमर हो जाने वाला नाम राष्ट्रपुत्र क्रांतिसूर्य स्वातंत्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर।

आगे चलकर यही बालक भारतीय स्वाधीनता संग्राम का अदम्य योद्धा, कट्टर देशभक्त, क्रांतिकारी समाज-सुधारक, चिंतक, विचारक, दूरदृष्टा, दार्शनिक, लेखक, कथाकार, निबंधकार, नाटककार, आलोचक, पत्रकार, लिपि-सुधारक, वक्ता, कूटनीतिज्ञ व अन्य कितनी ही विलक्षण प्रतिभाओं से सुसम्पन्न होकर अनेक क्षितिजों पर उभरा और उसने लगभग हर विधा में ही अपना अनूठा स्थान बनाया।

28 मई, 1883 को प्रात: दस बजे जन्मे इस मेधावी बालक के पिता का नाम था दामोदर राव पंत और माता का नाम राधा बाई सावरकर। परिवार में जहाँ एक ओर राम-विजय, हरि-विजय, महाभारत आदि का पाठ होता, वहीं दूसरी ओर चाणक्य, चन्द्रगुप्त, प्रताप और वीर शिवाजी के पराक्रम की कथाएं चलतीं और तीसरी ओर समर्थ गुरु रामदास के पद, संत ज्ञानेश्वर और तुकाराम के अभंग भी गूँजते। साहित्य, इतिहास और धर्म की इसी अद्भुत त्रिवेणी के तट पर तात्या एवं उनके दोनों भाइयों एवं एक बहन का लालन-पालन हुआ।

सुन्दर, सुडौल और साहसी विनायक ने छह वर्ष की आयु में भगूर की ‘मराठी मण्डल पाठशाला’ में प्रवेश लिया और कुछ ही दिनों में अपने अद्भुत अक्षर-ज्ञान बोध से भाषा के अध्यापक को हतप्रभ कर दिया।

अपना नाम सीखने के बाद जब उससे, श्यामपट पर ‘स’ अक्षर से पांच अन्य शब्द लिखने को कहा गया, तो उसने सहज आत्मविश्वास से जो शब्द लिखे, वह कुछ इस प्रकार थे— साहस, संगठन, संघर्ष, सफलता तथा स्वाधीनता।

सन् 1893 में जब विनायक मात्र दस वर्ष का था, हैजे से उसकी मां चल बसी और परिवार का सारा भार बड़े भाई बाबा पर आ पड़ा। पर बाबा ने भी अपना पेट काट कर खून-पसीने से अपना दायित्व निभाया।

साहसी और राष्ट्रप्रेमी के संस्कारों में पले हुए इस वीर बालक के अन्तर्मन में सुलगते हुए प्रतिशोध के ज्वालामुखी का विस्फोट तब हुआ जब उसने मई 1899 की एक शाम को तिलक के केसरी में चाफेकर बन्धुओं की फांसी का समाचार पढ़ा। तीव्र ज्वर से पीडि़त 16 वर्षीय यह बालक अपनी कुलदेवी-अष्टभुजा के चरणों में जा बैठा, भिंची हुई मु_ियां, कांपते होंठ और थरथराते हुए स्वर में उसने शपथ ली— ‘हे सिंहवाहिनी, महिषासुर-मर्दिनी मां दुर्गे! मैं तेरे पावन चरणों में बैठकर शपथ लेता हूं कि जीवन के अंतिम क्षण तक सशस्त्र क्रांति का ध्वज लेकर इस नृशंस विदेशियों से जूझता रहूंगा और तब तक चैन से नहीं बैठूंगा जब तक इन पापी पिशाचों को अपनी पवित्र मातृभूमि से खदेड़ न दूं। भले ही इस मुक्ति संग्राम में हम तीनों भाइयों की भी वही नियति क्यों न हो जो तीनों चाफेकर बन्धुओं की हुई।’

मई 1899 में रोपे गए महासंकल्प के इस बीज में शीघ्र ही कोंपलें फूटने लगीं। वर्ष के अन्त से पूर्व ही नासिक में ‘राष्ट्र-भक्त समूह’ नामक एक गुप्त संस्था का गठन किया गया, जो शीघ्र ही विकसित होकर ‘मित्र-मेला’ के नाम से प्रचलित हुई और आधारशिला बनी उस विराट देश-विदेश व्यापी संस्था अथवा संगठन की जिसे इतिहास में ‘अभिनव-भारत’ के नाम से जाना गया।

सन् 1901 में स्थापित ‘मित्र-मेला’ संस्था के तत्वावधान में विनायक ने ‘गणेशोत्सव’ (जो संयोगवश विनायक का ही एक नाम है) ‘शिवाजी महोत्सव’ आदि आयोजित करके सशस्त्र क्रांति के माध्यम से भारत-मुक्ति के लिए योजनाएं बनानी आरम्भ कीं। समय-समय पर गुप्त बैठकें और गोष्ठियां भी होने लगीं। निरंतर जनाधार बढ़ाने के लिए नए-नए सदस्यों को भी सम्मिलित किया जाने लगा। कुछ ही समय में सदस्यों की संख्या इतनी बढ़ गई कि बाईस जनवरी, 1901 को जब महारानी विक्टोरिया का देहान्त हुआ और समस्त देश में शोक सभाएं होने लगीं तो इसी ‘मित्र-मेला’ द्वारा आयोजित एक विशाल बैठक में एक प्रतिसभा ‘शोक-विरोध सभा’ करने का निश्चय लिया गया। मंच से विनायक ने गरज कर कहा—
‘रानी मरे या राजा— प्रश्न यह नहीं है। प्रश्न है कि वह किस देश की रानी या राजा है और यदि इंग्लैंड की रानी का निधन हुआ है तो वह तो हमारे शत्रु देश की रानी थी। फिर भला हम शोक क्यों मनाएं?—क्या यह हमारी दास-प्रवृत्ति का परिचायक न होगा? यदि नहीं, तो फिर कब तक हम इस तरह पराधीनता को स्वीकृति देकर और दिखाकर यह ढोंग करते रहेंगे? क्या कोई बता सकता है कि किसी भारतीय महापुरुष के निधन पर बरतानिया में कभी कोई शोक सभा हुई है?’
इस समाचार से फिरंगी अफसर इस संस्था के मुखिया विनायक के प्रति और भी सजग व सचेत हो गए। अभी एक आग पूरी तरह से दब भी न पाई थी कि नगर में एक और हंगामा हो गया।

रानी विक्टोरिया के उत्तराधिकारी के रूप में जिस दिन (9 अगस्त, 1902) एडवर्ड सप्तम का राज्याभिषेक हो रहा था, उस दिन विनायक एक योजना के अन्तर्गत पवित्र त्र्यंबकेश्वर में स्वयं उपस्थित थे। यहां बड़े जोर-शोर से अभिषेकोत्सव मनाने की तैयारियां हो रही थीं— रंग-बिरंगी झंडियां, तोरण, स्वागत-द्वार, शामियानें, रोशनी, आतिशबाजी और बैंड-बाजे—। कि तभी सुबह दीवारों पर चिपके अजीब से बड़े-बड़े पोस्टरों ने लोगों को दहला दिया। यह कारनामा किस व्यक्ति अथवा संस्था का हो सकता था, यह समझने में अधिकारियों को तनिक भी देर न लगी। इश्तहारों पर अंकित मसौदा कुछ इस प्रकार था—

‘जानते हो तुम लोग ऐसे राजा का अभिषेकोत्सव मना रहे हो, जिसने तुम्हारी मातृभूमि को हड़प कर तुम्हें गुलाम बना कर रखा है। क्या तुम्हें यह बात सोचकर ग्लानि नहीं होती कि हमारे लिए यह अभिषेकोत्सव हमारी गुलामी का जश्न है और क्या यह बात भी समझ में नहीं आती कि विदेशी आततायी के प्रति राजभक्ति का प्रदर्शन करके हम अपने राष्ट्र-प्रेम, दायित्व और स्वाभिमान के प्रति घोर पाप कर रहे हैं?’

व्यंग्य बाणों का आक्रमण यहीं समाप्त नहीं हुआ। सायंकाल के कार्यक्रम में अध्यक्ष ने जब एडवर्ड सप्तम को ‘पिता’ कहकर सम्बोधन किया तो फिर अगली सुबह उन्हीं दीवारों पर एक और अधिक उत्तेजक प्रश्न उकेरा दिखाई दिया— ‘अरे निर्लज्जो, सोचो—, यदि एडवर्ड सप्तम तुम्हारे बाप हैं ते तुम्हारी मां के साथ तुम्हारे पिताजी का क्या रिश्ता है, ऐं—?’
नासिक, पुणे और आस-पास के कई गांव और नगरों में समय-समय पर इसी भाषा में ऐसे विषैले संदेश दिखाई देने लगे।

विनायक के नासिक प्रवास की एक विचित्र बात यह थी कि वह अंग्रेजों और अंग्रेजी सरकार को जितना कोसते और ललकारते, घर पर अंग्रेजी भाषा और साहित्य का उतना ही डट कर अध्ययन करते, ताकि समय आने पर उनको उन्हीं की भाषा में लिख-बोल कर जवाब दिया जा सके। इस कार्य में बड़े भाई बाबा राव ने बहुत सहायता की, और यही कूटनीति सावरकर के लंदन जाने का भी मूल कारण बनी। उनका अमर वाक्य था, ‘शेर को ललकारना हो तो उसकी मांद में घुस कर ललकारो।’ अंग्रेजों के दांव-पेंच और हथकंडे समझने के लिए उन्हें लंदन जाना अनिवार्य लगा। विधि-अध्ययन तो मात्र एक बहाना था– एक मुखौटा, उनकी आंखों में धूल झोंकने का। लंदन से लिखे पत्रों को भी विनायक ने बड़ा ही सार्थक शीर्षक दिया था— ‘शत्रुंच्या शिविरांत’ अर्थात् शत्रु के शिविर से।

दूरदृष्टा विनायक ने जब दूसरे विश्वयुद्ध में भी हिन्दू युवकों से अंग्रेजी सेना में भर्ती होने का आह्वान किया था तो उसके पीछे भी यही रणनीति काम कर रही थी अर्थात्, जब तक तुम आज उनके साथ मिलकर युद्ध में उनकी रणनीति और चक्रव्यूह रचना को नहीं सीखोगे, तब तक समय आने पर उन्हीं संगीनों को घुमाकर उन पर उसका प्रयोग कैसे कर सकोगे?
भाइयों, पत्नी, चार वर्ष के पुत्र प्रभाकर तथा अपने साथियों से विदा लेकर यह तेजस्वी तरुण नए-नए सपने और संकल्प लेकर 9 जून, 1906 को बंबई (अब मुंबई) बन्दरगाह से ‘पर्शिया’ नामक जलपोत पर इंग्लैंड के लिए रवाना हो गया। 3 जुलाई 1906 को सावरकर लंदन पहुंचे।

1906 से 1911 तक के पांच वर्ष जो सावरकर ने लंदन और फ्रांस में बिताए, उनके जीवन-दर्शन के निर्माण की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण थे। यहां रहकर उन्होंने न केवल अंग्रेजी समाज, साहित्य, संस्कृति एवं सभ्यता का, वरन् आंग्ल राजनीति एवं कूटनीति का भी निकट से अध्ययन किया। अपने लंदन प्रवास के मूल उद्देश्य की स्पष्ट अभिव्यक्ति उनके उस भाषण से मिलती है जो उन्होंने 18 नवम्बर, 1958 को बम्बई में दिया था। दादर (मुम्बई) के सागर तट पर विद्यार्थियों के समक्ष अपनी अमर रचना ‘सागरास’ पर उन्होंने कहा था- ‘मेरे लंदन जाने का एक परोक्ष कारण यह भी था कि मैं वहां जाकर बम बनाने का ज्ञान प्राप्त करूं और समय आने पर अंग्रेजों के विरुद्ध ही उनका प्रयोग हो सके।’ ‘शठे शाठ्यम् समाचरेत’ में अटूट आस्था रखने वाले सावरकर का युद्ध-दर्शन, बुद्ध-दर्शन के सर्वथा विपरीत तो था ही, साथ ही उसमें अद्भुत दूरदर्शिता भी निहित थी। यह बात दूसरे विश्वयुद्ध में ‘हिन्दुओं का सैनिकीकरण’ के उदाहरण से प्रमाणित होती है। यहां यह बता देना भी प्रासंगिक होगा कि यही प्रेरणा और आशीर्वाद लेकर 21 जून, 1940 को नेताजी सुभाष बम्बई (मुम्बई) में सावरकर से मिले थे और 2 जुलाई, 1943 को सिंगापुर पहुंच कर उन्होंने ‘आजाद हिन्द फौज’ का गठन किया था। भारत के भूतपूर्व सेनाध्यक्ष जनरल करिअप्पा और जनरल मानिक शॉ ने भी कई स्थानों पर सावरकर के युद्ध-दर्शन को सराहा था। 1983 में पूना में आयोजित सावरकर जन्म-शताब्दी समारोह में सावरकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण करते हुए जनरल मानिकशॉ ने तो यहां तक कह डाला था- ‘यदि 1965 के युद्ध के समय सावरकर प्रधानमंत्री होते तो सम्भवत: युद्ध-विराम के बाद वे हमसे पूछते, ‘तुम जीता हुआ लाहौर छोड़ क्यों आए?’ और हमारा उत्तर यह है कि यदि सावरकर जी प्रधानमंत्री होते तो हम उन्हें यह पूछने का अवसर ही नहीं देते।’ 26 फरवरी, 1966 को इस राष्ट्रभक्त की जीवन-ज्योति मातृभूमि के श्रीचरणों में अर्पित हो गई।

(यह लेख लेखक की पुस्तक ‘कालजयी सावरकर’ के कुछ अंशों पर आधारित है।)