सुर संगत के साक्षी बने साधक

चंद्रप्रकाश तिवारी
संगीत समीक्षक


ध्रुवपद गहरे अनुशासन से जुड़ी संगीत की हमारी विरल परम्परा हैं। इसमें अपने -अपने समय के कलाकारों नें राग की सनातन परम्परा में रहते हुए निरंतर नवाचार किया है। प्राचीन संगीत ग्रंथो में प्रबंध गान का वर्णन आठवीं शताब्दी में ऋषि मतंग के संगीत ग्रन्थ ”बृहद्देशी” से लेकर तेरहवी शताब्दी में सारंगदेव द्वारा लिखित संगीत की परिनिष्ठत ग्रन्थ संगीत रत्नाकर में मिलता है। सारंगदेव नें प्रबंध के एक नए प्रकार का उल्लेख किया जिसे सालगसूड नामसे जाना जाता है और आज जो ध्रुपद गाया व बजाया जाता है ,वह भी प्रबंध का ही एक रूप है।

ध्रुवपद गायन के क्षेत्र में दरभंगा घराने का विशिष्ट स्थान है। इस परंपरा के संगीतकार स्वयं को स्वामी हरिदास और तानसेन से जोड़ते हुए गौड़हार वाणी का गायन करते हैं। इसी परंपरा में पं क्षितिपाल मल्लिक और पंडित नरहरि पाठक मल्लिक (जन्म 3 मार्च 1917 और मृत्यु 30 अगस्त 1990) जैसे यशस्वी ध्रुवपद गायक हुए हैं। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की याद में इंदु भैरवी और आचार्य विनोबा भावे की याद में विनोबा कल्याण जैसे रागों के सर्जक पंडित नरहरि पाठक मल्लिक ध्रुवपद, ख्याल और ठुमरी के विद्वान थे। उन्होंने विभिन्न प्रकार की सैकड़ों बंदिशों की भी रचना की थी। उनकी स्मृति में उनके यशस्वी सुपुत्र डॉ प्रभाकर नारायण पाठक मल्लिक विगत तीन दशकों से एक संगीत समारोह का आयोजन दिल्ली और पटना में करते हैं। इसी श्रृंखला में इस वर्ष यह 2 दिवसीय संगीत समारोह इण्डिया हैबिटेट सेंटर दिल्ली में सम्पन्न हुआ । डॉ प्रभाकर नारायण पाठक मल्लिक इस कुल परम्परा के चौदहवी पीढ़ी के कलाकर हैं जो ध्रुवपद गायन में अपना योगदान एक कलाकार, गुरु व संगीत के प्रचार प्रसार में रत हैं।

समारोह के प्रथमदिवस का आरम्भ गुरु वंदना से हुआ जिसे कविता बाधवा, श्रद्धा अग्रवाल और सोनल रसवासिया ने प्रस्तुत किया। उसके बाद ऋषभ राज ने राग यमन में एक ध्रुवपद प्रस्तुत किया- हर हर महादेव। तत्पश्चात् डॉक्टर प्रभाकर नारायण पाठक मल्लिक ने राग श्री में एक ध्रुवपद से अपने गायन की शुरुआत की राजत चंद्रमा ललाट। उसके बाद उन्होंने एक धमार प्रस्तुत किया- आज रंग भीजन लागी। अपने गायन का समापन उन्होंने द्रुत सूलताल में निबद्ध एक अन्य ध्रुवपद से किया- काली कल्याणी। प्रभाकर बहुमुखी प्रतिभा संपन्न गायक हैं। लय और ताल के दांव पेंच के बीच भी उनके गायन की सरसता और सुरीलापन लोगों को आकर्षित, प्रभावित करती रही और आपके साथ पखावज पर पं मनमोहन नायक और सारंगी पर तनिष धौलपुरी की संगति अत्यंत आकर्षक और सराहनीय रही। इसके बाद बनारस हरिहरपुर घराने के प्रतिष्ठित गायक पं भोलानाथ मिश्र ने राग श्याम कल्याण की सुंदर और प्रभावशाली प्रस्तुति अपने खयाल गायन के माध्यम से की। विलंबित एकताल में-अखियन नीद ना आवे सजनी के बाद अद्धा पंजाबी में पं बड़े रामदास मिश्र जी की रचना शंकर शिव दानी भोलानाथ की उन्होंने बेहद प्रभावशाली व आकर्षक प्रस्तुति की।

इसके बाद उन्होंने त्रिताल में मैं तो जान गई तेरी चतुराई और द्रुत एकताल में श्याम सलोने नैना तोरे-की श्रृंगारिक प्रस्तुति की। इस तरह उनके गायन में विविधता के दर्शन हुए आपके साथ तबले पर जितेंद्र स्वाइन नें सधी व प्रभावशाली संगत किया व हारमोनियम पर जाकिर धौलपुरी और सारंगी पर तनिष धौलपुरी की संगति भी अच्छी और सहयोग पूर्ण रही। गायन पर भोलानाथ के दो शिष्यों शिवम् मिश्रा और शिवम् नायक ने भी अपनी-अपनी प्रतिभा का अच्छा परिचय दिया।
दूसरे दिन का कार्यक्रम ज्योति सुधा द्वारा प्रस्तुत गणेश वंदना से आरम्भ हुआ।

ततपश्चात कोलकाता से पधारी प्रख्यात गायिका रोजी दत्ता पंडित ने राग बागेश्वरि में बड़ा खयाल विलंबित एक ताल से अपना गायन किया। एकताल में सुंदर बोलालाप, तेज तैयार तानों और मुखड़े पर हर बार नए अंदाज से आने की अदा को लोगों ने खूब पसंद किया। महिला गायिकाओं में रोजी दत्ता अपनी एक अलग पहचान रखती हैं। तबला पर उस्ताद अख्तर हसन व हारमोनियम पर पं सुमित ने अच्छी संगति की। दो दिवसीय संगीत समारोह का समापन पं मोर मुकुट केडिया और पं मनोज केडिया के सितार- सरोद की सुरीली और मर्मस्पर्शी जुगलबंदी से हुआ। इन दोनों भाइयों ने माज खमाज जैसे श्रृंगारिक राग को अपनी मुख्य प्रस्तुति के लिए चुना। विलंबित और द्रुत त्रिताल में सुंदर आलाप और पेंचदार तानों की प्रस्तुति के साथ-साथ दोनों भाइयों का आपसी सवाल जवाब और फिर तबला वादक उस्ताद मुस्तफा हुसैन के साथ की जुगलबंदी को दर्शकों ने खूब पसंद किया। दोनों भाई विगत 50 वर्षों से युगल वादन कर रहे हैं। अत: इनका आपसी तालमेल और सामंजस्य स्वाभाविक और प्रशंसनीय है। तबले पर उस्ताद मुस्तफा हुसैन की संगति भी अत्यंत कुशल और सहयोगपूर्ण तथा टक्कर की रही।