महाभारत में शक्ति- उपासना

मधुसूदन उपाध्याय
वैज्ञानिक सलाहकार, प्राकृतिक सम्पदा रक्षा परिषद


राम की शक्तिपूजा से बहुसंख्य लोग परिचित हैं। कृष्ण, अर्जुन और युधिष्ठिर की शक्ति पूजा से भी परिचय प्राप्त किया जाए। महाभारत में शक्ति तत्व बहुत व्यवस्थित है। सकारण बहुत गुप्त, गुप्ततर भी और अकारण प्रकट भी। अनेकों अनेकों प्रमाण और उद्धारण उपस्थित हैं पर हमारी दृष्टि में मुख्य कथानक के यही तीन पात्र कृष्णार्जुन और युधिष्ठिर सर्वाधिक महत्व के हैं। तो आज शक्ति के इन तीनों से संबंधित चरित्र की ही चर्चा करेंगे।

भारत के इतिहास को उठाकर देखते हैं तो पता चलता है कि महान पराक्रमी भारतीय राजा शक्ति की आराधना किसी ना किसी देवी के रूप में करते रहे हैं चाहे अपराजेय योद्धा महाराणा प्रताप हो या फिर तुलजा भवानी के सेवक छत्रपति शिवाजी महाराज। राम हों कि बलराम। परशुराम हों कि कात्र्तवीर्यार्जुन। पृथु हों कि विक्रमादित्य।

सच कहूँ तो क्षत्रिय तेज का जो ईंधन है वह शक्ति-पूजा ही है। रणचंडी दुष्टों के दमन के लिए हमें चिरकाल से रण की प्रेरणा देती रही है। हमारे राम जब रावण पर विजय प्राप्त करते हैं तो वे भी शक्ति पूजा करते हैं । भारत का कोई क्षेत्र नहीं है जहां की अधिष्ठात्री देवी ना हो । ऐसा कोई कुल नहीं है जिसकी कुलदेवी ना हो। शस्त्र धारिणी यह देवियां हमारी शक्ति आराधना का प्रतीक हैं। इतना ही नहीं भारत का कोई भारतीय त्यौहार बिना देवी पूजा के संपन्न नहीं होता।

महाभारत गूढ़तम निगूढ़ है। पञ्चम वेद ऐसे ही नहीं कहा। यह वेदों की तरह ऑल इनक्लूसिव भी है। इसमें वैष्णव शैव शाक्त सौर गाणपत्य सभी सम्प्रदाय अपनी भूमिका बराबर पाते हैं। द्वैत अद्वैत सब साथ चलते हैं। यहाँ सबको बराबर आश्रय है: युद्ध नीति दर्शन, अर्थ, धर्म , काम, मोक्ष, सब। ब्राह्म- क्षात्र समन्वय का अद्भुत ग्रंथ है यह।

महाभारत की विराटता का परिचय पाने के लिए हमारे वह साथी जो महाभारत जैसे विशाल ग्रंथ को पढऩे समझने का अवसर नहीं निकाल सकते। उन्हें वासुदेव शरण अग्रवाल की पुस्तक ‘भारत सावित्री” पढऩे का विनम्र निमंत्रण देता हूँ।
भारत सावित्री ने महाभारत की विशेषताएं गिनाते हुए भारतीय दर्शनों के इतिहास में उपस्थित पांच बड़े मार्गो का औचित्य, इस महान ग्रंथ के संदर्भ में परखा है। इसमें पहला ऋग्वेदकालीन दर्शन है, जिसके दार्शनिक दृष्टिकोण की चर्चा यहां की गई है। दूसरा, उपनिषद युग के अंत और बुद्ध से कुछ पूर्व अस्तित्व में आए उस युग के दर्शन का उल्लेख है, जिसका विवरण ‘श्वेताश्वतर उपनिषद’ में आता है। दार्शनिक विकास का तीसरा मोड़ वह महाभारत के संदर्भ में उस ‘षडदर्शन’ के रूप में देखते हैं जिसके अंतर्गत, मीमांसा, सांख्य, वेदांत आदि आते हैं। विकास की चौथी सीढ़ी पंचरात्र, भागवत, पाशुपत तथा शैव दर्शन के रूप में अभिव्यक्त हुई है, जबकि अंतिम और पांचवां मार्ग, अभिनव शांकर वेदांत, भक्ति आदि दर्शनों के पारस्परिक प्रभाव, सम्मिलन और ऊहापोह आदि के विस्तार से संबंधित है। महाभारत की प्रकृति है कि विविध प्रकार की प्राकृतिक शक्तियों को अपने कौशल द्वारा और भी प्रखर बना लेना। शक्ति साधना यह भी है कि उपलब्ध शक्ति का इस प्रकार नियोजन अथवा विनियोग जिससे वह और लोक कल्याणकारी बन सके।

शक्ति की साधना मातृरूप में की जाती है। वैदिक संहिताओं में अदिति, शची,उषा, पृथ्वी, वाक्, सरस्वती, गायत्री, रात्रि, इला, मही, भारती, अरण्यानी, पृश्नि, सरयू, सीता, श्री आदि देवियों के नाम मिलते हैं।

ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषदों में अंबिका, इंद्राणी, रुद्राणी, शर्वाणी,भवानी, कात्यायनी, कन्याकुमारी, उमा, हैमवती आदि देवियों का उल्लेख मिलता है। सिंधु घाटी सभ्यता में भी देवी उपासना प्रचलित थी। तैत्तिरीय संहिता में अंबिका को शिव-सहोदरा कहा गया है।

महाभारत के वन पर्व में मां दुर्गा को नंद-यशोदा की पुत्री और वासुदेव कृष्ण की बहन बतलाया गया है। अति प्राचीन दस उपनिषदों में से एक केनोपनिषद में उमा-हैमवती नामक एक देवी का उल्लेख मिलता है। इसमें कहा गया है कि देवताओं को ब्रह्म ज्ञान, उमा हैमवती नामक एक स्त्री देवता ने कराया था।

दुर्गा की प्रतिमा समस्त शक्ति अर्थात राष्ट्र शक्ति का प्रतिरूप है। जिस व्यक्ति अथवा व्यक्तियों के सम्मिलित रूप अर्थात राष्ट्र का शारीरिक बल, संपत्ति बल और ज्ञान बल सिंह सदृश है, उस व्यक्ति पर, उस राष्ट्र पर, मां दुर्गा आरूढ़ होती हैं।
राष्ट्र को पशुबल संपत्ति बल एवं ज्ञानबल(क्रमश: कार्तिकेय,लक्ष्मी और सरस्वती इनके प्रतीक और दाता हैं) चाहिए,किंतु बुद्धिहीन के लिए बल, संपत्ति एवं ज्ञान निरर्थक ही नहीं, प्रत्युत आत्म-संहार के लिए प्रबल अस्त्र सिद्ध होते हैं। इसीलिए मंगल बुद्धि के देवता महाकाय गणपति, दुर्गा पूजन का अहम हिस्सा होते हैं। उनकी विशाल बुद्धि और शरीर के भार के नीचे सभी विघ्न (चूहे) दबे पड़े रहते हैं और विवश रहते हैं।

समस्त दिशाओं में फैला हुआ विशेष जन बल राष्ट्र की अनंत भुजाएं हैं तथा समस्त प्रकार के उपलब्ध अस्त्र-शस्त्रादि इसके आयुध हैं। कोई व्यक्ति और राष्ट्र ऐसा नहीं है, जिसका विरोध न हो, यही महिष है। दुर्गा के रूप में हम प्रकारांतर से राष्ट्रशक्ति की उपासना करते हैं।

देवी की दस भुजाएं दस दिशाओं की केंद्रीय शक्ति होने तथा दस विभूतियों से मानव की रक्षा करने के भाव की द्योतक है। इसी प्रकार अष्टभुजा आठ दिशाओं में लोक के योगक्षेम के भाव का द्योतक है।