डॉ दीप नारायण पाण्डेय
पूर्व अधिकार, वन सेवा
कल मैं अपने बेटे के साथ बैठा था। वह अपनी बेटी को बड़े धीरज से समझा रहा था कि कुछ खाने की चीज़ें ऐसी होती हैं, जिन्हें नहीं खाना चाहिए, चाहे वे कितनी ही चमकीली, सुगंधित, रंग-बिरंगी और जीभ को फुसलाने वाली क्यों न हों। वह कह रहा था कि इनका नुकसान इतना गहरा, इतना दूर तक जाने वाला और इतना कपटी होता है कि लोगों ने इन्हें यूँ ही कोई हलका-फुलका नाम नहीं दे दिया, बल्कि झुँझलाहट, अनुभव और सचाई से भरा एक कठोर नाम दिया है। मैं उसे सुनता रहा। मुझे लगा, घर के भीतर दादा, पिता और बेटी के बीच कोई साधारण बातचीत नहीं चल रही, बल्कि अन्न और अनर्थ के बीच का भेद धीरे-धीरे उजाला पकड़ रहा है। उसी क्षण मेरे भीतर यह बात एकदम स्पष्ट हुई कि जो पदार्थ अपनी सहज काया, अपना स्वाभाविक रस, अपनी असली गंध और अपनी पहचानी हुई बनावट खो बैठते हैं, और जिनकी काया में नमक, शर्करा, परिष्कृत मैदा, कृत्रिम गंध, कृत्रिम रंग, स्वाद-वर्धक, परिरक्षक, स्थिरकारक, सस्ते तेल और न जाने कितनी बनावटी युक्तियाँ भर दी जाती हैं, वे भोजन होकर भी भोजन नहीं रह जाते। शिट हो जाते हैं। शिट की हिंदी क्या लिखें, आप लोग जानते हैं। फिर भी शिट का अर्थ प्रसंगानुसार मल, विष्ठा, टट्टी, मैला, गू, गंदगी या रूपक अर्थ में निकृष्ट चीज़ जैसे शब्द प्रयुक्त किए जा सकते हैं।
कुछ चीज़ें थाली में नहीं, आदत में परोसी जाती हैं। कुछ स्वाद जीभ पर नहीं, लालसा पर राज करते हैं। कुछ पैकेट इतने चमकते हैं कि भीतर की खोखलाहट दिखती ही नहीं। कुछ खाद्य-पदार्थ अन्न का चेहरा लगाते हैं, पर भीतर से बाज़ार के दलाल निकलते हैं। मैंने ऐसे पदार्थों को बरसों से बाज़ार की आलमारियों पर खड़ा देखा है। कोला, मीठे पेय, फल-जैसे दिखने वाले रंगीन पेय, चिप्स, कुरकुरे नमकीन, क्रीम बिस्कुट, भरे हुए कुकी, केक, पेस्ट्री, मीठे सुबह के दानेदार डिब्बे, इंस्टैंट नूडल्स, दो मिनट वाली कटोरियाँ, तैयार-से-गरम किए जाने वाले भोजन, फ्रोजन नगेट, प्रोसेस्ड मांस, मीठे दही जैसे डिब्बे, पैकेटदार सफेद ब्रेड, चॉकलेट-लिपटी टिकियाँ, प्रोटीन के नाम पर बेची जाने वाली मिठाइयाँ, और बच्चों के लिए बनाए गए वे नाश्ते जो नाश्ते से अधिक विज्ञापन होते हैं। इनमें से बहुत-सी चीज़ें ऐसी होती हैं जिनकी सामग्री-सूची घर की रसोई से नहीं, किसी कारख़ाने की लंबी खिड़की से उतरती हुई लगती है। वहाँ गेहूँ कम, घोल अधिक होता है; दाल कम, चूर्ण अधिक; फल कम, स्वाद अधिक; दूध कम, मिठास अधिक; अन्न कम, उद्योग अधिक। यही इनकी पहली पहचान है। इन्हें देखकर मैं बार-बार सोचता हूँ कि मनुष्य ने सुविधा के नाम पर कितनी चतुराई से ऐसे पदार्थ गढ़ लिए हैं जो पेट का नहीं, प्रवृत्ति का पीछा करते हैं।
वे जल्दी बनते हैं, इसलिए जल्दी भाते हैं। वे जल्दी भाते हैं, इसलिए बार-बार बुलाते हैं। वे बार-बार बुलाते हैं, इसलिए धीरे-धीरे स्वभाव बन जाते हैं। और जब स्वभाव बन जाते हैं, तब देह का विवेक पीछे छूटने लगता है। बात केवल इतनी नहीं कि इनमें नमक, शर्करा या वसा अधिक होती है। बात इससे कहीं बड़ी है। इनकी रचना ही ऐसी की जाती है कि वे बहुत स्वादिष्ट लगें, बहुत नरम या बहुत कुरकुरे हों, बहुत आसानी से मुँह में घुल जाएँ, बहुत तेज़ी से खाए जाएँ और पेट भर जाने पर भी हाथ रुकने न पाए। इनमें प्राय: रेशा कम होता है, इसलिए तृप्ति देर तक टिकती नहीं। इनमें मुक्त शर्करा और परिष्कृत कार्बोहाइड्रेट अधिक होते हैं, इसलिए रक्त में मिठास तेजी से चढ़ती है और फिर उतरते समय थकान, चिड़चिड़ापन और दुबारा खाने की हूक छोड़ जाती है। इनमें नमक इतना हो सकता है कि रक्तचाप की राह चौड़ी होने लगे। इनमें घटिया वसा या ऐसे तेल हो सकते हैं जो हृदय और चयापचय पर बोझ डालें। इनमें सूक्ष्म पोषक तत्व कम होते हैं, पर कैलरी बहुत होती है। यही कारण है कि इन्हें खाकर आदमी को लगता है उसने कुछ खा लिया, पर शरीर को लगता है उसे अभी भी असली भोजन नहीं मिला। यही वह धूर्त जगह है जहाँ भूख मिटती नहीं, बहलती है; तृप्ति आती नहीं, टलती है; और स्वाद शरीर के विरुद्ध एक नरम षड्यंत्र में बदल जाता है।
बीमारी कई बार दरवाज़ा तोड़कर नहीं आती, स्वाद बनकर आती है। रक्त की बेचैनी बाहर से दिखाई नहीं देती। जीभ की खुशी और शरीर का कल्याण एक ही बात नहीं हैं। सुविधा का अर्थ स्वास्थ्य नहीं होता। सस्ता स्वाद प्राय: महँगा भविष्य लिखता है।
मुझे इसमें सबसे अधिक चिंता बच्चों की होती है। बचपन की जीभ बहुत जल्दी बिगड़ती है और बहुत देर से सँभलती है। जब बच्चा बार-बार मीठे, नमकीन, तीखे, रंगीन, कृत्रिम स्वादों का आदी हो जाता है, तब फल उसे फीके लगने लगते हैं, घर की दाल साधारण लगती है, रोटी-सब्ज़ी में उत्साह नहीं बचता, और पानी तक कम प्रिय हो जाता है। यही वह बिंदु है जहाँ एक पीढ़ी का भोजन-संस्कार बदल जाता है। फिर केवल वजन नहीं बढ़ता, स्वाद की दिशा बदल जाती है। मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय-रोग, वसायुक्त यकृत, दाँतों की क्षति, सुस्ती, चयापचयी असंतुलन, और मनोदशा की अनियमितता तक की डोर इन पदार्थों से जुडऩे लगती है। जो चीज़ें शरीर को शांत, स्थिर और समर्थ बनाने के बजाय उसे उत्तेजित, भ्रमित और निर्भर बना दें, उनके साथ नरमी बरतना दूरदर्शिता नहीं है।
कुछ खाद्य-पदार्थ पेट नहीं भरते, बस हाथ को पैकेट तक बार-बार ले जाते हैं। कुछ मिठासें उत्सव की नहीं, अपकर्ष की दूत होती हैं। कुछ नमकीन इतने चालाक होते हैं कि जीभ उन्हें मित्र मान बैठती है। कुछ रंग इतने लुभावने होते हैं कि देह का भय दब जाता है। फिर भी मैं यह नहीं कहता कि हर संसाधित चीज़ शत्रु है। दही जमाना, आटा पीसना, दाल धोना, मेवे भूनना, दूध गरम करना, सब्ज़ी काटना, अनाज दबाना, यह सब जीवन की स्वाभाविक रसोई-प्रक्रियाएँ हैं। संकट वहाँ शुरू होता है जहाँ भोजन की आत्मा निकालकर उसकी जगह युक्तियों की बारात बैठा दी जाती है। जहाँ पदार्थ को इस तरह गढ़ा जाता है कि वह अधिक दिनों तक टिके, अधिक तेज़ी से बिके, अधिक नशे की तरह याद आए, और कम से कम श्रम में अधिक से अधिक जीभ पर कब्ज़ा कर ले। वही अल्ट्रा प्रोसेस्ड है। वही वह अँधेरा इलाका है जहाँ भोजन धीरे-धीरे उपभोग की चालाक मशीन में बदल जाता है। गाँव का आदमी इसे एक झटके में पहचान लेता है। वह लंबा व्याख्यान नहीं देता। वह बस कहता है, यह चीज़ ठीक नहीं, यह देह के काम की नहीं, यह छोड़े जाने लायक है। लोक की यह सहज समझ कई बार बड़े-बड़े ज्ञान से भी ज्यादा सटीक होती है। घर का भोजन शोर नहीं करता, अपना काम करता है। कारख़ाने का भोजन अक्सर काम से अधिक प्रचार करता है। जो चीज़ बार-बार समझानी पड़े कि वह स्वास्थ्यकर है, उस पर सन्देह करना चाहिए। जो भूख, मन और शरीर को बिना बीमार किये तृप्ति दे, वही खाद्य का धर्म निभाता है।
अल्ट्रा प्रोसेस्ड खाद्य-पदार्थ स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक हैं। ये केवल मोटापा बढ़ाने वाली चीज़ें नहीं, बल्कि भूख और तृप्ति की प्राकृतिक भाषा बिगाडऩे वाले पदार्थ हैं। ये रक्त-शर्करा, रक्तचाप, हृदय, यकृत, चयापचय और दीर्घकालिक स्वास्थ्य पर एक साथ चोट करते हैं। ये घर की रसोई से भरोसेमंद भोजन का स्थान छीनते हैं। ये बच्चों की स्वादेंद्रियों को बहकाते हैं, युवाओं की आदतों को जकड़ते हैं, और बड़ों की देह पर धीरे-धीरे कर लगाते हैं। इसलिए इन्हें नहीं खाना चाहिए। जहाँ तक संभव हो, इन्हें बिलकुल छोड़ देना चाहिए। कोला के बदले पानी, मीठे पेयों के बदले फल, चिप्स के बदले भुना चना, इंस्टैंट कटोरी के बदले घर का दलिया, क्रीम बिस्कुट के बदले मेवे, पैकेटदार मिठास के बदले सादा, सच्चा, घर का भोजन। यही रास्ता शरीर का मान बचाता है।





