कर्मवाद और स्वास्थ्य

आचार्य महाप्रज्ञ
आध्यात्मिक गुरु।


दृश्य जगत में केवल शरीर के स्तर पर स्वास्थ्य और रोग का चिन्तन हुआ है। कुछ चिन्तन मन के स्तर पर भी हुआ है। आयुर्वेद में सामान्यत: तीन प्रकार के रोग मान्य है वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक, आयुर्वेद के कुछ आचार्यों के कर्म के स्तर पर भी रोगों का विश्लेषण किया है। उन्होंने माना है कि रोगों के जनक पुण्य, पाप भी है। तज्जो रोग: कर्म-योग: पुण्य पाप से उत्पन्न रोग कर्मज रोग हैं। इस प्रकार रोग केवल वातिक, पैत्तिक और श्लेष्मिक ही नहीं होते वे कर्मज भी होते है। कर्मज रोगों का सम्बन्ध वात, पित्त और कफ से नहीं होता। उसका संबंध पूर्वजन्मकृत कर्मों से होता है, पुण्य पाप से होता है।

भगवान महावीर ने कर्मवाद का सर्वांगीण निरूपण किया और विविध कर्मों के विविध परिणामों की जानकारी दी। जैन दर्शन सम्मत चौदह पूर्व ग्रन्थों में कर्मप्रवाद नामक पूर्व है। उसमें कर्म और उसके परिणामों का विस्तार से वर्णन प्राप्त है। आज वह महाग्रन्थ प्राप्त नहीं है। किन्तु कर्म विषयक जो सूत्र उपलब्ध है उनका गंभीर अध्ययन करने पर रोग, आरोग्य और कर्म का संबंध सूत्र सहज बुद्धिगम्य हो जाता है। उसके अध्ययन से नए नए आयाम उद्घाटित होते है।

घटना और सुख-दुख:- हमारा शरीर सुख-दुख के अनुभव का साधन है। यह एक बात है। हमें इससे आगे जाना होगा। सुख-दुख का अनुभव कैसे होता है और किससे होता है यह जानना आवश्यक है। घटना घटना होती है वह न सुख देती है और न दु:ख देती है। जब हमारी चेतना उस घटना से जुड़ती है तब सुख:दुख का अनुभव होता है। केवल (घटना) से सुख-दुख: का अनुभव नहीं होता। यदि घटना से सुख या दु:ख का अनुभव होता तो बड़ा आपरेशन हो ही नहीं पाता। जब मेजर आपरेशन होता है तब रोगी को अनेसथेसिना सुंघाई जाती है अथवा शरीर के रोग ग्रस्त अवयव को सुन्न करने का अन्य प्रयोग किया जाता है। इससे कष्ट के संवेदन मस्तिष्क तक नहीं पहुंच पाते। उनका रास्ता रोक दिया जाता है। ऐसी स्थिति में कष्ट का अनुभव नहीं होता। इससे स्पष्ट है कि हमें सुख दुख का अनुभव किसी घटना विशेष से नहीं होता, किन्तु जब हमारी मस्तिष्किीय चेतना उससे जुड़ती है तब हमें सुख या दु:ख का अनुभव होता है।

शरीर सुख दुख के अनुभव का साधन मात्र है किन्तु जो सुख या दुख का अनुभव करती है वह है हमारी चेतना हमें उससे समझना होगा। जो चेतना सुख का अनुभव करती है दुख का संवेदन करती है वह किससे प्रभावित होकर करती है। हमें यह समझना है। इस समस्या पर चिन्तन करते समय कर्म हमारे सामने आता है कर्म आठ हैं। उनमें एक है वेदनीय कर्म। उसका कार्य है चेतना को प्रभावित करना। उससे सुख का संवेदन होता है दु:ख का संवेदन होता है। प्रियता और अनुकूलता की स्थिति में सुख का संवेदन होता है और अप्रियता तथा प्रतिकूलता की स्थिति में दुख का संवेदन होता और अप्रियता तथा प्रतिकूलता की स्थिति में दुख का संवेदन होता है। यह वेदनीय कर्म के प्रभाव से होता है। इस संवेदन के लिए कर्म विपाक के लिए सामग्री का निर्माण होता है। इसे नौ-कर्म कहते है। कर्म और नौ-कर्म भिन्न-भिन्न है। नौ-कर्म कर्म की सहायक सामग्री हैं यह रोग का कारण बनता है। जब असात वेदनीय का संवेदन होता है, तब शरीर और मन के रोगों की स्थिति पैदा हो जाती है। तब ही असात वेदनीय कर्म अपना फल दे सकता, संवेदन करा सकता।

माध्यम सापेक्ष है विपाक कर्म का विपाक माध्यम सापेक्ष होता है। हम उदाहरण के द्वारा इसे समझे कि किसी कर्म का विपाक होता है मतिभ्रम इस स्थिति में मति और बुद्धि भी विपरीत हो जाती है। मति बुद्धि और भावना का विपर्यक करके ही कर्म अपना फल देता है। माध्यम के बिना कर्म फल नहीं दे सकता। असात वेदनीय कर्म का जब विपाक होता है तब सबसे पहले कर्म शरीर की ऊर्जा बाहर निकलती है। यह ऊर्जा तैजस शरीर की ऊर्जा को अस्त व्यस्त कर देती है कर्म शरीर की ऊर्जा शरीर की ऊर्जा की जैविक ऊर्जा को विपर्यस्त कर देती है। उससे हमारा नाड़ी तंत्र प्रभावित होता है। उससे ग्रन्धि तंत्र तथा शरीर की सारी क्रियाएं प्रभावित होती है। और रोग का उदय हो जाता है। असात वेदनीय कर्म अपना काम कर लेता है। जब किसी कर्म का विपाक होना होता है तब सबसे पहले पूर्व तैयारी होती है। वह पूर्ण तैयारी शरीर के माध्यम से होती है।

कारण चार है। काय करण, मन: करण, वाग् करण और कर्म करण भगवती सूत्र का एक प्रसंग है। गौतम ने भगवान् महावीर से पूछा- भ्राते प्राणी सात वेदनीय और असात वेदनीस कर्म का अनुभव कैसे करता है? भगवान् ने कहा-सात या असात वेदनीय कर्म का अनुभव करने के लिए ये चार कारण माध्यम बनते है। मन एक कारण है इसके द्वारा सात या असात का अनुभव किया जाता है। इसी प्रकार शरीर के द्वारा, मस्तिष्क के द्वारा सात-असात का वेदन किया जाता है।
संदर्भ असात वेदनीय कर्म का दो प्रकार की बिमारियां है। (1) आगन्तुक और (2) कर्म विपाकज। सर्दी या गर्मी मौसम आया इस काल में अनेक मौसमी बीमारियां होती है दुर्घटना हुई और आदमी चोटग्रस्त हो गया। यह स्थिति असात वेदनीय कर्म को उदित करके आती है। सात वेदनीय कर्म का उदय नहीं हो रहा है। असात वेदनीय कर्म ने असात वेदना को पहले ही विपाक में ला दिया। यह एक प्रक्रिया है। यह आगन्तुक रोग के नाम से जानी जाती है। अब वह चाहे आयुर्वेद की भाषा में वात आदि से उत्पन्न है। अथवा मेडिकल सांइस की भाषा में वाइरल आदि से उत्पन्न रोग है। वह भी आगन्तुक रोग है। वह असात वेदनीय कर्म को खींच कर उदय में ले आता है। एक आदमी सुख का संवेदन कर रहा है कोई समस्या सामने नहीं है। आदमी बैठा है और अकस्मात एक गाड़ी आती है और उससे टकरा जाती है वह आगन्तुक स्थिति में है। यह स्थिति सात वेदनीय को खींचकर उदय में ले आती है और मनुष्य कष्ट का अनुभव करने लगता है। उस समय अकुशल स्थिति होने पर व्यक्ति असात वेदना का अनुभव करने लगता है। हम चाहें आगन्तुक रोग माने या समस्या मानें। इस प्रकार आयुर्वेद के आचार्यों ने विचार करते हुए कहा- आगन्तुक बीमारी भी हमारे वात, पित्त और कफ को प्रभावित करती है और हमें रोग का अनुभव होने लगता है।

एक स्थिति यह कि कर्म अपनी प्रक्रिया से उदय में आता है, विपाक में आता है। जब असात वेदनीय कर्म विपाक में आता है तब वह अपने आप अकुशल परिस्थिति का निर्माण करता है, व्यक्ति को असात का अनुभव कराता है। असात का अनुभव होने पर रोग से संबंध जुड़ जाता है। शरीर को कष्ट का अनुभव होता है दुख का संवेदन होता है और कोई न कोई रोग प्रगट हो जाता है। यह जान पाना कि कौन से कर्म के विपाक से कौन सी बीमारी होती है, बहुत ही कठिन हैं यह सूक्ष्म तथ्य है सूक्ष्मता मे जाने पर यह जाना जा सकता है कि कौन सा कर्म विपाक कौन से रोग के लिए जिम्मेदार है? स्थूल दृष्टि से देखा जाए तो यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि संवेदन होता है और वह संवेदन किसी न किसी रोग के कारण होता है।

रोग और कर्म रोग और कर्म का संबंध आचार-शास्त्र से जुड़ा हुआ है। असात वैदनय तथा सात वेदनीय कर्म का बंध कैसे होता है? इस विषय की चर्चा अनेक आगामी से प्राप्त है। सात वेदनीय कर्म बंध के
हेतु ये है।
प्राण, भूत जीव और सत्व की अनुकंपा।
प्राण भूत, जीव और सत्व को दु:खित न करना,
दीन न बनना।
शरीर का अपचय करने वाला शौक पैदा न करना।
अनुपता कराने का प्रहार न करना।
लाठी आदि का प्रहार न करना।
शारीरिक परिताप न देता।
सात वेदनीय शरीर प्रयोग नाम कर्म का उदय।

असात वेदनीय कर्म बंध के हेतु हैं- प्राण, भूत, जीव और सत्व की अनुकंपा न करना, उन्हें दुखित करना, दीन बनाना, शरीर का अपचय करने वाला शोक पैदा करना, अनुपात करने वाला शोक पैदा करना लाठी आदि का प्रहार करना, शारीरिक परिताप देना और असाता वेदनीय शरीर प्रयोग नाम कर्म का उदय।

एक श्रृंखला बनती है- रोग असात वेदनीय कर्म का बंध तथा असात वेदनीय कर्म के विपाक की स्थितियां किसी रोग के रोगी को देखकर केवल व्याधि का निदान करना, औषधि के द्वारा उसकी चिकित्सा करना, रोग उपशमन का उपाय करना यह सब स्थूल घटना है। जब असात वेदनीय कर्म बंध तीव्र है तो हजार दवा देने पर भी रोग शान्त नहीं होता। आज डाक्टर वैद्य तथा रोगी स्वयं यह मानता है कि वर्षों तक औषधि लेने पर भी रोग से छुटकारा नहीं मिला। यह कर्मज रोग की स्थिति हैं कोई गलत कार्य किया हुआ है, क्रूरता की प्रवृति की हुई है तो उससे उपार्जित असात वेदनीय कर्म के पुद्गल इतने प्रबल हो जाते है कि बीमारी असाध्य बन जाती है। उपचार करने पर भी वे पुदगल इतना प्रभाव डालते है कि रोगी अर्थहीन और शक्तिहीन हो जाता है। वह सभी चिकित्सा पद्धतियों को व्यर्थ कर डालता है

आध्यात्मिक रोग: बाह्य रोग दो प्रकार के हैं-बाह्य उपाय साध्य और आभ्यन्तर उपाय साध्य। जैन आगर्मी के आधार रोग दो भागों में विभक्त हैं। आध्यात्मिक रोग हैं ये भीतर से उत्पन्न होते है बाहर का कोई निमित्त नहीं मिलता। बाह्य रोग ब्राह्य निमित्तों से उत्पन्न होते हैं। ये ब्राह्य उपाय साध्य होते हैं। इनकी बाह्य साधनों द्वारा चिकित्सा की जा सकती है। आध्यात्मिक रोगों की चिकित्सा वाह्य साधनों से नहीं की जा सकती क्योंकि इस रोगों के परमाणु इतने प्रबल होते है कि वे औषधियों को स्व्वीकार नहीं करते, उनको नकार देते हैं। उनकी चिकित्सा आभ्यन्तर उपाय साध्य होती है। हम इसे एक आगमिक घटना से समझें।

कुमार अनाथी धनाढ्य सेठ का पुत्र था। एक बार उसकी आंख में भंयकर वेदना हो गई। वेदना असह्य थी, असीम थी। बहुत उपचार किये। पिता ने उपचार कराने में धन का प्रचुर व्यय किया। दूर-दूर से प्राणाचार्यों को बुलाया गया। अनेक तांत्रिक और मांत्रिक भी आए। सभी ने अपने अपने ढंग से चिकित्सा की। वेदना कम नहीं हुई। उसको तीव्रता वैसी ही बनी रही। कुमार अनाथी ने आभ्यंतर चिकित्सा का सहारा लिया वे जान गये कि यह कर्मज बीमारी है। उन्होंने मन ही मन संकल्प लिया। कर्मों पर संकल्प का प्रहार हुआ और कुमार अनाथी की अक्षि-वेदना शांत हो गई।

जहां कोई चिकित्सा पद्धति कारगर नहीं हुई, वंहा संकल्प से की जाने वाली चिकित्सा पद्धति सफल हो गई। कर्मज बीमारी के एिल यह पद्धति ही सफल हो सकती है विश्वास के द्वारा चिकित्सा की जा सकती है। भाव शुद्धि और मानसिक शुद्धि भी रोग निवारण में सहायक बनती है। हम रोग के कारण को समझे और यह जानें की रोग बाह्य निमित्तों से पैदा हुआ है। या आन्तरिक नियमों से? यदि आन्तरिक कारणों से उत्पन्न हुआ है तो वहां आभ्यंतरिक चिकित्सा सफल होगी, बाह्य चिकित्सा नहीं। सारी चिकित्सा पद्धतियां सर्वत्र सफल नहीं होती। लोग यह जानते हैं कि ध्यान, आसन, प्राणायाम आदि के द्वारा रोग की चिकित्सा होती है परन्तु यह कथन सापेक्ष है सर्वथा निरपेक्ष नहीं है। कर्मवाद का दर्शन यह स्पष्ट करता है कि यदि रोग आभ्यन्तरिक कारणों से उत्पन्न है तो आध्यात्मिक चिकित्सा बहुत सफल होगी। वहां ध्यान आसन, प्राणायाम आदि से रोग मुक्त हुआ जा सकेगा। यदि बाह्य कारणों से रोग उत्पन्न है तो ये साधन आरोग्य प्रात्पि में कुछ सहायक बन सकते है, परन्तु निरपेक्ष रूप से सहायक नहीं होते सारे रोग आध्यात्म से मिट जाएंगे यह एकान्तिक विचार भी संगत नहीं है। रोग की उत्पत्ति की कारण मीमांसा के अनुसार चिकित्सा करने पर ही रोग का निवारण हो सकता है।

कैसे होता है वेदन– वेदनीय कर्म के दो भेद है- सात वेदनीय और असात वेदनीय। इसका वेदन कैसे होता है? शरीर एक कारण है इसका वेदन शरीर के द्वारा होता है। शरीर की ऊर्जा अगर ठीक है तो शरीर में सात वेदनीय का संवेदन होगा। यदि शरीर की ऊर्जा अस्त व्यस्त है तो असात वेदनीय का संवेदन होगा। मन भी ऊर्जा से संचालित है। हमारी जैविक ऊर्जा ठीक काम रही है तैजस शरीर की ऊर्जा समीचीन है। तो मन प्रसन्न रहेगा। यदि ऊर्जा समीचीन नहीं है तो मन अशान्त हो जाएगा, दुखी बन जाएगा, बुरे विचार आने लगेंगे।