अभिवादन से आयु, विद्या, यश और बल बढ़ता है

भारतीय संस्कृति में बचपन से ही हमे अभिवादन सिखाया जाता है। घर में कोई आ जाए तो बड़े बुजुर्ग बच्चों को सिखाते है हैं कि बेटा नमस्ते करो प्रणाम करो बोलते है। जब हम किसी से मिलते हैं तो तो उसको आदर सम्मान आत्मीयता देते है। हिंदुओं में सविनय प्रणाम, करबद्ध प्रणाम, साष्टांग प्रणाम, दंडवत प्रणाम, वंदन, नमन, राम राम सीता राम, जय श्रीकृष्ण आदि आदर सम्मान सूचक शब्दों का प्रयोग करके स्वागत सत्कार करने का संस्कार प्रचलित है।

भारतीय परम्पराओं में अभिवादन का विशेष महत्व है। भारतीय जनजीवन में इस परम्परा की शुरूआत सदियों पूर्व ऋषि आश्रमों द्वारा प्रारंभ हुई। ऋषियों, संतों और साधुओं ने अपने आश्रमों में शिष्य परम्परा के अंतर्गत अभिवादन की संस्कार वृत्ति को महत्ता प्रदान की। गुरु चरणों में बैठकर शिष्य विद्या ग्रहण करता था। अभिवादन की संस्कृति हमारी देश की अनुपम धरोहर है। एक-दूसरे के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने की परम्परा के रूप में अभिवादन का प्रयोग होता है।
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरित मानस में बड़ी सुंदर पंक्तियों में लिखा गया है
प्रातकाल उठि कै रघुनाथा।
मातु पिता गुरु नावहिं माथा॥
श्री रघुनाथजी प्रात:काल उठकर माता-पिता और गुरु को मस्तक नवाते थे। मनुस्मृति के श्लोक संख्या 2/124 में लिखा है कि जो नित्य अपने से श्रेष्ठ जनों को वृद्ध जनों को अभिवादन करता है उस व्यक्ति का आयु, विद्या, यस और बल बढ़ता है। जो अभिवादन शील होगा उसमें विनम्रता, शालीनता, सभ्यता आदि सद्गुणों का होना स्वाभाविक है।
हैलो, हाय, गुड मॉर्निंग पाश्चात्य संस्कृति है। भारतीय नहीं है।

वर्तमान में अभिवादन की जितनी भी रीतियां प्रचलित हैं, उनमें सर्वाधिक वैज्ञानिक एवं मनोविज्ञान पर आधारित भारतीय पद्धतियों को मान्य किया गया है। साष्टांग प्रणाम, चरण स्पर्श, नमस्कार, हाथ जोडऩा, गले मिलना अभिवादन के प्रमुख स्वरूप हैं। अभिवादन की शारीरिक प्रतिक्रियाओं के साथ ही अपने इष्ट देव का स्मरण करते हुए संबोधन करना विशेष रूप से आत्मीयता का परिचायक है। अभिवादन से एक-दूसरे के मनोभावों से सौहाद्र्र, स्नेह तथा आत्मीयता के भावों का उद्गम होता है तो सामाजिक जीवन को भी समरस बनाने में प्रभावपूर्ण होता है। हमारे पौराणिक ग्रंथों तथा वेदों में भी अभिवादन परम्परा का विशेष उल्लेख मिलता है। जिसके अनुसार परस्पर आत्मीयता के साथ कल्याणकारी मनोभाव पैदा होते हैं। हार्दिक स्नेह तथा निकटता के भाव मन में आते हैं।

अभिवादन प्रक्रिया में चरण स्पर्श को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया है। हमारी वैदिक परम्पराओं के अनुसार इस अवस्था को विशेष मान्यता प्रदान की गई है। मनुस्मृति में उल्लेख है कि वेद के स्वाध्याय के प्रारंभ और अंत में सदैव गुरु के दोनों चरणों का स्पर्श करना चाहिए। बाएं हाथ से बायां पैर और दाएं हाथ से दायां पैर स्पर्श करना चमत्कारिक होता है।
चरण स्पर्श का मनोविज्ञान विशेष कोटी का है। जब सामने वाला व्यक्ति स्वयं से श्रेष्ठ व्यक्ति का चरण स्पर्श करता है तो दूसरा व्यक्ति चरण स्पर्श करने वाले के सिर पर आशीर्वाद स्वरूप हाथ रखता है, तो दोनों की समान ऊर्जाएं परस्पर टकराती हैं। जब दोनों की ऊर्जाओं का मिलन होता है तब श्रेष्ठ ऊर्जा वाले की ऊर्जा अपने कम श्रेष्ठ वाले व्यक्ति में प्रवाहित होने लगती है। इस दृष्टि से चरण स्पर्श की परम्परा सर्वाधिक प्रभावशाली मानी गई है।

अभिवादन की प्रस्तुति से एक अपरिचित व्यक्ति भी आत्मीय भाव के साथ ओत-प्रोत होकर उसका अभिन्न हिस्सा बन जाता है। अभिवादन प्रक्रिया में विनीत भाव प्रमुख है। एक-दूसरे के प्रति विनम्रता का भाव अनिवार्य होता है। महाकवि कालीदास ने विनय को राजा से लेकर रंक तक का सबसे बड़ा आभूषण बताया है, जो नमस्कार ही से सुलभ होता है। नमस्कार का मुख्य उद्देश्य है जिन्हें हम नमन करते हैं उनसे हमें आध्यात्मिक एवं व्यावहारिक लाभ उपलब्ध हो। अभिवादन द्वारा विनम्रता में वृद्धि होती है तथा अहंकार समाप्त होता है। कृतज्ञ भाव के साथ सात्विकता प्राप्त होती है। मंदिर में चढ़ते समय सीढिय़ों को भी नमन करते हैं। मन व बुद्धि सहित ईश्वर की शरण जाना साष्टांग नमस्कार होता है। बड़ों को नमन करने से उनमें विद्यमान देवत्व की शरण में प्रमाणकर्ता प्रस्तुत होता है। पश्चिमी सभ्यता का अभिवादन समय सूचक है परंतु हमारे देश का अभिवादन शिष्टाचार के सौंदर्य को परस्पर बांटने का अनुपम साधन है।