वैद्य मनीषा शर्मा
BAMS, Immunity Clinic
माइग्रेन की समस्या आजकल बहुत देखने को मिल रही है। यह मामूली सिरदर्द से अलग होता है। इसे आधा सीसी का दर्द भी कहते हैं क्योंकि अधिकतर मामलों में यह सिरदर्द सिर के आधे हिस्से में होता है।
माइग्रेन रिसर्च फाउंडेशन का मानना है कि माइग्रेन दुनिया की तीसरी सबसे प्रचलित बीमारी है जो 20 वर्ष की आयु से लेकर 50 वर्ष की आयु के लोगो में दिखाई देती है। पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में यह रोग अधिक देखने को मिलता है ।
माइग्रेन को उत्पन्न करने वाले कारणों में अनुवांशिकी, पर्यावरणीय, चय-अपचय, हारमोंस और औषधि सेवन प्रमुख रूप से आते हैं।
यह एक प्रकार का तंत्रिका तंत्र एवं रक्त वाहिकाओं से सम्बंधित विकार है। इस विषय पर किये गये अनेक शोध से यह पता चला है कि यह मस्तिष्क के भीतर शुरू होता है और फिर रक्त वाहिकाओं तक फैलता है। एक विशेष प्रकार का न्यूरोट्रांसमीटर सेरोटोनिन (Z-HYDROXYTRIPTAMINE) और एस्ट्रोजन हार्मोन माइग्रेन के दर्द की संवेदनशीलता में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
सेरोटोनिन का कम स्तर विशेष रूप से सिर की धमनियों को संकुचित करता है और परिसरिय तंत्रिका को उच्च स्तर पर सक्रिय करने के लिए उत्प्रेरित करता है जो माइग्रेन को उत्पन्न करने में बड़ी भूमिका निभाता है ।
माइग्रेन का दर्द दौरों के रूप में आता है जो आमतौर पर 4-72 घंटे तक रह सकता है ।
आयुर्वेद की दृष्टि में माइग्रेन
आयुर्वेद के सभी आचार्यों ने सिर को विशेष महत्व देते हुए इसका समावेश ‘त्रिमर्म’ के अंतर्गत किया है। इसे उत्तमांग भी कहा गया है, जहाँ सभी इन्द्रियों तथा प्राण का अधिष्ठान हैं।
आयुर्वेद की सभी प्रमुख संहिताओं ने इस रोग का वर्णन अर्धावभेदक के नाम से मिलता है जो शिरोरोग के अंतर्गत आता है तथा जिसका सबसे विशेष लक्षण आधे सिर में दर्द होना है ।
आचार्य चरक ने सूत्रस्थान में 5 प्रकार वातज, पित्तज, कफज, संनिपताज और कृमिज शिरोरोग कहे हैं तथा सिद्धि स्थान में 4 अन्य शिरोरोग बताये हैं – सूर्यावर्त, अर्धावभेदक, शंखक, और अनन्तवात ।
आचार्य सुश्रुत ने 11 प्रकार के शिरोरोग कहे हैं जिसमे से अर्धावभेदक भी एक है ।
अर्धावभेदक शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है। अर्ध और अवभेदक। अर्ध का अर्थ है आधा, अवा -खराब पूर्वानुमान का संकेत देता है और भेदक का अर्थ है टूटना, छेदना या फूटकर बाहर आने वाला दर्द। इस प्रकार, अर्धावभेदक का शाब्दिक अर्थ है सिर के आधे हिस्से में दर्द होना या फूटना। चरक संहिता के टीकाकार आचार्य चक्रपाणि ने ”अर्ध मस्तक वेदना” कहकर अर्धावभेदक शब्द को स्पष्ट किया है।
आचार्य चरक और माधव के अनुसार, यह वात कफज रोग है। आचार्य सुश्रुत के अनुसार यह त्रिदोषज रोग है। आचार्य वाग्भट्ट के अनुसार यह वातज रोग है।
इस रोग के होने में तीनो दोषों की भूमिका होती है विशेषत: वात या वात-कफ। यह रोग घातक तो नहीं होता किन्तु यदि सही प्रकार से चिकित्सा नहीं की गई तो यह देखने तथा सुनने की क्षमता को कम कर सकता।
कारण
आचार्यो ने इसके कारणों का वर्णन करते हुए बताया है कि अधिक रूखा भोजन खाने से, ठंडा और भारी भोजन करने से, ठंडा पानी अधिक पीने से, मानसिक तनाव, आये हुए प्राकृतिक वेगो का धारण करने से (विशेषत: मल-मूत्र, छींक, निद्रा का), दिन में सोना, रात्रि जागरण, अधिक बोलना, मद्यपान, आदि से दोषों के बिगडऩे के कारण यह रोग हो सकता है ।
अन्य कारण
माइग्रेन कई कारणों से आपको अपना शिकार बना सकता है। इनमें ये कारण प्रमुख हैं: अत्यधिक चिंता, पर्याप्त पानी न पीना, महिलाओं में हार्मोनल बदलावों के कारण, बहुत धीमी या बहुत तेज रोशनी में अक्सर रहने के कारण, दवाओं के साइड इफेक्ट के कारण, वातावरण में अचानक परिवर्तन होना, सिरदर्द की दवाएं बिना चिकित्सक की सलाह के लेने से
शराब सेवन, तंबाकू, धूम्रपान, चॉकलेट आदि का ज्यादा सेवन करने से।
लक्षण
आचार्य चरक के अनुसार इसके लक्षणों में सिर के आधे भाग में तेज दर्द होना है जो विशेष रूप से गर्दन, कान, कनपट्टी, आँखों, भौहों, तथा माथे को प्रभावित करता है। यह दर्द किसी तेज धार वाले औज़ार से काटे जाने के सामान होता है ।
आचार्य सुश्रुत के अनुसार सिर के आधे हिस्से में काटे जाने के सामान या चुभोये जाने के समान तेज पीड़ा होना इसका लक्षण है। यह दर्द 7 दिन /14 दिन के अंतराल पर हो सकता है।
आचार्य वाग्भट ने उपरोक्त लक्षणों के अलावा बताया है कि यह स्वयं शान्त हो जाता है ।
अन्य लक्षण
माइग्रेन का दर्द एक विशेष तरह का सिर दर्द होता है। इसमें सिर दर्द के साथ-साथ कुछ और भी लक्षण देखने को मिल सकते हैं।
साधारण या तीव्र दर्द जो सिर के एक या दोनों ओर हो सकता है
फड़कने जैसा दर्द (THROBBING PAIN)
शारीरिक श्रम करने से दर्द बढना।
जी मिचलाना, जिससे उल्टी भी हो सकती है।
आवाज और प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता।
गैस, एसिडिटी ।
कुछ लोगों में माइग्रेन के दौरान ब्लड प्रेशर लो हो जाता है। कई बार यह दर्द इतना तेज़ होता है कि व्यक्ति अपनी दैनिक क्रियाओं को करने में भी अक्षम हो जाता है।
कुछ लोगों में यह दर्द शुरू होने से पहले आखों के सामने काले धब्बों या चमकीली टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं का दिखना, या नजऱ का धुंधला होना जैसे लक्षण भी मिल सकते हैं।
चिकित्सा एवं उपाय
शमन चिकिसा के अंतर्गत दोषों के अनुसार विभिन्न कषायों/ चूर्ण/ वटी का प्रयोग किया जाता है ।
पंचकर्म की क्रियाओं में विरेचन का इसके साथ शिरो अभ्यंग, शिरोधारा, नस्य, शिरो बस्ति आदि अलग अलग प्रकार की क्रियाएं भी की जाती है ।
किसी भी रोग के उत्पन्न होने में व्यक्ति की दिनचर्या, रात्रिचर्या का विशेष महत्व होता है। इसलिए बचाव की दृष्टिकोण से हमें दिनचर्या-रात्रिचर्या को सही रखना अत्यन्त आवश्यक है। सुबह जल्दी उठकर दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर कुछ देर, योग्य, प्राणायाम, व्यायाम अवश्य करें। ध्यान केन्द्रित करने वाले आसन जैसे त्राटक से इसमे बहुत लाभ मिलता है यह तनाव को कम करने में तथा मन को एकाग्र करने में बहुत लाभकारी है।
इसमे विशेषत: अनुलोम विलोम, भ्रामरी, उज्जायी में लाकर है।
देर रात तक न सोएं, खाने पीने में अधिक ठंडी, अधिक खट्टी वस्तुएं, अधिक मात्रा में नमक, अधिक खट्टी चीज़ों व मसालेदार चीजों से परहेज करें। अगर मद्यपान करते हैं तो त्यागे।





