वैद्य स्वाती त्यागी
BAMS, PGD-PPHC, Garbhasanskar
भारतीय उपमहाद्वीप में ग्रीष्म ऋतु अत्यंत तीव्र उष्णता, शुष्कता और ऊर्जा-क्षय का काल माना जाता है। आयुर्वेद में ऋतुओं के अनुसार आहार-विहार को व्यवस्थित करने पर विशेष बल दिया गया है, जिसे ‘ऋतुचर्या’ कहा जाता है। ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की तीव्र किरणों के कारण शरीर में जल और बल का क्षय होता है, जिससे विशेष सावधानी आवश्यक हो जाती है। आयुर्वेद के प्रमुख ग्रंथ जैसे चरक संहिता, सुश्रुत संहिता तथा अष्टांग हृदयम् में ग्रीष्म ऋतु के लिए विस्तृत आहार-विहार का वर्णन मिलता है।
चरक संहिता के सूत्रस्थान में वर्णित है कि ग्रीष्म ऋतु में ‘आदित्य के प्रभाव से पृथ्वी की शीतलता और स्निग्धता नष्ट हो जाती है, जिससे शरीर में रूक्षता बढ़ती है और बल क्षीण होता है।’ इस समय कफ दोष का शमन हो जाता है और वात दोष का संचय प्रारंभ हो जाता है। इसलिए आहार-विहार ऐसा होना चाहिए जो शरीर को शीतलता, स्निग्धता और ऊर्जा प्रदान करे।
ग्रीष्म ऋतु में आहार की बात करें तो आयुर्वेद के अनुसार मधुर, शीतल और द्रव पदार्थों का सेवन करना चाहिए। चरक संहिता में स्पष्ट कहा गया है, ‘मधुर रस प्रधान, शीतल, द्रव और स्निग्ध आहार शरीर को संतुलित रखते हैं।’ इस दृष्टि से दूध, घी, छाछ, नारियल पानी, और ताजे फलों का सेवन अत्यंत लाभकारी माना गया है। तरबूज, खरबूज, आम (सीमित मात्रा में), अंगूर जैसे फल शरीर में जल की पूर्ति करते हैं और ऊर्जा बनाए रखते हैं। अष्टांग हृदयम् में उल्लेख है, ‘ग्रीष्म ऋतु में जल का अधिक सेवन तथा शीतल पेय का उपयोग करना चाहिए, जिससे शरीर में दाह और तृष्णा से बचाव हो सके।’
सुश्रुत संहिता के अनुसार इस ऋतु में भारी, तैलीय, मसालेदार और अत्यधिक नमकीन भोजन से बचना चाहिए, क्योंकि यह शरीर में पित्त को बढ़ाता है और निर्जलीकरण का कारण बन सकता है। अधिक तीखा, खट्टा और नमकीन भोजन शरीर में गर्मी को और बढ़ा देता है, जिससे घबराहट, चक्कर आना, और पसीना अधिक आने जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
आयुर्वेद में पेय पदार्थों का विशेष महत्व बताया गया है। चरक संहिता में ‘पानक’, ‘मन्थ’ (घोल), और शीतल जल के सेवन की सलाह दी गई है। बेल का शरबत, सत्तू का घोल, गुलाब जल, और खस का शरबत जैसे पारंपरिक पेय शरीर को ठंडक प्रदान करते हैं। इनका सेवन न केवल शरीर को हाइड्रेट रखता है, बल्कि पाचन को भी संतुलित करता है।
विहार की दृष्टि से ग्रीष्म ऋतु में अत्यधिक परिश्रम, धूप में अधिक समय तक रहना और दिन में कठोर व्यायाम करना हानिकारक माना गया है। अष्टांग हृदयम् में उल्लेख है कि इस ऋतु में व्यक्ति को अधिक श्रम से बचना चाहिए और शीतल स्थान में विश्राम करना चाहिए। दिन के समय धूप से बचाव, हल्के और सूती वस्त्र पहनना, तथा ठंडे स्थान पर रहना शरीर के लिए लाभकारी होता है।
आयुर्वेद में ग्रीष्म ऋतु में दिन में थोड़ी देर विश्राम को भी अनुमति दी गई है, जबकि अन्य ऋतुओं में दिन में सोना सामान्यत: वर्जित माना गया है। इसका कारण यह है कि ग्रीष्म ऋतु में शरीर की ऊर्जा जल्दी समाप्त हो जाती है, जिसे पुन: प्राप्त करने के लिए विश्राम आवश्यक होता है। चरक संहिता में कहा गया है कि ग्रीष्म ऋतु में दिवा-निद्रा से शरीर को बल प्राप्त होता है।
रात्रि में शीतल वातावरण में सोना, चंदन या गुलाब के इत्र का प्रयोग करना तथा ठंडे जल से स्नान करना शरीर को शांति और ठंडक प्रदान करता है। सुश्रुत संहिता में चंदन लेप को शरीर पर लगाने का भी उल्लेख मिलता है, जो शरीर की गर्मी को कम करता है और त्वचा को शीतलता देता है।
ग्रीष्म ऋतु में रोगों की संभावना भी अधिक रहती है, जैसे लू लगना, डिहाइड्रेशन, त्वचा रोग, और पाचन संबंधी समस्याएं। आयुर्वेद के अनुसार इनसे बचने के लिए नियमित रूप से जल का सेवन, संतुलित आहार और उचित दिनचर्या का पालन आवश्यक है। लू से बचने के लिए सिर को ढक कर बाहर निकलना, खाली पेट धूप में न जाना और ठंडे पेय पदार्थों का सेवन करना लाभकारी होता है।
पाचन तंत्र ग्रीष्म ऋतु में कमजोर हो जाता है, इसलिए हल्का और सुपाच्य भोजन करना चाहिए। खिचड़ी, दही-चावल, मूंग दाल, और हरी सब्जियां इस समय के लिए उत्तम आहार माने जाते हैं। अधिक तले-भुने और फास्ट फूड से बचना चाहिए, क्योंकि यह पाचन को खराब करता है और शरीर में गर्मी बढ़ाता है।
आयुर्वेद में मानसिक शांति पर भी बल दिया गया है। अत्यधिक क्रोध, चिंता और तनाव शरीर की गर्मी को बढ़ाते हैं, जिससे स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसलिए ध्यान , प्राणायाम और योग का अभ्यास करना लाभकारी होता है। शांत और ठंडे वातावरण में समय बिताना मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों के लिए आवश्यक है।





