सोनाली मिश्रा, वरिष्ठ लेखिका
बात चली रसोई की। आद्या ने कहा, ‘माँ, वैसे रसोई में काम केवल महिलाओं को ही क्यों करना चाहिए? बाहर किसी भी होटल में शेफ तो आदमी ही होते हैं। हमने रसोइये भी देखे थे किसी फिल्म आदि में? और बाहर धोबी भी आदमी ही होते हैं। फिर काम ऐसा क्यों है कि घर पर लड़कियां ही करें!’
बच्चियों के मन में ऐसे प्रश्न आना स्वाभाविक है, विशेषकर तब जब हम बाहर खाना खाने जाते हैं। रसोई ऐसा विषय है, जिसे लेकर सबसे अधिक चिक—चिक होती है, जबकि सबसे महत्वपूर्ण विषय और क्षेत्र वही है। मैंने आद्या से प्रश्न किया कि वह जब भी हल्दीराम या बीकानेर स्वीट्स जाती है तो उसे छोले—भटूरे का स्वाद कैसा मिलता है? उसने कहा ‘एक सा!’ फिर मैंने पूछा कि जब तुम्हारी माँ छोले—भटूरे बनाती है या फिर सांभर बनाती है, उसका स्वाद कैसा होता है? या फिर रोज ही दाल तो उसका स्वाद क्या कभी ऐसा हुआ है कि एक सा स्वाद, एक ही सब्जी या दाल होते हुए मिला हो! अब आद्या सोच मे पड़ गई। बोली ‘नहीं!’
मैंने फिर कहा कि बाहर खाना बनाने वाले पुरुष भी अपने घर जाकर अपनी पत्नी के ही हाथ का खाना खाना चाहते हैं, क्योंकि वे खाने को केवल तय फॉर्मूले और तय स्वाद के अनुसार बनाते हैं। वे उसमें अपने प्यार, अपनी भावनाओं को नहीं डाल सकते, और डालना चाहिए भी नहीं क्योंकि ग्राहक केवल एक निर्धारित स्वाद के लिए ही आ रहा है। मगर उस शेफ को भी संतुष्टि घर जाकर या तो अपने हाथ से बनाकर या फिर पत्नी, या माँ के हाथ का पका भोजन करके ही मिलती है। रसोई किसी ब्रांड की फ्रैंचाईजी के स्वाद का नाम नहीं है, बल्कि वह भावनाओं का नाम है।
एक शेफ भी जब पिता बनकर अपने बच्चों के लिए भोजन पकाएगा, वह एक सा बंधा बँधाया स्वाद नहीं दे पाएगा, क्योंकि वह फिर अपने बच्चों की पसंद के अनुसार बनाएगा कि एक बच्चे को ग्रेवी पसंद है तो एक को नहीं। एक को खटाई चाहिए तो दूसरे को नहीं। स्त्री जब रसोई सम्हालती है तो अपनी संतानों की प्रवृत्ति के अनुसार भोजन पकाती है, जैसे किसी बालक की कफ प्रवृत्ति है तो उसे उसके अनुसार भोजन, किसी को वात अधिक बनती है तो उसे उसके अनुसार भोजन आदि! अब जब स्त्री अपनी ही देह को सही से नहीं जानती तो अपनी संतान की देह को कैसे जानेगी? और रसोई तो फिर ऐसी ही रहेगी। दादियों को पता था कि कौन सी दाल को किससे छौंकना है, कद्दू के साथ किसकी दाल खाई जा सकती है, कब दही नहीं खाना है आदि आदि! मगर अब जब हम इस आधार पर भोजन पकाने लग गए हैं कि सारे मसाले डाल दिए जाएं, क्रीम भी, दही भी और न जाने क्या क्या और फिर सभी को संतुलित करने के लिए चीनी डाल दी जाए, तो उसमें न ही सब्जी के गुण मिल रहे हैं और न ही स्वाद!
आद्या को कुछ समझ आया और कुछ नहीं। मगर उसने इतना जरूर कहा कि आपके हाथ के छोले—भटूरे मैं खूब सारे खा सकती हूँ, मगर किसी होटल या रेस्टोरेंट के नहीं!
मैंने कहा यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है कि रसोई में क्यों माँ होनी चाहिए?





