वैद्य योगेश कुमार पांडेय
एसोसिएट प्रोफेसर, काय चिकित्सा विभाग, सी.बी.पी. आयुर्वेद चरक संस्थान, नजफगढ़, नई दिल्ली
निरोगी काया, सुखमय और दीर्घ जीवन कौन नहीं चाहता किंतु मनुष्य की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा अमृतत्व की प्राप्ति है। औषधियां, शल्य कर्म के शस्त्र, रोगों से लडऩे का संकल्प और अविरल कालचक्र इसके सबसे बड़े साधन हैं। इनकी प्रतिमूर्ति हैं भगवान धन्वन्तरि, जिनके एक हाथ में औषधि, दूसरे में जलौका, तीसरे में शंख और चौथे हाथ में चक्र विराजमान है। भगवान धन्वन्तरि सुर और असुर दोनों द्वारा समान रूप से पूजनीय हैं। जरा (वृद्धावस्था), रोग (शारीरिक पीड़ा), भय (मानसिक पीड़ा) एवं मृत्यु का नाश करने वाले देवता के रूप में लोक में प्रतिष्ठित हैं। त्रिदोष एवं पंचमहाभूतों के वैषम्य से होने वाले समस्त रोगों, मानसिक संताप, ज्वर, बुढ़ापा आदि से मुक्ति प्रदान करने के लिए भगवान धन्वन्तरि की पूजा की जाती है।
भगवान धन्वन्तरि को भगवान विष्णु के अवतार के रूप में स्वीकृति है। मंदार पर्वत और वासुकि की सहायता से देव और असुर ने जब क्षीर सागर का मंथन किया तो उसकी अंतिम परिणति के रूप में भगवान धन्वन्तरि का प्रादुर्भाव हुआ। इस आख्यान से यह निष्कर्ष सहज रूप से निकाला जा सकता है कि अमृतत्व (स्वास्थ्य एवं दीर्घ जीवन) देव, असुर एवं मानव सभी की कामना है। और यह कामना पूरी भी की जा सकती है, किंतु उसके लिए आपसी मतभेद भुलाकर समेकित रूप से ज्ञानसागर के क्षीरोदधि का मंथन करना पड़ेगा।
वेदों के संहिता और ब्राह्मण भाग में सम्प्रति धन्वन्तरि का उल्लेख नहीं प्राप्त होता है। महाभारत तथा पुराण ग्रंथों में इनका उल्लेख मिलता है। उपलब्ध आख्यानों में धन्वन्तरि का आख्यान न केवल देव अपितु नृप (राजा), सिद्ध एवं चिकित्सिकीय परंपरा (शल्य परंपरा) के रूप में भी प्राप्त होता है। रामायण के बालकाण्ड और भागवत पुराण में इस तरह का वर्णन प्राप्त होता है।
धन धान्य और शुभता के प्रतीक दीपावली उत्सव के दो दिन पहले ही त्रयोदशी के दिन भगवान धन्वन्तरि के पूजन का उत्सव धनतेरस के रूप में मनाने की परंपरा सम्पूर्ण भारत में है। मानो इस बात की सार्वभौमिक स्वीकृति है कि उत्तम आरोग्य के बिना जीवन में समृद्धि और शुभता संभव ही नहीं है।
ब्रह्म वैवर्त पुराण में उपलब्ध आख्यान के अनुसार धन्वन्तरि एक बार शिष्यों के साथ कैलाश पर्वत की यात्रा पर निकले। मार्ग में उनका सामना तक्षक सर्प से हुआ जिसने विष वमन द्वारा उनका मार्ग रोकने का प्रयत्न किया। जिससे रुष्ट शिष्यों ने उसके सिर से मणि निकाल ली जिसके कारण तक्षक नाग मूर्छित हो गया। उसका प्रतिकार करने के लिए वासुकि ने द्रोण, पुण्डरीक एवं धनंजय नामक सर्पों को भेजा किन्तु वह सब के सब पराजित कर दिए गए तो फिर वासुकि ने शैव सर्प मनसा की नियुक्ति की। देवी मनसा ने भगवान शिव द्वारा प्रदत्त त्रिशूल द्वारा आक्रमण किया। जिसे धन्वन्तरि द्वारा निष्क्रिय कर दिया गया। इस आख्यान से पता चलता है धन्वन्तरि विष गर वैरोधिक प्रशमन (अगद तंत्र) और शल्य शास्त्र के ज्ञाता थे।
ऐतिहासिक आख्यानों में भारद्वाज के शिष्य दीर्घतपा काशिराज धन्व के पुत्र धन्वंतरि का भी वर्णन है। हरिवंश पुराण के अनुसार धन्वन्तरि के पुत्र केतुमान, केतुमान के पुत्र भीमरथ और भीमरथ के पुत्र दिवोदास और फिर क्रमश: प्रतर्दन, वत्स एवं अलर्क इस प्रकार इनकी वंश परम्परा दिखाई पड़ती है। यही वंश परम्परा वायु पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण में भी प्राप्त होती है।आचार्य सुश्रुत इनके शिष्य हुए। आयुर्वेद को संप्रति प्रचलित आठ अंगों में वर्गीकृत करने का श्रेय इनको ही दिया जाता है।
विष्णु पुराण, भागवत, अग्नि पुराण और महाभारत में धन्वन्तरि के समुद्र मंथन से आविर्भूत होने, उनके श्वेताम्बर धारण करने और कलश धारण करने का उल्लेख तो मिलता है किन्तु उनके चतुर्भुज होने का कोई वर्णन नहीं मिलता। यद्यपि कि इन आख्यानों में उनके आयुर्वेद प्रवर्तक होने का स्पष्ट निर्देश है।
गरुण और मार्कण्डेय पुराण में उपलब्ध आख्यान के अनुसार जब वन में भटक रहे भूख प्यास से थके हुए गालव ऋषि को एक कन्या ने पानी पिलाया तो उन्होंने उसे पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया, किंतु जब उस कन्या ने सूचित किया कि वह कुंवारी है और वीरभद्रा नामक वेश्या है तो ऋषि गालव ने उस कन्या की गोद में कुश की पुरुषाकृति बनाकर उसे उस कन्या की गोद में रख दिया और उसे अभिमंत्रित करके उसमें प्राण प्रतिष्ठित कर दिया। वेद मंत्रों से अभिमंत्रित होने के कारण यह वैद्य कहलाया और कालांतर में धन्वंतरि के रूप में विख्यात हुए। उपलब्ध आख्यानों से यह सहज निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वैदिक काल में जिस प्रकार की प्रतिष्ठा अश्विनी कुमारों की थी, वही प्रतिष्ठा धन्वन्तरि को पौराणिक काल में प्राप्त हुई। निष्कर्ष यह है कि धन्वन्तरि आयुर्वेद के प्रवर्तक, अष्टांग आयुर्वेद का विभाग करने वाले, शल्य तंत्र के विशेषज्ञ, विष विज्ञान के ज्ञाता तथा भगवान विष्णु के अवतार के रूप में लोक में प्रतिष्ठित है।
यद्यपि ऐतिहासिक और पौराणिक आख्यानों में धन्वन्तरि को काशिराज दिवोदास के पुत्र और उत्तर भारतीय ऋषि भारद्वाज के शिष्य के रूप में उद्धृत किया गया है, किंतु भगवान धन्वन्तरि के सबसे प्राचीन मंदिर दक्षिण भारत में कोंकण, तमिलनाडु और केरल क्षेत्र में पाये जाते हैं।





