राजीव रंजन
एनएचपीसी में इंजीनियर तथा प्रसिद्ध लेखक
ऋग्वेद के नदी सूक्त में उल्लेख है कि इन्द्र ही है जिसने सबसे पहले नदियों के मार्गों का निर्माण किया और वर्षा को अवरुद्ध करने वाले वृत्र नामक राक्षस का संहार करके नदियों में जल की धारा को प्रवाहित किया। वृत्र ने पर्वतों के मध्य जल के अनेक स्रोतों को अवरुद्ध कर रखा था, याकि बांध बना कर पानी रोक लिया था। इन्द्र ने उसका वध कर बांधों से पानी को बहा दिया। भारत के वे प्राचीन बांध जिनके साक्ष्य हमें न केवल साहित्य में अपितु भूमि पर भी उपलब्ध मिलते हैं इनमें मौर्यकालीन सुदर्शन बांध, करिकाल चोल निर्मित कल्लनई बांध तथा परमार वंशीय राजा भोज निर्मित भोजपाल ताल के लिए बनाया गया बांध प्रमुख है। भारत के प्राचीनतम बांध की बात करें तो इसमें सुदर्शन बांध का नाम प्राथमिकता से आता है। इंटरनेशनल कमीशन ऑनइरिगेशन एण्ड डैंमस् (आईसीआईडी) द्वारा ‘हिस्टोरिकलडैम्स’ शीर्षक से पुस्तक प्रकाशित की गई थी जिसके अनुसार सुदर्शन बांध का निर्माण लगभग 322 वर्ष ईसा पूर्व हुआ है। यदि हम उस प्राचीनतम बांध की बात करें जिसका निर्माण राजा कारिकालचोल द्वारा लगभग दूसरी सदी में करवाया गया परंतु यह आज भी कल्लनई बांध के नाम से जाना जाता है और अनवरत अब भी अपनी सेवाएं प्रदान कर रहा है। हम प्राचीनतम अर्थात् सुदर्शन बांध के तकनीकी पहलुओं पर बात करते हैं। इस आलेख के लिए विभिन्न साहित्यिक सामग्रियों के अतिरिक्त मैंने विशेष रूप से उमेश चौबे, हिमांशु चौबे तथा शिवम चतुर्वेदी का शोधपत्र ”सम टेक्निकल एस्पेक्सट्स ऑफ दिएनशिएन्ट सुदर्शन डैम इन इंडिया” का उपयोग किया है।
सौराष्ट्र में गिरनार से निकलती सुवर्णरेखा (सुवर्णसुकता) नदी पर निर्मित सुदर्शन झील का निर्माण सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के शासन समय में उनके द्वारा नियुक्त सौराष्ट्र के प्रांतीय शासक पुष्यगुप्त ने वर्ष 322 ईसा पूर्व कराया था। कालांतर में अशोक के राज्यपाल तुशाष्प ने इस बांध तथा उससे जनित जलाशय में से सिंचन हेतु नहरें निकालीं। अनेक तर्कशास्त्री इस तथ्य को झुठलाने के लिए भांति-भांति के जतन करते हैं तो उन्हें संज्ञान में लेना चाहिए कि इस बांध के न केवल पुरातात्विक साक्ष्य, बल्कि साहित्यिक साक्ष्य भी उपलब्ध हैं। मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त के शासन समय में बांधों को लेकर विस्तृत जानकारी उपलब्ध थी, जिसका दस्तावेजीकरण उनके महा अमात्य आचार्य चाणक्य द्वारा अपनी कृति अर्थशास्त्र में किया गया है। चाणक्य ने अर्थशास्त्र में बांध के निर्माण, सिंचन व्यवस्था और कृषि पर बहुत विस्तार से लिखा है। उन्होंने अर्थशास्त्र में जल संग्रहण के लिए सेतु, नहर के लिए परिवह, जलाशय के लिए तातक, नदी जल के लिए नद्ययतना, नदी पर बनने वाले बांध के लिए नदिनीबंधयतन, इस बांध से निकली नहर के लिए निबंधयतन शब्दों का प्रयोग किया है। कौटिल्य ने लिखा है- आधारपरिवाहकेद्रोपभोग्या जिसका अर्थ है ‘जलागार की नहरों से सिंचित खेतों का उपयोग।’ ये उदाहरण संक्षेप में इसलिए जिससे कि कोई भ्रम न रहे कि अभियंता केवल आज के दौर में होते हैं, यह भ्रम टूटना चाहिए कि पुरातन को बांध निर्माण या कि सिंचन के तरीकों की जानकारी नहीं थी।
उस दौर में अनेक छोटे-बड़े बांध निर्मित कराए गए होंगे चूंकि अर्थशास्त्र में बाँधों को तोडऩे या नुकसान पहुँचाने पर मौर्यकालीन मुद्रा पण में लगने वाले जुर्माने की मात्रा का उल्लेख है। यू. सी. चौबे तथा साथियों द्वारा एक शोधपत्र ‘जर्नल ऑफ इंडियन वाटर रिसोर्सेजसोसाईटी’ में प्रकाशित हुआ था, जिसका शीर्षक था ‘फिस्कलएस्पेक्ट ऑफ इरिगेशन एडमिनिस्ट्रेशन इन मौर्यन पीरियड: अकाम्प्रीहेन्सिव स्टडी विथद्प्रेजेंड’। इस प्रपत्र के अनुसार कराधान और कठोर दंड के परिणामस्वरूप मौर्य काल में सिंचाई प्रणाली अपेक्षाकृत कुशल हो गई। शोधकर्ताओं ने मौर्य काल और तत्पश्चात वर्ष 2016 की तुलना में गेहूँ की समान क्रय शक्ति के संदर्भ में मौर्यकालीन मुद्रा पण (3.5 ग्राम वजन का एक चाँदी का सिक्का) की तुलना 237.5 रुपए (आधुनिक भारतीय मुद्रा; फरवरी 2021 में 1 अमेरिकी डॉलर = 72.92 रुपए) से की। इस आधार पर ज्ञात होता है कि यदि कोई व्यक्ति ऐसे बांध को तोड़ देता था जिसके जलाशय में पानी की उपलब्धता है तो उसे उस स्थान पर जलमग्न कर देने की कठोर सजा देने का प्रावधान था। यदि किसी ने ऐसे बांध को नुकसान पहुंचाने का यत्न किया जिसके जलाशय में उस समय पानी की उपलब्धता नहीं है, तो उसे 750 पण अथवा 1,78,117 रुपयों का अर्थदंड देना होता था। किसी ऐसे बांध को जो अब उपयोग में नहीं रहा उसे नुकसान पहुंचाने की स्थिति में 350 पण अथवा 83,121 रुपए अर्थदण्ड की व्यवस्था थी। बांध के तटबंधों को नुकसान पहुंचाने की स्थिति में जितनी हानि की गई है उसका आँकलन कर दुगुनी राशि अर्थदण्ड के रूप में राज्य द्वारा ली जाती थी।
सुदर्शन बांध का अगला स्पष्ट उल्लेख हमें शक महाक्षत्रप रुद्रदामन के शासन काल में मिलता है। रुद्रदामन के विषय में विस्तृत जानकारी उनके शक संवत् 72 अर्थात वर्ष 150 ई. के जूनागढ़ अभिलेख से प्राप्त होती है। जूनागढ़ अभिलेख कहता है कि महाक्षत्रप रुद्रदामन के शासन काल में एक भयंकर तूफान आया। यह कोई साधारण तूफान नहीं था। वर्णन है कि जल से भरे मेघों ने सम्पूर्ण धरती को आच्छादित कर दिया। इतनी घनघोर वर्षा हुई कि सारी धरती ही मानो महासागर में परिवर्तित हो गई हो। इस समय उरजयत अथवा गिरनार पर्वत से निकलने वाली सुवर्नासिकता, प्लासीनी तथा अन्य स्थानीय नदियों में विकराल बाढ़ आ गयी। प्रलंयकारी तूफान जिसने पर्वतों को, वृक्षों को, कंगूरों को, किनारों को, दो मंजिलें भवनों को, प्रवेश द्वारों को, ऊंचाई पर बने प्रासादों को और सभी आश्रयों को ध्वस्त कर दिया, इससे लग रहा था मानो सृष्टि का अंत होने जा रहा है। शिलाएं, वृक्ष, झाड़ी और लताएं चारों ओर अस्त—व्यस्त हो गई थीं। इस तूफान ने 420 क्यूबिट लम्बे और चौड़े तथा 75 क्यूबिट गहरे हिस्से को उखाड़ दिया, जिससे जलाशय का सम्पूर्ण जल बाहर आ गया और जब तूफान थमा तब झील बालूका राशि वाली मरूभूमि के सदृश्य दिखलाई पडऩे लगी।
कीलहॉर्न लिखते हैं कि लोगों ने इस प्रलयंकारी घटना के बाद बहुत विलाप किया। विनाश के आयाम इतने भयंकर थे कि रुद्रदामन के सलाहकारों और प्रधान अधिकारियों ने यह सोच लिया था कि अब सुदर्शन झील का पुनर्निर्माण संभव नहीं है। रुद्रदामन इस विकट घड़ी में उठ खड़े हुए और उन्होंने जलाशय के पुनर्निर्माण का आदेश दिया। पुनर्निर्माण कार्य अनर्ता और सुराष्ट्र के प्रान्तीय प्रशासक अमात्य सुविशाखा की देखरेख में शुरू हुआ। सुविशाखा का आज भी एक योग्य अधिकारी के रूप में दृष्टांत दिया जाता है। रुद्रदामन के आदेश पर निर्मित की जा रही झील की लम्बाई व चौड़ाई को, सभी ओर से, अत्यंत अल्प समय में, पहले से तीन गुणा अधिक मजबूत बनाया गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि राज्य द्वारा इस बांध के पुनर्निर्माण के लिए अपनी प्रजा पर किसी तरह का कोई कर नहीं थोपा गया था। अभिलेख स्पष्ट करता है कि महाक्षत्रप रुद्रदामन ने यह कार्य जनहित में एवं धर्म के पालनार्थ करवाया था। कौटिल्य का हमने उदाहरण लिया था जिन्होंने तटबंध के लिए सेतु शब्द का प्रयोग किया है। सेतु और सेतुबंधन शब्द कई संस्कृत ग्रंथों में भी मिलते हैं। रुद्रदमन के शिलालेख में इन शब्दों के अतिरिक्त जो दूसरे शब्द प्रयोग किए गए हैं वे हैं- नहर के लिए ‘प्रणाली’, कचरा बंधारा के लिए ‘परिवह’, झील से गाद की सफाई के लिए ‘मिधविधान’। इन सभी शब्दों की परिभाषायें हमें तत्कालीन बांध निर्माण के तरीकों से परिचित कराती हैं।
सुदर्शन झील के निर्माण के लिए आरम्भ में तटबंधों को मिट्टी से बनाया गया जिनके दोनों तरफ पत्थर लगाए गए थे। बाँध के ऊपरी हिस्से में कटाव को नियंत्रित करने के लिए पत्थर की पिचिंग के द्वारा उसे ढका गया था। नदी के दोनों ओर स्थित गिरनार पहाडिय़ों ने बाँध के लिए मज़बूत आधार प्रदान किए। सुदर्शन बाँध का निर्माण बलुआ पत्थर के उभार पर किया गया था इससे एक मज़बूत नींव प्राप्त हुई थी।
रुद्रदामन के शिलालेखों से यह ज्ञात होता है कि बाँध के मुख्य भाग में गाद को साफ़ करने के उपरांत बाढ़ को नियंत्रित करने के उद्देश्य से उनमें नालियाँ प्रदान की गईं थीं। सुदर्शन जलाशय और जलग्रहण क्षेत्र के 10 मीटर की कंटूर रेखाओं को प्रदर्शित करता मानचित्र आप देख रहे हैं। बांध की नदी तल से ऊँचाई 139.9 मीटर है। बांध का कुल जलग्रहण क्षेत्र 15.53 वर्ग कि. मी और जलग्रहण परिधि 17.97 कि.मी है। क्षेत्र में अनुकूल स्थलाकृति और वर्षा को ध्यान में रखते हुए, अधिक ऊँचाई का एक बाँध बनाया जा सकता था।
वर्ष 455 ई. में अत्यधिक वर्षा होने के कारण एक बार फिर सुदर्शन झील के तटबंध नष्ट हो गए। भारत में यह समय था गुप्त शासकों का। इस समय सम्राट स्कन्दगुप्त सिंहासन पर थे जिन्होंने सौराष्ट्र में गिरिनार के पास फटी सुदर्शन झील का पुर्ननिर्माण करवाया था। सम्राट स्कंदगुप्त ने सौराष्ट्र के प्रान्तकालपर्णदत्त के पुत्र चक्रपालिन को इस झील के पुनर्निर्माण का आदेश दिया। चक्रपालिन की देखरेख में सुदर्शन झील के तटबंधों को सुधारा गया। कार्य के पूर्ण होने के बाद सम्राट ने पिता की स्मृति में झील के किनारे भव्य विष्णुमंदिर का निर्माण करवाया। सुदर्शन झील सम्भवत: आठवीं या नौंवी ई. में प्रयोग के लिए उपयुक्त नहीं रही थी। इसके बाद से यह पूर्णरूपेण इतिहास हो गई थी। उमेश चौबे और साथियों के शोधपत्र में इस बात का उल्लेख है कि सुदर्शन बांध की सक्रियता कम से कम 750 वर्ष तक रही है जबकि वर्तमान समय में निर्माण किए गये इसी बांध के आसपास के क्षेत्रों के कुछ बांधों से तुलना की जाये तो वे पचास वर्ष के जीवन को भी पूर्ण करने योग्य नहीं हैं और किसी न् किसी समस्या से, विशेष रूप से गाद से भर कर समाप्त होते जा रहे हैं। क्या ये विवरण हमें प्राचीन भारत पर, उसके ज्ञान पर, अभियांत्रिकी पर, गौरव करने के कारण नहीं देता? भारतीय इतिहास के गौरव को इस दृष्टि से भी देखना परखना चाहिए।





