पानी की धरा और मिट्टी के दीये

डॉ. प्रिया सूफी
व्याख्याता, साहित्य अन्वेषक


पांच नीर संग ले बहे, सरित जहां दिन रैन, पंच दीप तंह नित बरे, हृदय, चित्त, मन, नैन… यह पहचान है पंजाब में दीपदान और दीपस्थान की। पंजाब पांच नदियों की धरती… पांच पानी पांच नदियां… बस क्या सिर्फ इतना ही? क्या है यह पानी? किसी पहाड़ से निकल कर किसी मैदान को छू कर गुजरता सिर्फ पानी। सभी जगह तो है यह पानी। और जहां पानी नहीं वहां उस पानी को पाने की प्यास। इतनी शिद्दत से, इतनी गहनता से, इतनी प्रगाढ़ता से जागी वो प्यास जो पानी को मजबूर कर दे उस प्यास तक आने को। इस प्यास को समझना है तो पहले उस पानी को समझिए, पानी की बांध तोड़ती पीड़ को समझिए। कितना आसान है कितना सहज किसी की बात को समझे—बूझे बिना बस हां में हां मिलाना। और कितना मुश्किल होगा उस प्यास के भीतर से निकलना और उफनती बांध तोड़ती नदी के पानी की लपलपाती लहरों के बीच सोहनी की तरह कच्चे घड़े पर कूद जाना। यही है पंजाब और यही है पंजाब के पानी की व्याख्या।

पंजाब में पानी की तरह मौसम भी अपनी पूरी शिद्दत से असर करते हैं। फिर चाहे गर्मी हो या सर्दी। प्रेम की तरह रूह में उतरने वाले, हृदय-भेदक, जीने और मरने की विभाजक सरहदों पर विचरण करने वाले किसी सौदाई जैसे बावले उन्मत्त उद्भ्रांत। दिवाली आत्मिक रोशनी की दस्तक देती है।

सुंदर सी स्मृतियों का लोक
खुशनुमा दीयों से सजी, पटाखों की गूंज से भरी, मां लक्ष्मी की पूजा—अर्चना वाली दिवाली। परंतु बचपन वाली दिवाली ऐसी नहीं थी जैसी आज है। पहले चाहे अहोई माता का चित्र हो या लक्ष्मी गणेश जी का सब हाथ से बनाए जाते थे। आटा भिगो कर बीच में हल्की सी हल्दी डाल कर या केवल हल्दी से भी दीवार पर चित्र बनाते थे और उनकी पूजा होती थी। और चित्र के दोनों तरफ छोटी—छोटी आटे की लोई चिपका कर उस पर मौली लगाई जाती थी। दिवाली पर एक मिट्टी की गुडिय़ा खरीदी जाती थी, जिसके दोनों हाथों में दिए बने होते थे। उनमें दीया जलाया जाता था। सालों बीत गए अब दीवार पर कैलेंडर लगा कर अहोई और दिवाली मनाते हैं। मिट्टी की गुडिय़ा अब नहीं मिलती, उसकी जगह दो माले का छोटा सा मिट्टी का घर बना मिलता है, जिसमें ऊपर वाले माले पर जाने के लिए सीढिय़ां बनी होती हैं। और छत पर लक्ष्मी गणेश की बहुत छोटी मूर्ति बनी होती है जिसके आगे छोटा सा दीया भी बना होता है। उसमें दीया जलाया जाता है। पूजा में और आंगन में अब रंगोली बनाने का रिवाज भी हो गया है। पर पहले दीवार पर दीये और फूल बनाए जाते थे।

चौमुखा दीप प्रधान
पूजा में मिट्टी का चार मुखी दीया जलाना बेहद शुभ माना जाता है, जिसमें जलती चार बत्तियां चारों दिशाओं को रोशन करने और मां लक्ष्मी के चारों दिशाओं से आगमन की प्रार्थना है। पूजा में चांदी के पुराने सिक्के जरूर रखे जाते हैं और उनकी पूजा की जाती है। देर रात पूजा के चौमुखी दीये की सभी बत्तियों को एक तरफ करके किसी लोहे की चौड़ी चीज जो हमेशा कोई आयुध जैसे चाकू, दरांती या कोई खेत में काम आने वाली वस्तु जैसे खुरपी या ऐसी ही कोई तेज धार वस्तु इस लौ पर रखी जाती है। सुबह के समय इस लोहे पर एकत्रित दीये की कालिमा को सम्भाल कर निकला जाता है और इसी से बच्चों और सभी बड़ों के लिए काजल बनाया जाता है। बच्चों की नजर उतारने के लिए भी इसी काजल का प्रयोग किया जाता है। पूजा घर की बुजुर्ग महिला करती है, परंतु नव—विवाहित जोड़े को दिवाली पर विशेष महत्व दिया जाता है। उनके हाथ से पूजा करवाई जाती है। सभी रिश्तेदारों, पास—पड़ोसियों, मित्रों को मिठाई दी जाती है और घर की विवाहित बेटियों को नए कपड़े भिजवाए जाते हैं।

दीप से अलाव तक का आश्रय
यहां दीपक के बाद अलाव और आग का आश्रय रहता है। सर्दी दिवाली से गुलाबी होती दिसंबर तक आते—आते कब प्रखर, तीव्र और क्रूर होने लगती है, पता ही नहीं चलता। हालत तब खराब होने लगती है जब सूर्यदेव कई—कई दिन तक चेहरा दिखाना भूल जाते हैं। सुबह के समय कोहरा और पूरा—पूरा दिन धुंध आपको चैन से बैठने भी नहीं देते। सड़क पर सफेद पर्दे खिंच जाते हैं। आप अगले कदम पर क्या है नहीं देख सकते, क्योंकि सघन धुंध की सफेद चादर आपको कुछ देखने नहीं देती। कमरों में मौसम की ठंडक का अजीब सा ठार पूरे गर्म कपड़ों में भी आपको सुन्न करने के लिए काफी होता है। बिना आग जलाए अथवा हीटर के आप बैठ ही नहीं सकते। सड़कों पर दुकानों में लोग अलाव जला कर बैठते हैं। पहले हर घर में घड़ौली हुआ करती थी, जिसमें चूल्हे से अंगार बने कोयले रख कर कमरों को गर्म किया जाता था। यह घड़ौली मिट्टी की बने कसोरे जैसे होती थी। जिसके किनारों पर ज्यादा मिट्टी लगाई जाती थी ताकि आग को सम्भाल सके। गरीब लोग आज भी इसका प्रयोग सर्दी से बचने के लिए करते हैं।

पानी, प्रेम और पंजाब यह आपस में पर्याय ही हैं। पंजाब के पानियों के साथ बहुत सी प्रेम कहानियां जुड़ी हैं जो इसकी नदियों के किनारे जन्मी, परवान चढ़ी और फिर प्रेम को समर्पित होती हुई नदी के उफान में ही कूद गईं। नाचता गाता पंजाब, रंगला पंजाब, अणखी (स्वाभिमानी) पंजाब बस यूं ही लिखता है पानियों पर प्रेम कहानियां जो कभी नहीं मिटती।

दीपोत्सव के कुछ उल्लेखनीय पक्ष
दिवाली ऊर्जा का, रोशनी का त्योहार है। पंजाब में पूरे देश की तरह दिवाली से पहले दिवाली की तैयारी शुरू हो जाती है। आज भी हर घर में साफ—सफाई का पूरा अभियान चलाया जाता है। घर का हर सदस्य इसमें भाग लेता है। पिछली सदी में हर कोई इतना तो संपन्न होता नहीं था तो घर भर के शेल्फ पर अखबार को ही बिछाया जाता था। दिवाली पर यह सारे शेल्फ नए अखबार के कवर से पट जाते थे। पुराने कपड़े निकाल कर घर के लागी अर्थात् काम करने वाले कर्मचारियों को दिए जाते थे। मां बहुधा कहा करती थी कि दिवाली पर केवल कड़वा (सरसों का) तेल ही जलाना चाहिए। इससे न केवल नकारात्मकता नष्ट होगी, बल्कि सभी छोटे कीड़े—मकौड़े और रोगों के जीवाणु भी नष्ट होंगे। तब मोमबत्तियों से ज्यादा दीये जलाए जाते थे। मां एक छोटी बोतल सरसों का तेल भर कर छत पर रखवा देती। हम बच्चों का काम होता जिस दिये में कम तेल हो उसमें और तेल डाल दो। हम सब पटाखे चलाते हुए यह काम भी बखूबी करते थे।

आज समय बदल गया है। पटाखे चलाना वातावरण को दूषित करना कहा जाने लगा है, पर तब तो मां कहती थी कि दिवाली पर पटाखे चलाना एक शगुन होता है। दिवाली के अगले दिन के लिए भी पटाखे जरूर संभाले जाते थे। मां कहती थी, दिवाली के दो दिन जरूर पटाखे चलाने चाहिए, यह शगुन होता था। घर के भीतर भी दिवाली के पांचों दिन सात अनाज की कटोरियों में सात दीये सरसों के तेल के पूजा स्थान पर जलाए जाते थे। इससे घर के कीटों का और नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।