डॉ. प्रणव पंड्या
प्रमुख, अखिल विश्व गायत्री परिवार
भारतीय संस्कृति में पर्व-त्योहारों का विशेष महत्व है। इनमें एक विशेष पर्व है दीपावली। दीपावली उत्तर से दक्षिण तक और पूर्व से पश्चिम तक पूरे देश में मनाई जाती है। श्रीलंका, म्यांमार, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल आदि देशों में भी यह पर्व मनाया जाता है।
पाँच दिन तक चलने वाले इस महापर्व में कितने ही संदर्भ जुड़े हुए हैं। वे भारत में उद्भूत हुए सभी धर्मों और संप्रदायों के विश्वास से जुड़े हुए हैं। वैदिक मत के अनुयायियों के अलावा जैन, सिख, बौद्ध और वेदों में असद् भक्ति रखने वाले सभी संप्रदायों के शलाका पुरुष कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से शुरू होने वाले महापर्व में किसी-न-किसी दिन याद किए जाते हैं।दीपावली पहचान से संबद्ध है। धार्मिक या पारंपरिक कारणों से यदि संकोच हो तो भी कोई हर्ज नहीं है। दीपावली को लोक—समाज ने तो राष्ट्रीय पर्व मान ही लिया है। धनतेरस या धन्वंतरि जयंती, नरक चतुर्दशी, काली पूजा, लक्ष्मी पूजा, हनुमान जयंती, महावीर निर्वाण, बलि प्रतिपदा, गोवर्धन पूजा, नवसंवत्सर, भाई दूज और यम द्वितीया जैसे एकादश संदर्भों वाले इस अवसर को लोकपर्व की प्रतिष्ठा तो सदियों से मिली हुई है।
दीपावली का सामान्य परिचय लक्ष्मी पूजा के उत्सव के रूप में है। समुद्र मंथन के समय इस दिन लक्ष्मी के प्रकट होने की अंतर्कथा वाला यह प्रसंग दीपावली का प्रमुख संदर्भ है। पौराणिक महत्व के साथ व्यावहारिक सच्चाई भी है कि लक्ष्मी की प्रसन्नता सभी के लिए अभीष्ट है। साल भर में पाँच मिनट भी पूजापाठ और प्रदीप ध्यान में नहीं लगाने वाले व्यक्ति भी इस दिन सिक्कों की खनखनाहट को मंदिर की घंटियों की तरह सुनते और लक्ष्मी पूजा में मन लगाते हैं। धन-वैभव हर किसी को चाहिए। इसलिए उसकी अधिष्ठात्री शक्ति की पूजा-आराधना भी व्यापक रूप से प्रचलित होगी ही।
लेकिन दीपावली के दूसरे संदर्भ भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। उन संदर्भों की दिशा और संकेतों को समझने की चेष्टा करें तो जीवन का संपूर्ण शास्त्र अपने रहस्य खोल देता है। इस पुनरावृत्ति में जाना जरूरी नहीं है कि खेती—बाड़ी से निपटकर आनंद-उल्लास मनाने की दृष्टि से यह पर्व रचा गया। यह भी कि पर्व पहले से प्रचलित था और धीरे-धीरे तमाम संदर्भ जुड़ते गए। संस्कृत वाङ्मय में यह पर्व शारदीय उत्सव के रूप में भी चित्रित किया गया है। उन उल्लेखों के अनुसार दशहरे के बाद से शुरू होकर पर्व पूरे सत्रह दिन तक मनाया जाता था। शरद पूर्णिमा इस उत्सव का पड़ाव था।
त्रयोदशी का पहला दिन धन्वंतरि जयंती के रूप में मनाया जाता है। लोग इसे धनतेरस भी कहते हैं और पहले दिन का संबंध धन-वैभव से जोड़ते हैं। धन्वंतरि जयंती का संबोधन घिस-पिटकर धनतेरस के रूप में प्रचलित हो गया। वस्तुत: यह आरोग्य के देवता धन्वंतरि का अवतरण दिवस है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय इसी दिन धन्वंतरि आयुर्वेद और अमृत लेकर प्रकट हुए थे। समुद्र-मंथन का प्रयोजन पूरा हुआ मानकर देव और असुर दोनों तेजी से लपके थे। इन दिनों धन्वंतरि जयंती चिकित्सा व्यवसाय में जुड़े लोगों तक ही सीमित रह गई है। प्रचलित क्रम के अनुसार यम के निमित्त एक दीया जलाकर धनतेरस मनाई जाती है। दीया घर के मुख्य द्वार पर रखा जाता है। कामना की जाती है कि वह दीप अकाल मृत्यु के प्रवेश को रोके। ऐसा विवेक जगाए जो स्वास्थ्य, शक्ति और शांति दे। यम की बहन यमुना नदी जिन क्षेत्रों में बहती है वहाँ यह विशेष पूजा का दिन भी है। उस दिन श्रद्धालु यमुना में स्नान कर यम को मनाने की भावना करते हैं।
दीपावली महापर्व का पहला दीप जलाकर शुरू हुए महोत्सव का एक अंग नए बर्तन खरीदना भी है। लक्ष्मी के लिए भोग-प्रसाद घर में ही बनाना चाहिए। खाने-बांटने के लिए बाजार से कितने ही व्यंजन मँगाए जाएँ। पूजन सामग्री घर में ही तैयार हो, देवता को कोरा, ताजा अच्छा और पवित्र भोजन अर्पित करना चाहिए। नए बर्तन भी इसलिए खरीदे जाते हैं कि प्रसाद तैयार करने के लिए प्रयुक्त पात्रों का उपयोग भी भोग पूजा तैयार करने के साथ शुरू हो। नरक चतुर्दशी और हनुमान जयंती महापर्व का दूसरा दिन है। ‘नरक’ विशेषण से स्पष्ट है कि इसका संबंध भी मृत्यु अथवा यमराज से है। विधायक अर्थ में यह दिन स्वास्थ्य साधना का दिन है। पर्व का विधान है कि इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि करना चाहिए। चतुर्दशी के दिन जो लोग सूर्योदय के बाद स्नान करते हैं, उनके लिए कठोर शब्द कहे गए हैं। सायंकाल दीपदान के लिए है और दीप यम के लिए जलाए जाते हैं। सुबह स्नान और शाम को दीपदान से चूकने को धर्म शास्त्रों में अक्षम्य पाप बताया है। कहा है कि उन लोगों को वर्षभर किए गए पुण्य कर्मों का फल नहीं मिलेगा।
आशय यह है कि आलस्य और प्रमाद में सुबह-शाम गँवा देने वाले लोग जीवनरस को छककर नहीं पी सकते। आधे-अधूरे मन से किए गए उनके काम विपरीत परिणाम ही देते हैं। यम यदि मृत्यु के देवता हैं, उनका काम संसार का नियमन करना है, तो संयम के अधिष्ठाता देव भी हैं। उन देव हनुमान की जयंती नरक चतुर्दशी के दिन मनाई जाती है। हनुमान जयंती यों चैत्र मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है, लेकिन उत्तर भारत के कई भागों में यह दीपावली से एक दिन पहले मनती है। आशय यह है कि संयम-नियम से रहने वालों को मृत्यु से जरा भी भयभीत नहीं होना चाहिए। उनकी अपनी साधना उनकी रक्षा करेगी। पर्व का नाम नरक चतुर्दशी प्रचलित है। इसका यह नाम कृष्ण लीला से संबंधित भी है।
पौराणिक कथा है कि इसी दिन भगवान् कृष्ण ने नरकासुर का वध किया था। उस राक्षस ने हजारों कुलीन स्त्रियों को बंदी बना लिया था। उनसे दासी की तरह व्यवहार करता था। नरकासुर के आतंक से पृथ्वी के समस्त शूर और सम्राट थरथर काँपते थे। प्रतीक की दृष्टि से नरकासुर उद्दाम अहं और वासना का उदाहरण है। ये प्रवृत्तियाँ कितना ही आतंक मचा लें, अंतत: पराभूत ही होती हैं। जब इनका दारुण अंत होता तो कोई आँसू नहीं बहाता था, प्रत्युत लोग खुश होते थे। अमावस्या दीपावली का प्रमुख उत्सव है। बीते दो दिन भूमिका और विस्तार के थे। लक्ष्मी पूजा का प्रसंग मुख्य है और वह पर्व के ठीक मध्य में आता है। जाति, वर्ग, स्थिति पद, प्रतिष्ठा और ऊँच-नीच के सभी भेद बाधित हो जाते हैं और उत्साह भरे धीरज के साथ पर्व मनाते हैं। उत्साह लक्ष्मी के आवाहन के लिए और धीरज पुकार सुन लेन लेने की प्रतीक्षा के लिए।
दूसरे पर्व उत्सवों की तरह इस दिन आमोद-प्रमोद के साधन इक_े नहीं होते, लेकिन यह कर्मठता और जागरूकता का संदेश जरूर दे जाता है। रात भर जागकर प्रतीक्षा करने का अर्थ ही यह है कि जागरूक रहते हुए पुरुषार्थ किया जाए। उद्यमी प्रयत्नशील और पुरुषार्थी व्यक्ति पर ही लक्ष्मी का अनुग्रह बरसता है। गोवर्धन पूजा वायवीय, आकाशीय शक्तियों का मुँह ताकने के स्थान पर प्रकृति की आराधना का प्रतीक है। स्वास्थ्य, धन और प्रवृत्ति को जिसने साध लिया, उसके लिए सभी दिशाओं में जय-ही-जय है। मृत्यु और यम उसके लिए भाई-बहन की तरह हो जाते हैं, जो सभी स्थितियों में रक्षा करते हैं, संरक्षण देते हैं।
दीपावली का समापन मर्यादा और पारिवारिक दायित्वों के स्मरण के साथ होता है। उन सभी का स्मरण रखना चाहिए, जो सहोदर हैं, लौकिक दृष्टि से भाई-बहन हैं। उसमें प्रकृति परिवार के अन्य सदस्य भी आ जाते हैं। कम-से-कम वे सदस्य तो निश्चित ही, जो किसी भी रूप में, किसी भी कोण से सहोदर हैं जो अपने आसपास ही जन्मे और पले-बढ़े हैं। इस प्रकार यह पर्व समुच्चय महती शिक्षण हमें दे जाता है।
महानायक भगवान श्रीराम के जीवन चरित्र को अपनाने का यह विशिष्ट पर्व भारतीय संस्कृति के समग्र उत्थान के लिए प्रेरणा परक पर्व है। इस पर्व के मर्म को समझना आवश्यक है। दीपावली पर दीपक जलाते समय दीपक के सच को समझना भी आवश्यक है, अन्यथा दीपावली की प्रकाशपूर्ण रात्रि के पश्चात् केवल बुझे हुए मिट्टी के दीपक हाथों में रह जाएँगे, आकाशीय अमृत-आलोक खो जायेगा। दीपक का सच उसके स्वरूप में है। दीपक मरणशील मिट्टी का होकर भी इस ज्योति का अवतरण कर धारण करने का सबल माध्यम है। दीपक जलता है, आलोक बिखेरता है और तत्पश्चात् अपनी मरणशील मिट्टी में समा जाता है। मोल है जलते हुए प्रदीप्त दीपक का, मोल बुझे दीपकों का नहीं होता। दीपक का तात्पर्य है- अपनी वर्तिका में अग्रि को धारण कर प्रकाश बिखेरना।
यह घटना असाधारण है और तिल-तिल जलने-गलने का वह संकल्प जो उसकी मरणशीलता में अमृत घोलता है। इस मिट्टी की ज्योति तो अमृतमय आकाश की है। जो धरती का है, वह धरती पर ठहरा है, लेकिन उध्र्वगामी ज्योति तो निरन्तर आकाश की ओर भागी जा रही है। दीपक की ही भाँति मनुष्य की देह भी मिट्टी ही है, किन्तु उसकी आत्मा मिट्टी की नहीं है। वह तो इस मिट्टी के दीपक में जलने वाली अमृत ज्योति है। जिन्दगी के सघन अंधकार में जीवन की समस्त दुर्बलताएँ सजग-सक्रिय हो जाती हैं, दुष्प्रवृत्तियाँ नंगा नाच करने लगती हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह के संजाल नानाविधि रूपों में अपना अदृश्य परिचय देते हैं। पौराणिक काल की असुरता आज के अंध तमस में जीवित है, बदला है तो केवल उसका स्वरूप। रावण, कंस, जरासंध, दुर्योधन की भूमिका में आज महाभ्रष्टाचारी, रिश्वतखोरी, आतंकवादी क्रियाशील हैं। इनकी करतूत और कारनामों से अतीत के सारे आतंक कमतर नजर आते हैं, क्योंकि मानवीय बुद्धि के विकास के चरम दुरुपयोग जो इनके साथ हैं।
परम चेतना रूप में परमात्मा की करुणा ही स्नेह बनकर बाती को सिक्त किए रहती है। चैतन्य ही प्रकाश है, जो समूचे अस्तित्व को प्रभु की करुणा के सहारे सार्थक बनाता है। प्रकाश की यह महाचैतन्यता ही हमारे समग्र अस्तित्व को प्रभु की करुणा धारा एवं निर्झर से आप्लावित एवं आलोकित करती है। प्रभु करुणा का आलोक अनुशासन रूपी आँवाँ में तपने पर ही मिलता है। तब जाकर कहीं वह सद्गुरु की कृपा से परमात्मा की स्नेहरूपी करुणा का पात्र बनकर दीपक का रूप लेता है। ऐसा दीपक जिसमें आत्मज्योति प्रकाशित होती है। दीपावली पर जलने वाले दीपकों की संख्या एक दो नहीं, हजारों होती हैं, परन्तु इससे बाहर का अंधकार मिटता है, अंतर का अंधकार तो यथावत् बना रहता है। अच्छा हो कि दीपावली में दीपक के सच की इस अनुभूति के साथ हम एक दीपक जलाएं, ताकि इस मरणशील मिट्टी की देह में आत्मा की ज्योति मुस्करा सके।





