शठे शाठ्यं समाचरेत्

पिछले महीने में हमास के आतंकियों ने इजरायल पर हमला किया था। इस हमले में आतंकियों के द्वारा वहां की महिलाओं एवं बच्चों के साथ अमानवीय कृत्य किया जो बेहद ही निंदनीय है। इस हमले में हमास ने इजराइल पर सुनियोजित तरीके से हमला करके इजराइल पर 5000 से अधिक राकेट दागे तथा हमास के आतंकियों के द्वारा इजराइल के सैकड़ों निवासियों को बड़ी क्रूरतापूर्वक ना सिर्फ मारा गया बल्कि मृत सैनिकों की लाशों के साथ क्रूरता की गयी, महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया यहां तक कि मृत महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया, बच्चों को बड़ी क्रूरता के साथ मारा गया इस आतंकी हमले के बाद इजरायल ने जवाबी हमला किया जो उसका नैतिक और धार्मिक अधिकार है और इजराइल का इतिहास भी यही है कि वो अपने नागरिकों तथा देश के ऊपर हुए हमले का जवाब ही नहीं देता है बल्कि विश्व के कोने-कोने मे घुसकर मारता है।

अब इस युद्ध को लेकर पूरा विश्व दो भागों में बंट चुका हैं। कोई इजरायल का समर्थन कर रहा है तो कोई फलिस्तीन को सही ठहरा रहा है। भारतवर्ष की नरेंद्र मोदी सरकार ने हमास के इस आतंकवादी कृत्य निंदा की और इजराइल का समर्थन किया जो बिल्कुल सही और धर्म संगत, शास्त्र सम्मत है लेकिन भारतवर्ष में भी कुछ तथाकथित मोहब्बत की दुकान चलाने वाले,अहिंसा परमो धर्म आधा अधूरा ज्ञान देने वाले लोगों ने हमास के इस राक्षसी कृत्य का विरोध तो नहीं कर रहे हैं लेकिन भारत के द्वारा इजराइल के समर्थन का विरोध कर रहे है ताकि उन्हें विशेष समुदाय का वोट मिल सके।

इस प्रकार के राक्षसी हमलों, आतंकी हमलों के बारे में भारतीय परंपरा में धर्म ग्रंथो, वेदों में प्राचीन समय से ही बिल्कुल स्पष्ट संदेश है कि शासक का पहला और सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य प्रजा की सुरक्षा करना होता था जिसमें आंतरिक खतरों के साथ-साथ बाहरी आक्रमण का शास्त्र और अस्त्र से मुकाबला करना शामिल था। परंतु वैदिक काल से चल रहा युद्ध की नैतिकता और अनैतिकता पर कुछ लोग विवाद आज भी विवाद करते हंै जबकि वैदिक ग्रंथों और पौराणिक कथाओं दोनों में युद्ध के सिद्धांतों के बारे में बहुत ही स्पष्ट संदेश उपलब्ध है, जिनके अनुसार सीमित परिस्थितियों में ”उचित युद्ध” की आज्ञा दी हुई है।

खैर भारत वर्ष में तो भगवान मर्यादा पुरूषोत्तम राम, भगवान श्री कृष्ण और भगवान का अवतार ही दुष्टों, राक्षसों एवम् आतंकी प्रवृत्ति के लोगों के संहार के लिए होता है।

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम जब चित्रकूट से दण्डकारण्य की ओर चलते समय अनेक ऋषियों ने उन्हें घेरकर कहा था- राम, चित्रकूट से लेकर पम्पा सरोवर तक ऋषियों की हड्डियों के ढेर लगे हैं। इन्हें राक्षसों ने मारा है। राम, तुम नगर में रहो या वन में, तुम्हीं हमारे शासक हो। इन राक्षसों से हमारी रक्षा करो। राम ने उन्हें रक्षा का आश्वासन दिया था। मानस में मर्यादा भगवान राम ने कहा है- निसिचरहीन करउँ महि, भुज उठाइ प्रन कीन्ह। तो वही मानस के सुंदरकांड में जब रावण की सभा में मेघनाद के द्वारा ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करके हनुमान जी को बंधक बनाकर लाया गया तब रावण ने उनसे पूछा था – मारे निसिचर केहि अपराधा….तब हनुमानजी कहते हैं- जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। अर्थात जिन्होंने मुझे मारा उनको मैंने भी मारा। अत: इसमें मेरा कोई अपराध नहीं बनता है। यह तो क्रिया की प्रतिक्रिया का प्राकृतिक सिद्धांत है।

महाराजा धृतराष्ट्र लघु भ्राता नीति के महा पंडित विदुर ने अपने नीति वाक्यों (विदुर नीति) में जैसे से तैसा बरतने की आज्ञा दी है। जो जैसा करे उसके साथ वैसा ही बर्ताव करो। जो तुम्हारे साथ हिंसा करता है, तुम भी उसके प्रतिकार में उसकी हिंसा करो! इसमें मैं कोई दोष नहीं मानता क्योंकि शठ के साथ शठता ही करने में उपाय पक्ष का लाभ है।

श्रीकृष्ण जी ने भी ऐसा ही कहा है, हे पाण्डव ! मेरी प्रतिज्ञा निश्चित है, कि धर्म की स्थापना के लिए मैं उन्हें मारता हूँ, जो धर्म का लोप (नाश) करने वाले हैं। वेदादि शास्त्रों के प्रमाणों से यह तो निश्चय हो गया कि आत्मरक्षा अथवा देशहित के लिए दुष्टों, आततायियों तथा राक्षसों को मारना पुण्य है। यहाँ एक प्रश्न उपस्थित होता है कि कभी-कभी कोई किसी निरपराधी पर आक्रमण करे तो इस पर आर्य का विचार है कि छली को छल से मारने में कभी संकोच न करें – अर्थात् छल, कपट, आदि से भी शत्रु को मार देना चाहिए। ऐसे समय में यदि नियम और अनियमों के गोरखधन्धे में योद्धा , शासक फँसा रहेगा, तो कार्य सिद्धि नहीं होगी।