हाल ही में केंद्र सरकार ने चार वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए क्लोरफेनिरामाइन मेलिएट और फिनाइलएफ्रिन हाइड्रोक्लोराइड के संयोजन वाली सभी दवाओं के निर्माण, बिक्री और वितरण पर रोक लगा दी है। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) की 18 अगस्त 2026 की अधिसूचना में इसका स्पष्ट उल्लेख है। यह निर्णय बच्चों में इन दवाओं के उपयोग को लेकर विशेषज्ञों और Drugs Technical Advisory Board की चिंताओं के बाद लिया गया।
यह फैसला केवल दवाओं पर रोक की खबर नहीं है, बल्कि हमें अपने उस पारंपरिक जीवन-विधान को भी याद करने का अवसर देता है, जिसमें बच्चों की हर छोटी-मोटी सर्दी, खांसी और जुकाम के लिए तुरंत दवाओं का सहारा नहीं लिया जाता था। कभी भारतीय परिवारों में बच्चे को मौसम बदलने पर सर्दी-जुकाम होने पर मां सबसे पहले उसके आराम, भोजन और घरेलू देखभाल पर ध्यान देती थी। अदरक, तुलसी, हल्दी वाला दूध जैसे पारंपरिक पदार्थ अनेक घरों में सामान्य घरेलू स्वास्थ्य-परंपरा का हिस्सा रहे हैं। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि हर बीमारी का इलाज घरेलू नुस्खों से किया जा सकता है या बच्चों को बिना चिकित्सकीय सलाह के कोई औषधि दी जानी चाहिए।
भारतीय चिकित्सा परंपरा की विशेषता यह रही कि उसने बच्चों को केवल छोटे वयस्क के रूप में नहीं देखा। आयुर्वेद में कौमारभृत्य बाल चिकित्सा की स्वतंत्र शाखा है। काश्यप संहिता जैसे ग्रंथों में शिशु के जन्म से लेकर उसके पोषण, पालन-पोषण, स्वास्थ्य संरक्षण और रोगों की चिकित्सा तक का वर्णन मिलता है।
अर्थात आयुर्वेद की दृष्टि केवल बीमारी आने के बाद दवा देने तक सीमित नहीं थी। बच्चे का उचित आहार, पाचन शक्ति, शारीरिक बल, मानसिक विकास और स्वस्थ जीवनचर्या भी उसके स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण हिस्सा माने गए।
यही बात आज के समय में विशेष रूप से विचारणीय है। बच्चों की प्रत्येक छींक, हल्की खांसी या सामान्य जुकाम को तुरंत दवा से दबाने के बजाय पहले यह समझना चाहिए कि बच्चे को वास्तव में किस प्रकार की चिकित्सा की आवश्यकता है। आधुनिक चिकित्सा भी छोटे बच्चों में कफ-कोल्ड की दवाओं के इस्तेमाल में सावधानी पर जोर देती है।
आयुर्वेद में बाल स्वास्थ्य से जुड़ी एक महत्वपूर्ण परंपरा सुवर्णप्राशन की भी रही है। काश्यप संहिता में इसका उल्लेख करते हुए कहा गया है कि ”सुवर्णप्राशनं ह्येतन्मेधाग्निबलवर्धनम्। आयुष्यं मङ्गलं पुण्यं वृष्यं वण्र्यं ग्रहापहम्॥”
इसके आगे ग्रंथ में सुवर्णप्राशन के संबंध में मेधा, बल और स्मरणशक्ति आदि से जुड़े लाभों का वर्णन मिलता है। आयुर्वेदिक औषधि भी बच्चे को योग्य चिकित्सक की सलाह से ही दी जानी चाहिए।
फिर भी यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि भारतीय चिकित्सा परंपरा में सदियों पहले ही बच्चों के स्वास्थ्य को मजबूत बनाने और उनकी शारीरिक-मानसिक वृद्धि पर विशेष विचार किया गया था।
आज आवश्यकता किसी एक चिकित्सा पद्धति को दूसरी के विरुद्ध खड़ा करने की नहीं है। आधुनिक चिकित्सा ने गंभीर संक्रमणों और आपात स्थितियों में मानव जीवन को बचाने में असाधारण योगदान दिया है। वहीं हमारी पारंपरिक चिकित्सा और जीवनशैली में आहार, दिनचर्या, स्वच्छता और स्वास्थ्य-संरक्षण से जुड़ा व्यापक अनुभव मौजूद है।
इसलिए रास्ता बीच का होना चाहिए। सामान्य सर्दी-जुकाम में अनावश्यक दवाओं से बचना चाहिए, लेकिन तेज बुखार, सांस लेने में परेशानी, अत्यधिक सुस्ती, पानी की कमी या अन्य गंभीर लक्षण होने पर बच्चे को तुरंत चिकित्सक के पास ले जाना चाहिए।
सरकार का यह निर्णय हमें यही संदेश देता है कि बच्चे के स्वास्थ्य में ”हर बीमारी की एक दवा” वाली मानसिकता के बजाय सही समय पर सही उपचार और बेहतर स्वास्थ्य-संरक्षण की जरूरत है।
हमारी माताओं की रसोई, आयुर्वेद की बाल चिकित्सा परंपरा और आधुनिक विज्ञान तीनों को विवेक के साथ समझने की जरूरत है। आधुनिक चिकित्सा को अनावश्यक दवा-निर्भरता का पर्याय भी न बनने दिया जाए। इसी दिशा में भारतीय धरोहर पिछले डेढ़ दशक से कार्य कर रही है।





