पीढिय़ों को नाम नहीं, संस्कार चाहिए

हाल के दिनों में GEN Z की चर्चा खूब हो रही है। कहीं इसे नई पीढ़ी की पहचान बताया जा रहा है तो कहीं GEN Z के नाम पर हुई अराजकता, अश्लीलता और अनुशासनहीनता को लेकर बहस छिड़ी हुई है। सोशल मीडिया ने इस चर्चा को और व्यापक बना दिया है। लेकिन इस पूरे विमर्श के बीच एक बुनियादी प्रश्न पर विचार करना जरूरी है। क्या मनुष्य को उसकी जन्मतिथि के आधार पर किसी एक पीढ़ी के खांचे में बांट देना वास्तव में भारतीय समाज और उसकी जीवन-दृष्टि के अनुकूल है?

भारतीय संस्कृति और सभ्यता में GEN Z, GEN X या GEN Alpha जैसे शब्दों के लिए कोई स्थान नहीं रहा है। भारत की परंपरा ने मनुष्य को किसी विशेष दशक में जन्म लेने के आधार पर नहीं, बल्कि उसके जीवन के चरणों, कर्तव्यों, संस्कारों और आचरण के आधार पर समझा है। भारतीय जीवन-दृष्टि में बचपन है, युवावस्था है, प्रौढ़ावस्था है और वृद्धावस्था है। ये अवस्थाएं किसी एक पीढ़ी की संपत्ति नहीं हैं, बल्कि प्रत्येक मनुष्य के जीवन की स्वाभाविक यात्रा हैं।
आज जो व्यक्ति युवा है, कल वह प्रौढ़ होगा और आगे चलकर वृद्ध भी होगा। यही जीवन का शाश्वत सत्य है। आने वाले सौ वर्षों में भी मनुष्य जन्म लेगा, बाल्यावस्था से गुजरेगा, युवा होगा, परिवार और समाज के प्रति अपने दायित्व निभाएगा और अंतत: वृद्धावस्था में पहुंचेगा। इसलिए युवावस्था को किसी एक कालखंड या जन्म-वर्ष के समूह के साथ स्थायी रूप से जोड़ देना एक सीमित दृष्टिकोण है।

युवा होना कोई पीढ़ी नहीं, जीवन की एक अवस्था है। आज GEN Z के नाम पर जो कुछ कहा जा रहा है, उसमें तकनीक और आधुनिक संसाधनों के इस्तेमाल को भी पीढ़ी की पहचान से जोड़ दिया जाता है। लेकिन क्या मोबाइल फोन केवल GEN Z इस्तेमाल करता है? क्या इंटरनेट केवल युवा चलाते हैं? क्या सोशल मीडिया केवल नई पीढ़ी की दुनिया है? बिल्कुल नहीं।

आज स्मार्टफोन प्रौढ़ व्यक्ति के हाथ में भी है और साठ वर्ष से अधिक आयु का व्यक्ति भी इंटरनेट, डिजिटल भुगतान, सोशल मीडिया और ऑनलाइन सेवाओं का इस्तेमाल कर रहा है। तकनीक का उपयोग उम्र से नहीं, आवश्यकता और उपलब्धता से निर्धारित होता है। इसलिए किसी व्यक्ति के आधुनिक संसाधनों का इस्तेमाल करने मात्र से उसे GEN Z या GEN Alpha की मानसिकता वाला मान लेना उचित नहीं है।

मोबाइल फोन किसी के हाथ में ज्ञान का माध्यम बन सकता है तो किसी दूसरे के हाथ में अश्लीलता का साधन। इंटरनेट किसी के लिए शिक्षा, रोजगार और शोध का माध्यम हो सकता है तो कोई उसका इस्तेमाल अफवाह, गाली-गलौज और अराजकता फैलाने के लिए कर सकता है। इसमें दोष उपकरण का नहीं, उसके उपयोगकर्ता की मानसिकता और संस्कार का है।

भारत की परंपरा में आयु के साथ उत्तरदायित्व बढ़ता है। बालक से अपेक्षा है कि वह शिक्षा और संस्कार ग्रहण करे। युवा से अपेक्षा है कि वह अपने सामथ्र्य का उपयोग परिवार, समाज और राष्ट्र के निर्माण में करे। प्रौढ़ व्यक्ति अनुभव के आधार पर मार्गदर्शन करे और वृद्ध व्यक्ति अपने अनुभव तथा ज्ञान से अगली पीढ़ी को दिशा दे। यह व्यवस्था किसी त्रश्वहृ के आधार पर नहीं, बल्कि जीवन की स्वाभाविक अवस्थाओं और सामाजिक दायित्वों पर आधारित है।

यही कारण है कि भारतीय समाज में बुजुर्ग केवल उम्रदराज व्यक्ति नहीं रहे, बल्कि अनुभव के स्रोत माने गए। युवाओं को केवल इसलिए श्रेष्ठ नहीं माना गया कि वे नए हैं और बुजुर्गों को इसलिए अप्रासंगिक नहीं माना गया कि वे पुराने हैं। भारतीय दृष्टि में अनुभव और ऊर्जा दोनों का अपना महत्व है।